स्वर्लोक: वैदिक वाङ्मय, ब्रह्मांड विज्ञान एवं शास्त्रीय संहिताओं के परिप्रेक्ष्य में एक सर्वांगीण और अत्यंत गहन शोध-वृत्तांत
प्रस्तावना एवं स्वर्लोक का शास्त्रीय तथा तात्विक स्वरूप
सनातन धर्म के अत्यंत प्रामाणिक और गूढ़ वाङ्मय—विशेषकर अष्टादश महापुराणों (विष्णु, भागवत, ब्रह्मांड, गरुड़, और मार्कंडेय), स्मृतियों, और इतिहास ग्रंथों (महाभारत)—में ब्रह्मांड की उत्पत्ति, संरचना और इसके विभिन्न स्तरों का जो अत्यंत सूक्ष्म, गणितीय और वैज्ञानिक विवरण प्राप्त होता है, उसमें "स्वर्लोक" या स्वर्ग का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण और केंद्रीय है। वैदिक त्रिलोकी की संकल्पना, जिसे 'व्याहृतियों' (भूर्भुवः स्वः) के रूप में जाना जाता है, उसमें स्वर्लोक तीसरा और सबसे प्रधान ऊर्ध्व लोक है। मीमांसा दर्शन और शास्त्रीय संहिताओं में स्वर्ग की परिभाषा किसी सामान्य भौतिक स्थान से अधिक एक ऐसी विशुद्ध सात्त्विक अवस्था और ऊर्ध्व ऊर्जा-क्षेत्र के रूप में दी गई है, जहाँ सांसारिक और भौतिक दुखों का सर्वथा अभाव होता है। प्राचीन शास्त्रों, विशेषकर मीमांसा न्याय प्रकाश और अन्य दर्शन ग्रंथों में स्वर्ग को अत्यंत स्पष्ट शब्दों में परिभाषित करते हुए एक प्रसिद्ध श्लोक उद्धृत किया गया है:
इस श्लोक का तात्विक अर्थ यह है कि वह सुख जो किसी भी प्रकार के सांसारिक दुःख, क्लेश या पीड़ा से तनिक भी मिश्रित नहीं है, जिसके पश्चात भविष्य में किसी भी प्रकार के कष्ट या पतन का आवरण नहीं है, और जो केवल अभिलाषा (इच्छा) करने मात्र से स्वतः प्राप्त हो जाता है, उस परम सात्त्विक और दिव्य सुख के आश्रय स्थल को ही स्वर्लोक या स्वर्ग कहा जाता है।
पौराणिक ब्रह्मांड विज्ञान के अंतर्गत स्वर्लोक कोई अमूर्त विचार या केवल मानसिक कल्पना नहीं है, अपितु इसका एक अत्यंत सटीक भौगोलिक (ब्रह्मांडीय) स्थान, भौतिक विस्तार, गणितीय मापन (योजनों में) और एक निश्चित प्रशासनिक पदानुक्रम है। विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचलक्षण सिद्धांत के अंतर्गत 'सर्ग' (सृष्टि की उत्पत्ति) और 'प्रतिसर्ग' (सृष्टि का लय या प्रलय) के वर्णन में इस लोक की पूर्ण उत्पत्ति, इसकी स्थिति और इसके विनाश का अत्यंत सुस्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है। ब्रह्मांड पुराण में वर्णित चौदह भुवनों (लोकों) के पदानुक्रम में स्वर्लोक न केवल पृथ्वी से ऊपर स्थित है, बल्कि यह उन उच्चतर लोकों (महर्लोक, जनलोक, तपलोक, सत्यलोक) की ओर जाने वाले आध्यात्मिक मार्ग का पहला और सबसे महत्वपूर्ण सोपान भी है, जो भौतिक सृष्टि और विशुद्ध आध्यात्मिक सृष्टि के मध्य एक सेतु का कार्य करता है। यह लोक उन पुण्यात्माओं, देवों, गंधर्वों, चारणों, विद्याधरों और सिद्ध ऋषियों का निवास स्थान है जिन्होंने अपने पूर्व जन्मों में सकाम कर्मों, वैदिक यज्ञों, महादान और कठोर तपस्या के माध्यम से असीम पुण्य अर्जित किया है。
ब्रह्मांडीय पदानुक्रम एवं स्वर्लोक का खगोलीय स्थान
पुराणों के अनुसार संपूर्ण ब्रह्मांड (हिरण्यगर्भ) एक अंडगोलाकार संरचना है, जिसे मुख्य रूप से 14 लोकों में विभाजित किया गया है। ये लोक 7 ऊर्ध्व लोकों और 7 अधोलोकों (या पाताल) में विभक्त हैं। स्वर्लोक ऊर्ध्व लोकों की श्रेणी में आता है। ब्रह्मांड पुराण, विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध में इन लोकों की सटीक दूरियों और उनके स्थानिक संबंधों का गणितीय और ज्योतिषीय वर्णन किया गया है, जो इस लोक की ब्रह्मांडीय स्थिति को पूर्णतः स्पष्ट करता है।
श्रीमद्भागवत के अनुसार, पृथ्वी (भूर्लोक) के ठीक ऊपर का क्षेत्र अंतरिक्ष है, जिसे भुवर्लोक कहा जाता है। भुवर्लोक का विस्तार वहीं तक है जहाँ तक वायु का प्रवाह होता है, बादल तैरते हैं, और पक्षी (हंस, उकाब आदि) उड़ान भर सकते हैं। पृथ्वी से सूर्य की दूरी 1 लाख योजन (अर्थात् लगभग 800,000 मील) बताई गई है। सूर्य मंडल से ठीक ऊपर स्वर्लोक का आरंभ होता है। ब्रह्मांड पुराण और भागवत पुराण स्पष्ट करते हैं कि सूर्य से लेकर ध्रुवलोक (ध्रुव तारा) तक के बीच के संपूर्ण ब्रह्मांडीय अंतराल को स्वर्लोक या स्वर्ग के प्रभाव क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। ध्रुवलोक, जो कि सप्तर्षि मंडल से भी 13 लाख योजन (1,300,000 योजन या 10,400,000 मील) ऊपर स्थित है, स्वर्लोक की सर्वोच्च खगोलीय सीमा को स्पर्श करता है। सूर्य से ध्रुवलोक तक की यह विशाल दूरी ही वह क्षेत्र है जहाँ स्वर्ग के विभिन्न उप-लोक, देव-विमान, और ज्योतिर्मय नक्षत्र निवास करते हैं。
| लोक का नाम | वर्ग | ब्रह्मांडीय स्थिति, दूरी और प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| सत्यलोक (ब्रह्मलोक) | ऊर्ध्व लोक | ब्रह्मांड का सर्वोच्च लोक, जो तपलोक से 12 करोड़ योजन (960,000,000 मील) ऊपर स्थित है। यह ब्रह्मा का निवास है। |
| तपलोक | ऊर्ध्व लोक | यह लोक जनलोक से 8 करोड़ योजन (640,000,000 मील) ऊपर स्थित है। यहाँ वैराज नामक तपस्वी निवास करते हैं। |
| जनलोक | ऊर्ध्व लोक | महर्लोक से 2 करोड़ योजन (160,000,000 मील) ऊपर स्थित। यहाँ ब्रह्मा के मानस पुत्र (सनकादि) रहते हैं। |
| महर्लोक | ऊर्ध्व लोक | यह ध्रुवलोक (स्वर्लोक की सीमा) से 1 करोड़ योजन (80,000,000 मील) ऊपर स्थित है। भृगु आदि ऋषि यहाँ रहते हैं। |
| स्वर्लोक | ऊर्ध्व लोक | सूर्य से लेकर ध्रुव तारा तक का विस्तृत ज्योतिर्मय क्षेत्र। देवों, पुण्यातमाओं और नक्षत्रों का निवास। |
| भुवर्लोक (अंतरिक्ष) | ऊर्ध्व लोक | पृथ्वी से सूर्य के मध्य का क्षेत्र (1 लाख योजन विस्तार)। यक्ष, गंधर्व, चारण और विद्याधरों का विचरण क्षेत्र। |
| भूर्लोक (पृथ्वी) | ऊर्ध्व लोक | मानवों का निवास और कर्मभूमि। सुमेरु पर्वत इसका केंद्र है। |
| अतल | अधोलोक | भूर्लोक के नीचे का प्रथम पाताल। मय दानव के पुत्र बल का निवास। |
| वितल | अधोलोक | अतल के नीचे। भगवान शिव (भव) और भवानी का निवास, जहाँ हाटकी नदी बहती है। |
| सुतल | अधोलोक | वितल के नीचे। विरोचन पुत्र बलि महाराज का निवास, जहाँ भगवान वामन द्वारपाल हैं। |
| तलातल | अधोलोक | सुतल के नीचे। मय दानव का निवास, जिसे शिव का अभय प्राप्त है। |
| महातल | अधोलोक | तलातल के नीचे। कद्रू के पुत्र अनेक फनों वाले सर्पों (कुहक, तक्षक, कालिय) का निवास। |
| रसातल | अधोलोक | महातल के नीचे। दिति और दनु के पुत्रों (पणि, निवात-कवच) का निवास। |
| पाताल (नागलोक) | अधोलोक | ब्रह्मांड का सबसे निचला लोक। वासुकि, शंख और धनंजय जैसे नागों का निवास। |
इस प्रकार, ब्रह्मांड की ऊर्ध्वाधर संरचना में स्वर्लोक भौतिक जगत (मर्त्यलोक) और विशुद्ध आध्यात्मिक जगत (महर्लोक से सत्यलोक तक) के ठीक मध्य में स्थित एक विशाल संक्रमण क्षेत्र है। इस लोक में जाने के लिए आत्माओं को भुवर्लोक की सीमाओं को पार करना पड़ता है।
सुमेरु पर्वत: स्वर्लोक का भौगोलिक केंद्र और इलावृत वर्ष
स्वर्लोक का सबसे भौतिक, भौगोलिक और प्रत्यक्ष केंद्र सुमेरु पर्वत की चोटी को माना जाता है। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कंध के सोलहवें अध्याय में सुमेरु पर्वत और उसके आसपास के क्षेत्रों (वर्षों) का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है। इस वर्णन के अनुसार, सुमेरु पर्वत कमल के आकार के इस ब्रह्मांड का मध्य भाग (या कर्णिका) है, जो जम्बूद्वीप के ठीक मध्य 'इलावृत वर्ष' में स्थित है। यह संपूर्ण इलावृत वर्ष पूरी तरह से स्वर्ण से निर्मित है। सुमेरु पर्वत की संरचना अत्यंत विशाल है; इसका आधार 32,000 योजन चौड़ा है, यह पृथ्वी के नीचे 16,000 योजन तक गहराई में धंसा हुआ है, और पृथ्वी के ऊपर इसका विस्तार 84,000 योजन की ऊँचाई तक है। इसी सुमेरु पर्वत के सर्वोच्च शिखर पर साक्षात् स्वर्ग की राजधानियां और देवताओं के निवास स्थान स्थित हैं। सुमेरु पर्वत के चारों ओर कुरंग, कुरर, कुसुम्भ, त्रिकूट आदि कई पर्वत श्रृंखलाएं कमल की पंखुड़ियों के समान व्यवस्थित हैं।
सुमेरु पर्वत पर निवास करने वाले देवताओं के विश्राम और मनोरंजन के लिए 4 मुख्य दिव्य उद्यानों का निर्माण किया गया है, जिन्हें नंदन, चैत्ररथ, वैभ्राजक, और सर्वतोभद्र कहा जाता है। इन उद्यानों में कल्पवृक्ष और पारिजात जैसे वृक्ष सुशोभित हैं, जो निवासियों की प्रत्येक इच्छा की पूर्ति तत्काल करते हैं। यहाँ देवगण, गंधर्व, अप्सराएं, और चारण अपनी पत्नियों के साथ विहार करते हैं। भागवत पुराण के अनुसार, स्वर्ग के इस क्षेत्र में 4 विशाल और दिव्य झीलें स्थित हैं, जिनमें क्रमशः सबसे शुद्ध जल, दूध, शहद और गन्ने का रस भरा हुआ है। इन झीलों के सेवन से देवताओं और स्वर्ग के निवासियों में अष्ट-सिद्धियों (अणिमा, महिमा, लघिमा आदि) और योग की प्राकृतिक शक्तियों का स्वतः संचार होता है।
स्वर्लोक की नदियों का वर्णन भी अत्यंत अद्भुत और पृथ्वी की नदियों से सर्वथा भिन्न है। सुमेरु के निकट मंदराचल पर्वत के ढलानों पर 'देवचूत' नामक विशाल आम्र वृक्ष स्थित हैं। इन वृक्षों से पर्वत के शिखरों के समान बड़े आकार के आम के फल टूटकर गिरते हैं। जब ये विशाल फल फूटते हैं, तो उनके अत्यंत मीठे रस से 'अरुणोदा' नामक एक पूरी नदी का निर्माण होता है। इसी प्रकार, मेरुमंदराचल पर्वत पर 'जम्बू' (गूलर या जामुन) के अत्यंत विशाल फल (जो हाथियों के आकार के होते हैं) 10,000 योजन की ऊँचाई से गिरते हैं। उनके रस से 'जम्बू-नदी' नामक सरिता बहती है। इन नदियों के तटों की मिट्टी जब इस दिव्य रस से सराबोर होती है और सूर्य तथा वायु के संपर्क में आती है, तो वह सूखकर एक विशेष प्रकार के स्वर्ण में परिवर्तित हो जाती है, जिसे 'जाम्बूनद' स्वर्ण कहा जाता है। स्वर्ग की देवियां और विद्याधर इसी जाम्बूनद स्वर्ण का उपयोग अपने मुकुट, कंगन, करधनी और अन्य दिव्य आभूषणों के निर्माण के लिए करते हैं। कुमुद पर्वत पर शतवल्श नामक एक विशाल बरगद का वृक्ष है, जिससे दूध, दही, शहद, और घी की नदियां उत्पन्न होती हैं, जो स्वर्लोक के निवासियों को वस्त्र और आभूषण भी प्रदान करती हैं।
स्वर्लोक के सप्त महाद्वीप (सप्त द्वीप) और उनका स्वर्गीय स्वरूप
श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कंध के बीसवें अध्याय में जम्बूद्वीप के अतिरिक्त 6 अन्य महाद्वीपों (द्वीपों) का वर्णन है, जो स्वर्लोक के विस्तृत और क्षैतिज फैलाव को दर्शाते हैं। यद्यपि इन्हें 'द्वीप' कहा गया है, परंतु शास्त्रों में स्पष्ट है कि इन द्वीपों के निवासियों का जीवन देवताओं के समान (स्वर्गिक) है। महर्षि शुकदेव जी ने इन द्वीपों का वर्णन करते हुए एक श्लोक उद्धृत किया है:
अर्थात्, शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि अब मैं प्लक्ष आदि 6 द्वीपों के परिमाण, लक्षण और संरचना का वर्णन करूँगा। इन द्वीपों का विवरण निम्नलिखित है, जो स्वर्लोक के विस्तृत ऐश्वर्य को प्रमाणित करता है:
- 1. प्लक्ष द्वीप: यह जम्बूद्वीप के खारे जल के महासागर के पार स्थित है और इसका आकार जम्बूद्वीप से दोगुना है। इसका नाम एक विशाल 'प्लक्ष' (पाकड़) वृक्ष के नाम पर पड़ा है, जिसकी जड़ों से 7 ज्वालाओं वाली अग्नि प्रज्वलित होती है। यहाँ के शासक इध्मजिह्व (प्रियव्रत के पुत्र) थे, जिन्होंने इसे अपने 7 पुत्रों (शिव, यवस, सुभद्र, शांत, क्षेम, अमृत और अभय) के नाम पर 7 वर्षों (खंडों) में विभाजित किया। यहाँ के निवासी हंस, पतंग, ऊर्ध्वायन और सत्यांग कहलाते हैं, जो 1000 वर्षों तक देवताओं के समान जीवन जीते हैं और सूर्य देव की उपासना करते हैं।
- 2. शाल्मल द्वीप: प्लक्ष द्वीप के पार इक्षुरस (गन्ने के रस) का महासागर है, और उसके पार शाल्मल द्वीप है। यह द्वीप प्लक्ष से भी दोगुना बड़ा है और सुरा (मदिरा) के महासागर से घिरा हुआ है। इसका नाम एक विशाल 'शाल्मली' वृक्ष के नाम पर है, जो भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ का निवास स्थान है। यहाँ के शासक यज्ञबाहु थे, और यहाँ की 7 प्रमुख नदियां अनुमति, सिनीवाली, सरस्वती, कुहू, रजनी, नंदा और राका हैं। यहाँ के निवासी चंद्र देव (सोम-आत्मा) की पूजा करते हैं।
- 3. कुश द्वीप: सुरा के महासागर के पार कुश द्वीप है, जो घी के सागर से घिरा है। यहाँ की उत्पत्ति कुश घास से हुई है, जो अग्नि के समान दैवीय आभा बिखेरती है और सभी दिशाओं को प्रकाशित करती है। हिरण्यरेता इसके शासक थे। यहाँ के निवासी कुसल, कोविद, अभियुक्त और कुलक कहलाते हैं, और वे अग्नि देव (जातवेद) की पूजा करते हैं।
- 4. क्रौंच द्वीप: घी के सागर के पार क्रौंच द्वीप है, जो दूध (क्षीर) के सागर से घिरा है। इसका नाम क्रौंच पर्वत के नाम पर है। यहाँ के शासक घृतपृष्ठ थे। यहाँ शुक्ल, वर्धमान, भोजन, उपबर्हिण, नन्द, नंदन और सर्वतोभद्र नामक 7 पर्वत हैं। यहाँ के निवासी पुरुष, ऋषभ, द्रविण और देवक कहलाते हैं, जो वरुण देव (जल के देवता) की उपासना करते हैं।
- 5. शाक द्वीप: क्षीर सागर के पार 3.2 मिलियन (32 लाख) योजन चौड़ा शाक द्वीप है, जो मट्ठे (दधि) के सागर से घिरा है। यहाँ एक सुगंधित शाक (अंजीर या सागौन) का वृक्ष है जिसकी सुगंध पूरे द्वीप में फैलती है। यहाँ के शासक मेधातिथि थे। यहाँ ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामक निवासी रहते हैं, जो वायु देव की पूजा करते हैं।
- 6. पुष्कर द्वीप: मट्ठे के सागर के पार पुष्कर द्वीप है, जो मीठे जल के सागर से घिरा है। यहाँ 10 करोड़ (100 मिलियन) पंखुड़ियों वाला एक विशाल स्वर्ण कमल है, जो स्वयं ब्रह्मा जी का आसन है। इस द्वीप के मध्य में 'मानसोत्तर' नामक पर्वत श्रृंखला है, जो 10,000 योजन ऊँची है। इसी पर्वत पर देवराज इन्द्र, यमराज, वरुण और चंद्र देव (सोम) की राजधानियां स्थित हैं। अतः पुष्कर द्वीप का मानसोत्तर पर्वत स्वर्लोक का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र है।
इन सभी द्वीपों में रहने वाले लोग पूर्णतः स्वर्गिक जीवन व्यतीत करते हैं, जहाँ बुढ़ापा, रोग, और मानसिक कष्ट नहीं होते। वे मानसिक दृढ़ता और शारीरिक शक्ति में पूर्णता प्राप्त होते हैं और स्वर्ग के द्वार पर वैदिक अनुष्ठान करते हैं। मीठे जल के सागर के पार लोकालोक पर्वत है, जो प्रकाश और अंधकार के बीच की ब्रह्मांडीय सीमा निर्धारित करता है। लोकालोक के पार अलोक-वर्ष का अंधकारमय क्षेत्र है जहाँ कोई जीव नहीं रहता।
ऊर्ध्व खगोल और शिशुमार चक्र: स्वर्लोक का ज्योतिषीय और दार्शनिक आधार
स्वर्लोक केवल पर्वतों और उद्यानों तक सीमित नहीं है, अपितु इसका खगोलीय और ज्योतिषीय स्वरूप अत्यंत विस्तृत है। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कंध के तेईसवें अध्याय में स्वर्लोक के ऊपरी भाग में स्थित तारा-मंडलों, ग्रहों और नक्षत्रों के विन्यास का अत्यंत अद्भुत वर्णन किया गया है। इस सम्पूर्ण खगोलीय व्यवस्था को महर्षि शुकदेव जी ने 'शिशुमार' (एक प्रकार का जल-जंतु) के रूप में वर्णित किया है, जो भगवान वासुदेव के विराट स्वरूप का ही एक दृश्यमान अंग है।
यह शिशुमार चक्र ही वह अदृश्य ब्रह्मांडीय ढांचा है, जिसके इर्द-गिर्द संपूर्ण स्वर्लोक की व्यवस्था घूमती है। इस चक्र की धुरी 'ध्रुवलोक' है, जो सप्तर्षि मंडल से 13 लाख योजन ऊपर स्थित है। भागवत पुराण के अनुसार:
अर्थात्, यह शिशुमार चक्र ग्रहों, नक्षत्रों और तारों से निर्मित भगवान का आधिदैविक स्वरूप है। जो भी व्यक्ति दिन में 3 बार इसका स्मरण और नमन करता है, उसके उस समय के समस्त पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। शिशुमार चक्र के अंग-विन्यास में स्वर्ग के समस्त प्रमुख देवताओं और नक्षत्रों का स्थान निर्धारित है, जो ब्रह्मांडीय प्रशासन को दर्शाता है:
- 1. पूंछ: शिशुमार की पूंछ के अंतिम छोर पर स्थिर तारा ध्रुव स्थित है। पूंछ के अन्य भागों में प्रजापति, अग्नि देव, इन्द्र (स्वर्ग के राजा) और धर्मराज स्थित हैं। पूंछ के आधार पर धाता और विधाता का स्थान है।
- 2. शरीर और कुंडल: इसके कूल्हे पर सप्तर्षि मंडल स्थित है। शिशुमार का शरीर दाईं ओर मुड़ा हुआ है। इसके उत्तरी भाग में अभिजित से लेकर पुनर्वसु तक 14 नक्षत्र स्थित हैं, और दक्षिणी भाग में पुष्य से लेकर उत्तराषाढ़ा तक 14 नक्षत्र स्थित हैं।
- 3. पीठ और पेट: इसकी पीठ पर अजवीथी (मूल, पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा) नक्षत्र हैं, और इसका पेट साक्षात 'आकाशगंगा' है।
- 4. अन्य अंग और नक्षत्र: इसके कटि भाग पर पुनर्वसु और पुष्य; पंखों पर आर्द्रा और अश्लेषा; नथुनों पर अभिजित और उत्तराषाढ़ा; आंखों पर श्रवण और पूर्वाषाढ़ा; तथा कानों पर धनिष्ठा और मूल नक्षत्र स्थित हैं। इसके बाएँ और दाएँ पसलियों पर मघा और मृगशीर्ष सहित 8-8 नक्षत्र स्थित हैं। कंधों पर शतभिषा और ज्येष्ठा हैं।
- 5. आंतरिक और मुख संबंधी अंग: शिशुमार के ऊपरी जबड़े पर महर्षि अगस्त्य और निचले जबड़े पर यमराज स्थित हैं। इसका मुख मंगल ग्रह है, जननांग शनि ग्रह है, गर्दन के पिछले भाग में बृहस्पति और गर्दन में राहु स्थित है। इसके हृदय में साक्षात भगवान नारायण, मन में चंद्र देव, नाभि में शुक्र ग्रह और श्वास में बुध ग्रह स्थित हैं।
यह शिशुमार चक्र समय (काल) के पहिए के अनुसार एक अकल्पनीय और सर्वशक्तिमान बल द्वारा संचालित होता है। जिस प्रकार बैल धान कूटने के खंभे से बंधे रहकर उसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं, उसी प्रकार ये समस्त ग्रह और देवता काल-चक्र से बंधे रहकर ध्रुवलोक की परिक्रमा करते हैं। जो योगी इस स्वरूप का ध्यान करते हैं, वे इस मंत्र का 3 बार जाप करते हैं: "नमो ज्योतिर्लोकाय कालायनाय अनिमिषां पतये महापुरुषाय अभिधीमहीति" (हम उन ज्योतिर्लोक स्वरूप, काल के नियंत्रक, देवों के स्वामी, महापुरुष भगवान को नमस्कार करते हैं)।
स्वर्लोक की राजधानी: अमरावती नगरी का अलौकिक ऐश्वर्य और वास्तुकला
स्वर्लोक का सबसे प्रमुख और भव्य क्षेत्र देवराज इन्द्र की राजधानी 'अमरावती' है। मार्कंडेय पुराण, महाभारत और बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में भी अमरावती का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है। पुराणों में इसे देवपुर (देवताओं का नगर) और पूषाभासा (सूर्य के समान तेजस्वी) भी कहा गया है。
अमरावती का निर्माण ब्रह्मांड के सर्वोच्च वास्तुकार 'विश्वकर्मा' (जो ब्रह्मा जी या कश्यप के पुत्र माने जाते हैं) द्वारा किया गया है। महाभारत और पुराणों के अनुसार, देवराज इन्द्र की यह नगरी 800 मील की परिधि में फैली हुई है और इसकी ऊँचाई लगभग 40 मील है। इस नगरी के निर्माण में सांसारिक ईंट, पत्थर या मिट्टी का रत्ती भर भी उपयोग नहीं हुआ है, बल्कि यह पूरी तरह से विशुद्ध स्वर्ण (जाम्बूनद) और हीरों से निर्मित है। अमरावती के सभी विशाल महल स्वर्ण-निर्मित हैं और उन महलों के खंभे ठोस हीरों और अमूल्य रत्नों से गढ़े गए हैं।
अमरावती का वातावरण पृथ्वी के किसी भी स्थान से सर्वथा भिन्न है। यहाँ अंधकार का कोई अस्तित्व नहीं है; यहाँ सूर्य की भौतिक ऊष्मा या रात्रि का अंधकार समय का निर्धारण नहीं करता। यहाँ का प्रकाश स्वयं देवताओं के दिव्य शरीरों, उनके स्वर्ण महलों, रत्नों और देव-विमानों की आभा से स्वतः उत्पन्न होता है। यहाँ तापमान सदैव वसंत ऋतु के समान अत्यंत सुखद और ऊर्जावान रहता है। अमरावती में बहने वाली वायु सदैव शीतल और सुगंधित रहती है, क्योंकि यह गुलाब, चमेली, मैगनोलिया, फ्रीसिया और अन्य दिव्य पुष्पों के रस का स्पर्श करते हुए बहती है। महलों की स्वर्ण-दीवारों और मार्गों पर सुगंधित बादाम का सत्त और अन्य दैवीय इत्र छिड़के जाते हैं।
यहाँ सर्वत्र धीमी और अत्यंत मधुर संगीतमय ध्वनियां गूंजती रहती हैं, जिन्हें गंधर्व, किन्नर और अप्सराएं अपनी वीणा और गायन से उत्पन्न करते हैं। अमरावती में देव, दानव, गंधर्व, किन्नर, उरग और रक्षक निवास करते हैं। इसके अतिरिक्त, वे भाग्यशाली मनुष्य जिन्होंने अपने पृथ्वी जीवन में महान यज्ञ किए हैं और पूर्ण धार्मिक जीवन व्यतीत किया है, वे भी देवताओं के समान रूप धारण करके इस नगरी में निवास करने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।
देवराज इन्द्र की राजसभा: सुधर्मा (पुष्कर-मालिनी) का विस्तृत विवरण
अमरावती नगरी के मध्य में वह स्थान है जहाँ से संपूर्ण स्वर्लोक और अन्य लोकों का प्रशासनिक संचालन होता है—देवराज इन्द्र की राजसभा। महाभारत के सभा पर्व (अध्याय 7) में देवर्षि नारद द्वारा धर्मराज युधिष्ठिर को इन्द्र की राजसभा का जो सजीव और अत्यंत विस्तृत वर्णन दिया गया है, वह स्वर्लोक के प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक स्वरूप को स्पष्ट करता है। इस राजसभा को 'सुधर्मा' और कभी-कभी 'पुष्कर-मालिनी' भी कहा जाता है。
नारद जी के अनुसार, इन्द्र की यह तेजोमयी दिव्य सभा सूर्य के समान प्रकाशित होती है और स्वयं देवराज इन्द्र ने 100 यज्ञों (शतक्रतु) का अनुष्ठान पूर्ण करके अपने तपोबल से इस पर विजय प्राप्त की थी। इस सभा की भौतिक विमाएं अत्यंत विशाल हैं; इसकी लंबाई 150 योजन, चौड़ाई 100 योजन और ऊँचाई 5 योजन है। यह सभा कोई पृथ्वी के भवनों के समान स्थिर संरचना नहीं है, बल्कि यह एक 'काम-गामिनी' (इच्छा के अनुसार आकाश में तीव्र या मंद गति से विचरण करने वाली) संरचना है। इस सभा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके भीतर प्रवेश करते ही प्राणी के भीतर से शोक, जरा (बुढ़ापा), थकान, मानसिक चिंता और भय का पूर्णतः नाश हो जाता है।
इस सुधर्मा सभा में सर्वश्रेष्ठ सुवर्ण-सिंहासन पर देवराज इन्द्र अपनी अर्धांगिनी शची (इन्द्राणी) के साथ विराजमान होते हैं। उस समय उनका रूप अवर्णनीय होता है। इन्द्र के मस्तक पर एक अत्यंत दैवीय किरीट (मुकुट) शोभायमान रहता है और उनकी दोनों भुजाओं में लाल रंग के बाजूबंद सुशोभित होते हैं। उनके शरीर पर स्वच्छ श्वेत वस्त्र और कंठ में विचित्र पुष्पों की माला होती है। उनके साथ साक्षात लज्जा, कीर्ति और कान्ति देवियां मूर्तिमान रूप धारण करके उपस्थित रहती हैं।
इस राजसभा में उपस्थित होने वाले सदस्यों का विवरण ब्रह्मांड के सबसे विशिष्ट ज्ञानी जनों की सूची प्रस्तुत करता है। यहाँ सिद्ध, साध्य, मरुद्गण, और देवर्षि अपने तेजोमयी स्वरूप में उपस्थित होते हैं। महाभारत के अनुसार, इस सभा में वे ब्रह्मर्षि और राजर्षि निरंतर आते-जाते रहते हैं जो साक्षात ब्रह्मा जी के समान प्रभावशाली हैं। देवर्षि नारद ने सभा पर्व में उन विशिष्ट ऋषियों और मुनियों के नाम भी गिनाए हैं जो स्वर्लोक की इस सभा के स्थायी या आमंत्रित सदस्य हैं। इनमें प्रमुख हैं: महर्षि पराशर, पर्वत मुनि, सावर्णि, गालव, शंख, लिखित, गौरशिरा, महर्षि दुर्वासा, क्रोधन, श्येन, दीर्घतमा, पवित्रपाणि, याज्ञवल्क्य, भालुकि, उद्दालक, श्वेतकेतु, ताण्डव्य, भाण्डायनि, हविष्मान, गरिष्ठ, राजा हरिश्चन्द्र, उदरशाण्डिल्य, व्यासदेव (पराशर नंदन), कृषीवल, वातस्कन्ध, विशाख, विधाता, काल, करालदन्त, त्वष्टा, विश्वकर्मा और गंधर्व तुम्बुरु।
ये सभी अयोनिज और योनिज महर्षि, जो केवल वायु पीकर (वायुभक्ष) या हविष्य खाकर घोर तपस्या करते हैं, वे अपने तप के प्रभाव से इस सभा में देवराज इन्द्र की उपासना और ब्रह्मांडीय मंत्रणा करते हैं। देवताओं के गुरु बृहस्पति और असुरों के गुरु शुक्राचार्य भी इस सभा में नित्य विराजमान रहते हैं, जो अपने चंद्रमा के समान चमकीले विमानों द्वारा यहाँ उपस्थित होते हैं। भृगु और सप्तर्षि भी इस सभा की शोभा बढ़ाते हैं। यह सभा ब्रह्मांड के शासन, न्याय और यज्ञों के फल-वितरण का सर्वोच्च केंद्र है।
स्वर्लोक के निवासी और उनके वर्ग
स्वर्लोक यद्यपि देवराज इन्द्र के शासन के अधीन है, परंतु यह लोक अत्यंत विविधतापूर्ण है और यहाँ ब्रह्मांड के कई उच्च कोटि के जीव निवास करते हैं। भागवत पुराण, विष्णु पुराण और ब्रह्मांड पुराण के आधार पर यहाँ के निवासियों को निम्नलिखित मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
- 1. देवता: स्वर्लोक के मूल निवासी 33 कोटि (प्रकार) के मुख्य देवता हैं। इनमें 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्विनी कुमार शामिल हैं। इसके अतिरिक्त अग्नि, वायु, वरुण, यम, कुबेर आदि अष्ट-दिक्पाल भी मानसोत्तर और सुमेरु पर्वत की दिशाओं में स्थित अपनी-अपनी स्वर्ण राजधानियों में निवास करते हैं। देवताओं का शरीर पंचभौतिक नहीं होता, बल्कि सात्त्विक ऊर्जा से निर्मित 'भोग-देह' होता है।
- 2. गंधर्व और अप्सराएं: ये स्वर्ग के संगीतकार और नर्तक हैं। गंधर्व गायन वादन में पारंगत होते हैं, जबकि उर्वशी, रंभा, मेनका जैसी अप्सराएं अपनी दिव्यता और नृत्य कला के लिए विख्यात हैं।
- 3. सिद्ध, चारण और विद्याधर: ये वे दिव्य प्राणी हैं जो जन्म से ही अष्ट-सिद्धियों से संपन्न होते हैं और स्वर्ग के ऊपरी आवरण (भुवर्लोक और स्वर्लोक की सीमा) में विचरण करते हैं। चारण देवताओं की कीर्ति का गान करते हैं।
- 4. महर्षि और देवर्षि: जैसा कि सुधर्मा सभा के वर्णन में स्पष्ट हुआ है, उच्च कोटि के ऋषि यहाँ ज्ञान, यज्ञ और वैदिक ऋचाओं के अनुसंधान हेतु निवास करते हैं।
- 5. पुण्यात्मा मनुष्य: मृत्युलोक (पृथ्वी) से वे आत्माएं जिन्होंने अपने जीवन में धर्म का पालन किया, दान दिए, और यज्ञ किए, वे अपने पुण्य के अनुपात में एक निर्धारित अवधि तक स्वर्ग का सुख भोगने यहाँ आते हैं। स्वर्लोक में उन्हें उनके कर्मों के अनुरूप दिव्य शरीर प्राप्त होता है, जिससे वे भूख, प्यास, और बुढ़ापे से मुक्त होकर जीवन व्यतीत करते हैं।
स्वर्लोक की प्राप्ति के शास्त्रीय मार्ग: गरुड़ पुराण के प्रेतखंड का विश्लेषण
स्वर्लोक की प्राप्ति किसी भी आत्मा के लिए स्वतः या सहज नहीं होती। गरुड़ पुराण (विशेषकर इसके प्रेत खंड) और अन्य स्मृतियों में उन विशिष्ट कर्मों और मार्गों का अत्यंत विस्तृत वर्णन है जिनके माध्यम से जीवात्मा मृत्युलोक से स्वर्लोक की लंबी और कठिन यात्रा करती है。
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्युलोक (पृथ्वी) और यमलोक के मध्य की कुल दूरी 86,000 योजन है। साधारण और पापी जीवों के लिए यह मार्ग अत्यंत भयंकर और कष्टदायक होता है। यमदूतों के पाश में बंधे पापी जीवों को जलती हुई रेत, भयंकर अंधकार, प्यास और भयंकर 'वैतरणी' नदी का सामना करना पड़ता है। यमदूत उन्हें कोड़े मारते हुए ले जाते हैं, और आत्मा बार-बार गिरती और उठती है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि जो लोग अपने मित्रों, अतिथियों और परिवार के सामने अकेले ही स्वादिष्ट भोजन खाते हैं, उन्हें नरक में जलते हुए अंगारे चबाने पड़ते हैं।
परंतु, जिन व्यक्तियों ने अपने जीवन में धर्मशास्त्रों के अनुसार आचरण किया है, जिन्होंने प्यासों के लिए कुएं और तालाब खुदवाए हैं, और विशेषकर ब्राह्मणों को भूमि, गौ (गाय) और तिल का दान किया है, उनके लिए यह मार्ग अत्यंत सुलभ और बाधारहित हो जाता है। गरुड़ पुराण स्पष्ट करता है कि तिल और गौ का दान मनुष्य के समस्त पापों को नष्ट कर देता है और यह सीधे स्वर्ग का द्वार खोल देता है। ये दान केवल सुपात्र ब्राह्मणों को ही दिए जाने चाहिए।
मृत्यु के समय की मनःस्थिति और भगवान के स्मरण का भी स्वर्लोक प्राप्ति में अत्यंत महत्व है। गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्युशैया पर पड़े व्यक्ति के निकट शालग्राम शिला रखनी चाहिए, उसके दोनों हाथों और गले पर तुलसी दल रखना चाहिए, और शरीर के नौ छिद्रों में स्वर्ण के टुकड़े रखने चाहिए। जो व्यक्ति मृत्यु के समय भगवान विष्णु के 10 अवतारों (मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, और कल्कि) का स्मरण करता है, या जिसके कानों में भगवान का नाम पड़ता है, उसके करोड़ों महापाप तत्काल भस्म हो जाते हैं। गरुड़ पुराण इसमें अजामिल का उदाहरण देता है, जिसने मरते समय केवल अपने पुत्र 'नारायण' को पुकारा था, परंतु भगवान के नाम के प्रभाव से वह भी यमदूतों से बचकर सीधे वैकुंठ/स्वर्ग को प्राप्त हुआ।
स्वर्लोक में आत्माओं को उनके कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के भोग प्राप्त होते हैं। मृत्यु के पश्चात वंशजों द्वारा किए गए श्राद्ध और तर्पण का इस प्रक्रिया में बड़ा महत्व है। गरुड़ जी जब भगवान विष्णु से पूछते हैं कि पृथ्वी पर ब्राह्मणों को खिलाया गया भोजन पितृलोक या स्वर्लोक में पूर्वजों तक कैसे पहुँचता है, तो भगवान विष्णु उत्तर देते हैं कि श्रुति (वेदों) के अनुसार, मंत्रों और गोत्र के उच्चारण के साथ जो भोजन पूर्ण श्रद्धा से ब्राह्मणों को कराया जाता है, वह भोजन स्वर्लोक में निवास कर रहे पूर्वजों के लिए साक्षात 'अमृत' में परिवर्तित हो जाता है। यदि कोई पुण्यात्मा स्वर्लोक में गंधर्व बनती है, तो वह श्राद्ध का फल आनंददायक कलाओं के रूप में प्राप्त करती है; यदि नाग बनती है तो वायु के रूप में; और यदि पशु बनती है तो घास के रूप में प्राप्त करती है। इस प्रकार वैदिक अनुष्ठान सीधे स्वर्लोक की अर्थव्यवस्था और जीविका से जुड़े हुए हैं।
मार्कण्डेय पुराण एवं अन्य शास्त्रों में स्वर्लोक के विविध प्रसंग और युद्ध
यद्यपि स्वर्लोक असीम सुखों का स्थान है, परंतु पुराणों में ऐसे अनेक प्रसंग आते हैं जहाँ स्वर्लोक को राजनीतिक, सामरिक और असुरों के आक्रमण का केंद्र बनते देखा गया है। शास्त्रों के अनुसार स्वर्लोक की सत्ता तपस्या और शक्ति पर आधारित है, जिसे असुर भी यदि चाहें तो अपनी तपस्या के बल पर देवताओं से छीन सकते हैं।
मार्कंडेय पुराण, विशेषकर इसके 'देवी माहात्म्य' (दुर्गा सप्तशती) खंड के 85वें अध्याय में स्वर्लोक पर असुरों के अधिकार का अत्यंत सजीव वर्णन है। जब शुंभ और निशुंभ नामक महापराक्रमी असुरों ने अपनी घोर तपस्या के बल पर असीमित शक्तियां प्राप्त कर लीं, तो उन्होंने स्वर्लोक पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने देवराज इन्द्र, अग्नि, कुबेर, सूर्य, चंद्र, पवन (वायु) और वरुण के सभी 'यज्ञ-भाग' और उनके प्रशासनिक अधिकारों को बलपूर्वक छीन लिया। असुरों ने देवताओं को स्वर्ग से निर्वासित कर दिया, जिसके पश्चात इन्द्र आदि देवताओं को हिमालय जाकर भगवती अपराजिता (विष्णुमाया / पार्वती) की स्तुति करनी पड़ी। इसी स्तुति के फलस्वरूप देवी ने कौशिकी और काली का रूप धारण करके शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड और रक्तबीज का वध किया और देवताओं को पुनः स्वर्लोक का आधिपत्य सौंपा।
इसी प्रकार मार्कंडेय पुराण में वृत्रासुर की कथा का भी विस्तृत वर्णन है। जब देवराज इन्द्र ने विश्वरूप (त्वष्टा के पुत्र) का वध कर दिया, तो क्रोधित होकर प्रजापति त्वष्टा ने अपनी एक जटा उखाड़कर अग्नि में हवन कर दिया। उस होमकुंड से 'वृत्र' नामक एक भयंकर असुर उत्पन्न हुआ, जिसका शरीर कोयले के पहाड़ के समान काला था और जिसकी दाढ़ें अत्यंत विशाल थीं। उस महान असुर को देखकर इन्द्र अत्यंत भयभीत हो गए और उन्होंने संधि करने के लिए सप्तर्षियों को उसके पास भेजा। बाद में महर्षि दधीचि की अस्थियों से वज्र का निर्माण कर इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया। ये सभी कथाएं इस बात को प्रमाणित करती हैं कि स्वर्लोक भी युद्ध, भय और अस्थिरता से पूर्णतः मुक्त नहीं है; यहाँ भी पद और सत्ता के लिए संघर्ष होता है।
विष्णु पुराण का दृष्टिकोण स्वर्लोक को ब्रह्मांडीय कालगणना से जोड़ता है। विष्णु पुराण के द्वितीय अंश के सप्तम अध्याय में महर्षि पराशर ने सृष्टि के 'सर्ग' और 'प्रतिसर्ग' (प्रलय) का वर्णन किया है। विष्णु पुराण स्पष्ट करता है कि जब ब्रह्मा जी का 1 दिन (कल्प) समाप्त होता है और नैमित्तिक प्रलय आती है, तो सूर्य की प्रचंड ऊष्मा (संवर्तक अग्नि) भूर्लोक और भुवर्लोक के साथ-साथ स्वर्लोक को भी भस्म कर देती है। उस प्रलय की भयानक गर्मी से बचने के लिए स्वर्लोक के निवासी और महर्षि वहाँ से पलायन करके महर्लोक या जनलोक की ओर चले जाते हैं। अतः विष्णु पुराण के अनुसार स्वर्लोक की भौतिक संरचना भी ब्रह्मा के कल्प के अंत में नष्ट हो जाती है।
स्वर्लोक की अनित्यता और परम धाम (मोक्ष) से इसका भेद
यद्यपि स्वर्लोक असीम सुखों, ऐश्वर्य, अमृत और रोग-रहित जीवन का केंद्र है, परंतु वेदांत दर्शन, श्रीमद्भगवद्गीता और भागवत पुराण इसके सबसे बड़े सत्य को उजागर करते हैं—स्वर्लोक की अनित्यता। स्वर्लोक कोई मोक्ष का स्थान नहीं है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहते हैं:
अर्थात्, स्वर्लोक के विशाल सुखों को भोगने के पश्चात, जब जीवात्मा का संचित पुण्य क्षीण (समाप्त) हो जाता है, तो उसे अनिवार्य रूप से पुनः मृत्युलोक (पृथ्वी) पर लौटकर जन्म लेना पड़ता है। स्वर्लोक एक बैंक खाते के समान है, जहाँ पुण्यों का संचय खर्च होता रहता है और पुण्य समाप्त होते ही जीव को वहाँ से निष्कासित कर दिया जाता है।
विष्णु पुराण में महर्षि पराशर भी इसी तथ्य को पुष्ट करते हुए कहते हैं कि केवल नरक में ही दुःख हो, ऐसा नहीं है; स्वर्ग में भी जीव को पतन का निरंतर भय सताता रहता है। जब किसी देव या पुण्यात्मा के पुण्य समाप्त होने लगते हैं, तो उसके शरीर से पसीना आने लगता है, और उसके गले में पड़ी दिव्य पुष्पों की माला कुम्हलाने (मुरझाने) लगती है। यह इस बात का संकेत होता है कि अब उसे स्वर्ग से निष्कासित होकर पुनः माता के गर्भ के कष्टों और जीवन-मृत्यु के चक्र से गुजरना पड़ेगा।
इसके विपरीत, भगवान श्रीकृष्ण अपने परम धाम (वैकुंठ, गोलोक या ब्रह्म-अवस्था) का वर्णन करते हुए कहते हैं:
अर्थात्, वह परम धाम जहाँ जाने के पश्चात जीव लौटकर वापस संसार में नहीं आता, वह स्वर्लोक से सर्वथा भिन्न और उच्च है। कर्मकांडी केवल स्वर्लोक तक जाने की कामना करते हैं जहाँ वे इन्द्र के समान ऐश्वर्य भोग सकें। वे यज्ञों के माध्यम से स्वर्लोक को अंतिम लक्ष्य मानते हैं, परंतु ब्रह्मज्ञानी और अनन्य भक्त इस स्वर्गिक सुख को भी 'नरक' के समान अस्थायी मानते हैं, क्योंकि यहाँ से पतन निश्चित है। भागवत पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि अद्वैत वेदांत और शुद्ध भक्ति के मार्ग पर चलने वाले साधक स्वर्लोक की कामना नहीं करते, क्योंकि उनका लक्ष्य जन्म-मृत्यु के चक्र को हमेशा के लिए तोड़ना होता है। स्वर्लोक भौतिक ब्रह्मांड के भीतर एक अस्थायी विश्राम स्थल है, जहाँ आत्मा अपने अच्छे कर्मों का फल भोगने के लिए रुकती है, यह मोक्ष का अंतिम गंतव्य नहीं है।
निष्कर्षतः, समग्र वैदिक और पौराणिक वाङ्मय का सूक्ष्मता से अनुशीलन करने पर यह निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि "स्वर्लोक" मात्र कोई कपोल-कल्पना नहीं है, बल्कि सनातन ब्रह्मांड विज्ञान की एक अत्यंत सुव्यवस्थित, भौगोलिक, खगोलीय और प्रशासनिक इकाई है। सुमेरु पर्वत के स्वर्णिम शिखरों से लेकर शिशुमार चक्र की ज्योतिर्मय सीमाओं तक विस्तृत यह लोक भौतिक जगत (भूर्लोक) और विशुद्ध आध्यात्मिक जगत (सत्यलोक या वैकुंठ) के मध्य एक भव्य परंतु अस्थायी पड़ाव है। अमरावती का हीरों और स्वर्ण से जड़ा स्थापत्य, सुधर्मा सभा की शोक-रहित ऊर्जा, नंदन कानन के कल्पवृक्ष, अरुणोदा और जम्बू नदियों का दिव्य रस, और 33 कोटि देवताओं के साथ महर्षियों की उपस्थिति—यह सब स्वर्लोक को एक ऐसा अद्वितीय आयाम बनाते हैं, जहाँ केवल उच्च कोटि के सकाम पुण्यों के माध्यम से ही प्रवेश संभव है। फिर भी, शास्त्रों का अंतिम सत्य यही उद्घोषित करता है कि स्वर्लोक का ऐश्वर्य भी काल (समय) और कर्मफल की सीमाओं से बंधा हुआ है, और आत्मा की अंतिम शांति केवल परमात्मा के शाश्वत धाम (मोक्ष) में ही निहित है।



