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स्वर्लोक क्या है?

स्वर्लोक वह दिव्य सुख का क्षेत्र है जहाँ दुःख, रोग और बुढ़ापा नहीं होते।

संक्षिप्त उत्तर

स्वर्लोक वह दिव्य सुख का क्षेत्र है जहाँ दुःख, रोग और बुढ़ापा नहीं होते। यह देवों, पुण्यात्माओं और ऋषियों का निवास है जो पुण्य कर्मों से प्राप्त होता है।

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विस्तृत उत्तर

सनातन धर्म के प्रामाणिक वाङ्मय में 'स्वर्लोक' या स्वर्ग का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण और केंद्रीय है। वैदिक त्रिलोकी की संकल्पना जिसे व्याहृतियों (भूर्भुवः स्वः) के रूप में जाना जाता है उसमें स्वर्लोक तीसरा और सबसे प्रधान ऊर्ध्व लोक है। मीमांसा दर्शन और शास्त्रीय संहिताओं में स्वर्ग को एक ऐसी विशुद्ध सात्त्विक अवस्था और ऊर्ध्व ऊर्जा-क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया गया है जहाँ सांसारिक और भौतिक दुखों का सर्वथा अभाव होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि वह सुख जो किसी भी प्रकार के सांसारिक दुःख, क्लेश या पीड़ा से तनिक भी मिश्रित नहीं है, जिसके पश्चात भविष्य में किसी कष्ट का आवरण नहीं है और जो केवल अभिलाषा करने मात्र से स्वतः प्राप्त हो जाता है, उस परम सात्त्विक और दिव्य सुख के आश्रय स्थल को ही स्वर्लोक या स्वर्ग कहा जाता है। यह लोक उन पुण्यात्माओं, देवों, गंधर्वों, चारणों, विद्याधरों और सिद्ध ऋषियों का निवास स्थान है जिन्होंने सकाम कर्मों, वैदिक यज्ञों, महादान और कठोर तपस्या से असीम पुण्य अर्जित किया है। ब्रह्मांड पुराण में वर्णित चौदह भुवनों के पदानुक्रम में स्वर्लोक भौतिक सृष्टि और विशुद्ध आध्यात्मिक सृष्टि के मध्य एक सेतु का कार्य करता है।

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