ब्रह्मांडीय संरचना में अतल लोक का शास्त्रीय विवेचन: पुराणों के आधार पर एक विस्तृत अध्ययन
अतल लोक का मूल परिचय एवं ब्रह्मांडीय वर्गीकरण
सनातन धर्म के प्रामाणिक शास्त्रों, पुराणों एवं वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान के अंतर्गत संपूर्ण ब्रह्मांड (ब्रह्मांड कटाह) को मुख्य रूप से चौदह लोकों (चतुर्दश भुवन) में विभाजित किया गया है। ब्रह्मांड पुराण के 'प्रक्रिया पाद', श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध तथा विष्णु पुराण के द्वितीय अंश में इन चौदह लोकों की विस्तृत भौगोलिक, खगोलीय और दार्शनिक संरचना का प्रामाणिक वर्णन प्राप्त होता है। इन चौदह लोकों को दो मुख्य श्रेणियों में विभक्त किया गया है: सात ऊर्ध्व लोक (व्याहृतियां या ऊपर के लोक) और सात अधोलोक (पाताल या नीचे के लोक)। इन सात अधोलोकों के क्रम में 'अतल' सबसे प्रथम लोक है। ऊर्ध्व लोकों में भूः (भूमंडल/पृथ्वी), भुवः (अंतरिक्ष), स्वः (स्वर्ग), महः, जनः, तपः और सत्यलोक (ब्रह्मलोक) समाहित हैं, जबकि पृथ्वी के ठीक नीचे से अधोलोकों का आरंभ होता है, जिनमें क्रमशः अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल शामिल हैं।
शास्त्रों के अनुसार, यद्यपि अतल लोक 'अधोलोक' की श्रेणी में आता है, परंतु इसे किसी भी रूप में 'नरक' नहीं माना जा सकता। श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णु पुराण में इन सात अधोलोकों को सामूहिक रूप से 'बिल-स्वर्ग' या 'भूमिगत स्वर्ग' की संज्ञा दी गई है। नरक लोक ब्रह्मांड का वह स्थान है जहाँ पापी जीवात्माएं अपने दुष्कर्मों का दंड भोगने जाती हैं और वहां अत्यंत पीड़ा व यातनाएं होती हैं; नरक लोकों की स्थिति इन पातालों से भी नीचे तथा गर्भोदक सागर के ठीक ऊपर बताई गई है। इसके सर्वथा विपरीत, अतल लोक सहित सभी बिल-स्वर्गों में ऐश्वर्य, भोग-विलास, और भौतिक सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं होती। यहाँ के निवासियों का जीवन देवराज इंद्र के स्वर्गलोक से भी अधिक सुखमय, समृद्ध और विलासितापूर्ण बताया गया है। यहाँ रहने वाले प्राणी असीमित भौतिक आनंद का उपभोग करते हैं, परंतु उनमें आध्यात्मिक चेतना और आत्मज्ञान का नितांत अभाव होता है। अतल लोक पूर्णतः दैवीय नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से भौतिक और राजसिक-तामसिक प्रवृत्तियों का चरम केंद्र है, जहाँ आध्यात्मिक प्रगति के बिना केवल भौतिक वासनाओं की पूर्ति की जाती है।
ब्रह्मांड में अतल लोक की स्थानिक स्थिति और विस्तार
पौराणिक भूगोल और खगोल शास्त्र के अनुसार, ब्रह्मांड की संरचना अत्यंत व्यवस्थित और सटीक दूरियों (योजनों) में वर्णित है। श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध के चौबीसवें अध्याय में श्री शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित को ब्रह्मांड का विस्तार समझाते हुए स्पष्ट करते हैं कि ऊर्ध्व लोकों और अधोलोकों के मध्य दूरियों का एक निश्चित गणितीय क्रम है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की टीका के अनुसार, सूर्य से दस हजार योजन (लगभग 80,000 मील) नीचे राहु का स्थान है। राहु के नीचे क्रमशः सिद्ध, चारण और विद्याधरों के लोक स्थित हैं। विद्याधर लोक के नीचे अंतरिक्ष है जहाँ यक्ष, राक्षस और पिशाचों के विहार स्थल हैं। पिशाच लोकों के सौ योजन नीचे पृथ्वी (भूमंडल) स्थित है।
इसी भूमंडल (पृथ्वी) के नीचे से अधोलोकों (पातालों) की शुरुआत होती है। विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, पृथ्वी के नीचे एक के बाद एक सात पाताल स्थित हैं, और इनमें से प्रत्येक लोक की ऊंचाई और विस्तार दस-दस हजार योजन है। विष्णु पुराण के द्वितीय अंश, पंचम अध्याय में महर्षि पराशर ने अतल सहित सातों पातालों का स्पष्ट उल्लेख किया है।
| लोक का नाम | ब्रह्मांडीय क्रम (पृथ्वी से नीचे) | लोक का विस्तार (ऊंचाई/गहराई) | विष्णु पुराण संदर्भ श्लोक (2.5.2) |
|---|---|---|---|
| अतल | प्रथम अधोलोक | 10,000 योजन | दशसाहस्रमेकैकं पातालं मुनिसत्तम । |
| वितल | द्वितीय अधोलोक | 10,000 योजन | अतलं वितलं चैव नितलं च गभस्तिमत् । |
| सुतल | तृतीय अधोलोक | 10,000 योजन | महाख्यं सुतलं चाग्र्यं पातालं चापि सप्तमम् ॥ |
विष्णु पुराण के इस संस्कृत श्लोक का प्रामाणिक अर्थ है कि हे मुनिश्रेष्ठ! अतल, वितल, नितल (तलातल), गभस्तिमत् (महातल), महाख्यं (रसातल), सुतल और पाताल—ये सात पाताल हैं और इनमें से प्रत्येक का विस्तार दस-दस हजार योजन है। श्रीमद्भागवत (5.24.7) भी इसकी पुष्टि करता है कि इन सातों निचले लोकों की लंबाई और चौड़ाई ठीक पृथ्वी के ही समान है। इस प्रकार अतल लोक पृथ्वी से ठीक दस हजार योजन नीचे स्थित पहला विशाल भूमिगत लोक है। अतल लोक के ठीक नीचे दस हजार योजन की दूरी पर वितल लोक स्थित है, और इस प्रकार यह पूरी संरचना ब्रह्मांड के निचले हिस्से में सत्तर हजार योजन तक फैली हुई है। इन सातों पातालों के नीचे तीस हजार योजन की दूरी पर भगवान शेषनाग (अनंत) गर्भोदक सागर में विराजमान हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का भार अपने फनों पर धारण करते हैं।
भगवान के विराट स्वरूप में अतल लोक का स्थान
श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वितीय स्कंध के प्रथम और पंचम अध्याय में ब्रह्मांड की कल्पना भगवान विष्णु के 'विराट स्वरूप' के रूप में की गई है। इस विराट शरीर में चौदहों लोकों को भगवान के विभिन्न शारीरिक अंगों के रूप में दर्शाया गया है। ब्रह्मा जी देवर्षि नारद को ब्रह्मांडीय संरचना का उपदेश देते हुए विराट स्वरूप का वर्णन करते हैं:
महातलं तु गुल्फाभ्यां प्रपदाभ्यां रसातलम् । पातालं पादतलत इति लोकमयः पुमान् ॥ (श्रीमद्भागवत 2.5.40-41)
इस श्लोक के सटीक अर्थ के अनुसार, भगवान के विराट स्वरूप की कटि (कमर) में अतल लोक स्थित है। उनकी जांघों में वितल लोक, घुटनों में सुतल लोक, पिंडलियों में तलातल लोक, टखनों में महातल लोक, पैरों के अग्र भाग या पंजों में रसातल लोक और पैरों के तलवों में पाताल लोक स्थित है। चूँकि अतल लोक पृथ्वी (जो भगवान की जंघा या कटि के ऊपरी भाग का प्रतिनिधित्व करती है) के ठीक नीचे का पहला लोक है, इसलिए इसे भगवान के विराट रूप की कमर के स्थान पर स्थापित माना गया है। यह प्रतीकात्मक और तात्विक वर्णन दर्शाता है कि ब्रह्मांड का कोई भी लोक भगवान के शरीर से पृथक नहीं है। अतल लोक का अस्तित्व भी उसी परम ईश्वरीय संरचना का एक अभिन्न अंग है।
अतल लोक का भौतिक स्वरूप और प्राकृतिक वातावरण
अतल लोक का प्राकृतिक वातावरण पृथ्वी से पूर्णतः भिन्न परंतु अत्यंत सम्मोहक है। चूँकि यह लोक पृथ्वी के आवरण के नीचे स्थित है, इसलिए यहाँ सूर्य, चंद्र या अन्य ग्रहीय नक्षत्रों का प्रकाश सीधे नहीं पहुँचता। शिव पुराण, विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, अतल लोक सहित सभी पातालों में सूर्य के प्रकाश के अभाव के कारण दिन और रात का कोई प्राकृतिक विभाजन नहीं होता। दिन-रात न होने के कारण यहाँ के निवासियों को समय के बीतने का तनिक भी भान नहीं होता और न ही उन्हें काल (समय) से उत्पन्न होने वाला कोई भय सताता है।
यहाँ प्रकाश का मुख्य स्रोत सूर्य की किरणें नहीं, बल्कि महान और नागों (सर्पों) के फनों पर सुशोभित मणियां हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध (5.24.12) में वर्णित है: यत्र हि महाहि-प्रवर-शिरो-मणयः सर्वं तमः प्रबाधन्ते। इसका अर्थ है कि अतल और अन्य पातालों में रहने वाले विशाल और श्रेष्ठ सर्पों के फनों पर स्थित मणियां अपने तीव्र और शीतल प्रकाश से अतल लोक के संपूर्ण अंधकार को नष्ट कर देती हैं और वहां सर्वत्र प्रकाश फैलाती हैं। मणियों का यह प्रकाश इतना दिव्य और आकर्षक होता है कि यहाँ कभी अंधेरा या निराशा प्रतीत नहीं होती।
विष्णु पुराण में वर्णित है कि एक बार देवर्षि नारद पाताल लोकों (अतल आदि) का भ्रमण करके स्वर्ग लौटे। स्वर्ग की देव-सभा में उन्होंने उद्घोष किया कि पाताल लोक का सौंदर्य और ऐश्वर्य इंद्र के स्वर्ग से भी कहीं अधिक आनंददायक और श्रेष्ठ है। नारद जी के अनुसार अतल लोक की भूमि अत्यंत विचित्र और बहुवर्णीय है; यहाँ की मिट्टी सफेद, काली, लाल (बैंगनी), पीली, रेतीली, पथरीली और स्वर्णमयी है। यहाँ के भवन, महल और प्रांगण अत्यंत भव्य तथा बहुमूल्य रत्नों और मणियों से निर्मित हैं, जिनका निर्माण स्वयं मय दानव और विश्वकर्मा ने किया है।
शिव पुराण के पाताल वर्णन के अनुसार, अतल लोक के सरोवरों और झीलों में अत्यंत सुंदर और सुगंधित कमल खिले रहते हैं। नदियों तथा झीलों का जल अमृत के समान मीठा और निर्मल होता है। यहाँ के उद्यानों में कोकिल (कोयल) आदि पक्षियों का मधुर कलरव गूंजता रहता है, और वीणा, बांसुरी तथा मृदंग की मधुर ध्वनियां निरंतर वायु में प्रवाहित होती रहती हैं। यहाँ के निवासी अत्यंत दिव्य और सुगंधित लेप और स्वर्ण के आभूषण धारण करते हैं। अतल लोक का वातावरण पूर्णतः दैहिक और भौतिक सुखों के अनुकूल है।
श्रीमद्भागवत (5.24.14) के अनुसार, इस लोक के निवासियों को बुढ़ापा, पसीना, बीमारी, थकावट, सफेद बाल, झुर्रियां या शारीरिक कांति का क्षीण होना जैसी कोई भी शारीरिक दुर्बलता नहीं सताती। वे बिना किसी शारीरिक क्षय के निरंतर युवावस्था में अपना जीवन व्यतीत करते हैं। यहाँ का वातावरण विशुद्ध रूप से भौतिक भोगों के लिए निर्मित है, जहाँ आध्यात्मिक ज्ञान या ईश्वर-प्राप्ति की चिंता भले ही न हो, परंतु ऐश्वर्य, शारीरिक सुख और विलासिता के साधनों की कोई सीमा नहीं है।
अतल लोक के अधिपति: मयपुत्र असुर बल और उनकी माया
श्रीमद्भागवत महापुराण और देवी भागवत पुराण के अनुसार, अतल लोक का मुख्य अधिपति और स्वामी दानवराज मय का पुत्र 'बल' नामक महान असुर है। मय दानव, जो राक्षसों और दैत्यों का सबसे बड़ा वास्तुकार और मायावी शिल्पी है (जिसका निवास तलातल लोक में है), उसी का यह अति-अहंकारी और शक्तिशाली पुत्र बल अतल लोक पर शासन करता है। शास्त्रों में बल असुर का वर्णन एक ऐसे मायावी सत्ता के रूप में किया गया है, जिसने अपने तपोबल और जादुई शक्तियों से छियानवे (96) प्रकार की मायाओं का सृजन किया है।
इस श्लोक का अर्थ है कि उस अतल लोक में मय दानव का पुत्र बल नामक असुर निवास करता है। उसने छियानवे (96) प्रकार की जादुई मायाओं की रचना की है। आज भी कुछ परम मायावी लोग पृथ्वी पर बल द्वारा रची गई उन मायाओं में से एक या दो को धारण करते हैं या उनका अभ्यास करते हैं। देवी भागवत पुराण (अष्टम स्कंध, 19वाँ अध्याय) भी इस तथ्य की पुष्टि करता है कि कोई भी अन्य मायावी बल की सभी छियानवे मायाओं को नहीं जान सकता, क्योंकि वे अत्यंत जटिल और पूर्णतः दुस्साध्य हैं। अतल लोक के निवासियों की समस्त भौतिक आवश्यकताएं और विलासिता के साधन इन्हीं मायावी शक्तियों के प्रभाव से स्वतः उत्पन्न और प्राप्त हो जाते हैं। बल असुर की यह मायावी शक्ति अतल लोक को एक अभेद्य और मायावी दुर्ग में परिवर्तित कर देती है, जहाँ इन्द्रियों को भ्रमित करने वाले सभी साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहते हैं।
अतल लोक की तीन प्रकार की स्त्रियां
अतल लोक की सबसे विशिष्ट और विलक्षण बात उन तीन प्रकार की स्त्रियों का वर्णन है, जो जीवात्माओं को भौतिक प्रलोभन और कामुकता के चरम शिखर पर ले जाती हैं। श्रीमद्भागवत पुराण और देवी भागवत पुराण में उल्लेख है कि एक बार जब वह मायावी और शक्तिशाली असुर बल जम्हाई ले रहा था, तब उसके मुख से संपूर्ण लोकों को सम्मोहित करने वाली तीन प्रकार की स्त्रियों के समूह उत्पन्न हुए। इन स्त्रियों को उनके स्वभाव और आचरण के आधार पर तीन स्पष्ट श्रेणियों में विभक्त किया गया है:
| स्त्री वर्ग का नाम | चारित्रिक विशेषता और स्वभाव |
|---|---|
| स्वैरिणी | ये वे स्त्रियां हैं जो अपनी इच्छा से केवल अपने ही वर्ग या समूह के पुरुषों से विवाह या संबंध स्थापित करती हैं। ये अत्यंत स्वतंत्र और स्वेच्छाचारी प्रकृति की होती हैं। |
| कामिनी | ये वे अत्यंत आकर्षक और कामुक स्त्रियां हैं जो किसी भी वर्ग या समूह के पुरुष के साथ संबंध स्थापित कर सकती हैं। ये पुरुषों को अपनी ओर अत्यधिक आकर्षित करती हैं। |
| पुंश्चली | ये वे स्त्रियां हैं जो अस्थिर स्वभाव की होती हैं, अपना साथी निरंतर बदलती हैं और चारित्रिक रूप से चंचल होती हैं। |
जब भी कोई सुंदर और सुडौल पुरुष इस अतल लोक की गुफाओं या मार्गों से प्रविष्ट होता है, तो ये स्त्रियां उसे तुरंत अपने मायाजाल में फंसा लेती हैं। ये स्त्रियां उस पुरुष को कामुक दृष्टिकोण से आकर्षित करती हैं और अतल लोक के भौतिक आमोद-प्रमोद में उसे पूर्णतः लिप्त कर देती हैं।
हाटक रस का रहस्य और उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव
अतल लोक में प्रविष्ट हुए पुरुषों को सम्मोहित करने के लिए ये स्त्रियां एकांत में ले जाकर एक विशेष प्रकार का मादक रस पीने को देती हैं। शास्त्रों में इस रस को 'हाटक रस' कहा गया है। यद्यपि वितल लोक (अतल से ठीक नीचे का लोक) में हाटकी नामक नदी बहती है (जो भगवान शिव और भवानी के तेज से उत्पन्न है) और वहाँ हाटकेश्वर शिव का वास है, परंतु अतल लोक की स्त्रियां जिस मादक तरल का उपयोग करती हैं, वह कामोद्दीपक हाटक रस कहलाता है।
इसका भावार्थ यह है कि अतल लोक में प्रविष्ट हुए पुरुष को ये स्त्रियां हाटक नामक मादक रस पिलाती हैं। इसके पश्चात् वे अपनी कामुक दृष्टि, मनमोहक मुस्कान, अनुराग भरे वचनों और गहरे आलिंगन से उस पुरुष को पूर्णतः अपने वशीभूत कर लेती हैं और उसके साथ स्वेच्छा से विहार करती हैं। इस हाटक रस का प्रभाव इतना तीव्र और मायावी होता है कि इसे पीने के उपरांत वह पुरुष स्वयं को ईश्वर समझने लगता है। उसके भीतर इतना प्रबल मिथ्या अहंकार जाग्रत हो जाता है कि वह गर्व से उद्घोष करता है— "मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही सिद्ध हूँ" (ईश्वरोऽहं सिद्धोऽहम)।
उसे ऐसा शारीरिक और मानसिक भ्रम हो जाता है मानो उसके भीतर दस हजार विशाल हाथियों का बल आ गया हो। मद में अंधा होकर वह पुरुष मृत्यु के अवश्यंभावी सत्य को भूल जाता है और पूर्णतः वासनाओं तथा अपनी मिथ्या शक्ति के अहंकार में डूब जाता है। यह प्रसंग दर्शाता है कि अतल लोक में अत्यधिक भौतिक भोग और मादकता किस प्रकार जीव के विवेक और आध्यात्मिक ज्ञान को नष्ट कर उसे अहंकार के अंधकूप में धकेल देते हैं, जहाँ वह अपनी सीमित सत्ता को ही सर्वशक्तिमान ईश्वर मान बैठता है।
विभिन्न पुराणों में अतल लोक और उसके निवासियों का वर्णन
अतल लोक और अन्य पातालों का वर्णन केवल भागवत पुराण तक सीमित नहीं है, बल्कि वायु पुराण, ब्रह्मांड पुराण, विष्णु पुराण, गरुड़ पुराण, मार्कंडेय पुराण और शिव पुराण में भी इसके विस्तार और निवासियों की भिन्न-भिन्न विशेषताएं वर्णित हैं। इन सभी ग्रंथों का सर्वसम्मत मत है कि अतल लोक एक ऐसा आयाम है जो दैत्यों, दानवों, यक्षों और नागों के रहने का प्रमुख स्थान है।
- वायु पुराण और ब्रह्मांड पुराण का मत: वायु पुराण और ब्रह्मांड पुराण, जो कि प्राचीनतम महापुराणों में गिने जाते हैं, अतल लोक के संबंध में कुछ विशेष भौगोलिक और जनांकिकीय जानकारी प्रदान करते हैं। ब्रह्मांड पुराण के 'प्रक्रिया पाद' में ब्रह्मांड की उत्पत्ति और चौदह लोकों की संरचना का अत्यंत विस्तार से वर्णन है, जहाँ अतल लोक को भौतिक सघनता और माया के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। वायु पुराण के अनुसार, पातालों के प्रत्येक लोक में दैत्यों और नागों के विशाल नगर बसे हुए हैं। वायु पुराण विशेष रूप से उल्लेख करता है कि पहले पाताल क्षेत्र यानी अतल लोक में महान दैत्य नमुचि और प्रसिद्ध नाग कालिया के निवास स्थान और भव्य नगर स्थित हैं। यहाँ रहने वाले दैत्य और दानव वे जातियां हैं जिन्हें देवताओं ने स्वर्ग से निष्कासित कर दिया था, परंतु अपने तप और बल के कारण उन्होंने इन पातालों में स्वर्ग जैसी ही विलासितापूर्ण बस्तियां बसा ली हैं।
- गरुड़ पुराण और शिव पुराण का मत: गरुड़ पुराण अतल लोक का वर्णन करते हुए इसे कामुकता और विलासिता का केंद्र मानता है। इसके अनुसार अतल लोक पर मय दानव के पुत्र बल का राज है, और यहाँ की सुंदर अप्सराएं और दानव-कन्याएं अत्यंत विलासी जीवन जीती हैं। शिव पुराण अतल लोक के निवासियों के भौतिक सुखों का श्रेय उनके पूर्वजन्म के तप और पुण्यों को देता है। शिव पुराण (पाताल वर्णन) कहता है कि इन दानवों और सिद्धों ने पूर्व काल में कठोर तपस्या की थी, जिसके फलस्ववरूप उन्हें अतल लोक में यह अनंत भोग-विलास प्राप्त हुआ है, जहाँ वे श्रेष्ठ भोजन, वाद्ययंत्रों के संगीत और अप्सराओं के संग निरंतर क्रीड़ा करते हुए जीवन का आनंद लेते हैं।
- मार्कंडेय पुराण का मत: मार्कंडेय पुराण में ब्रह्मांडीय भूगोल का वर्णन क्रौष्टुकि और महर्षि मार्कंडेय के संवाद के रूप में आता है। इस पुराण में अतल लोक और अन्य पातालों का संदर्भ मुख्य रूप से उन कथाओं में आता है जब पृथ्वी के राजाओं का पाताल निवासियों से संपर्क होता है। मार्कंडेय पुराण में अतल लोक को असुरों के छिपने और विश्राम करने के एक ऐसे सुरक्षित स्थान के रूप में बताया गया है, जो देवताओं की पहुँच से सर्वथा दूर है। इस पुराण की कथाओं में दानव युद्ध में पराजित होने के पश्चात अपनी शक्ति संचित करने हेतु इन्हीं अधोलोकों में लौट आते हैं।
मृत्यु का स्वरूप और भगवान के सुदर्शन चक्र का भय
यद्यपि अतल लोक के निवासियों को किसी प्रकार का रोग, शारीरिक दुर्बलता, पसीना या बुढ़ापा नहीं आता, और वे समय की गणना (सूर्य के उदय और अस्त होने) से पूर्णतः मुक्त हैं, फिर भी वे अमर नहीं हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध (5.24.14) में महर्षि शुकदेव स्पष्ट करते हैं:
इस श्लोक का अर्थ है कि इन बिल-स्वर्गों (अतल आदि) में रहने वाले भौतिक रूप से सुखी और बलवान प्राणियों को किसी भी सामान्य कारण से मृत्यु नहीं आ सकती। उन्हें काल का स्वाभाविक भय नहीं सताता। उनकी मृत्यु का एकमात्र कारण केवल साक्षात भगवान का तेज है, जो सुदर्शन चक्र के रूप में वहां उपस्थित होता है। भगवान विष्णु का यह काल-रूपी सुदर्शन चक्र ही उनकी मृत्यु का स्थापित समय निर्धारित करता है।
भगवान के सुदर्शन चक्र का भय इन दानवों और असुरों के हृदयों में इतना गहरा बसा होता है कि भागवत पुराण (5.24.15) इसका अत्यंत सूक्ष्म शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव वर्णित करता है: यस्मिन् प्रविष्टेऽसुरवधूनां प्रायः पुंसवनानि भयादेव स्रवन्ति पतन्ति च ।
अर्थात्, जब कभी सुदर्शन चक्र भगवान के तेज के रूप में इन अधोलोकों (अतल आदि) में प्रवेश करता है या उसकी परिक्रमा की ध्वनि गूंजती है, तो उस अकल्पनीय भय के कारण असुरों और दानवों की गर्भवती स्त्रियों (असुर वधुओं) के गर्भपात हो जाते हैं, और उनके गर्भ भय के मारे स्वतः ही गिर जाते हैं। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि चाहे अतल लोक का असुर बल कितनी ही माया रच ले, और हाटक रस पीने के बाद पुरुष स्वयं को ईश्वर या सर्वशक्तिमान क्यों न मान ले, परंतु परमेश्वर की सर्वोच्च शक्ति (सुदर्शन चक्र) के समक्ष उनका वह संपूर्ण अहंकार और बल क्षण भर में धराशायी हो जाता है。
अन्य लोकों से अतल लोक का स्थानिक संबंध
अतल लोक की स्थिति ब्रह्मांड की धुरी में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह ऊर्ध्व लोकों (पृथ्वी) और अन्य गहरे पातालों के मध्य एक सेतु का कार्य करता है।
- ऊपर का लोक: अतल लोक के ठीक ऊपर पृथ्वी (भूमंडल) स्थित है। पृथ्वी से नीचे की ओर जाने पर यह पहला आयाम है।
- नीचे के लोक: अतल लोक के ठीक नीचे वितल लोक स्थित है। वितल लोक में भगवान शिव के एक रूप 'हाटकेश्वर' का निवास है, जो अपनी पत्नी भवानी के साथ वहां भूत-गणों से घिरे रहते हैं और स्वर्ण खदानों के स्वामी हैं। वितल के नीचे सुतल लोक है, जहाँ परम भक्त और दैत्यराज बलि निवास करते हैं, जिन्हें भगवान वामन ने सुतल का साम्राज्य सौंपा था।
सुतल के नीचे तलातल है जहाँ अतल के स्वामी बल का पिता, मय दानव रहता है। तलातल के नीचे महातल (जहाँ कश्यप पत्नी कद्रू के पुत्र अनेक सिरों वाले नाग रहते हैं), उसके नीचे रसातल (पणि नामक दैत्यों का स्थान) और सबसे नीचे पाताल (नागराज वासुकी का लोक) स्थित है।
अतल लोक से जुड़े प्रसंग और कथाएं
अतल लोक और उसके समीपवर्ती पाताल लोकों का वर्णन कई पौराणिक आख्यानों में आता है:
- रामायण का अहिरावण प्रसंग: रामायण की कथाओं में यद्यपि सीधे 'अतल' नाम का उल्लेख कम मिलता है, परंतु अहिरावण प्रसंग में पाताल लोक का जो वर्णन आता है, वह इन्हीं बिल-स्वर्गों की समग्र संरचना का हिस्सा है। जब अहिरावण भगवान राम और लक्ष्मण का अपहरण करके उन्हें पाताल ले गया था, तो हनुमान जी ने पृथ्वी के नीचे स्थित इन्हीं लोकों के मार्गों से यात्रा की थी। उन्होंने अपने ही पुत्र मकरध्वज को परास्त करके पातालपुरी के रक्षकों पर विजय प्राप्त की थी और राम-लक्ष्मण को मुक्त कराया था।
- वामन अवतार और राजा बलि: श्रीमद्भागवत पुराण के अष्टम स्कंध में जब भगवान वामन ने दैत्यराज बलि से तीन पग भूमि मांगकर संपूर्ण त्रिलोकी नाप ली थी, तब उन्होंने बलि को सुतल लोक (अतल और वितल के ठीक नीचे स्थित तीसरा अधोलोक) का साम्राज्य सौंप दिया था। उस प्रसंग में भी इन अधोलोकों (अतल, वितल, सुतल) की अपार संपदा और ऐश्वर्य की पुष्टि होती है, जिसे देवराज इंद्र भी प्राप्त नहीं कर सके थे। चूँकि अतल लोक सुतल लोक के मार्ग में पड़ने वाला सबसे ऊपरी अधोलोक है, यह असुरों और दैत्यों का सबसे पहला रक्षण-स्थल माना जाता है।
- राजा सगर के पुत्रों की कथा: विष्णु पुराण में इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की कथा आती है, जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को खोजते हुए और कपिल मुनि के आश्रम तक पहुँचने के लिए पृथ्वी को खोदते हुए पाताल लोकों के मार्ग का निर्माण किया था।
अतल लोक जाने के शास्त्रीय कारण
शास्त्रों में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि कोई जीवात्मा नरक या स्वर्ग के बजाय अतल लोक (बिल-स्वर्ग) में क्यों जाती है? गरुड़ पुराण, भागवत पुराण और अन्य शास्त्रों के कर्म-सिद्धांत के अनुसार, जीवात्माओं के गंतव्य उनके त्रिगुण (सत्व, रज, तम) और कर्मों की प्रधानता से तय होते हैं।
अतल लोक में वे जीवात्माएं प्रवेश करती हैं जिन्होंने अपने पूर्व जन्मों में अत्यधिक सकाम पुण्य कर्म और कठोर तपस्या तो की है, परंतु उनका उद्देश्य कभी भगवान की अनन्य भक्ति या मोक्ष प्राप्त करना नहीं था। ऐसे प्राणी जो पूर्णतः राजसिक और तामसिक अहंकार से ग्रसित होते हैं, जो भौतिक संपदा, स्वर्ण, और शारीरिक भोगों की तीव्र लालसा रखते हैं, और जिन्होंने तपस्या या दान के माध्यम से भारी कार्मिक पुण्य इकट्ठा कर लिया है, वे मृत्यु के पश्चात अतल आदि लोकों में भेजे जाते हैं।
यहाँ का जीवन अज्ञानता में व्यतीत होता है। इन निवासियों के पास अकूत संपत्ति, सुंदर स्त्रियां, रसायन और स्वर्ण होता है, किंतु उनमें आध्यात्मिक दृष्टि का पूर्णतः अभाव होता है। वे इतने संपन्न होते हैं कि उन्हें लगता ही नहीं कि उन्हें किसी आध्यात्मिक विकास या ईश्वर की आवश्यकता है। शास्त्रों में इसे एक अत्यंत निम्न चेतना की अवस्था बताया गया है। अतल लोक का अर्थ ही है— 'अ' (नहीं) + 'तल' (आधार), अर्थात ऐसा स्थान जहाँ आत्मा का कोई वास्तविक या ठोस आध्यात्मिक आधार नहीं होता। हाटक रस पीकर "मैं ईश्वर हूँ" ऐसा मान लेना जीव की इसी चरम अज्ञानता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। यह लोक आत्मा की मुक्ति का मार्ग नहीं है, बल्कि यह भौतिक सुखों के भोग के माध्यम से अर्जित पुण्यों को समाप्त करने का एक ऐसा मायावी स्थान है। जब इन जीवों के पुण्यों की अवधि समाप्त हो जाती है, तो उन्हें पुनः कर्मचक्र के अनुसार मृत्युलोक (पृथ्वी) पर लौटना पड़ता है।




