विस्तृत उत्तर
भुवर्लोक का भूलोक और स्वर्लोक के बीच होना ब्रह्मांडीय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह लोक भौतिक और दैवीय जगत के बीच एक पारगमन क्षेत्र के रूप में कार्य करता है। जहाँ भूलोक स्थूल भौतिक पृथ्वी है और स्वर्लोक पूर्णतः दैवीय और प्रकाशमान है वहीं भुवर्लोक इन दोनों के बीच की कड़ी है जहाँ स्थूलता समाप्त होती है और दिव्यता का आरंभ होता है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार जब ब्रह्मा जी ने भूः, भुवः और स्वः तीन लोकों की रचना की तो स्वर्ग देवताओं के निवास के लिए, पृथ्वी मनुष्यों और मरणशील जीवों के लिए, और भुवर्लोक भूत-प्रेतों तथा सूक्ष्म सत्ताओं के निवास के लिए निर्धारित किया गया। इस प्रकार यह लोक उन सत्ताओं का निवास है जो न तो पूर्णतः भौतिक हैं और न ही पूर्णतः दैवीय।
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