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विस्तृत उत्तर
विहाराजिरम्' शब्द श्रीमद्भागवत पुराण (५.२४.५) में भुवर्लोक के निचले हिस्से का वर्णन करते हुए प्रयोग किया गया है। इस शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'विचरण का क्षेत्र' या 'क्रीड़ा-स्थल'। शुकदेव गोस्वामी के अनुसार भुवर्लोक का वह निचला हिस्सा जहाँ सघन वायु बहती है और बादल तैरते हैं वह यक्ष, राक्षस, पिशाच, भूत और प्रेतों का विहाराजिरम् अर्थात विचरण-क्षेत्र है। यह शब्द यह स्पष्ट करता है कि ये सत्ताएं भुवर्लोक के निचले हिस्से में स्थायी निवास नहीं करतीं बल्कि वहाँ विचरण करती हैं। 'विहार' का अर्थ है भ्रमण या क्रीड़ा और 'अजिर' का अर्थ है प्रांगण या आंगन। इस प्रकार विहाराजिरम् इन सत्ताओं के अनियंत्रित और भटकते हुए अस्तित्व का एक सटीक वर्णन है।
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