विस्तृत उत्तर
भुवर्लोक वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान में वर्णित चौदह लोकों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण लोक है। यह भूलोक (पृथ्वी) और स्वर्लोक (स्वर्ग) के ठीक मध्य में स्थित है और सात ऊर्ध्व लोकों में दूसरा स्थान रखता है। शास्त्रों में इसे 'अंतरिक्ष' के नाम से भी जाना जाता है। यह भौतिक और दैवीय जगत के बीच एक पारगमन क्षेत्र के रूप में कार्य करता है जहाँ स्थूलता समाप्त होती है और दिव्यता का आरंभ होता है। इस लोक का विस्तार पृथ्वी के वायुमंडल के ठीक ऊपर से प्रारंभ होकर सूर्यमंडल के ठीक नीचे तक होता है। यह कोई ठोस ग्रह या भूमि का टुकड़ा नहीं है बल्कि एक अत्यंत विस्तृत त्रि-आयामी आकाश है जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और स्वर्ग के पूर्ण प्रकाश के बीच सेतु का कार्य करता है। विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, मार्कण्डेय पुराण और वायु पुराण जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है।
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