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भीमवक्त्रा

भीमवक्त्रा मंत्र: अग्नि पुराण की 'त्रैलोक्य विजय' विद्या और शत्रु स्तंभन !

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'भीमवक्त्रा' (दूती) मंत्र: अग्नि पुराण साधना विधि एवं त्रैलोक्यविजय विद्या | Bhimvaktra Duti Mantra

'भीमवक्त्रा' (दूती): मंत्र

1.1 भीमवक्त्रा का स्वरूप (ध्यान)

यद्यपि ब्रह्मयामल के उपलब्ध अंशों में विस्तृत मूर्ति-लक्षण क्षत-विक्षत हो सकते हैं, परन्तु 'पिचुमत' परंपरा और अग्नि पुराण के साक्ष्य को मिलाकर इनका स्वरूप निम्न प्रकार निर्मित होता है:

  • वक्त्र (मुख): इनका मुख अत्यंत विशाल और भयानक है (भीम-वक्त्र)। यह काल (समय) की सर्वभक्षी प्रकृति का द्योतक है।
  • स्थान: ये श्मशान भूमि में निवास करती हैं, जो संसार की नश्वरता का प्रतीक है।
  • संबंध: ये 'कपालिश भैरव' (कपाल धारण करने वाले शिव) की सेविका हैं।

1.2 मूल मंत्र (अग्नि पुराण, अध्याय):

"ॐ हूँ क्षूँ ह्रूूँ ॐ नमो भगवति दंष्ट्रिणि भीमवक्त्रे महोग्ररूपे हिलि हिलि रक्तनेत्रे किलि किलि महानिस्वने कुलु ॐ निर्मांसे कट कट गोनसाभरणे चिलि चिलि शवमालाधारिणि द्रावय, ॐ महारौद्रि सार्द्रचर्मकृताच्छदे विजृम्भ, ॐ पूत्यासिलताधारिणि भृकुटीकृतापाङ्गे विषमनेत्रकृतानने वसामेदोविलिप्तगात्रे कह कह, ॐ हस हस क्रुद्ध क्रुद्ध ॐ नीलजीमूतवर्णोऽभ्रमालाकृताभरणे विस्फुर, ॐ घण्टारवावकीर्णदेहे, ॐ सिंसिस्थेऽरुणवर्णे, ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूूँ रौद्ररूपे हूँ ह्रीं क्लीं ॐ ह्रीं ह्रूूँ ओमाकर्षय ॐ धून-धून, ॐ हे हः खः वज्रिणि भिन्द, ॐ महाकाये छिन्द ॐ करालिनि किटि-किटि महाभूतमातः सर्वदुष्टनिवारिणि जये, ॐ विजये ॐ त्रैलोक्यविजये हूँ फट् स्वाहा।।"

2.1 मंत्र का विस्तृत पद-विश्लेषण

यह मंत्र तांत्रिक ध्वन्यात्मकता का अद्भुत उदाहरण है। इसमें प्रयुक्त प्रत्येक शब्द का एक विशिष्ट प्रभाव है जो साधक के मनोबल को बढ़ाता है और शत्रु के चित्त को अस्थिर करता है।

सारणी २: त्रैलोक्यविजय विद्या के पदों का तांत्रिक अर्थ

मंत्र पद शाब्दिक अर्थ तांत्रिक अभिप्राय
ॐ हूँ क्षूँ ह्रूूँ प्रणव + बीज मंत्र 'हूँ' (कवच/क्रोध), 'क्षूँ' (नृसिंह/संरक्षण), 'ह्रूूँ' (शिव/माया)। यह मंत्र का 'शिर' है जो ऊर्जा को जागृत करता है।
दंष्ट्रिणि भीमवक्त्रे दाढ़ों वाली, भयानक मुख वाली देवी का वह रूप जो काल (समय) को भी चबा सकता है। 'भीमवक्त्रे' संबोधन यहाँ मुख्य है।
हिलि हिलि क्रीड़ा करो / हिला दो शत्रु के आधार को कम्पित करना। यह 'क्षोभण' क्रिया का बीज है।
रक्तनेत्रे लाल आँखों वाली अत्यधिक क्रोध और सक्रियता का प्रतीक।
किलि किलि कीलन करना शत्रु की गति और बुद्धि को स्तंभित कर देना।
निर्मांसे बिना मांस के (कंकाल) यह चामुण्डा या काली का वह रूप है जो भौतिकता से परे अस्थि-मात्र शेष है।
गोनसाभरणे गोनस (सर्प) के आभूषण 'गोनस' एक विशेष विषैला सर्प या मणियुक्त नाग है। यह विष को नियंत्रित करने की शक्ति दर्शाता है।
शवमालाधारिणि शवों की माला पहनने वाली मुण्डमाला धारिणी - जो मृत्यु पर विजय प्राप्त कर चुकी है।
वसामेदोविलिप्तगात्रे चर्बी और मेद से लिपटा शरीर श्मशान साधना और अघोर चर्या का संकेत।
कह कह, हस हस अट्टहास (हँसना) प्रलयंकारी हँसी जिससे ब्रह्मांड कम्पित होता है।
नीलजीमूतवर्ण... नीले बादलों जैसा रंग देवी की व्यापकता और अनंतता (आकाशवत)।
त्रैलोक्यविजये तीनों लोकों को जीतने वाली मंत्र का फल श्रुति - साधक को अजेय बनाना।

2.2 अग्नि पुराणोक्त साधना विधि।

1. ध्यान :

मंत्र जप से पूर्व देवी का ध्यान अनिवार्य है:

"नीलवर्णां प्रेतसंस्थां विंशहस्तां यजेज्जये"
  • वर्ण: नील.
  • आसन: प्रेत (शव) पर आसीन।
  • भुजाएँ: बीस भुजाएँ - जो यह दर्शाता है कि वे नाना प्रकार के आयुधों से सुसज्जित हैं।

2. न्यास :

"न्यासं कृत्वा तु पञ्चाङ्गं..."

साधक को 'पञ्चांग न्यास' करना चाहिए। मंत्र के बीज मंत्रों (हूँ, क्षूँ, ह्रूूँ) को हृदय, शिर, शिखा, कवच और नेत्र में स्थापित करना अनिवार्य है। बिना न्यास के किया गया जप 'निष्फल' माना जाता है, क्योंकि न्यास साधक के शरीर को 'मंत्रमय' बनाता है।

3. होम :

"रक्तपुष्पाणि होमयेत्"

द्रव्य: 'रक्तपुष्प' (लाल फूल)। तंत्र में लाल फूल (जैसे जवाकुसुम/Hibiscus, करवीर/Red Oleander) शक्ति और राजसिक ऊर्जा का प्रतीक हैं।

विधि: मंत्र का उच्चारण करते हुए प्रत्येक आवृत्ति के अंत में 'स्वाहा' लगाकर लाल फूल अग्नि में समर्पित करें।

4. विशिष्ट प्रयोग (शत्रु स्तंभन):

  • यदि शत्रु अत्यंत प्रबल हो, तो मिट्टी (मृत्तिका) से शत्रु की प्रतीकात्मक मूर्ति या पुतली बनाएँ।
  • उस पर 'भुजंग' (सर्प) का नाम या आकृति बनाएँ (संभवतः शत्रु को सर्पवत बांधने की भावना से)।
  • इस मूर्ति के समक्ष मंत्र का जप करने से शत्रु 'स्तम्भित' (Paralyzed/Inactive) हो जाता है।

5. फलश्रुति:

"संग्रामे सैन्यभंगः स्यात्"

इस साधना का प्रत्यक्ष फल युद्धभूमि में शत्रु सेना का भंग (भगदड़/पराजय) है। यह राजाओं और सेनापतियों के लिए विहित विद्या थी।

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