विस्तृत उत्तर
महर्लोक का वातावरण पूर्ण रूप से विशुद्ध सत्त्व गुण से आच्छादित है जहाँ रजोगुण और तमोगुण का लेशमात्र भी प्रवेश नहीं है। यहाँ के निवासी अन्न या जल पर निर्भर नहीं रहते बल्कि वे योग-अग्नि और परब्रह्म के ध्यान से ही पोषण प्राप्त करते हैं। योग-अग्नि वह दिव्य आंतरिक ऊर्जा है जो अष्टांग योग के गहन अभ्यास से साधक के भीतर प्रज्वलित होती है। यह आंतरिक अग्नि साधक के शरीर को अन्न-जल के बिना जीवित रखने में समर्थ होती है। महर्लोक के ऋषिगण इतने उच्च योगी होते हैं कि वे ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को सीधे ग्रहण कर सकते हैं। यह अवस्था उन वानप्रस्थियों के लिए भी संभव है जिन्होंने देह को तपस्या से इतना परिष्कृत कर लिया है कि वह केवल योग-अग्नि पर जीवित रह सके। यहाँ भूख का पूर्णतः अभाव है।
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