श्री लक्ष्मी पूजन: शास्त्रोक्त शुद्धिकरण, घृत-अर्पण एवं ध्यान-मंत्रों का दिव्य रहस्य
सनातन धर्म में प्रत्येक पूजन एक दिव्य अनुष्ठान है, जो केवल बाह्य क्रियाओं का समुच्चय नहीं, अपितु अंतःकरण के भावों का ईश्वर से मिलन है। जब कर्मकांड शास्त्र-सम्मत विधि और हृदय की सच्ची श्रद्धा से संयुक्त होता है, तब वह साधारण पूजा न रहकर एक शक्तिशाली आध्यात्मिक साधना बन जाता है। दीपावली के पुण्य अवसर पर या किसी भी शुभ दिवस पर जब हम धन, धान्य, ऐश्वर्य और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी, जगज्जननी माँ महालक्ष्मी का पूजन करते हैं, तो उसका प्रत्येक सोपान गहन आध्यात्मिक अर्थों से परिपूर्ण होता है।
आइए, हम शास्त्रों के प्रकाश में लक्ष्मी पूजन के उन विशिष्ट मंत्रों और क्रियाओं के रहस्य को समझें, जो शुद्धिकरण से आरम्भ होकर, घृत (घी) द्वारा अर्पण और अंत में माँ के दिव्य स्वरुप के ध्यान में हमें लीन कर देते हैं।
प्रथम सोपान: सर्व-मंगल का आधार – पवित्रीकरण
किसी भी दैवीय शक्ति का आवाहन करने से पूर्व आत्म-शुद्धि, स्थान-शुद्धि और सामग्री-शुद्धि अनिवार्य है। शास्त्रों के अनुसार, शुद्धि दो प्रकार की होती है - बाह्य (शारीरिक और भौतिक स्वच्छता) तथा आभ्यंतर (मन और विचारों की पवित्रता)। इन दोनों ही शुद्धियों के लिए वैदिक ऋषियों ने एक अद्भुत मंत्र प्रदान किया है, जो भगवान विष्णु के स्मरण की महिमा पर आधारित है।
पवित्रीकरण मंत्र:
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
इस मंत्र का उच्चारण करते हुए जब साधक अपने ऊपर, पूजा की सामग्री पर और पूजा-स्थान पर जल छिड़कता है, तो वह केवल जल नहीं छिड़क रहा होता, अपितु भगवान पुण्डरीकाक्ष (कमल-नयन विष्णु) का स्मरण कर रहा होता है। इस मंत्र का गूढ़ार्थ यह है कि व्यक्ति चाहे किसी भी अवस्था में हो - पवित्र हो या अपवित्र, उसका बाह्य या आंतरिक स्तर कैसा भी हो, केवल भगवान के दिव्य नाम का स्मरण ही उसे बाहर और भीतर, दोनों ओर से पवित्र करने की क्षमता रखता है । यह सनातन धर्म की उस गहन दृष्टि को दर्शाता है, जहाँ भौतिक अवस्था से अधिक महत्व मानसिक और आत्मिक जुड़ाव का है। ईश्वर का स्मरण ही परम शुद्धि है।
द्वितीय सोपान: देवी का दिव्य अभिषेक – घृत स्नान का वैदिक रहस्य
पवित्रीकरण के उपरांत, जब हम देवी का आवाहन कर उन्हें आसन प्रदान करते हैं, तब षोडशोपचार पूजन (16 चरणों की पूजा) के अंतर्गत उनका दिव्य स्नान कराया जाता है। इस स्नान में पंचामृत के विभिन्न द्रव्यों का प्रयोग होता है, जिनमें 'घृत' अर्थात घी का स्थान सर्वोपरि है।
गाय के दूध से बना घी, जिसे नवनीत (मक्खन) को तपाकर प्राप्त किया जाता है, दूध का शुद्धतम और अंतिम सार माना जाता है। यह परम पुष्टि, तेज, स्निग्धता और पवित्रता का प्रतीक है। जब हम माँ लक्ष्मी को घी से स्नान कराते हैं, तो हम उन्हें केवल एक द्रव्य अर्पित नहीं करते, बल्कि अपने जीवन का श्रेष्ठतम सार, अपनी ऊर्जा और अपनी भक्ति की शुद्धतम अवस्था समर्पित करते हैं।
घृत स्नान समर्पण मंत्र:
नवनीतसमुत्पन्नं सर्वसंतोषकारकम्। घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥$
ॐ महालक्ष्म्यै नमः, घृतस्नानं समर्पयामि।
इस मंत्र द्वारा हम प्रार्थना करते हैं, "हे देवी! मक्खन से उत्पन्न, सभी को संतोष प्रदान करने वाला यह घृत मैं आपको स्नान के लिए प्रदान कर रहा हूँ, कृपया इसे स्वीकार करें।" यह अर्पण एक गहन आध्यात्मिक प्रार्थना भी है। जिस प्रकार दूध को मंथन और तपाने की प्रक्रिया से शुद्ध घी प्राप्त होता है, उसी प्रकार साधक प्रार्थना करता है कि माँ की कृपा से उसका मन भी साधना की अग्नि में तपकर शुद्ध, निर्मल और ज्ञानरुपी घृत से परिपूर्ण हो जाए।
तृतीय सोपान: ज्ञान-ज्योति का प्रज्वलन – घृत-दीप का माहात्म्य
लक्ष्मी पूजन में घी का दीपक प्रज्वलित करना एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। दीपक का प्रकाश अंधकार को दूर करता है, जो अज्ञान का प्रतीक है। दीपक की लौ सदैव ऊपर की ओर उठती है, जो हमें जीवन में ऊर्ध्वगामी होने, अर्थात उच्च आध्यात्मिक चेतना की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है। घी का दीपक जलाना मानो अपनी आत्मा की ज्योति को परमात्मा की महाज्योति से जोड़ने का प्रयास है। इस क्रिया के लिए शास्त्रों में अद्भुत मंत्र दिए गए हैं, जो साधक को द्वैत से अद्वैत की यात्रा कराते हैं।
दीपक समर्पण का मंत्र:
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वद्दिना योजितं मया। दीपं गृहाण देवेशि त्रैलोक्यतिमिरापहे॥
(हे देवेश्वरी! घी और बाती से युक्त, मेरे द्वारा अग्नि से प्रज्वलित इस दीपक को आप ग्रहण करें। आप तीनों लोकों के अंधकार को हरने वाली हैं।)
यह कर्मयोग का प्रतीक है, जहाँ भक्त और भगवान अलग हैं और भक्त अपनी सेवा अर्पित कर रहा है।
दीप-ज्योति से प्रार्थना:
शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
(जो शुभ करती है, कल्याण करती है, आरोग्य और धन-संपदा देती है तथा शत्रु-बुद्धि का विनाश करती है, उस दीपक की ज्योति को मेरा नमन है।)
यह भक्तियोग का मार्ग है, जहाँ दीपक की ज्योति को एक सजीव दैवीय शक्ति मानकर उससे कृपा की याचना की जाती है।
ज्योति में ब्रह्म का दर्शन:
दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते॥
(दीपक की ज्योति परब्रह्म है, दीपक की ज्योति ही जनार्दन (विष्णु) है। यह दीपक मेरे पापों का हरण करे। हे संध्यादीप, आपको नमस्कार है।)
यह ज्ञानयोग की पराकाष्ठा है, जहाँ साधक को दीपक की ज्योति में ही परब्रह्म का साक्षात्कार होता है और समस्त भेद मिट जाते हैं।
चतुर्थ सोपान: हृदय में माँ का आवाहन – शास्त्रोक्त ध्यान-मंत्र
जब मन और स्थान पवित्र हो गए, दिव्य ज्योति प्रज्वलित हो गई, तब साधक का हृदय माँ के स्वरुप का ध्यान करने के लिए तैयार होता है। ध्यान-मंत्र केवल स्तुति नहीं, अपितु शास्त्रों द्वारा प्रदान किया गया एक 'शब्द-चित्र' है, जो हमें देवी के वास्तविक स्वरुप पर मन को एकाग्र करने में सहायता करता है। माँ लक्ष्मी का सर्वाधिक प्रामाणिक और प्रसिद्ध ध्यान मंत्र इस प्रकार है:
श्री महालक्ष्मी ध्यान मंत्र:
या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी, गम्भीरावर्तनाभिः स्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया। लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रै-र्मणिगणखचितैः स्नापिता हेमकुम्भै-र्नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता
इस दिव्य श्लोक का भाव है:
"जो देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं (पद्मासनस्था), जिनका कटि-प्रदेश विशाल है और नेत्र कमल-दल के समान हैं (पद्मपत्रायताक्षी), जिनकी नाभि गहरी है और जो स्तनों के भार से किंचित झुकी हुई हैं (अनंत पोषण का प्रतीक), जो शुभ्र वस्त्र धारण किये हुए हैं, जिन्हें दिव्य गजराज मणि-जड़ित स्वर्ण-कलशों से नित्य स्नान कराते हैं, जिनके हाथ में सर्वदा कमल सुशोभित है (पद्महस्ता), वे सर्व-मंगलमयी माँ लक्ष्मी मेरे घर में सदा निवास करें।"
यह ध्यान केवल माँ के बाह्य रूप का चिंतन नहीं, बल्कि उनके गुणों को अपने भीतर आत्मसात करने की साधना है। उनका कमलासन संसार में रहते हुए भी पवित्र और निर्लिप्त रहने की प्रेरणा है। उनका पोषण से झुका हुआ शरीर हमें उदारता और करुणा सिखाता है। यह ध्यान करने से साधक का हृदय ही माँ का मंदिर बन जाता है।
