आवो लक्ष्मी बैठो आँगन (लक्ष्मी पूजन शाबर मंत्र)
देवता:
लक्ष्मी।
स्रोत:
शाबर तंत्र परंपरा।
प्रयोजन:
घर में धन-धान्य की कमी न होना, वर्ष भर सुख-समृद्धि और आनंद की प्राप्ति।
विधि:
दीपावली की रात्रि में सर्वप्रथम लक्ष्मी जी का षोडशोपचार पूजन करें (अथवा किसी योग्य ब्राह्मण से करवाएं)। इसके उपरांत रात्रि में इस मंत्र की पांच माला जप करें 4।
महत्व:
यह एक सरल और भावना प्रधान शाबर मंत्र है, जिसमें लक्ष्मी जी को आत्मीयता से घर में आमंत्रित कर स्थापित करने का भाव है। इसमें त्रिदेवों और शक्ति की आन (शपथ) देकर मंत्र को प्रभावी बनाया गया है, जो शाबर मंत्रों की एक विशिष्ट शैली है।
श्री कुबेर-लक्ष्मी स्तोत्रों में वर्णित जगज्जननी महालक्ष्मी की सर्वोच्च महिमा: एक शास्त्रीय विवेचन
भाग 1: प्रस्तावना - धन की अधिष्ठात्री देवी और देवों के कोषाध्यक्ष
सनातन धर्म की प्रत्येक उपासना पद्धति गहन आध्यात्मिक रहस्यों एवं दिव्य व्यवस्थाओं पर आधारित है। दीपावली जैसे महापर्वों पर हम श्रद्धापूर्वक जगज्जननी श्री महालक्ष्मी के साथ यक्षराज कुबेर का पूजन करते हैं 1। सामान्य दृष्टि से दोनों ही श्री, अर्थात धन और वैभव के प्रदाता प्रतीत होते हैं। इस संयुक्त पूजन को देखकर सहज ही यह प्रश्न उठता है कि इन दोनों दिव्य शक्तियों का वास्तविक शास्त्रीय संबंध क्या है? क्या वे समान हैं, अथवा उनमें कोई तात्विक भेद है? इस प्रश्न का उत्तर किसी कल्पना या लोक-मान्यता में नहीं, अपितु हमारे वेदों, पुराणों और प्रामाणिक स्तोत्रों के पवित्र शब्दों में निहित है। आइए, शास्त्रों के प्रकाश में हम धन की अधिष्ठात्री देवी और देवों के कोषाध्यक्ष के इस दिव्य संबंध को समझें और जगदम्बा महालक्ष्मी की सर्वोच्च महिमा का दर्शन करें।
भाग 2: पौराणिक आधार - श्री लक्ष्मी और श्री कुबेर का शास्त्रीय स्वरूप
2.1 जगदम्बा श्री महालक्ष्मी: समग्र 'श्री' की स्रोत
पुराणों के अनुसार, आदि-शक्ति श्री महालक्ष्मी का प्राकट्य देव-दानवों द्वारा किए गए अमृत-मंथन से हुआ था 2। वे भगवान श्रीहरि विष्णु की शाश्वत शक्ति और अर्धांगिनी हैं। वे केवल 'धन' अर्थात मुद्रा या संपत्ति की देवी नहीं हैं, अपितु वे समग्र 'श्री' की अधिष्ठात्री हैं। यह 'श्री' आठ स्वरूपों में व्यक्त होता है, जिन्हें हम 'अष्टलक्ष्मी' के नाम से जानते हैं: आदिलक्ष्मी (आरंभ), धनलक्ष्मी (भौतिक संपदा), धान्यलक्ष्मी (अन्न), गजलक्ष्मी (स्वास्थ्य एवं बल), संतानलक्ष्मी (वंश), वीरलक्ष्मी (साहस), विजयलक्ष्मी (विजय) और विद्यालक्ष्मी (ज्ञान)। उनका स्वरूप चंचल है, क्योंकि वे कृपा-प्रवाह का प्रतीक हैं, जो एक स्थान पर बंधकर नहीं रहता 。 वस्तुतः, वे ही संपूर्ण ब्रह्मांड के ऐश्वर्य, सौभाग्य, तेज, कीर्ति और समृद्धि का मूल स्रोत हैं।
2.2 यक्षराज श्री कुबेर: धर्मनिष्ठ कोषाध्यक्ष एवं उत्तर दिशा के दिक्पाल
यक्षराज कुबेर महर्षि विश्रवा के पुत्र और रावण के सौतेले भ्राता हैं। उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया, जिसके फलस्वरूप महादेव ने उन्हें उत्तर दिशा का दिक्पाल, यक्षों का राजा और देवलोक के समस्त कोष (खजाने) का स्वामी अर्थात 'धनपति' नियुक्त किया। उनका कार्य देवी-देवताओं और सृष्टि के लिए आवश्यक संपत्ति का संरक्षण और उसका धर्मानुसार वितरण करना है। वे अर्जित की हुई संपत्ति, स्वर्ण, रत्न और समस्त निधियों के अधिपति हैं। उनका पद और सामर्थ्य उनकी अपनी घोर तपस्या और महादेव की कृपा का फल है।
2.3 मौलिक भेद: सृजनकर्ता और संरक्षक
शास्त्रों में श्री लक्ष्मी और श्री कुबेर के बीच का भेद अत्यंत स्पष्ट है। जगदम्बा महालक्ष्मी धन की 'सृजनकर्ता' हैं, वे वह अनंत महासागर हैं जहाँ से ऐश्वर्य की उत्पत्ति होती है। इसके विपरीत, यक्षराज कुबेर उस महासागर से भरे हुए एक पवित्र कलश की भांति हैं; वे धन के 'संरक्षक' और 'वितरक' हैं। उनका कोष स्वयं महालक्ष्मी की कृपा से ही भरता है। वे ब्रह्मांड के वित्त मंत्री हैं, किंतु उस कोष की स्वामिनी स्वयं महालक्ष्मी हैं। यह संबंध एक दिव्य, पदानुक्रमित व्यवस्था को दर्शाता है, जहाँ सृजन और प्रबंधन के कार्य अलग-अलग दिव्य शक्तियों द्वारा संपादित होते हैं।
| विशेषता | जगदम्बा श्री महालक्ष्मी | यक्षराज श्री कुबेर |
|---|---|---|
| मूल स्वरूप | समग्र ऐश्वर्य ('श्री') की अनंत स्रोत एवं सृजनकर्ता। भगवान विष्णु की शक्ति। | देवों के कोष के संरक्षक, प्रबंधक एवं वितरक। भगवान शिव के परम भक्त। |
| कार्यक्षेत्र | अष्टलक्ष्मी के रूप में जीवन के सभी आठ आयामों (धन, धान्य, ज्ञान, बल आदि) में समृद्धि प्रदान करना। | अर्जित धन, संपत्ति, स्वर्ण, रत्न एवं निधियों की रक्षा करना और उनका उचित वितरण सुनिश्चित करना। |
| पौराणिक संबंध | धन की मूल अधिष्ठात्री देवी, जिनकी कृपा से कुबेर का कोष भरता है। | धन के व्यवस्थापक एवं कोषाध्यक्ष, जो स्वयं महालक्ष्मी के उपासक हैं। |
भाग 3: स्तोत्रों एवं मंत्रों से प्रत्यक्ष शास्त्रीय प्रमाण
3.1 धनदा लक्ष्मी स्तोत्र का गहन विश्लेषण: "धनदपूजिते"
'धनदा लक्ष्मी स्तोत्र' स्वयं भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को बताया गया एक परम गोपनीय और प्रभावशाली स्तोत्र है, जो दरिद्रता का नाश कर धन प्रदान करता है। इस स्तोत्र के श्लोक महालक्ष्मी की सर्वोच्चता का अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
श्लोक 9: "धराऽमरप्रियेपुण्येधन्येधनदपूजिते।सुधनंधार्मिकेदेहियजमानायसत्वरम्॥"
इस श्लोक में देवी को 'धनदपूजिते' कहकर संबोधित किया गया है, जिसका स्पष्ट अर्थ है- "वे जिनकी पूजा धनद (धन देने वाले कुबेर) स्वयं करते हैं"। यह एक शब्द ही संपूर्ण संबंध को स्पष्ट कर देता है कि धन के अधिपति कुबेर भी धन की प्राप्ति और कृपा के लिए जिनकी उपासना करते हैं, वे स्वयं महालक्ष्मी हैं।
3.2 श्री कुबेर-अष्टलक्ष्मी मंत्र का मर्म: "कुबेराय अष्ट-लक्ष्मी..."
एक अत्यंत प्रचलित और सिद्ध मंत्र है-
"ॐह्रींश्रींक्रींश्रींकुबेरायअष्ट−लक्ष्मीममगृहेधनंपुरयपुरयनमः॥"
। इस मंत्र की संरचना अत्यंत ज्ञानवर्धक है। यहाँ कुबेर का आवाहन अकेले नहीं, अपितु 'अष्ट-लक्ष्मी' के साथ किया गया है। प्रार्थना यह है कि कुबेर, अष्टलक्ष्मी के धन को साधक के घर में पूर्ण करें ('पुरय पुरय')। यह दर्शाता है कि कुबेर वह दिव्य माध्यम हैं जो महालक्ष्मी के आठों स्वरूपों वाले ऐश्वर्य को भक्त तक पहुँचाते हैं । वे उस खजाने को लाकर देते हैं, जिसकी स्वामिनी अष्टलक्ष्मी हैं। इस प्रकार, ये पवित्र मंत्र केवल उपासना के साधन नहीं, अपितु आध्यात्मिक सत्य को प्रकट करने वाले ज्ञान के स्रोत भी हैं। वे साधक की चेतना को सही ईश्वर-बोध से जोड़ते हैं, जिससे उपासना अधिक फलदायी होती है।
भाग 4: संयुक्त उपासना का आध्यात्मिक मर्म - संतुलन और समग्रता का मार्ग
4.1 प्राप्ति और संरक्षण का संतुलन
श्री लक्ष्मी और श्री कुबेर की संयुक्त उपासना सनातन धर्म की परिपक्व दृष्टि का प्रतीक है। यह केवल धन की प्राप्ति के लिए नहीं, अपितु उसकी स्थिरता और सदुपयोग के लिए की गई एक संपूर्ण प्रार्थना है। महालक्ष्मी की उपासना धन, अवसर और सौभाग्य के प्रवाह (प्राप्ति) के लिए है, तो कुबेर की उपासना उस प्राप्त हुए धन की स्थिरता, उचित प्रबंधन और संरक्षण के लिए है । यह लक्ष्मी के 'चंचल' स्वरूप को कुबेर की 'स्थिरता' से संतुलित करने का आध्यात्मिक उपाय है।
4.2 सनातन धर्म में अर्थ पुरुषार्थ की समग्र दृष्टि
मानव जीवन के चार पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- में 'अर्थ' का महत्वपूर्ण स्थान है। लक्ष्मी-कुबेर की उपासना 'अर्थ' पुरुषार्थ की सिद्धि का श्रेष्ठतम मार्ग है, जो धर्म से जुड़ा हुआ है। महालक्ष्मी की कृपा से 'अर्थ' की प्राप्ति होती है और कुबेर की कृपा से उस 'अर्थ' को धर्मानुसार भोगने और संरक्षित करने की बुद्धि प्राप्त होती है । यह उपासना सिखाती है कि धन साधन है, साध्य नहीं। इसका उद्देश्य जीवन को धर्म के मार्ग पर चलाते हुए समस्त कर्तव्यों का निर्वहन करना है।
