विस्तृत उत्तर
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार नैमित्तिक प्रलय में जब एकार्णव (विशाल प्रलय का समुद्र) उत्पन्न होता है तो इसके जल का स्तर निरंतर बढ़ता हुआ सप्तर्षि मंडल (ध्रुवलोक के समीप) तक पहुँच जाता है। परन्तु महर्लोक अपनी अत्यधिक ऊँचाई के कारण जलमग्न होने से बच जाता है। महर्लोक ध्रुवलोक से एक करोड़ योजन ऊपर स्थित है जो एकार्णव के जल स्तर से बहुत ऊपर है। इस प्रकार महर्लोक नैमित्तिक प्रलय में न तो अग्नि से भस्म होता है और न ही एकार्णव के जल से जलमग्न होता है। यह इसके कृतकाकृतक स्वभाव की एक और पुष्टि है। तथापि संकर्षण की अग्नि का ताप और एकार्णव से उत्पन्न भयंकर जलवाष्प महर्लोक को रहने योग्य नहीं रहने देते जिससे ऋषिगण जनलोक की ओर चले जाते हैं।
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