लोकगरुड़ पुराण में महर्लोक को कण्ठ क्यों कहा गया है?गरुड़ पुराण के सूक्ष्म शरीर-विज्ञान में महर्लोक कण्ठ (गले) क्षेत्र में है। यह विशुद्ध चक्र का स्थान है जो उच्चतर चेतना और सत्य का मुख्य द्वार है।#गरुड़ पुराण#महर्लोक#कण्ठ
ध्यान अनुभवध्यान करते समय शरीर में विद्युत प्रवाह जैसा अनुभव क्यों होता है?प्राण ऊर्जा (72,000 नाड़ी), कुंडलिनी (अमर उजाला: 'बिजली कौंधना'), नाड़ी शुद्धि (block), चक्र सक्रिय। रीढ़=कुंडलिनी, हथेली=प्राण। सामान्य+शुभ! दर्दनाक=गुरु।#विद्युत
मंत्र जप अनुभवमंत्र जप करते समय शरीर में कंपन हो तो डरना चाहिए या नहीं?डरें नहीं। कारण: मंत्र resonance, कुंडलिनी गति, चक्र जागरण, प्राण प्रवाह। शांत रहें → जप जारी। अत्यधिक = रोकें + गहरी सांस। नियमित = कम होता है। तीव्र = गुरु।#कंपन#शरीर#जप
मंत्र जप विधिमंत्र जप में मातृका न्यास कैसे करें?50 संस्कृत अक्षर (अ→क्ष) शरीर पर। 16 स्वर = मस्तक→मुख, 34 व्यंजन = कंठ→पैर। बोलें + स्पर्श। तांत्रिक = अनिवार्य। सामान्य = करन्यास/अंगन्यास पर्याप्त। गुरु उत्तम।#मातृका#न्यास#वर्णमाला
तीर्थ दर्शनतीर्थ यात्रा से शरीर और मन की शुद्धि कैसे?शरीर: पवित्र स्नान, पैदल, सात्विक, शुद्ध वायु। मन: तनाव मुक्ति, मंत्र, भक्ति, सत्संग। आत्मा: ईश्वर समीप, आत्मचिंतन, दान। तीर्थ = पूर्ण रीसेट — लौटकर नवीन।#तीर्थ#शुद्धि#शरीर
मंत्र जप विधिमंत्र जप से पहले न्यास विधि कैसे करें?शरीर अंगों पर मंत्राक्षर स्थापना। करन्यास (5 अंगुली+करतल), अंगन्यास (6 अंग), मातृका (वर्णमाला)। शरीर = मंत्रमय। सरल: 'ॐ' 3 बार + ध्यान = पर्याप्त।#न्यास#विधि#जप
ध्यान अनुभवध्यान करते समय अपने शरीर से बाहर निकलने का अनुभव क्या है?'ऊपर से शरीर देखना' = शरीर transcend, सूक्ष्म शरीर, पतंजलि 3.38। कुंडलिनी→सहस्रार।: 'अनुभव — मन खेल भी।' भय नहीं — 'वापस आओगे।' गुरु।#शरीर#बाहर#निकलना
ध्यान अनुभवध्यान करते समय शरीर में कंपन होने का क्या कारण है?ऊर्जा block तोड़ रही (नाड़ी शुद्धि), कुंडलिनी (अमर उजाला: 'बिजली कौंधना'), दबी भावनाएं release। सामान्य — घबराएं नहीं। गहरी श्वास, ढीला, बहने दें। अत्यधिक = गुरु।#ध्यान#कंपन#शरीर
मंत्र जप अनुभवमंत्र जप करते समय शरीर में गर्मी महसूस होने का कारण क्या है?कुंडलिनी जागरण, बीज मंत्र अग्नि तत्व, 'तप'=आंतरिक अग्नि। शारीरिक: metabolism, रक्त प्रवाह। शुभ संकेत। अत्यधिक: ठंडा जल, चंदन, 'ॐ शांति'।#गर्मी#शरीर#जप
शकुन शास्त्रछिपकली शरीर पर गिर जाए तो शुभ-अशुभ?दाहिना अंग = अधिकांशतः शुभ, बायाँ = अशुभ। दाहिनी भुजा = धनलाभ। बालों पर = अशुभ। सिर = धनलाभ (स्त्री)। छिपकली = लक्ष्मी प्रतीक। अशुभ हो तो स्नान + गंगाजल + 'ॐ नमः शिवाय'। शकुन शास्त्र मान्यता।#छिपकली#शकुन#शरीर
लोकपितृ तर्पण का संबंध हमारे शरीर और वंश से कैसे है?सपिण्ड संबंध के कारण श्राद्धकर्ता का शरीर और वंश उसके सात पीढ़ी पितरों से जुड़ा माना जाता है।#पितृ तर्पण#वंश#शरीर
लोकशरीर के 84 अंशों का पितृ ऋण से क्या संबंध है?पूर्वजों से मिले ५६ अंशों में सबसे अधिक ४६ अंश तीन पीढ़ियों से आते हैं, इसलिए पितृ ऋण उनसे जुड़ा है।#84 अंश#पितृ ऋण#शरीर
लोक“यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” सिद्धांत में तपोलोक कैसे समझाया गया है?इस सिद्धांत में तपोलोक बाहरी ब्रह्मांड का लोक भी है और शरीर में ललाट या आज्ञा चक्र की चेतना भी।#यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे#तपोलोक#शरीर
लोकगरुड़ पुराण के अनुसार शरीर में तपोलोक कहाँ है?गरुड़ पुराण के अनुसार तपोलोक मनुष्य के ललाट पर स्थित है।#गरुड़ पुराण#शरीर#तपोलोक
जीवन एवं मृत्युप्रेत को शरीर क्यों नहीं मिलता?प्रेत को शरीर इसलिए नहीं मिलता क्योंकि — स्थूल शरीर जल चुका है, पापकर्मों के कारण तत्काल पुनर्जन्म नहीं, अकाल मृत्यु में शेष आयु प्रेत-रूप में बिताना पड़ता है और यमराज के निर्णय की प्रतीक्षा होती है।#प्रेत#शरीर#कर्म
जीवन एवं मृत्युप्रेत शरीर कैसा होता है?प्रेत-शरीर सूक्ष्म, अदृश्य और 'हस्तमात्र' (एक हाथ बराबर) बताया गया है। यह पिंडदान से निर्मित वासनामय शरीर है जिसमें भूख-प्यास और पीड़ा का अनुभव होता है। यमदूत के पाश से बँधा होने के कारण वापस नहीं लौट सकता।#प्रेत#शरीर#सूक्ष्म
जीवन एवं मृत्युनरक में जीव के शरीर का स्वरूप कैसे बदलता है?नरक में जीव 'यातना-देह' में रहता है जो पिंडदान से बनती है। यातना से क्षत-विक्षत होती है, रक्त वमन होता है। नष्ट होने पर यमराज की शक्ति से पुनः निर्मित होती है — यह पाप-शुद्धि की प्रक्रिया है।#नरक#शरीर#यातना देह
जीवन एवं मृत्युनरक में जीव के शरीर की स्थिति कैसी होती है?नरक में जीव 'यातना-शरीर' में होता है जो पिंडदान से बनता है। यह शरीर जंजीरों में बँधा, पिटा हुआ, जला हुआ, काटा हुआ और रक्त वमन करता हुआ होता है। यह मरता नहीं — बार-बार पुनः उत्पन्न होता है।#नरक#शरीर#यातना शरीर
जीवन एवं मृत्युमृत्यु के समय शरीर क्यों निष्क्रिय हो जाता है?शरीर की चेतना और शक्ति का आधार जीवात्मा है। मृत्यु के समय जीवात्मा शरीर छोड़ती है — इसी प्रक्रिया में प्राण-ऊर्जा हटती जाती है और शरीर निष्क्रिय होता जाता है। जीवात्मा के बिना यह शरीर पाँच तत्वों का जड़ आवरण मात्र रह जाता है।#मृत्यु#शरीर#निष्क्रिय
आत्मा और मोक्षमरने के बाद आत्मा शरीर से कैसे निकलती हैबृहदारण्यक उपनिषद (4.4.1-2) अनुसार — इंद्रियां शिथिल होती हैं, पांचों प्राण हृदय में एकत्रित होते हैं, उदान वायु आत्मा को सूक्ष्म शरीर सहित शरीर के एक द्वार से बाहर ले जाती है। कर्म और संस्कार भी साथ जाते हैं।#आत्मा#शरीर#मृत्यु
तंत्र साधनातंत्र में शरीर को देवालय कैसे बनाएंशरीर = देवालय (कुलार्णव तंत्र: 'देहो देवालयः')। विधि: (1) न्यास — शरीर पर मंत्र आरोपण (कर/अंग/मातृका)। (2) भूतशुद्धि — पंचतत्व शुद्धि (लं/वं/रं/यं/हं)। (3) चक्र जागृति — 7 चक्र = 7 कक्ष, कुण्डलिनी ऊर्ध्वगमन। (4) प्राणायाम + बन्ध। (5) सात्विक आहार-विहार। गुरु दीक्षा अनिवार्य।#तंत्र#शरीर#देवालय
कुंडलिनीकुंडलिनी जागरण होने पर शरीर में क्या बदलाव आते हैं?तत्काल: रीढ़ विद्युत, ज्योति per चक्र, कंपन, ताप। दीर्घ: रोग↓, इंद्रियां↑, नींद↓, सात्विक स्वतः। बिना गुरु = कष्ट। अमर उजाला: 'बिजली कौंधना।'#कुंडलिनी#शरीर#बदलाव
तंत्र ज्ञानतंत्र में मुद्रा कितने प्रकार की होती हैं?3 प्रकार: हस्त (ज्ञान/चिन्/योनि), शरीर (हठ — महामुद्रा/खेचरी/बंध = 10), तांत्रिक (पूजा — 24/64)। पंचमकार 'मुद्रा' = अन्न/योगिक। हठ योग प्रदीपिका: 10 = कुंडलिनी।#मुद्रा#प्रकार#तंत्र
तंत्र साधनातंत्र शास्त्र में भूत शुद्धि का क्या विधान है?पंचभूत शुद्धि: लं/वं/रं/यं/हं — 5 चक्रों पर बीज जप। अग्नि(रं)→शरीर भस्म→पुनर्निर्माण (कल्पना)। 'सोऽहम्' = आत्मा भावना। तांत्रिक जप/यंत्र पहले = अनिवार्य। सरल: 5×'ॐ'।#भूत शुद्धि#विधान#पंचभूत
मंत्र जप विधिमंत्र जप में करन्यास और अंगन्यास कैसे करें?करन्यास: 6 अंगुली/करतल (अंगूठा→कनिष्ठिका+करतल) + 'नमः/स्वाहा/वषट्/हुं/वौषट्/फट्'। अंगन्यास: 6 शरीर (हृदय/मस्तक/शिखा/कवच/नेत्र/अस्त्र)। प्रत्येक पर बीज + स्पर्श।#करन्यास#अंगन्यास#विधि
कुंडलिनीकुंडलिनी जागरण में शरीर गर्म क्यों हो जाता है?अग्नि सर्पिणी (मूलाधार=अग्नि), 'बिजली कौंधना' (अमर उजाला), नाड़ी friction (शुद्धि), मणिपुर=अग्नि चक्र, metabolism↑। सामान्य। शीतली प्राणायाम, चंदन, grounding।#कुंडलिनी#शरीर#गर्म
ध्यान अनुभवगहरे ध्यान में शरीर सुन्न हो जाने का क्या कारण है?प्रत्याहार (इंद्रियां अंतर्मुखी), शरीर transcend, प्राण shift। या शारीरिक (बैठना→रक्त↓)। सुखद सुन्न=आध्यात्मिक(शुभ)। असहज=शारीरिक(बदलें)। बाद=धीरे awareness।#सुन्न#शरीर#ध्यान