विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में नरक में जीव के शरीर की स्थिति का वर्णन अत्यंत करुणाजनक है।
यातना-शरीर (प्रेत-शरीर) — मृत्यु के बाद स्थूल शरीर जल जाता है। नरक में जीव एक 'यातना-देह' में रहता है जो पिंडदान से निर्मित होती है और जिसमें कष्ट भोगने की पूरी क्षमता होती है। यही शरीर नरक की यातना का माध्यम है।
गरुड़ पुराण में वर्णित है — 'रक्त वमन करते हैं तथा वमन किये रक्त को पीते हैं।' यह शरीर की दारुण दशा का चित्रण है।
नरक में शरीर की स्थिति — गले में जंजीरें, हाथ-पैरों में बंधन, पीठ पर लोहे का भार, शरीर पर लाठियों और गदाओं की चोट के निशान, जलने, उबलने और काटे जाने से क्षत-विक्षत। यह शरीर बेहोश होता है पर मरता नहीं।
एक विशेष बात — यह यातना-शरीर बार-बार उत्पन्न होता है। जब पिटाई से नष्ट हो जाता है, तब पुनः उत्पन्न करके यातना दी जाती है (संजीवन नरक)।
शरीर की यह दशा उस व्यक्ति के जीवन के कर्मों का प्रतिबिंब है जिसने दूसरों के शरीर को कष्ट दिया।





