प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय संरचना में यमलोक का सटीक स्थान
सनातन धर्म के प्रामाणिक शास्त्रों, विशेषकर गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण में मृत्यु के उपरांत जीवात्मा की गति, कर्म-विपाक के सिद्धांत और यमलोक की संपूर्ण संरचना का अत्यंत सूक्ष्म तथा विशद वर्णन प्राप्त होता है। यमलोक मात्र कोई कल्पित स्थान नहीं है, अपितु पौराणिक ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) के अंतर्गत यह एक सुनिश्चित भौगोलिक एवं आध्यात्मिक आयाम है जहाँ जीवात्मा अपने कर्मों का फल भोगने हेतु जाती है। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कंध के छब्बीसवें अध्याय (५.२६) में शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को ब्रह्मांड की संरचना का बोध कराते हुए यमलोक के स्थान का स्पष्ट निर्धारण करते हैं। उनके विवरण के अनुसार, नरक या यमलोक ब्रह्मांड के दक्षिणी भाग में, भू-मण्डल (पृथ्वी) के नीचे तथा गर्भोदक सागर के जल से तनिक ऊपर स्थित है । यह त्रिलोकी और गर्भोदक सागर के मध्य का वह रिक्त स्थान है जिसे पितृलोक का क्षेत्र भी कहा जाता है। पितृलोक की इसी परिधि में सूर्यपुत्र यमराज का मुख्य निवास स्थान और उनकी न्याय-सभा स्थित है, जहाँ उनके अधीनस्थ यमदूत पापियों को मृत्यु के पश्चात तत्काल लाते हैं ।
गरुड़ पुराण के प्रेतखण्ड में भी मृत्युलोक और यमलोक के मध्य की दूरी का सटीक परिमाण ८६,००० योजन (लगभग ६,८८,००० मील) बताया गया है । ब्रह्मांड के इस निचले क्षेत्र में स्थापित यमलोक का मुख्य उद्देश्य जीवों के कर्मों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना और प्राकृतिक न्याय की स्थापना करना है। श्रीमद्भागवत पुराण में कहा गया है कि "प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः" अर्थात् जीवात्मा प्रकृति के गुणों के वशीभूत होकर कर्म करती है, और यमलोक की पूरी व्यवस्था उन कर्मों की प्रतिक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए परमेश्वर के एक कठोर प्रशासनिक विभाग के रूप में कार्य करती है । यमराज इस विभाग के अधिपति हैं, जो भगवान के ही एक विशेष महाजन (अधिकारी) माने गए हैं। यद्यपि यह लोक भौतिक ब्रह्मांड के भीतर ही स्थित है, परंतु इसकी प्रकृति सांसारिक नहीं है; यह शुद्ध रूप से यातना और कर्म-शोधन का आयाम है जहाँ स्थूल शरीर के बिना केवल सूक्ष्म 'यातना-देह' के माध्यम से ही प्रवेश संभव है । विष्णु पुराण में महर्षि पराशर मैत्रेय जी को स्पष्ट करते हैं कि "विष्णु-शक्तिः परा प्रोक्ता", अर्थात् यह संपूर्ण ब्रह्मांड और इसके भीतर यमलोक की संपूर्ण दण्ड व्यवस्था भगवान विष्णु की ही परा शक्ति का एक अनुशासित विस्तार है ।
यमराज का स्वरूप, उनके १४ नाम, अधिकार एवं कर्तव्य
शास्त्रों में यमराज को मृत्यु के देवता, धर्मराज और पितरों के अधिपति के रूप में मान्यता प्राप्त है। विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, वे सूर्य (विवस्वान) के पुत्र हैं और उन्हें ब्रह्मांड में न्याय और दण्ड-विधान का सर्वोच्च अधिकार प्राप्त है । यमराज का पद कोई साधारण देव-पद नहीं है, अपितु यह ब्रह्मांडीय न्यायपालिका का सर्वोच्च पद है जहाँ से संपूर्ण सृष्टि के पाप-पुण्य का संतुलन स्थापित किया जाता है। स्मृति ग्रंथों और पुराणों में यमराज के १४ प्रमुख नामों का उल्लेख मिलता है, जो उनके विभिन्न कार्यों और स्वरूपों को परिभाषित करते हैं: यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दध्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त । ये नाम मात्र उपाधियां नहीं हैं, अपितु उनके द्वारा ब्रह्मांड में किए जाने वाले संहार और न्याय के कार्यों के प्रतीक हैं।
गरुड़ पुराण में यमराज के स्वरूप का अत्यंत गूढ़ और द्वैत (Dual) वर्णन मिलता है, जो यह स्पष्ट करता है कि जीवात्मा के कर्मों के आधार पर ही यमराज का दर्शन उसे भिन्न-भिन्न रूपों में होता है। जो जीवात्माएँ जीवन भर पाप कर्मों में लिप्त रहती हैं, उन्हें यमराज अत्यंत भयंकर, विशालकाय, कृष्ण वर्ण वाले, लाल नेत्रों वाले और हाथ में मृत्यु-पाश तथा काल-दण्ड धारण किए हुए एक क्रूर शासक के रूप में दिखाई देते हैं। पापी आत्मा उन्हें देखकर भय से कांपने लगती है और हाहाकार करती है । इसके विपरीत, जिन पुण्यवान आत्माओं ने अपने जीवन में सत्य, धर्म, दान और अहिंसा का पालन किया है, उन्हें यमराज का यही स्वरूप अत्यंत सौम्य, शांत, और मुकुट तथा कुंडल धारण किए हुए देव रूप में प्रतीत होता है । गरुड़ पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि जब कोई अत्यंत पुण्यात्मा, जिसने अन्न, वस्त्र, गौ अथवा विद्या का दान किया हो, यमलोक के समीप पहुँचती है, तो धर्मराज स्वयं अपने आसन से उठकर उस पुण्यात्मा का स्वागत करते हैं और उसे सम्मानपूर्वक अपनी सभा में स्थान देते हैं । यमराज का यह स्वरूप कर्म-सिद्धांत का ही दर्पण है, जहाँ जीवात्मा अपने ही कर्मों की छाया यमराज के स्वरूप में देखती है। यमराज पूर्णतः निष्पक्ष हैं और उनके निर्णय में तनिक भी त्रुटि या विलंब नहीं होता है । वे भगवान विष्णु के प्रतिनिधि के रूप में कार्यरत हैं और विष्णु पुराण के द्वितीय अंश में यमराज स्वयं अपने दूतों को यह स्पष्ट निर्देश देते हैं कि जो मनुष्य भगवान विष्णु के सच्चे भक्त हैं, उनके समीप यमदूत कभी न जाएँ, क्योंकि वैष्णवों पर यमराज का अधिकार नहीं होता, वे मृत्यु के पश्चात सीधे वैकुण्ठ जाते हैं ।
यमराज की भव्य सभा (दरबार) का शास्त्रीय वर्णन
यमराज का न्यायालय या उनकी सभा कोई अंधकारमय या डरावना स्थान नहीं है, अपितु यह देवलोक की सभाओं के समान ही अत्यंत भव्य और विस्तृत है। गरुड़ पुराण और भागवत पुराण में इस सभा का विशद वर्णन प्राप्त होता है। जब कोई पुण्यवान आत्मा यमलोक पहुँचती है, तो वह देखती है कि यमराज की सभा में चारों ओर दिव्य प्रकाश फैला हुआ है। इस सभा में अनेक मुनीश्वर, सिद्ध योगी, गंधर्व और देवतागण उपस्थित रहते हैं । सभा में पितृलोक के अधिपति अग्निष्वात्त आदि पितृगण भी विराजमान होते हैं, जो अपने वंशजों के कर्मों का अवलोकन करते हैं । जब धर्मराज अपने सिंहासन पर आसीन होते हैं, तो गंधर्व उनका यशोगान करते हैं और अप्सराएँ नृत्य करती हैं ।
शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति धर्म का पालन करते हैं और निष्काम भाव से कर्म करते हैं, वे इस सभा में अत्यंत आदर प्राप्त करते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, कई पुण्यात्माएँ जो सीधे स्वर्ग या वैकुण्ठ नहीं जातीं, वे यमराज की इसी सभा में एक महाकल्प तक निवास करती हैं। वहाँ वे मनुष्यों के लिए दुर्लभ दिव्य भोगों का उपभोग करती हैं और देवताओं तथा मुनियों के सत्संग का लाभ उठाती हैं। जब उनके पुण्यों का क्षय होने लगता है, तब वे पुनः मृत्युलोक में किसी अत्यंत धनवान, सर्वज्ञ और सभी शास्त्रों में पारंगत उच्च कुल में जन्म लेती हैं, ताकि वे अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढ़ा सकें और आत्म-चिंतन द्वारा परम गति को प्राप्त कर सकें । यमराज की यह सभा एक ऐसा पारलौकिक न्यायालय है जहाँ कोई भी साक्ष्य छिपाया नहीं जा सकता और जहाँ हर कर्म का पारदर्शी मूल्यांकन होता है। इस मूल्यांकन प्रक्रिया में यमराज की सहायता करने के लिए एक अत्यंत सुव्यवस्थित प्रशासनिक तंत्र कार्यरत रहता है, जिसके मुख्य आधार भगवान चित्रगुप्त हैं।
चित्रगुप्त की उत्पत्ति, स्वरूप एवं 'अग्रसंधानी' पुस्तिका
जीवात्मा के कर्मों का सटीक, त्रुटिहीन और सूक्ष्म लेखा-जोखा रखने का कार्य भगवान चित्रगुप्त का है। गरुड़ पुराण और अन्य स्मृति ग्रंथों में चित्रगुप्त के जन्म और उनके स्वरूप का विस्तृत आख्यान प्राप्त होता है। शास्त्रों में उन्हें 'कायस्थ' कहा गया है, जिसका अर्थ है वह जो काया (शरीर) में स्थित हो। उनकी उत्पत्ति के संदर्भ में गरुड़ पुराण में एक श्लोक प्राप्त होता है जहाँ यमराज विचार करते हैं: "ततो मे सर्वसिद्धिः स्यान्निर्वृत्तिश्च परा भवेत्।" अर्थात्, यदि मेरी पुरी में कोई ऐसा मेधावी लेखक हो जाए जो सभी जीवों के शुभ-अशुभ कर्मों का ज्ञाता हो, तो मेरा कार्य सिद्ध हो जाएगा और मैं चिंतामुक्त हो जाऊंगा । यमराज की इसी आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए ब्रह्मा जी ने १००० वर्षों तक घोर तपस्या की, जिसके परिणामस्वरूप उनके शरीर (काया) से एक अत्यंत तेजस्वी पुरुष प्रकट हुआ, जिसके हाथों में कलम, दवात और करवाल (तलवार) थी। ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न होने के कारण वे कायस्थ कहलाए और गुप्त रूप से सभी जीवों के चित्र (कर्मों का स्वरूप) संचित करने के कारण उनका नाम चित्रगुप्त पड़ा ।
विष्णु धर्म सूत्र और यम विचार प्रकरण के एक श्लोक में उनकी वंदना इस प्रकार की गई है: "यमांश्चैके-यमायधर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च... चित्रगुप्ताय ते नमः" । भगवान चित्रगुप्त का न्याय-कौशल इतना अचूक है कि कोई भी जीव उनके सम्मुख अपने कर्मों से मुकर नहीं सकता। वे 'अग्रसंधानी' नामक एक अलौकिक पंजिका (बहीखाता) रखते हैं, जिसमें ब्रह्मांड के प्रत्येक प्राणी के जन्म से लेकर मृत्यु तक के एक-एक क्षण का शुभ और अशुभ कर्म अंकित रहता है । जब जीवात्मा को यमदूत यमराज के सम्मुख प्रस्तुत करते हैं, तब चित्रगुप्त अपनी अग्रसंधानी पुस्तिका खोलकर उस जीव के संपूर्ण जीवन का कर्म-वृत्तांत सुनाते हैं। इस प्रक्रिया में कोई मानवीय न्यायालय जैसी बहस, सिफारिश, घूस या वकील की आवश्यकता উভয় नहीं होती, क्योंकि चित्रगुप्त का लेखा-जोखा स्वयं में अंतिम और अकाट्य साक्ष्य होता है । वहां कोई भ्रष्टाचार नहीं चलता। चित्रगुप्त द्वारा प्रस्तुत इसी कर्म-वृत्तांत के आधार पर यमराज तत्काल अपना निर्णय सुनाते हैं कि आत्मा को किस नरक में कितनी यातना भोगनी है या किस पुण्य के प्रताप से उसे कौन सा उच्च लोक प्राप्त होगा ।
श्रवण और श्रवणी: यमलोक के पारलौकिक गुप्तचर
चित्रगुप्त की इस अकाट्य सूचना प्रणाली के पीछे एक अत्यंत शक्तिशाली और अदृश्य गुप्तचर व्यवस्था कार्य करती है, जिसे 'श्रवण' और 'श्रवणी' देवों के नाम से जाना जाता है। गरुड़ पुराण के प्रेतखण्ड (अध्याय ५) में भगवान नारायण पक्षीराज गरुड़ को इन देवों के विषय में विस्तार से बताते हैं । जब सृष्टि का पुनः निर्माण हो रहा था, तब ब्रह्मा जी को ऐसे प्राणियों की आवश्यकता थी जो लोक-व्यवहार का सूक्ष्म ज्ञान रखते हों। तब सभी देवताओं की स्तुति से प्रेरणा प्राप्त कर ब्रह्मा जी ने अपनी तपस्या के प्रभाव से अत्यंत तेजस्वी और विशाल नेत्रों वाले 'श्रवण' देवों को उत्पन्न किया । ये देव वस्तुतः ब्रह्मा जी के कानों और नेत्रों के प्रतीक हैं जो पूरे ब्रह्मांड में विचरण करते हैं।
श्रवण देव पुरुषों के गुप्त से गुप्त कर्मों पर दृष्टि रखते हैं, जबकि उनकी पत्नियाँ, जिन्हें 'श्रवणी' कहा जाता है, स्त्रियों के सभी शुभ-अशुभ कर्मों का सूक्ष्म अवलोकन करती हैं । मनुष्य बंद कमरों में, अंधकार में या एकांत में जो भी पाप या पुण्य करता है, श्रवण और श्रवणी देव उसे उसी क्षण देख और सुन लेते हैं। संसार में जो कोई जैसा भी शुभ या अशुभ बोलता है, उसे वे अत्यंत शीघ्र ब्रह्मा के कानों तक और भगवान चित्रगुप्त की पंजिका तक पहुंचाते हैं । जब जीवात्मा को यमराज के दरबार में लाया जाता है और यदि वह अपने पापों को नकारने का प्रयास करती है, तो ये श्रवण और श्रवणी देव यमराज के समक्ष प्रत्यक्ष गवाह के रूप में प्रस्तुत होकर जीवात्मा के प्रत्येक कृत्य का प्रमाण देते हैं । शास्त्रों में यह भी उल्लेख है कि जो मनुष्य अपने जीवनकाल में सत्य बोलता है, दान-पुण्य करता है और श्रवण देवों की पूजा करता है, उस पर श्रवण देव अत्यंत प्रसन्न रहते हैं और मृत्यु के समय उसे कष्ट नहीं होने देते ।
यमदूतों का भयंकर स्वरूप, अस्त्र-शस्त्र एवं मृत्यु की प्रक्रिया
यमराज के आदेशों का कठोरता से पालन करने और जीवात्मा को मृत्युलोक से यमलोक तक खींचकर लाने का कार्य यमदूतों का है। गरुड़ पुराण और भागवत पुराण में यमदूतों के स्वरूप का वर्णन अत्यंत रोंगटे खड़े कर देने वाला है। मृत्यु के समय जब पापी मनुष्य के प्राण कंठ में अटक जाते हैं, उसका मुँह फेन से भर जाता है और आंखें पलट जाती हैं, तब उसे अपने सम्मुख अत्यंत विकराल, नग्न शरीर वाले, लाल आँखों वाले, कौवे और काले कुत्तों के समान भयानक मुख वाले यमदूत दिखाई देते हैं । उनके हाथों में 'काल-पाश' (मृत्यु की डोरी), लोहे के मुद्गर, त्रिशूल और कोड़े होते हैं । उनके नख अत्यंत नुकीले और बाल ऊपर की ओर उठे हुए होते हैं।
पापी आत्मा यमदूतों के इस विकराल स्वरूप को देखते ही मल-मूत्र त्याग देती है और भय से कांपने लगती है। यमदूत बिना किसी दया के जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर को, जिसे शास्त्रों में 'अंगुष्ठमात्र' (अंगूठे के आकार का) कहा गया है, स्थूल शरीर से बलपूर्वक खींच निकालते हैं । यह सूक्ष्म शरीर कोई सामान्य प्रकाश या ऊर्जा नहीं है, अपितु इसे 'यातना-देह' कहा जाता है। यह देह विशेष रूप से केवल नरक के कष्ट भोगने के लिए ही निर्मित होती है; यह न तो आग से जलकर नष्ट होती है और न ही शस्त्रों से कटकर समाप्त होती है, इसमें केवल असहनीय पीड़ा का निरंतर अनुभव होता है । जीवात्मा अपने परिजनों को रोता-बिलखता देखती है और वापस अपने शरीर में प्रवेश करना चाहती है, परंतु यमदूत उसे काल-पाश में बांधकर और गालियां देते हुए, डराते-धमकाते हुए बलपूर्वक दक्षिण दिशा के यममार्ग की ओर खींच ले जाते हैं । वे आत्मा को ताना मारते हैं कि "रे दुष्ट! शीघ्र चल, तूने जीवन में कोई धर्म नहीं किया, अब हम तुझे कुंभीपाक आदि नरकों में पकायेंगे" । इस प्रकार यमदूतों की तर्जनाओं से उसका हृदय विदीर्ण हो जाता है और वह अपने पापों का स्मरण करता हुआ यममार्ग पर घसीटा जाता है ।
यममार्ग: 86,000 योजन की दुर्गम यात्रा और १६ नगरों का विवरण
गरुड़ पुराण के प्रेतखण्ड (अध्याय ५) में मृत्यु के पश्चात आत्मा की यमलोक तक की यात्रा का जो विशद वर्णन है, वह कर्म और उसके परिणाम के बीच के संबंध को स्पष्ट रूप से उद्घाटित करता है। यह यात्रा मात्र एक भौतिक दूरी नहीं है, बल्कि यह आत्मा के कर्म-शोधन और सांसारिक मोह के विच्छेदन की एक क्रूर प्रक्रिया है। यममार्ग की कुल दूरी ८६,००० योजन है, जिसे जीवात्मा को ३४८ दिनों में तय करना होता है । आत्मा प्रतिदिन लगभग २००.५ योजन की दूरी वायु के वेग से बलपूर्वक तय करती है ।
यह मार्ग अत्यंत दुर्गम, अंधकारमय और भयंकर है। इस मार्ग पर न तो विश्राम करने के लिए वृक्षों की कोई छाया है, न प्यास बुझाने के लिए जल की एक बूंद है, और न ही प्राणों की रक्षा करने के लिए कोई अन्न है । पापी आत्मा के लिए मार्ग में हमेशा प्रलय काल के समान अनेक सूर्य चमकते रहते हैं, जिनकी तपन से बालू (रेत) उबलती रहती है और आत्मा के पाँव उस गर्म रेत में जलते हैं, जिससे पैरों में बड़े-बड़े छाले पड़ जाते हैं । इसके अतिरिक्त, रास्ते में भयंकर श्वान (कुत्ते), भेड़िये, और कौवे आत्मा को नोचते हैं । प्यास से व्याकुल होकर जब आत्मा जल मांगती है, तो यमदूत उसे कोड़े मारते हैं।
इस सुदीर्घ यात्रा के दौरान जीवात्मा को १६ विभिन्न नगरों (पुरों) से होकर गुजरना पड़ता है। गरुड़ पुराण के अनुसार इन १६ नगरों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं: १. सौम्यपुर, २. सौरिपुर, ३. नगेन्द्रभवन, ४. गंधर्वपुर, ५. शैलागम, ६. क्रौंचपुर, ७. क्रूरपुर, ८. विचित्रभवन, ९. बह्वापद, १०. दुःखदपुर, ११. नानाक्रन्दपुर, १२. सुतप्तभवन, १३. रौद्रपुर, १४. पयोवर्षणपुर, १५. शीताढ्यपुर, १६. बहुभीतिपुर ।
इस यात्रा में एक गहरा रहस्य छिपा है जो भूमि पर परिजनों द्वारा किए जाने वाले 'श्राद्ध' और 'पिंडदान' कर्मकांड से सीधे जुड़ा है। आत्मा जब इन नगरों में पहुँचती है, तो उसे कुछ क्षणों का विश्राम मिलता है। मृत्यु के अठारहवें दिन आत्मा वायु के वेग से चलते हुए सर्वप्रथम 'सौम्यपुर' पहुँचती है। यहाँ उसे परिजनों द्वारा दिया गया प्रथम पिंड प्राप्त होता है। यहाँ वह अपने पुराने सुखों और परिवार को याद करके रोती है, जिस पर यमदूत उसे ताना मारते हैं कि "तुम्हारा धन और परिवार कहाँ गया? अपने कर्मों का फल भोगो" । जब आत्मा दूसरे मास में 'सौरिपुर' (जहाँ यमराज का छोटा भाई सौरि शासन करता है) पहुँचती है, तो वह द्वितीय मास का पिंड ग्रहण करती है । इसी प्रकार वह तीसरे मास में नगेन्द्रभवन, चौथे मास में गंधर्वपुर, पांचवें महीने में 'क्रौंचपुर', छठे महीने में 'क्रूरपुर' और बाद में 'विचित्रभवन' (जहाँ का राजा विचित्र है) पहुँचती है । जब आत्मा देखती है कि उसके परिजन उसकी संपत्ति के लिए लड़ रहे हैं और उसके लिए पिंडदान नहीं कर रहे हैं, तो वह भूख-प्यास से तड़पती हुई भयंकर विलाप करती है और पश्चाताप की अग्नि में जलती है कि उसने जीवन भर जिनके लिए पाप किए, वे आज उसके किसी काम नहीं आ रहे ।
वैतरणी एवं पुष्पोदका नदियाँ: पाप और पुण्य का पारलौकिक विभाजन
१६ नगरों की यात्रा पूर्ण करने और यमलोक के समीप पहुँचने पर जीवात्मा को दो प्रमुख नदियों का सामना करना पड़ता है, जो पूर्णतः उसके कर्मों के अनुसार उसे प्राप्त होती हैं। इनमें सबसे भयंकर और कष्टकारी नदी है 'वैतरणी'। गरुड़ पुराण के अनुसार, यह नदी यमलोक के दक्षिणी द्वार के मार्ग में स्थित है और यह कोई साधारण जल की नदी नहीं है। इसका निर्माण ही पापियों को यातना देने के लिए हुआ है । यह नदी १०० योजन चौड़ी है और इसमें जल के स्थान पर उबलता हुआ रक्त, पीब, मज्जा, मूत्र, और हड्डियाँ बहती हैं । नदी के किनारे नुकीले काँटों वाले भयंकर सेमल के वृक्ष हैं। जब कोई पापी आत्मा इस नदी के पास पहुँचती है, तो नदी का रक्त खौलने लगता है। जो लोग अपने जीवन में सत्ता का दुरुपयोग करते हैं, धर्म का नाश करते हैं, झूठी गवाही देते हैं, और विशेष रूप से जिन्होंने जीवन में 'गौ-दान' (गोदान) नहीं किया है, वे इस नदी में डूबते और उतराते हैं । यमदूत उन्हें भालों और त्रिशूलों से छेदकर नदी में धकेल देते हैं। शास्त्रों में यह विधान है कि मृत्यु से पूर्व काले या लाल रंग की गाय का सविधि दान करने से, जीवात्मा उसी गाय की पूंछ पकड़कर इस भयानक नदी को बिना किसी कष्ट के पार कर लेती है ।
पुण्यात्माओं के लिए वैतरणी का यह विकराल रूप नहीं होता। जो आत्मा जीवन भर दान-पुण्य और धर्म का पालन करती है, उसके मार्ग में 'पुष्पोदका' नामक अत्यंत निर्मल और शीतल नदी बहती है । इस नदी का जल स्वच्छ होता है और इसमें कमल के पुष्प खिले रहते हैं। पुष्पोदका नदी के किनारे एक विशाल और छायादार वटवृक्ष है, जहाँ पुण्यात्मा विश्राम करती है और उसे अपने पुत्रों या परिजनों द्वारा किया गया तर्पण और अन्न प्राप्त होता है, जिससे उसमें नव ऊर्जा का संचार होता है ।
यमपुरी के चार प्रवेश द्वार
३४८ दिनों की कठिन यात्रा और नदियों को पार करने के पश्चात जीवात्मा एक लाख योजन में फैली हुई यमपुरी के मुख्य द्वारों पर पहुँचती है। गरुड़ पुराण के अनुसार यमपुरी के चार मुख्य दिशाओं में चार द्वार हैं, और जीवात्मा का प्रवेश उसके कर्मों के आधार पर निर्धारित द्वार से ही होता है ।
दक्षिण द्वार को पापियों का मार्ग कहा जाता है। यह यमलोक का सबसे भयानक और घोर अंधकारमय द्वार है। जो मनुष्य अपने जीवन में हमेशा झूठ बोलते हैं, परस्त्री गमन करते हैं, कन्या विक्रय करते हैं, झूठी गवाही देते हैं, माता-पिता को कटु वचन बोलते हैं, अभक्ष्य भक्षण करते हैं, और भ्रूण हत्या करते हैं, उन्हें यमदूत इसी दक्षिणी द्वार से बलपूर्वक भीतर ले जाते हैं । यह द्वार भयंकर सिंहों, भेड़ियों और विषैले सर्पों से घिरा रहता है। इसी द्वार से प्रवेश करने के बाद पापी आत्माएं चित्रगुप्त और यमराज के समक्ष प्रस्तुत की जाती हैं और उनके कर्मों का हिसाब कर उन्हें नरकों में धकेला जाता है ।
पश्चिम द्वार को दानवीरों का मार्ग माना गया है। यह द्वार रत्नों से जड़ित और अत्यंत कांतिमान है। जिन मनुष्यों ने अपने जीवन में निस्वार्थ भाव से दान-पुण्य किया है, धर्म की रक्षा की है, गौ, भूमि या विद्या का दान किया है, अथवा किसी पवित्र तीर्थ में अपने प्राण त्यागे हैं, उनका प्रवेश इसी पश्चिमी द्वार से होता है ।
उत्तर द्वार सत्यवादियों और पितृभक्तों के लिए है। उत्तर दिशा का द्वार विभिन्न स्वर्ण जड़ित रत्नों से सजा होता है और इसे सबसे उत्तम माना गया है । जिन लोगों ने जीवन भर अपने माता-पिता की निष्काम सेवा की है, जो हमेशा सत्य बोलते रहे हैं, और जिन्होंने मन, वचन और कर्म से अहिंसा का पालन किया है, उनकी आत्मा इसी द्वार से प्रवेश करती है। उन्हें यमलोक में रथों और विमानों द्वारा लाया जाता है और उनके लिए नाना प्रकार के सुखों तथा भोजन की व्यवस्था होती है ।
पूर्व द्वार योगियों और ऋषियों का मार्ग है। पूर्व दिशा का द्वार हीरे, मोती, नीलम और पुखराज जैसे बहुमूल्य रत्नों से सुसज्जित है। इसे स्वर्ग का द्वार भी कहा जाता है। इस द्वार से उन आत्माओं का प्रवेश होता है जो सिद्ध योगी, ऋषि, ज्ञानी और संबुद्ध हैं। जब ये आत्माएं प्रवेश करती हैं, तो गंधर्व, देव और अप्सराएं पुष्प वर्षा कर उनका स्वागत करती हैं ।
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार २८ नरकों का विस्तृत वर्णन
यमराज की सभा में चित्रगुप्त द्वारा कर्मों का वाचन होने के पश्चात, पापी आत्माओं को उनके विशिष्ट पापों के अनुसार अलग-अलग नरकों (Narakas) में भेज दिया जाता है। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कंध (अध्याय २६) में इन नरकों का अत्यंत विस्तृत और वैज्ञानिक वर्गीकरण किया गया है। यहाँ कर्म और दंड का अनुपात (Proportion of Karma and Punishment) पूरी तरह से गणितीय और अकाट्य है। शुकदेव गोस्वामी भागवत पुराण में २८ प्रमुख नरकों का वर्णन करते हैं, जहाँ भिन्न-भिन्न पापों के लिए कठोर यातनाओं का विधान है ।
| नरक का नाम (Sanskrit Name) |
पाप कर्म (Sinful Action) |
यातना एवं दण्ड (Punishment/Torment) |
| तामिस्र |
दूसरों का धन, स्त्री या संपत्ति का अपहरण करने वाले । |
यमदूत कालपाश में बांधकर पीटते हैं; अन्न-जल के अभाव में जीव अंधकार में मूर्छित हो जाता है । |
| अंधतामिस्र |
छल-कपट से दूसरे की पत्नी या संपत्ति भोगने वाले । |
जीव की दृष्टि और बुद्धि नष्ट हो जाती है; वह अंधे के समान ठोकर खाता है और भयंकर पीड़ा सहता है । |
| रौरव |
अपने और अपने परिवार के स्वार्थ हेतु अन्य जीवों को कष्ट देने वाले । |
जिन जीवों को उसने सताया था, वे 'रुरु' (भयंकर सर्प/क्रूर जंतु) बनकर उसे नोचते हैं । |
| महारौरव |
केवल अपने शरीर के पोषण के लिए जीवों की हत्या करने वाले । |
क्रव्यादा नामक रुरु जंतु पापी के शरीर का मांस नोंच-नोंच कर खाते हैं । |
| कुम्भीपाक |
स्वाद के लिए जीवित पशु-पक्षियों को पकाने और खाने वाले । |
यमदूत पापी को खौलते हुए तेल के विशाल कड़ाह (कुम्भ) में डालकर पकाते हैं । |
| कालसूत्र |
माता-पिता या ब्राह्मणों से द्रोह करने वाले । |
१०,००० योजन लंबे तांबे के मैदान में, जो सूर्य और अग्नि से दहकता है, पापी को नंगा दौड़ाया जाता है । |
| असिपत्रवन |
पाखंडी, जो वेद-विरुद्ध आचरण करते हैं और अधर्म का पालन करते हैं । |
तलवार के समान तेज पत्तों वाले वन में दौड़ाया जाता है, जिससे शरीर कटकर छिन्न-भिन्न हो जाता है । |
| सूकरमुख |
जो राजा या अधिकारी निर्दोष लोगों को अन्यायपूर्वक दंड देते हैं । |
गन्ने की भांति कोल्हू में डालकर पापी को बुरी तरह से पेरा (crush) जाता है । |
| अंधकूप |
जो खटमल, मच्छर आदि क्षुद्र जीवों की भी व्यर्थ हत्या करते हैं । |
अंधे कुएं में डाला जाता है जहाँ कीड़े-मकोड़े और जंतु उसे निरंतर काटते रहते हैं । |
| कृमिभोजन |
बिना भगवान या अतिथियों को अर्पण किए अकेले स्वादिष्ट भोजन करने वाले । |
१,००,००० योजन चौड़े कीड़ों से भरे कुंड में गिराया जाता है, जहाँ उसे मल और कीड़े खाने के लिए विवश किया जाता है । |
| संदंश |
जो स्वर्ण, रत्न या ब्राह्मणों की संपत्ति चुराते हैं । |
लाल गर्म लोहे की चिमटियों (तप्त लौह पिंडों) से पापी की त्वचा और मांस नोचा जाता है । |
| तप्तसूर्मि |
जो मर्यादा तोड़कर परस्त्री या परपुरुष के साथ अवैध यौन संबंध बनाते हैं । |
पापी को आग से दहकती हुई लोहे की पुरुष या स्त्री की मूर्ति का आलिंगन करवाया जाता है, जिससे उसका शरीर भस्म हो जाता है । |
| वज्रकंटक-शाल्मली |
पशुओं के साथ या अप्राकृतिक यौनाचार करने वाले कामी पुरुष । |
वज्र के समान कठोर कांटों वाले सेमल के वृक्ष पर खींचकर ऊपर-नीचे किया जाता है । |
| पूयोद |
जो शूद्र होकर ब्राह्मण का कर्म करते हैं या मर्यादाहीन जीवन जीते हैं । |
पीब, मल, मूत्र, और रक्त के सागर में फेंका जाता है जहाँ पापी उसी गंदगी को पीता है । |
| प्राणरोध |
जो शौक के लिए जंगल में कुत्तों से शिकार करवाते हैं । |
यमदूत पापी को तीखे बाणों से बेधते हैं । |
| विशसन |
पाखंडी जो झूठे यज्ञों में पशुबलि देते हैं । |
यमदूत उनके शरीर को तलवारों से टुकड़ों में काट देते हैं । |
| लालाभक्ष |
जो कामुक पति अपनी पत्नी को अप्राकृतिक कर्मों के लिए विवश करता है । |
वीर्य और लार की नदी में डुबोया जाता है जहाँ उसे वही पीने को बाध्य किया जाता है । |
| सारमेयादन |
जो डाकू, लुटेरे और राजा घरों में आग लगाते हैं या लोगों को लूटते हैं । |
वज्र के समान दांतों वाले ७२० खूंखार कुत्ते पापी को नोंच कर खाते हैं । |
| अवीचि |
जो व्यापार में झूठ बोलते हैं या झूठी गवाही देते हैं । |
जल-विहीन, पत्थर की लहरों वाले पहाड़ (८०० मील ऊँचे) से सिर के बल बार-बार नीचे फेंका जाता है । |
| अयःपान |
जो ब्राह्मण होकर मदिरा (शराब) का सेवन करते हैं । |
यमदूत पापी की छाती पर पैर रखकर उसके मुख में खौलता हुआ पिघला लोहा डालते हैं । |
| क्षारकर्दम |
जो अपने से श्रेष्ठ, विद्वान या कुलीन व्यक्तियों का अपमान करते हैं । |
पापी को उलटा लटका कर भयंकर यातनाएं दी जाती हैं । |
| रक्षोगण-भोजन |
जो पुरुष बलि देकर मनुष्यों का मांस खाते हैं (नरभक्षी) । |
राक्षस और पिशाच छुरे से उसे काटते हैं और उसका रक्त पीकर उसी प्रकार नाचते हैं जैसे पापी पृथ्वी पर नाचता था । |
| शूलप्रोत |
जो निर्दोष जानवरों या पक्षियों को शूल में पिरोकर या बाण से मारते हैं । |
पापी को तीखे त्रिशूल या भालों पर पिरोया जाता है और गिद्ध उसे नोचते हैं । |
| दंदशूक |
जो दुष्ट दूसरों को सांपों या चूहों की तरह डराते और सताते हैं । |
पाँच या सात फनों वाले भयंकर सर्प बिलों से निकलकर पापी को चूहों की तरह निगल लेते हैं । |
| अवट-निरोधन |
जो जीवों को अंधेरी गुफाओं या कोठरियों में कैद करते हैं । |
पापी को एक दमघोंटू, जहरीले धुएं से भरे गहरे गड्ढे में फेंक दिया जाता है । |
| पर्यावर्तन |
जो अतिथियों को क्रोधी और लाल आँखों से देखते हैं । |
वज्र जैसी चोंच वाले गिद्ध, बगुले और कौवे पापी की आँखें बलपूर्वक नोंच लेते हैं । |
| सूचामुख |
जो धन के नशे में पागल रहते हैं और संपत्ति जमा करने में लगे रहते हैं । |
पापी के शरीर को यमदूत दर्जी की तरह सूई के धागों से सिलते हैं । |
विष्णु पुराण के अनुसार नरक एवं दण्ड विधान
विष्णु पुराण के द्वितीय अंश के छठे अध्याय में महर्षि पराशर मैत्रेय जी को यमराज के शासनाधीन नरकों का विवरण देते हैं। इन नरकों की सूची भागवत पुराण से कुछ भिन्न है, जो शास्त्रों की काल-भेद या कल्प-भेद से जुड़ी सूक्ष्म विवेचना को प्रमाणित करती है । पराशर मुनि के अनुसार प्रमुख नरक और उनके दंड विधान इस प्रकार हैं:
| नरक का नाम |
पापकर्म जिनका दंड यहाँ मिलता है |
| रौरव |
जो कूटसाक्षी (झूठी गवाही देने वाला) है, या पक्षपात करके यथार्थ नहीं बोलता और मिथ्या भाषण करता है । |
| रोध |
भ्रूण (गर्भ) नष्ट करने वाले, गाँव उजाड़ने वाले (ग्रामनाशक), और गोहत्या करने वाले । |
| सूकर |
मदिरा पीने वाले, ब्रह्महत्यारे, स्वर्ण चुराने वाले और इन पापियों की संगति करने वाले । |
| ताल |
क्षत्रिय या वैश्य की हत्या करने वाले । |
| तप्तकुण्ड |
गुरु-पत्नी के साथ गमन करने वाले, अपनी सगी बहन के साथ व्यभिचार करने वाले, और राजदूतों की हत्या करने वाले । |
| तप्तलोह |
सती स्त्रियों को बेचने वाले, अश्व (घोड़े) बेचने वाले, और भक्त पुरुष का त्याग करने वाले । |
| महाज्वाल |
पुत्री और पुत्रवधू के साथ विषय-भोग करने वाले महापापी । |
| लवण |
गुरुजनों का अपमान करने वाले, वेद की निंदा करने वाले, वेद बेचने वाले और अगम्या स्त्री से सम्भोग करने वाले । |
| विलोहित |
चोर और मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले पुरुष । |
| कृमिभक्ष/कृमीश |
देव, ब्राह्मण और पितरों से द्वेष करने वाले तथा अनिष्ट यज्ञ करने वाले । |
| लालाभक्ष |
जो देवताओं और अतिथियों को भोजन कराये बिना स्वयं पहले खा लेता है । |
| विशसन/वेधक |
जो कर्णी नामक बाण, खड्ग (तलवार) और अन्य मारक शस्त्रों का निर्माण करते हैं । |
| अधोमुख |
जो नक्षत्र विद्या जाने बिना ज्योतिष का ढोंग रचते हैं (नक्षत्रोपजीवी) और दूषित उपायों से धन संग्रह करते हैं । |
| पूयवह |
जो अकेले स्वादु भोजन करते हैं और लाख, मांस, रस, तथा नमक बेचने वाले ब्राह्मण । |
संवाद एवं प्रसंग: यमराज का विष्णु भक्तों के प्रति आदेश
विष्णु पुराण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवाद प्राप्त होता है जो यमराज के कार्यक्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट करता है। कलिंग देश के एक महात्मा ब्राह्मण के प्रसंग में भीष्म जी नकुल को यह कथा सुनाते हैं। इस कथा के अनुसार, यमराज अपने दूतों को स्पष्ट रूप से यह शिक्षा देते हैं कि वे भगवान विष्णु के भक्तों से सदैव दूर रहें । यमराज कहते हैं कि जो मनुष्य जीवन भर भगवत परायण रहते हैं, निष्काम भाव से कर्म करते हैं और अपने कर्मों को परमात्मा स्वरूप श्री विष्णु को अर्पण करते हैं, उन पर यमराज का कोई अधिकार नहीं है । ऐसे भक्तों का यम, यमदूत, यमपाश, यमदंड अथवा यम-यातना कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। यमराज अपने दूतों को चेतावनी देते हैं कि वे केवल उन लोगों को यमलोक लाएं जो अधर्मी हैं, जो देवताओं और अतिथियों का अपमान करते हैं, और जो सांसारिक मोहमाया में फँसे रहते हैं। भागवत पुराण भी इसकी पुष्टि करता है कि वैष्णवों को यमदूत नहीं, अपितु विष्णुदूत सीधे वैकुण्ठ ले जाते हैं ।
कर्म-विपाक सिद्धांत और पुनर्जन्म के चिह्न
यमलोक की दण्ड प्रक्रिया केवल नरक तक ही सीमित नहीं है। गरुड़ पुराण में 'कर्म-विपाक' के सिद्धांत का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसके अनुसार नरक की यातनाएँ पूर्ण करने के पश्चात पापी जीवात्मा को सीधे मनुष्य योनि नहीं मिलती। वह वृक्ष, कीट, पशु, पक्षी आदि ८४ लाख योनियों में भटकती है । कुत्ते, सुअर, गधे आदि नीच योनियों में अनगिनत कष्ट सहने के पश्चात जब वह अंततः मनुष्य योनि प्राप्त करती है, तब भी उसके पूर्व जन्म के पापों के चिह्न उसके शरीर पर परिलक्षित होते हैं । गरुड़ पुराण के अनुसार भगवान विष्णु गरुड़ जी को बताते हैं कि ब्रह्म हत्या करने वाला क्षय (टीबी) रोगी होता है, गाय की हत्या करने वाला मूर्ख और कुबड़ा होता है, कन्या की हत्या करने वाला कोढ़ी होता है । इसी प्रकार, स्त्री की हत्या करने वाला या गर्भपात करने वाला भील या रोगी होता है, परस्त्री गमन करने वाला नपुंसक होता है, और गुरु पत्नी के साथ व्यभिचार करने वाला भयंकर चर्म रोगी होता है । जो बिना दूसरों को दिए मिष्ठान खाता है, उसे गले में गंडमाला का रोग होता है, श्राद्ध में अपवित्र अन्न देने वाला श्वेत कुष्ठी होता है, गुरु का अपमान करने वाला मिर्गी का रोगी होता है, और वेद-शास्त्र की निंदा करने वाला पांडु (पीलिया) का रोगी होता है । झूठी गवाही देने वाला गूंगा और पुस्तक चुराने वाला जन्म से अंधा होता है । ये सभी शारीरिक व्याधियां इस बात का प्रमाण हैं कि यमलोक का दण्ड केवल नरक की अग्नि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह स्थूल जगत में भी कर्म के अचूक प्रभाव के रूप में प्रकट होता है।
इस प्रकार, विभिन्न महापुराणों—विशेष रूप से गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण—का गहन अनुशीलन यह सिद्ध करता है कि यमलोक की संरचना ब्रह्मांडीय प्रशासन का एक अत्यंत तार्किक, विस्तृत और पारदर्शी आयाम है। यह व्यवस्था प्रकृति के नियमों का पूर्ण सटीकता के साथ पालन कराती है, जहाँ यमराज न्यायाधीश के रूप में, चित्रगुप्त अभिलेखक के रूप में, श्रवण-श्रवणी गुप्तचरों के रूप में और भयंकर यमदूत दंडाधिकारियों के रूप में कार्यरत हैं। ८६,००० योजन का यममार्ग, उसमें पड़ने वाले १६ नगर, पापी और पुण्यात्माओं के लिए अलग-अलग नदियाँ (वैतरणी और पुष्पोदका), यमपुरी के चार दिशाओं में स्थित चार प्रवेश द्वार और भागवत तथा विष्णु पुराणों में वर्णित दर्जनों वैज्ञानिक नरक इस बात को प्रामाणिक रूप से स्थापित करते हैं कि जीव का कोई भी कर्म, चाहे वह कितना ही सूक्ष्म क्यों न हो, इस ब्रह्मांडीय न्याय व्यवस्था की दृष्टि से बच नहीं सकता।