| विष्णु |
विष्णु का अर्थ है ‘सर्वव्यापी’, अर्थात जो समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त होकर उसे धारित किए हुए
है। शास्त्रों में विष्णु को समस्त जगत का अधार बताते हुए कहा गया है
कि वे ही अपनी अनंत शक्ति से विश्व का पोषण करते हैं। इसी सर्वव्यापकता
के कारण उन्हें विष्णु कहा जाता है। |
| लक्ष्मीपति |
लक्ष्मीपति का अर्थ है ‘देवी लक्ष्मी के पति’ – भगवान विष्णु सदा श्री (महालक्ष्मी) सहित
विराजते हैं। समुद्र-मंथन से उत्पन्न देवी लक्ष्मी ने विष्णु को अपना अनंतकालिक स्वामी रूप में
चुना था, इसलिए विष्णु लक्ष्मीपति अर्थात लक्ष्मी के पति कहलाए। |
| कृष्ण |
कृष्ण नाम संस्कृत शब्द “कृष्ण” से बना है, जिसका अर्थ “श्यामवर्ण (गहरा साँवला या नीला)”
है। श्रीकृष्ण विष्णु के पूर्ण अवतार हैं और महाभारत के विष्णु सहस्रनाम में कृष्ण नाम 57वें
स्थान पर उल्लिखित है। अपने श्यामल वर्ण एवं अनन्य आकर्षण के कारण भगवान को यह प्रिय नाम प्राप्त हुआ। |
| वैकुण्ठ |
वैकुण्ठ विष्णु के परम धाम (निवास-स्थान) का नाम है और शास्त्रों में यह शब्द विष्णु के
लिए एक विशेषण रूप में भी प्रयुक्त हुआ है। वैकुण्ठ
लोक को निर्विघ्न, चिन्तारहित दिव्य लोक कहा गया है, जहाँ भगवान विष्णु
शेषनाग पर विराजमान रहते हैं और अपने भक्तों को परम आनंद प्रदान करते
हैं। इसीलिए विष्णु को वैकुण्ठवासी परमेश्वर के रूप में वैकुण्ठ नाम से संबोधित किया जाता है। |
| गरुडध्वज |
गरुडध्वज का अर्थ है ‘गरुड़ ध्वजा वाले’, यानी जिनके ध्वज (झंडे)
पर देवपक्षी गरुड़ का चिन्ह अंकित है। भगवद्गीता एवं भागवत में उल्लेख है
कि युद्ध में भगवान कृष्ण के रथ पर गरुड़ की ध्वजा लहराती थी
। इसी
कारण विष्णु को गरुडध्वज – गरुड़-ध्वजाधारी – कहा जाता है। |
| परब्रह्म |
परब्रह्म का अर्थ है ‘परम ब्रह्म’ अर्थात् सभी से परे उच्चतर परम सत्य। महा नारायण
उपनिषद में स्पष्ट कहा गया है – “नारायणः परं ब्रह्म” – नारायण ही परम ब्रह्म हैं
। विष्णु को शास्त्रों में वही परमब्रह्म परमात्मा कहा गया है जो सृष्टि,
पालन व संहार की मूलाधार शक्ति हैं, इसलिए वे परब्रह्म कहलाते हैं। |
| जगन्नाथ |
जगन्नाथ शब्द “जगत” (विश्व) तथा “नाथ” (स्वामी) के संयोजन से बना है जिसका अर्थ है
“संसार के स्वामी”। भगवान विष्णु समस्त ब्रह्मांड के पालनकर्ता प्रभु हैं –
पूरी सृष्टि जिनकी अधीन है – इसी कारण उन्हें श्रद्धापूर्वक जगन्नाथ कहा जाता है।
पुराणों तथा 특히 पुरीधाम में श्रीकृष्ण को जगन्नाथ रूप में पूजा जाता है, जो विष्णु का ही पूर्ण स्वरूप है। |
| वासुदेव |
वासुदेव नाम दो अर्थ लिए हुए है – पहला: वसुदेव के पुत्र (श्रीकृष्ण, जिनके पिता वसुदेव थे),
तथा दूसरा: ‘वसु’ (प्राणियों/सर्वत्र) में ‘देव’ रूप में वास करने वाले।
शास्त्रों में विष्णु/कृष्ण को वासुदेव कहा गया है क्योंकि वे प्रत्येक
जीव में अन्तर्यामी रूप से निवास करते हैं। भगवद्गीता में घोषित है
“वासुदेवः सर्वमिति” – संपूर्ण जगत वासुदेव (भगवान) ही है – इसलिए भगवान का नाम वासुदेव पड़ा। |
| त्रिविक्रम |
त्रिविक्रम का शाब्दिक अर्थ है ‘तीन विक्रम (पद) लेने वाला’, यह भगवान विष्णु के वामन
अवतार का नाम है। ऋग्वेद में वर्णित है कि विष्णु ने अपने तीन विशाल कदमों से पृथ्वी,
अंतरिक्ष और स्वर्ग को नापा। वामन रूप में राजा बलि से तीन पग भूमि मांगकर भगवान
ने विशाल त्रिविक्रम रूप धारण किया और तीनों लोकों को अपने पग से
आच्छादित कर लिया। इस अद्भुत लीला के कारण विष्णु त्रिविक्रम कहलाए। |
| दैत्यान्तक |
दैत्यान्तक का अर्थ है ‘दैत्य (राक्षस) का अन्त करने वाला’। यह
विष्णु का एक नाम है जो उनकी दुष्ट-असुर-विनाशक शक्ति को दर्शाता है
। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि भगवान ने नरसिंह आदि रूपों में प्रह्लाद जैसे
भक्तों की रक्षा हेतु अनेक असुरों का संहार किया, इसलिए उन्हें दैत्यान्तक (दैत्यारि) कहा जाता है। |
| मधुरिपु |
मधुरिपु का अर्थ है ‘मधु नामक असुर का शत्रु (वध करने वाला)’। विष्णु
ने प्रारम्भ में प्रकट असुर मधु का संहार किया था, इसलिए उनका एक नाम
मधुसूदन (मधुरिपु) प्रसिद्ध हुआ।
महाभारत में अर्जुन कृष्ण को मधुसूदन कहकर संबोधित करते हैं, जो इस लीला की याद दिलाता है। |
| तार्क्ष्यवाहन |
तार्क्ष्यवाहन दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘तार्क्ष्य’ जिसका
अर्थ गरुड़ (वैनतेय) है और ‘वाहन’ अर्थात सवारी। भगवान विष्णु
का वाहन गरुड़ नामक दिव्य पक्षी है, जो उन्हें यातायात प्रदान
करता है। इसी से भगवान का नाम तार्क्ष्यवाहन – गरुड़-वाहन – पड़ा। |
| सनातन |
सनातन का अर्थ है ‘शाश्वत’ या सदैव अस्तित्व में रहने वाला। उपनिषत्कारों ने
परमात्मा को अजन्मा, अनन्त और अपरिवर्तनीय कहा है –
विष्णु बिल्कुल वैसा ही शाश्वत सत्-स्वरूप हैं जिनका न आदि है न अन्त। इस नित्यत्व
के कारण उन्हें सनातन भगवान कहा जाता है। |
| नारायण |
नारायण शब्द दो भागों से बना है – ‘नर’ अर्थात जल (कुछ मतों में जीव)
और ‘आयन’ अर्थात आश्रय। इस प्रकार नारायण का मूल अर्थ है ‘जल में शयन
करने वाला’ या ‘सभी जीवों का आश्रय’। शास्त्रों में
(जैसे भागवतपुराण में) नारायण को परम ब्रह्म, परम ईश्वर कहा गया है।
सृष्टि के आदि में क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में लीन भगवान विष्णु के नाभि-कमल से
ही ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई – इन तथ्यों के कारण वे नारायण नाम से पुकारे जाते हैं। |
| पद्मनाभ |
पद्मनाभ का अर्थ है ‘कमल-नाभि वाला’ – यह
भगवान विष्णु का विशेष नाम है क्योंकि सृष्टि के आरम्भ
में उनकी नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ,
जिससे सृष्टिकर्ता ब्रह्मा उत्पन्न हुए। विष्णुपुराण में वर्णित इस प्रसंग के आधार पर वे पद्मनाभ (कमल-नाभि) कहे जाते हैं। |
| हृषीकेश |
हृषीकेश दो शब्दों से मिलकर बना है – हृषीक यानी इंद्रियाँ और
ईश यानी स्वामी। अर्जुन भगवद्गीता में श्रीकृष्ण को हृषीकेश कहकर
संबोधित करते हैं क्योंकि कृष्ण समस्त इंद्रियों के नियंता एवं स्वामी
हैं। इस प्रकार हृषीकेश का अर्थ हुआ “इंद्रियों का स्वामी” – भगवान विष्णु
जो जगत की समस्त इंद्रियों को निर्देशित एवं नियंत्रित करते हैं |
| सुधाप्रद |
सुधाप्रद में ‘सुधा’ का अर्थ अमृत है और ‘प्रद’ का अर्थ प्रदान करने वाला। यह नाम
विष्णु को इसलिए मिला क्योंकि समुद्र-मंथन के पश्चात भगवान ने मोहिनी
अवतार धारण कर देवताओं को अमृत पान करवाया था। देवताओं को अमरत्व
का वरदान देकर तथा असुरों को विमोहित करके विष्णु सुधाप्रद (अमृत-दाता) कहलाए। |
| माधव |
माधव विष्णु का प्रसिद्ध नाम है जिसका एक अर्थ है “माँ (महादेवी लक्ष्मी) का धवन
(पति)”। विष्णु सहस्रनाम पर शंकराचार्य की व्याख्या में आता है – “माधवो मा-धवः”
अर्थात जो मा (श्रीमहालक्ष्मी) के धव (स्वामी) हैं। इस प्रकार माधव भगवान विष्णु को संबोधित करता है,
जिनके वक्ष स्थल पर श्रीदेवी विराजमान हैं। (दूसरे अर्थों में माधव का अर्थ ज्ञान का स्वामी या
मधु वंश में जन्मा भी बताया गया है, किन्तु प्रचलित अर्थ लक्ष्मीपति ही है)। |
| पुण्डरीकाक्ष |
पुण्डरीकाक्ष शब्द का शाब्दिक अर्थ है “पुण्डरीक (कमल) जैसे अक्षि (नेत्र) वाले” –
अर्थात् कमलदल-से सुंदर नेत्रों वाले भगवान। शास्त्रों में विष्णु को कमल-नयन कहा गया है –
जैसे स्तुतियों में “कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्”। इसी गुण के कारण विष्णु का नाम पुण्डरीकाक्ष पड़ा। |
| स्थितिकर्ता |
स्थितिकर्ता का अर्थ है “सृष्टि की स्थिति (पालन) करने वाले कर्ता”। हिंदू
धर्म में ब्रह्मा-सृष्टि, विष्णु-स्थिति व रुद्र-संहार की त्रिमूर्ति सिद्धांत प्रसिद्ध है।
विष्णु सत्त्व गुण के अधिष्ठाता होकर पूरे जगत का पालन-पोषण करते हैं, अतः वे स्थितिकर्ता (पालक) परमेश्वर हैं। |
| परात्पर |
परात्पर का अर्थ है “पर (श्रेष्ठ) से भी परे”, यानी सभी से सर्वोच्च।
शैव एवं वैष्णव दोनों ग्रंथों में परमात्मा के लिए यह विशेषण प्रयुक्त हुआ है –
शिवपुराण में शिव को और उपनिषदों में विष्णु को परात्पर ब्रह्म कहा गया है। भगवान विष्णु स्वयं
सभी देवों से बढ़कर परात्पर परम ब्रह्म हैं – वे श्रेष्ठतम के भी श्रेष्ठ हैं। |
| वनमाली |
वनमाली का अर्थ है “वन-पुष्पों की माला धारण करने वाले”। भगवान विष्णु अपने
शारीरिक सौष्ठव को सुशोभित करने के लिए सदा वैजयन्ती माला धारण करते हैं –
यह पाँच प्रकार के वन पुष्पों से बनी दिव्य माला है। इसीलिए उन्हें वनमाली कहा जाता है। |
| यज्ञरूप |
यज्ञरूप नाम से अभिप्राय है कि भगवान स्वयं यज्ञस्वरूप हैं।
शास्त्र-वचन “यज्ञो वै विष्णुः” के अनुसार यज्ञ वास्तव में विष्णु ही हैं
और उनकी काया का प्रत्येक अंश यज्ञमय है। भगवद्गीता (9.16) में श्रीकृष्ण कहते हैं – “अहं यज्ञः”
(मैं ही यज्ञ हूँ) – इसलिए विष्णु को यज्ञरूप (यज्ञ पुरुष) कहा जाता है। |
| चक्रपाणि |
चक्रपाणि अर्थात् “चक्र (सुदर्शन चक्र) धारण करने वाले”
। भगवान विष्णु के चार हाथों में से एक में दिव्य चक्र सुशोभित रहता है, जिसे
वे धर्म की रक्षा हेतु प्रकट करते हैं। इस कारण उन्हें चक्रपाणि (चक्रधारी) कहा जाता है। |
| गदाधर |
गदाधर का अर्थ है “गदा धारक”, यानी जो भगवान कौमोदकी गदा धारण करते हैं
। श्रीविष्णु के हस्तों में शंख-चक्र के साथ ही एक हाथ में गदा भी रहती है, अतः वे गदाधर –
गदा धारण करने वाले भगवान – कहलाते हैं। |
| उपेन्द्र |
उपेन्द्र का शाब्दिक अर्थ है “इन्द्र का छोटा भाई”
। यह भगवान विष्णु के वामन अवतार का एक नाम है, क्योंकि वामन देव माता अदिति के पुत्र और
देवराज इन्द्र के अनुज थे। इस अवतार में विष्णु ने इन्द्र के छोटे भाई रूप में जन्म
लेकर त्रिभुवन विजय किया, जिससे उनका नाम उपेन्द्र विख्यात हुआ। |
| केशव |
केशव नाम के दो प्रमुख अर्थ बताए जाते हैं – पहला: “सुंदर केशों वाले”,
और दूसरा: “केशी नामक दैत्य का वध करने वाले”।
श्रीकृष्ण ने अपने ब्रजलीला में घोरे रूपी असुर केशी का वध किया था, इसी
कारण शास्त्रों में कृष्ण को केशव (केशी का संहारक) कहा गया है। साथ ही भगवान के केश घने,
सुंदर एवं मस्तक पर मुकुट सहित शोभित हैं, यह अर्थ भी केशव नाम में निहित है। |
| हंस |
हंस का अर्थ है राजहंस (सुवर्ण-सफेद हंस)। शास्त्रों में विष्णु के एक हंस अवतार का वर्णन मिलता है
जहां भगवान ज्ञानप्रदान हेतु हंस रूप में प्रकट हुए। भागवतपुराण में भगवान का हंस स्वरूप सनकादि ऋषियों
व ब्रह्मा को अध्यात्म उपदेश देता है। अतः विष्णु का एक नाम हंस भी है – जो लीला
हेतु हंस रूप धारण करते हैं। (कुछ व्याख्याओं में हंस का अर्थ ब्रह्मा की सवारी हंस से है,
किंतु यहाँ विष्णु के हंसावतार को ही संदर्भित किया गया है)। |
| समुद्रमथन |
समुद्रमथन का अर्थ है “समुद्र का मंथन करने वाले”। देवासुर-संघर्ष के समय भगवान
विष्णु ने कूर्म अवतार लेकर क्षितींद्र मंदराचल को अपनी पीठ पर धारण किया था और समुद्र-मंथन
की प्रक्रिया को संभव बनाया। बाद में मोहिनी रूप में अमृत वितरण कर विष्णु ने
देवताओं को विजय दिलाई। इस प्रकार समुद्र-मंथन में मुख्य भूमिका निभाने के कारण वे समुद्रमथन कहलाते हैं। |
| हरि |
हरि भगवान विष्णु का अत्यंत प्रचलित नाम है, जिसका अर्थ है “हरने वाला” – विशेषतः
पापों व अज्ञान को हरने वाला। हरि शब्द हिंसादि दोषों को हरण करने की क्षमता दर्शाता है
।विष्णु अपने भक्तों के पाप-ताप हर लेते हैं और उन्हें आनंद प्रदान करते हैं, अतः वे हरि (पापहारक) परमेश्वर कहे जाते हैं। |
| गोविन्द |
गोविन्द नाम दो शब्दों से मिलकर बना है – गो अर्थात गाय (पृथ्वी भी) और विन्द
अर्थात आनंददाता। श्रीकृष्ण को यह नाम गोवर्धन लीला के बाद स्वयं देवराज इन्द्र ने प्रदान
किया था – इन्द्र ने कृष्ण का अभिषेक कर कहा, “तुम गो (गोप-गोरस) के इन्द्र हो,
तुम्हारा नाम गोविंद होगा”। इस प्रकार गोविन्द का शाब्दिक अर्थ “गायों एवं धरा को आनंद देने वाले”
हुआ। कृष्ण गोप-गोपियों, गौओं व समस्त व्रज को आनंद व संरक्षण देते थे, इसलिए विष्णु का यह नाम अत्यंत सार्थक है। |
| ब्रह्मजनक |
ब्रह्मजनक का अर्थ है “ब्रह्मा के उत्पत्तिकर्ता”। सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु की
नाभि से प्रकट कमल पर चतुरानन ब्रह्माजी उत्पन्न हुए – इस प्रकार विष्णु ही ब्रह्मा के जनक
एवं सृष्टि के आदिपिता हैं। इसी कारण शास्त्रों में उनका नाम ब्रह्मजनक आया है। |
| कैटभासुरमर्दन |
कैटभासुरमर्दन का तात्पर्य है “कैटभ नामक असुर का मर्दन करने वाले”। उत्पत्ति के आरंभ
में भगवान विष्णु ने दो महादैत्यों मधु और कैटभ का संहार किया था। इस पराक्रम के उपलक्ष्य में पुराण
उन्हें मधुसूदन तथा कैटभजित जैसे से विभूषित करते हैं – वर्तमान नाम कैटभासुरमर्दन उसी
का हिंदी रूपांतरण है, जो विष्णु की असुर-संघारक लीला का स्मरण कराता है। |
| श्रीधर |
श्रीधर शब्द का अर्थ है “श्री (लक्ष्मी) को धारण करने वाले”।
भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर श्रीवत्स नामक चिह्न विराजता है तथा उसी स्थली पर श्रीदेवी लक्ष्मी
का नित्य निवास है। लक्ष्मीपति होने के कारण विष्णु श्रीधर – श्री को धारण करने वाले – कहलाते हैं। |
| कामजनक |
कामजनक का शाब्दिक अर्थ है “काम (इच्छा) को उत्पन्न/पूरा करने वाले”। एक अर्थानुसार
भगवान विष्णु भक्तों के चित्त में परम कल्याण की इच्छा उद्पन्न करते हैं और उन्हें पूर्ण करते
हैं। कामजनक नाम यह भी दर्शाता है कि संसार में सत्य कामनाओं के उत्पत्ति-कर्त्ता भी विष्णु ही हैं –
वे सृष्टि में जीवन व अभिलाषा का संचार करते हैं। |
| शेषशायी |
शेषशायी नाम दो शब्दों से बना है – शेष (नागराज अनन्त) और शायी (शयन करने वाला) –
अर्थ हुआ “जो शेषनाग पर शयन करते हैं”। पुराणों के अनुसार सृष्टि के प्रत्येक कल्प के पूर्व भगवान विष्णु
क्षीरसागर की श्वेतद्वीप तपोभूमि में शेषनाग की शय्या पर योग-निद्रा में लीन रहते हैं। यह शेषशायी
विष्णु ही सृष्टि रचने हेतु ब्रह्मा को उत्पन्न करते हैं। |
| चतुर्भुज |
चतुर्भुज का अर्थ है “चार भुजाओं वाले”। भगवान विष्णु की मूर्ति/मूर्तियाँ प्रायः चार
भुजाओं सहित प्रदर्शित की जाती हैं – प्रत्येक हाथ में क्रमशः शंख (पाञ्चजन्य),
चक्र (सुदर्शन), गदा (कौमोदकी) और कमल धारण रहता है। इस विशिष्ट चार-बाहु रूप के कारण
वे चतुर्भुज (चौभुजा रूप) भगवान कहे जाते हैं। |
| पाञ्चजन्यधर |
पाञ्चजन्यधर का अर्थ है “पाञ्चजन्य (शंख) धारण करने वाले”। पाञ्चजन्य भगवान विष्णु का दिव्य शंख है,
जो उन्हें समुद्र-मंथन से प्राप्त हुआ और जिसकी ध्वनि से वे युद्ध में विजय का उद्घोष करते थे।
विष्णु अपने हाथ में इस शंख को सदैव धारण रखते हैं, इसलिए वे पाञ्चजन्यधर कहे जाते हैं। |
| श्रीमान् |
श्रीमान् का शाब्दिक अर्थ है “जिस पर सदा श्री की कृपा हो” (श्रीयुक्त)। विष्णु श्रीपति हैं –
उनके वक्ष पर श्रीवत्स चिह्न एवं कौस्तुभ मणि सुशोभित है, जो माता लक्ष्मी का स्थायी निवास एवं
अनुग्रह का प्रतीक है। इस प्रकार लक्ष्मी-समन्वित होने के कारण भगवान को सम्मानसूचक
नाम श्रीमान् (श्रीयुक्त भगवान) से अलंकृत किया जाता है। |
| शार्ङ्गपाणि |
शार्ङ्गपाणि का अर्थ है “शारंग धनुष हाथ में धारण करने वाले”। शारंग भगवान विष्णु का दिव्य धनुष है
जिसे वे आवश्यकतानुसार धारण करते हैं। रामावतार में भी भगवान ने परशुराम को अपना शारंग
धनुष दिखाकर समस्त देवों में अपनी सर्वश्रेष्ठता प्रकट की थी। अतः विष्णु शार्ङ्गपाणि (शारंग-धनुर्धर) के नाम से स्तुत होते हैं। |
| जनार्दन |
जनार्दन शब्द के दो मुख्य भाव हैं – पहला: “जनों का पालन-पोषण करने वाला”, और दूसरा:
“दुष्ट जनों को संताप देकर (ठीक मार्ग पर लाने हेतु) पीड़ा हरने वाला”। विष्णु धर्मपालक एवं भक्तों के रक्षक हैं,
परंतु अधर्मी लोगों को दंड द्वारा सही राह दिखाने का कार्य भी करते हैं। इन भूमिकाओं के कारण उन्हें जनार्दन –
जन समुदाय के हितैषी व नियंता – कहा जाता है। |
| पीताम्बरधर |
पीताम्बरधर का शाब्दिक अर्थ है “पीत (पीले) अम्बर (वस्त्र) धारण करने वाले”। श्रीविष्णु का स्वर्णिम
मूर्तिरूप प्रायः मेघ-नीलवर्ण होता है और उस पर चमकीले पीत-वस्त्र सुशोभित रहते हैं। यह पीताम्बर
उनकी दिव्यता एवं सौम्यता का प्रतीक है, अतएव उन्हें पीताम्बरधर कहा जाता है। |
| देव |
देव शब्द “दिव्” धातु से निकला है जिसका अर्थ है प्रकाशमान या दिव्य। विष्णु स्वयं परम
तेजस्वी दिव्य सत्ता हैं, इसीलिए वे देवों में श्रेष्ठ देव कहे जाते हैं। वेद में उन्हें “देवदेव नारायणः” कहा गया है
अर्थात् विष्णु समस्त देवताओं के भी आराध्य देव हैं। |
| सूर्यचन्द्रविलोचन |
सूर्यचन्द्रविलोचन का अर्थ है “जिनकी आँखें सूर्य और चन्द्रमा हैं”। विष्णु के विराट-पुरुष रूप का वर्णन
करते हुए वेद-उपनिषद कहते हैं – “सूर्यचन्द्रमाौ यस्य चक्षुरे” – अर्थात सूर्य और चन्द्रमा भगवान
के दो नेत्र हैं। इस उपमान के द्वारा बताया गया कि विष्णु सर्वदृष्टा हैं; सूर्य रूप में प्रकाश एवं चन्द्र
रूप में शीतलता द्वारा वे संसार का पोषण करते हैं। |
| मत्स्यरूप |
मत्स्यरूप से आशय भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार से है। मत्स्य अवतार में भगवान एक विशाल मछली
के रूप में प्रकट हुए थे। मत्स्यपुराण एवं भागवत में वर्णित है कि प्रलयकाल में विष्णु
ने मत्स्य रूप धारण कर वैवस्वत मनु की नौका का उद्धार किया और वेदों की रक्षा की।
अतः मत्स्यरूप विष्णु के प्रथम अवतार का सूचक नाम है। |
| कूर्मतनु |
कूर्मतनु का अर्थ है “कच्छप शरीर धारण करने वाले (कूर्म अवतार)”। भगवान विष्णु ने समुद्र-मंथन
के समय मंदर पर्वत को स्थिर आधार देने हेतु विशाल कछप का अवतार लिया था। इस कूर्म अवतार में
उन्होंने अपनी कठोर पीठ पर पर्वत को संभालकर देवताओं-असुरों की सहायता की, इसलिए विष्णु को कूर्मतनु कहा जाता है। |
| क्रोडरूप |
क्रोडरूप शब्द “क्रोड” से आया है जिसका अर्थ वराह (जंगली सूअर) होता है। यह भगवान विष्णु के वराह अवतार को
दर्शाता है। वराह रूप में विष्णु ने अधोजल में डूबी पृथ्वी का उद्धार अपने दाँतों
पर उठाकर किया और हिरण्याक्ष असुर का संहार किया। अतः क्रोडरूप विष्णु की उस त्राणकारी लीला का द्योतक है। |
| नृकेसरि |
नृकेसरि नाम का शाब्दिक अर्थ है “नर-सिंह”, यानी मनुष्य शरीर और सिंह के सिर-युक्त रूप।
यह भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को इंगित करता है। नरसिंह रूप
में भगवान ने स्तंभ से प्रकट होकर भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और अत्याचारी हिरण्यकशिपु का वध
किया। इस अद्भुत आधे नर आधे सिंह स्वरूप के कारण विष्णु नृकेसरि (नरसिंह) नाम से पूजित हैं। |
| वामन |
वामन भगवान विष्णु के पाँचवें अवतार का नाम है। इस अवतार में विष्णु ने
अदिति-पुत्र एक बौने ब्राह्मण (वामन) रूप में जन्म लिया। वामन देव ने तीन पग भूमि याचकर राजा बलि
को आध्यात्मिक परिक्षा में डाला और फिर विशाल त्रिविक्रम रूप धारण कर तीनों लोक विनम्र राजा को
वापस किए। वामन अवतार धर्म की स्थापना हेतु विष्णु की करुणा और लीला का प्रतीक है। |
| भार्गव |
भार्गव नाम भगवान विष्णु के परशुराम अवतार को सूचित करता है। परशुराम महर्षि भृगु के
वंशज (इसलिए भार्गव) थे और विष्णु के आवेशावतार माने जाते हैं। परशुराम ने अत्याचारी
क्षत्रियों का अनेक बार संहार कर पृथ्वी को निर्दोष शासकों के हाथ में सौंपा। इस पराक्रम
के कारण विष्णु को भार्गव नाम से भी जाना जाता है। |
| राम |
राम भगवान विष्णु के सातवें अवतार श्रीरामचंद्र जी का नाम है। श्रीराम ने मर्यादा पुरुषोत्तम रूप
में अवतार लेकर अधर्म का नाश किया और आदर्श राजधर्म स्थापित किया। विशेषतः उन्हों
ने लंका के अत्याचारी राक्षस राजा रावण का वध कर धर्म की विजय पताका लहराई। इस प्रकार
विष्णु का राम अवतार सत्य, मर्यादा और आदर्श का प्रतीक बन गया। |
| बली |
बली का अर्थ है “बलवान या अत्यन्त शक्तिशाली”। यह नाम भगवान के अपार
बलशाली स्वरूप का वर्णन करता है – विष्णु अनन्त बल के अक्षय भंडार हैं। वे
स्वयं शेषनाग रूप में पृथ्वी सहित असंख्य लोकों को अपने मस्तक पर धारण करते हैं।
कोई भी शक्ति उनका सामना नहीं कर सकती, इसलिए विष्णु को बली (सर्वाधिक शक्तिमान) कहा जाता है। |
| कल्कि |
कल्कि भगवान विष्णु के दसवें अवतार का नाम है जो कलियुग के अंत में अवतरित होंगे। पुराणों
के अनुसार कलियुग में अधर्म चरम पर पहुँचने पर विष्णु कल्कि रूप में जन्म लेंगे, सफ़ेद घोड़े
पर आरूढ़ होकर दुष्टों का संहार करेंगे और सतयुग की स्थापना करेंगे। इस भविष्य अवतार
के कारण विष्णु का एक नाम कल्कि सर्वत्र विख्यात है। |
| हयानन |
हयानन का शाब्दिक अर्थ है “घोड़े के मुख वाले”, और यह भगवान विष्णु के हयग्रीव अवतार को दर्शाता है
। हयग्रीव रूप में भगवान ने अश्वमुख धारण कर वेदों की रक्षा की थी (पौराणिक कथा
अनुसार दैत्यों से वेद छीनकर)। विष्णु के इस दिव्य स्वरूप को हयानन अथवा हयग्रीव कहा जाता है। |
| विश्वम्भर |
विश्वम्भर शब्द दो भागों से बना है – विश्व (संपूर्ण ब्रह्मांड) और भरण-पोषण करने वाला।
भगवान विष्णु को विश्वम्भर कहते हैं क्योंकि वे संपूर्ण विश्व के पालनहार हैं। वे अन्न से लेकर प्राण तक,
सूक्ष्म से स्थूल तक, हर स्तर पर जगत का भरण-पोषण सुनिश्चित करते हैं। |
| शिशुमार |
शिशुमार एक विशेष शब्द है जो एक प्रकार के जलचर (डॉल्फ़िन-सदृश) को दर्शाता है।
भागवतपुराण में शिशुमार चक्र नामक ब्रह्मांडीय विन्यास का वर्णन है जिसमें विष्णु
को शिशुमार रूप मानकर ध्यान किया जाता है। अतः शिशुमार विष्णु का एक रूप है – जिसमें
उनका शरीर एक विशाल डॉल्फ़िन जैसे आकार में ब्रह्मांड स्वरूप प्रदर्शित होता है – इस रूप की कल्पना
ध्यान और ज्योतिष में की जाती है। |
| श्रीकर |
श्रीकर का अर्थ है “श्री (संपदा-सुख) प्रदान करने वाला”। भगवान
विष्णु अपने भक्तों को सांसारिक सुख एवं आध्यात्मिक समृद्धि – दोनों प्रकार की श्री
(ऐश्वर्य) प्रदान करते हैं। भक्त प्रह्लाद के शब्दों में विष्णु समस्त अभिलषित फल देने में सक्षम हैं,
इसलिए उन्हें श्रीकर नाम से स्तुति मिलती है। |
| कपिल |
कपिल भगवान विष्णु के एक महार्षि अवतार का नाम है। कपिल मुनि ने सांख्य दर्शन का प्रवर्तन किया था।
भागवतपुराण में आता है कि विष्णु ने देवहूति के पुत्र के रूप में कपिल अवतार लेकर अध्यात्म ज्ञान का उपदेश दिया।
इस कारण विष्णु कपिल नाम से प्रसिद्ध हैं। |
| ध्रुव |
ध्रुव का शाब्दिक अर्थ है “स्थिर, अचल” – जो परिवर्तित न हो। यह नाम विष्णु के अपरिवर्तनीय एवं
स्थायी तत्व को दर्शाता है। विष्णु स्वयं अनंतकाल से एक-से हैं, उनमें कोई विकार या क्षय
नहीं होता। भक्त ध्रुव की कथा से जोड़कर भी इस नाम को देखा जाता है, जिसमें विष्णु ने
ध्रुव को अटल ध्रुवतारा पद प्रदान किया। इसलिए विष्णु ध्रुव – नित्य, अविचल सत्ता – कहलाते हैं। |
| दत्तत्रेय |
दत्तात्रेय भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं जिन्होंने त्रिमूर्ति-अंश रूप में अत्रि ऋषि के पुत्र होकर जन्म लिया
था। दत्तात्रेय को संन्यास तथा ज्ञान का आदिगुरु कहा जाता है – उन्होंने समस्त ब्रह्मांड के प्राणियों के कल्याण हेतु
अनेकों उपदेश दिए। इस अवतार के कारण विष्णु का एक नाम दत्तात्रेय भी है। |
| अच्युत |
अच्युत का अर्थ है “जो कभी क्षय (पतन) न हो”, अर्थात अविनाशी
। भगवान विष्णु पूर्णतः अविनाशी हैं – न उनका सत्ता रूप कभी नष्ट होता है, न शक्ति क्षीण होती है।
गीता में अर्जुन श्रीकृष्ण को “अच्युत” कहकर पुकारते हैं, यानी “हे अविनाशी भगवान”। अतः विष्णु को
अच्युत (अविनाशी एवं अपरिवर्तनीय) कहा जाता है। |
| अनन्त |
अनन्त का अर्थ है “जिसका अन्त न हो”, अर्थात् असीम और अपरिमेय। विष्णु स्वयं अनंत हैं – स्थान,
समय और शक्ति की कोई सीमा उन्हें बाँध नहीं सकती। अनन्त शब्द उनके
शाश्वत एवं सर्वव्याप्त स्वरूप को सूचित करता है। शेषनाग को भी अनन्त
कहा जाता है जो भगवान का ही रूप हैं। |
| मुकुन्द |
मुकुन्द नाम में “मुक्ति” शब्द निहित है – मुकुन्द का अर्थ है “मुक्ति देने वाला”
। भगवान विष्णु जीवों को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं, भक्ति योग द्वारा वे जन्म-मृत्यु के
बंधन काट देते हैं। इस कृपा के कारण भक्तजन उन्हें प्रेम से मुकुन्द (मुक्ति-दाता) नाम
से पुकारते हैं, जैसे भगवद्भक्ति साहित्य में प्रचलित भजन “भजे मुकुन्दं मनसा” इत्यादि। |
| दधिवामन |
दधिवामन विष्णु के वामनावतार का एक विशेष नाम है। दधि का अर्थ दही (दधि-मठा) है,
और संभवत: यह नाम वामन देव की गौर-वर्ण (दधि समान श्वेत) अलौकिक आभा को
दर्शाता है। कुछ कथाओं में दधि-वामन को विष्णु का ऐसा स्वरूप बताया गया है जो यज्ञ
में दधि (दही) ग्रहण करते हैं। सारतः, दधिवामन विष्णु के वामन अवतार का ही एक रूप है। |
| धन्वन्तरि |
धन्वंतरि भगवान विष्णु के एक आंशिक अवतार हैं जो आरोग्य के देवता माने जाते हैं।
समुद्र-मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत-कलश लेकर प्रकट हुए और आयुर्वेद के आदिष्ठाता बने।
हिन्दू धर्म में उन्हें देव वैद्य कहा जाता है। विष्णु का यह अवतार रोगों से मुक्ति और आरोग्य प्रदान
करने के कारण धन्वंतरि नाम से विख्यात है। |
| श्रीनिवास |
श्रीनिवास का अर्थ है “श्री (लक्ष्मी) का निवास”, अर्थात जहाँ श्रीदेवी सदा निवास करती हैं
। भगवान विष्णु श्रीवत्स चिह्न से अलंकृत हैं और वे लक्ष्मीपति हैं – माता लक्ष्मी
उनका अंग होकर उनके हृदय में निवास करती हैं। आंध्र के तिरुपति मंदिर में श्रीनिवास (वेंकटेश्वर)
नाम से विष्णु की आराधना विशेष रूप से होती है। |
| प्रद्युम्न |
प्रद्युम्न भगवान विष्णु के चतुर्व्यूह स्वरूपों में से एक हैं। वे श्रीकृष्ण के पुत्र और कामदेव के अवतार माने जाते
हैं। प्रद्युम्न को प्रेम का देवता कहा जाता है – उन्होंने शांभवी विद्या प्राप्त कर नरकासुर
जैसे दानवों का विनाश किया। विष्णु का यह सौरभ-सौम्य रूप प्रद्युम्न नाम से जाना जाता है। |
| पुरुषोत्तम |
पुरुषोत्तम का अर्थ है “सर्वोत्तम पुरुष”। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान को पुरुषोत्तम कहकर
संबोधित किया गया है – “यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्” (15.19) –
अर्थात जो भगवान को परम पुरुषोत्तम जानता है वह सब कुछ जान लेता है। विष्णु
ही वह परम पुरुषोत्तम हैं जो पुरुष रूप में सर्वोच्च ईश्वर हैं, अतः उनका नाम पुरुषोत्तम सर्वमान्य है। |
| श्रीवत्सकौस्तुभधर |
यह नाम श्रीवत्स एवं कौस्तुभ दोनों को धारण करने वाले विष्णु की ओर संकेत करता
है। श्रीवत्स विष्णु के वक्ष पर अंकित लक्ष्मीजी का चिह्न है और कौस्तुभ समुद्र-मंथन
से प्राप्त दिव्य मणि, जो उनके कंठ में शोभित है। अतः श्रीवत्स-कौस्तुभधर भगवान वह
हैं जिनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स का निशान है और जिन्होंने कौस्तुभ मणि धारण की हुई है। |
| मुराराति |
मुराराति का अर्थ है “असुर मुरा का शत्रु (वधकर्ता)”। श्रीकृष्ण ने
नरकासुर के संग्राम में असुर मुरा का वध किया था – भागवतपुराण में वर्णन है
कि पाँच मुख वाले मुरा को कृष्ण ने तीरों से परास्त कर गिरा दिया।
इस पराक्रम के चलते कृष्ण को मुरारी (मुराराति) कहा जाने लगा। यह नाम हरि मुरारी आदि भजनों
में भी लोकप्रिय है, जो भगवान की उस विजयगाथा की स्मृति दिलाता है। |
| अधोक्षज |
अधोक्षज संस्कृत का दार्शनिक शब्द है जिसका अर्थ है “जो इन्द्रियजन्य अनुभव से परे हो”। अधः अक्षज –
अर्थात इंद्रियों की पहुँच से नीचे (परे) रहने वाला। भगवान विष्णु अधोक्षज हैं क्योंकि वे प्रत्यक्ष इंद्रिय-ज्ञान
का विषय नहीं, बल्कि वेद-श्रुति द्वारा जाने जाने वाले परात्पर हैं। हमारी इंद्रियाँ एवं तर्क जहाँ चूक
जाते हैं, वहाँ से विष्णु की लौकिकातीत महिमा प्रारम्भ होती है। |
| ऋषभ |
ऋषभ विष्णु के एक अवतार ऋषभदेव को सूचित करता है। ऋषभदेव ने स्वयंराजा होकर भी
वैराग्य धारण किया और आत्मज्ञान का उपदेश दिया। भगवतमाहापुराण में
आता है कि जड़भरत जैसे महापुरुष उन्हीं से उत्पन्न हुए। विष्णु का यह अवतार आदर्श
त्याग और तप का प्रतीक है, इसलिए उनका नाम ऋषभ प्रसिद्ध है। |
| मोहिनीरूपधारी |
मोहिनीरूपधारी शब्द स्पष्ट करता है कि भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण
किया था। यह प्रसंग समुद्रमंथन का है जब असुरों-देवों में अमृत के लिए 争
हो गई थी। तब विष्णु ने अनुपम सुंदरी मोहिनी बनकर असुरों को मोहित किया औ
र देवताओं को अमृत बांट दिया। इस लीला के कारण विष्णु को मोहिनी रूपधारी कहा जाता है –
शिवजी ने भी भगवान का यह मोहिनी रूप दर्शन किया था। |
| सङ्कर्षण |
सङ्कर्षण भगवान विष्णु के बलराम अवतार का नाम है। सङ्कर्षण का शाब्दिक अर्थ है खींचना –
कथाओं में आता है कि देवकी-पुत्र बलराम को योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में खींच (स्थानांतरित)
दिया था, इसलिए वे संकर्षण कहलाए। वे विष्णु के ही अंश हैं – श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदेव –
जिन्होंने शेषनाग का अवतार लेकर लीला की। |
| पृथु |
पृथु भगवान विष्णु के एक अवतार राजा पृथु को दर्शाता है। पृथु एक आदर्श राजा माने जाते हैं –
भागवत में वर्णित है कि उन्होंने भूख से व्याकुल प्रजा के लिए पृथ्वी का दोहन किया और धरती से
अन्न तथा संपदा प्राप्त की। पृथु के नाम पर ही इस धरती को पृथ्वी कहा गया। विष्णु के इस
जनकल्याणकारी राजावतार को स्मरण कर उन्हें पृथु नाम से पूजा जाता है। |
| क्षीराब्धिशायी |
क्षीराब्धिशायी का अर्थ है “क्षीराब्धि (दूध के समुद्र) पर शयन करने वाले”। हिंदू मान्यतानुसार भगवान
विष्णु क्षीरसागर नामक दिव्य समुद्र के मध्य स्थित श्वेतद्वीप में अनंतनाग पर योगनिद्रा में
शयन करते हैं। देवकार्य हेतु ब्रह्मा आदि देव उसी शयनावस्था में उनकी स्तुति करते
हैं। विष्णु का यह स्वरूप क्षीराब्धिशायी नारायण कहलाता है। |
| भूतात्मा |
भूतात्मा शब्द में भूत का अर्थ भूत-प्राणी (सभी जीव) तथा आत्मा का अर्थ स्वरूप है
। इस प्रकार भूतात्मा नाम वर्णन करता है कि भगवान विष्णु सभी भूत (
प्राणियों) के आत्मस्वरूप में विद्यमान हैं। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं “गुडाकेश… सर्वभूतस्थमात्मानं” – वे
हर प्राणी में स्थित आत्मा हैं। अतः विष्णु भूतात्मा हैं – सभी के अंदर बैठने वाले परमात्मा। |
| अनिरुद्ध |
अनिरुद्ध का शाब्दिक अर्थ है “जिसे रोका न जा सके”, अर्थात् अदमनिय या
अजेय। अनिरुद्ध भगवान विष्णु के चतुर्व्यूह स्वरूपों में एक हैं (विष्णु – संकर्षण – प्रद्युम्न – अनिरुद्ध)।
साथ ही श्रीकृष्ण के पोत्र अनिरुद्ध को भी विष्णु का अंश अवतार माना जाता है। अनिरुद्ध नाम विष्णु
की अजेयता और स्वतंत्र सत्तास्वरूप का द्योतक है – वे निर्विरोध रूप से अपनी लीला संचालित करते हैं। |
| भक्तवत्सल |
भक्तवत्सल नाम में वत्सल शब्द वत्स (संतान) के प्रति स्नेह से जुड़ा है। अर्थात् भक्तवत्सल वह है
जो अपने भक्तों पर पुत्र के समान अपार स्नेह रखता है। भगवान विष्णु अपने
भक्तों के प्रति अत्यंत प्रेमी एवं कृपालु हैं – वे उनके कष्ट दूर कर उन्हें अपना सान्निध्य देते हैं। इस
भगवद्गुण के कारण भक्तजन उन्हें भक्तवत्सल कहते हैं – “भक्त वत्सल तुम्हें बुलावे” जैसे भजनों में यह नाम मिलता है। |
| नर |
यहाँ नर से तात्पर्य भगवान के मानव स्वरूप से है। विष्णु ने देवों के उद्दार हेतु अनेक बार मानव
रूप में अवतार लिए – जैसे राम, कृष्ण आदि। नर-नारायण ऋषि के रूप में भगवान ने बदरीवन
में घोर तप किया था। अतः नर नाम मार्गदर्शक मानव रूप विष्णु को दर्शाता है
। महाभारत में भी अर्जुन को नर (मानव अवतार) और कृष्ण को नारायण कहा गया है। |
| गजेन्द्रवरद |
गजेन्द्रवरद दो शब्दों से मिलकर बना है – गजेन्द्र (हाथियों के राजा) तथा वरद (वर देने वाला)
। यह भगवान विष्णु के उस प्रसंग का स्मरण कराता है जब उन्होंने श्रीमन् गजेन्द्र हाथी की प्रार्थना पर प्रकट
होकर उसे मगर से बचाया था। विष्णु ने गजेन्द्र को मोक्ष वरदान दिया और उसके शत्रु
ग्राह का उद्धार किया। इसलिए वे गजेन्द्र-वरद (गजेन्द्र को वर देने वाले दयालु प्रभु) कहे जाते हैं। |
| त्रिधाम |
त्रिधाम का अर्थ है “तीनों धामों (तीनों लोकों) में विद्यमान”। भगवान विष्णु त्रिलोकी के स्वामी हैं –
वे भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तीनों में व्याप्त हैं। वे स्वर्ग में देवताओं के रूप में, पृथ्वी पर अवतारों/प्रतिमाओं
के रूप में और पाताल में अनन्तनाग के रूप में विराजमान हैं। इस सर्वव्यापक सत्ता को दर्शाने के लिए विष्णु
को त्रिधाम कहा जाता है। |
| भूतभावन |
भूतभावन शब्द “भूत” (पंचमहाभूत एवं प्राणी) और “भावन” (उत्पत्ति एवं पालन करने वाला)
से मिलकर बना है। यह भगवान विष्णु को उस रूप में दर्शाता है जिसमें वे संपूर्ण
भूत-जगत के उत्पत्ति-कर्ता एवं पालक हैं। पुरुषसूक्त में कहा गया है – “विश्वं भूतं भवत्येष” –
यह संपूर्ण भूतलोक उन्हीं परम पुरुष से उत्पन्न हुआ और उन्हीं में स्थित है। इसलिए विष्णु को
भूतभावन (सृष्टि की उत्पत्ति एवं वृद्धि करने वाले) कहा जाता है। |
| श्वेतद्वीपसुवास्तव्य |
श्वेतद्वीप-सु-वासत्व्य का अर्थ है “श्वेतद्वीप में सुस्थित रहने वाले”। श्वेतद्वीप क्षीरसागर स्थित
वह पवित्र द्वीप है जहाँ भगवान विष्णु अनन्तशायी रूप में विराजते हैं। श्रुतियों में वर्णन है
कि वहाँ का परिवेश श्वेत (शुद्ध प्रकाशमय) है और विष्णु योगनिद्रा में रहते
हुए भी जगत का नियमन करते हैं। इस आवासीय विशेषता के कारण विष्णु
श्वेतद्वीपसुवासव्य कहलाते हैं। |
| सनकादिमुनिध्येय |
सनकादि-मुनि-ध्येय का अर्थ है “जो सनकादि ऋषियों द्वारा ध्येय (ध्यानेष्य) हैं”। सनक, सनंदन, सनातन,
सनत्कुमार – ये चारों ब्रह्मऋषि सृष्टि के प्रारंभिक ज्ञानी महापुरुष थे। भागवत में वर्णित है कि
सनकादि मुनि निर्गुण ब्रह्म की उपासना करते-करते अंत में वैकुण्ठ पहुँचे, जहां नारायण का
साक्षात्कार पाया। अतः विष्णु को सनकादिमुनिध्येय – ऋषियों द्वारा ध्यान करने योग्य परमात्मा – कहा गया है। |
| भगवान् |
भगवान् शब्द “भग” धातु से निकला है जिसका अर्थ ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य – ये छः
विभूतियाँ होता है। विष्णु पूर्णरूपेण इन छः भगों से युक्त हैं, इसलिए वे भगवान् हैं
। भगवद्गीता (10.41) में श्रीकृष्ण कहते हैं – “समस्त उत्तम गुण मेरे अंश से आते हैं” –
यह भगवतत्त्व उनके परम ईश्वरत्व को दर्शाता है। अतः विष्णु को भगवान् कहकर उनकी पूर्णता का सूचक सम्मान दिया जाता है। |
| शङ्करप्रिय |
शङ्करप्रिय का अर्थ है “शंकर (महादेव) को प्रिय”। हरि (विष्णु) और हर (शिव)
एक-दूसरे के अति प्रिय हैं। पुराणों में कई कथाएँ मिलती हैं जहाँ विष्णु ने
शिव की आराधना की (जैसे रामेश्वरम् में श्रीराम ने शिवलिंग स्थापित कर पूजा)
और शिव ने विष्णु को प्रियवर रूप में पूजा (जैसे विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का शिव द्वारा उच्चारण)।
इस पारस्परिक प्रीति के भाव से विष्णु शङ्करप्रिय नाम से जाने जाते हैं। |
| नीलकण्ठ |
नीलकण्ठ सामान्यतः भगवान शंकर का नाम है (उनके विषपान से कंठ नीला होने के कारण)
किंतु विष्णु के संदर्भ में नीलकण्ठ का अर्थ है “नील-वर्ण की कान्ति वाले”
। भगवान विष्णु का वर्ण मेघ-श्यामल (नीलाभ) है, जो कमल के समान श्यामनील कान्ति प्रकट करता है।
इस नीलवर्ण-आभा के कारण उन्हें नीलकण्ठ विशेषण से अलंकृत किया जाता है |
| धराकण्ठ |
धराकान्त या धराकण्ठ का अर्थ है “पृथ्वी का पालन-पोषण करने वाले
(सुन्दर कण्ठहार स्वरूप)”। भगवान विष्णु समस्त
पृथ्वी का पोषण एवं रक्षण करते हैं – वे पृथ्वी के परम स्वामी हैं। विष्णु के
इस पृथ्वी-पोषक रूप को दर्शाने के लिए उन्हें धराकण्ठ कहा जाता है, जो यह
जताता है कि पृथ्वी (धरा) उन पर आश्रित है और वे उससे प्रेम करते हुए उसका भरण करते हैं |
| वेदात्मा |
वेदात्मा का अर्थ है “वेदों के आत्मा (सार)”।
सभी वेद-उपनिषद भगवान विष्णु की महिमा का गायन करते हैं – “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः
” (गीता 15.15) अर्थात सभी वेदों से केवल परमात्मा विष्णु को ही जाना जाता है।
स्वयं श्वेताश्वतर उपनिषद में कहा है “वेदात्मा पुरुषः पुराणः” – वह आदिपुरुष ही वेदात्मा है।
इसलिये विष्णु वेदात्मा हैं – वेद जिनकी आत्मा हैं या जो स्वयं वेदों के सार हैं। |
| बादरायण |
बादरायण महर्षि वेदव्यास का अन्य नाम है। यह नाम उन्हें बदरीवन (बदरिकाश्रम
) में तप तथा वेद-रचना करने के कारण मिला। महर्षि व्यास विष्णु के अंशावतार माने जाते हैं –
उन्होंने वेदों का विभाजन कर पुराण एवं महाभारत की रचना की। विष्णु के इस साहित्यिक अवतार
की स्मृति में भगवान को बादरायण नाम से भी स्मरण किया जाता है। |
| भागीरथीजन्मभूमिपादपद्म |
यह विष्णु के उस महिमामय प्रसंग को स्मरण करता है जिसमें भागीरथी गंगा
का उद्गम उनके पादपद्म (चरणों) से हुआ। श्रीमद्भागवत में वर्णित है कि वामन अवतार में
ब्रह्मांड को फुटते समय विष्णु के चरण से निकला जल ब्रह्मलोक में पहुंचा, जो आगे चलकर
भागीरथ के पूजन से स्वर्ग से धरती पर अवतरित हुआ। इसीसे भगवान का नाम भागीरथी-जन्मभूमि-पादपद्म पड़ा –
अर्थात जिनके चरण कमल भागीरथी गंगा की जन्मभूमि हैं। |
| सतां प्रभु |
सतां प्रभु का शाब्दिक अर्थ है “सज्जनों के स्वामी”। भगवान विष्णु धर्मनिष्ठ साधुजनों एवं
भक्तों के आराध्य प्रभु हैं – वे सच्चरों (सत्पुरुषों) की रक्षा और उन्हें आनंद प्रदान करते हैं।
इसी कारण संतसमाज उन्हें सतां प्रभु (सज्जनों के प्रभु) कहकर भक्ति-भाव से गुणगान करता है। |
| स्वभु |
स्वभु का अर्थ है “स्वयंभू (स्वतः अस्तित्व में आए) एवं जगत का पालन करने वाले”। भगवान विष्णु स्वयं
किसी से उत्पन्न नहीं हुए – वे अनादि स्वयंभू हैं। साथ ही वे अपनी इच्छा से सृष्टि की रचना-पोषणा
करने हेतु अवतरित होते हैं। इस स्वयंभू, स्वतःसिद्ध सत्ता और पालनकर्ता भाव को दर्शाते हुए उन्हें स्वभु कहा जाता है। |
| विभु |
विभु शब्द का अर्थ है “सर्वत्र व्याप्त”। भगवान विष्णु के सर्वव्यापी होने के गुण को विभुता कहा जाता है –
वे काल, देश और वस्तु की सीमाओं से परे प्रत्येक अणु-अणु में विद्यमान हैं। उपनिषद कहते हैं:
“परिपूर्णम् इतिः विष्णुः”। अतः विष्णु विभु हैं – सर्वव्यापक, पूर्ण-सत्ता। |
| घनश्याम |
घनश्याम का अर्थ है “घने मेघ के समान श्याम (वर्ण) वाले”।
श्रीकृष्ण का वर्ण वर्षाकालीन घनघोर बादलों जैसा साँवला है – इसीसे उनका यह सुंदर नाम उत्पन्न हुआ।
घनश्याम नाम कवियों का प्रिय रहा है; सूरदास आदि भक्तकवियों ने कृष्ण को “मेघ-श्याम” रूप में
निरूपित किया है। विष्णु के इस दिव्य वर्ण-रूप को स्मरण कर उन्हें घनश्याम कहा जाता है। |
| जगत्कारण |
जगत्कारण दो शब्दों से बना है – जगत (संसार) और कारण (हेतु या कारण) –
अर्थ हुआ “जगत का कारण”। वैदिक सिद्धांत है कि परमब्रह्म विष्णु ही सृष्टि के उपादान एवं
निमित्त कारण हैं – “विष्णोः कर्मेदं विश्वम्”। अर्थात संपूर्ण जगत की उत्पत्ति
परमात्मा विष्णु से हुई और वही उसकी अन्तिम कारण-स्वरूप सत्ता हैं। अतः विष्णु जगत्कारण हैं –
संपूर्ण सृष्टि जिनसे प्रकट हुई। |
| अव्यय |
अव्यय का अर्थ है “जिसका क्षय न हो”, यानी अक्षय अथवा अविनाशी।
यह भगवान विष्णु की नित्य-अविनाशी प्रकृति को दर्शाता है – उनकी शक्ति, स्वरूप,
वैभव क्षीण नहीं होते। श्वेताश्वतर उपनिषद में उन्हें “अक्षरं परमं ब्रह्म” कहा गया,
अर्थात् विष्णु अक्षर (नश्वरता रहित) परम ब्रह्म हैं। इसीलिए वे अव्यय (अक्षय) परमात्मा माने जाते हैं। |
| बुद्धावतार |
बुद्धावतार भगवान विष्णु के नवें अवतार गौतम बुद्ध को इंगित करता है
। कुछ पुराणों (जैसे भागवतपुराण 1.।.।) में विष्णु के दशावतारों
में बुद्ध को भी शामिल किया गया है, जहाँ यह कहा गया कि भगवान
ने मोह भ्रम फैलाकर अधर्मियों से छुटकारा पाने हेतु बुद्ध रूप धारण किया
। बौद्ध अवतार में विष्णु ने अहिंसा एवं करुणा का प्रचार किया,
इसलिए वैष्णव परंपरा में उन्हें बुद्धावतार के रूप में पूजा जाता है। |
| शांतात्मा |
शांतात्मा का अर्थ है “अत्यंत शांत एवं निर्मल आत्मस्वरूप वाले”
। भगवान विष्णु को शांताकारम् कहा जाता है – उनका स्वरूप अचल,
शीतल और पूर्ण शांति से युक्त है। वे समस्त राग-द्वेष से परे, स्थितप्रज्ञ परमात्मा
हैं। इस अखंड शांति और संतुलन के कारण विष्णु शांतात्मा नाम से प्रसिद्ध हैं। |
| लीलामानुषविग्रह |
लीला-मानुष-विग्रह का तात्पर्य है “जिनका विग्रह (शरीर) मनुष्य जैसा है, जो लीला हेतु मानव
रूप धारण करते हैं”। भगवान विष्णु ने विभिन्न अवतारों में मानव-शरीर धारण कर अपने दि
व्य लीलाएं की हैं – जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि के रूप में। ये
मानुष-विग्रह परमात्मा की कृपा से ही संभव हैं ताकि वे मनुष्यों
के बीच रहकर धर्म स्थापना कर सकें। अतः विष्णु लीलामानुषविग्रह हैं – लीला के लिए मानवीय शरीर वाले भगवान। |
| दामोदर |
दामोदर नाम का शाब्दिक अर्थ है “दाम (रस्सी) से बँधे हुए उदर
(कमर) वाले”। यह बालकृष्ण की प्रसिद्ध लीला से संबंधित है जब माता यशोदा
ने शरारती बाल गोपाल को ऊखल (मोर्टार) से रस्सी द्वारा
बाँध दिया था। भगवतपुराण में इस प्रसंग पर दामोदर नाम
से कृष्ण की स्तुति की गई – “नमामीश्वरं सच्-चिदानन्दरूपं… रदामोदरं”। इस अद्वितीय
बाललीला के स्मरण में भगवान विष्णु को दामोदर कहा जाता है। |
| विराट्रूप |
विराट्रूप का अर्थ है “विराट (विशाल) विश्वरूप”। महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को
अपना विराट विश्व-स्वरूप दिखाया था जिसमें असंख्य मुख-भुजाएँ, करोड़ों सूर्य के तेज,
अनंत आकार समाए थे। इस विश्व रूपदर्शन के कारण भगवान को विराटपुरुष और विराट्रूप
नाम से भी पुकारा जाता है। विष्णु सहस्रनाम में भी “विराट स्वरूप” उनकी महिमा का वर्णन करता है। |
| भूतभव्यभवत्प्रभु |
यह नाम दर्शाता है कि भगवान विष्णु भूत (अतीत), भविष्य और वर्तमान – तीनों कालों
में प्रभु हैं। वे समय से परे त्रिकालज्ञ एवं त्रिकालाधिपति हैं। विष्णु हर युग, हर कालखंड
में धर्म स्थापना करते हैं – सतयुग में पृथु, त्रेतायुग में राम, द्वापर में कृष्ण और
कलियुग में कल्कि रूप में अवतार लेते हैं। इस त्रिकाल व्यापित्व के कारण उन्हें
भूतभव्यभवत्प्रभु (त्रिकाल के प्रभु) कहा जाता है। |
| आदिदेव |
आदिदेव का अर्थ है “आदि (प्रथम) देवता”। विष्णु को आदिदेव इसलिए कहते हैं क्योंकि वे
सृष्टि के आरम्भ से पूज्य परमेश्वर हैं। वेदों में उन्हें “पुरुषः प्रथमः”
कहा गया – अर्थात सबसे पहले विद्यमान परम पुरुष। सभी देवताओं में वे श्रेष्ठ
एवं प्रथमपूज्य हैं। इस प्रकार विष्णु आदिदेव (प्रथम एवं सर्वोच्च देव) हैं। |
| देवदेव |
देवदेव शब्द में भगवान विष्णु को “देवों के देव” कहा गया है। इसका
आशय है कि स्वयं देवगण भी जिनकी वंदना करते हैं, ऐसे परमेश्वर विष्णु।
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं – “देवत्व मैं हूँ” – अर्थात देवत्व
के मूल भी वही हैं। इसलिए वे सभी देवताओं के नियंता और आराध्य देवाधिदेव हैं, जिन्हें देवदेव कहा जाता है। |
| प्रह्लादपरिपालक |
प्रह्लाद-परिपालक का अर्थ है “भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने वाले”। यह भगवान विष्णु के नरसिंह
अवतार की ओर संकेत करता है – जब बाल भक्त प्रह्लाद को उसके क्रूर पिता
हिरण्यकशिपु ने मारने का प्रयास किया, तब विष्णु ने खंभे से नरसिंह रूप
में प्रकट होकर प्रह्लाद की रक्षा की। उन्होंने हिरण्यकशिपु का संहार कर अपने
भक्त को गोद में बैठाकर आशीर्वाद दिया। अतः विष्णु प्रह्लादपरिपालक – प्रह्लाद जैसे भक्तों के पालक – के रूप में पूजित हैं। |
| श्रीमहाविष्णु |
श्री महाविष्णु भगवान विष्णु का प्रकाट्य महिमान्वित नाम है, जिसका अर्थ है
“श्रीयुक्त महान विष्णु”। वैष्णव आस्था में महाविष्णु उस परम शक्तिमान प्रभु को कहते
हैं जिनसे असंख्य ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं (जिन्हें कर्णोदकशायी विष्णु भी कहते हैं)।
यहाँ श्रीमहाविष्णु नाम विष्णु की उस सर्वोच्च, अनंत और समस्त श्रियम् (ऐश्वर्य)
से युक्त स्वरूप को दर्शाता है, जो समस्त सृष्टियों के मूल अधिष्ठाता हैं। (उन्हीं के
अंश स्वरूप क्षीरसागर में शेषशायी नारायण हर ब्रह्मांड में विद्यमान हैं)। |