नरक चतुर्दशी (छोटी दीपावली): प्रभातकालीन दीपदान, अभ्यंग स्नान एवं यम तर्पण की शास्त्रसम्मत मीमांसा
सनातन धर्म की अक्षुण्ण, ज्ञान-गर्भित एवं पारलौकिक रहस्यों से परिपूर्ण परंपरा में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक महत्व रखती है। लोक व्यवहार में इस पावन तिथि को 'नरक चतुर्दशी', 'रूप चतुर्दशी', 'काली चौदस' अथवा 'छोटी दीपावली' के नाम से संबोधित किया जाता है । धर्मशास्त्रों की सूक्ष्म विवेचना करने पर यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि यह तिथि मात्र एक लौकिक उत्सव नहीं है, अपितु यह मनुष्य की आध्यात्मिक शुद्धि, अकाल मृत्यु के निवारण, शारीरिक कांति की पुनर्प्राप्ति तथा पितरों एवं पूर्वजों की सद्गति के लिए निर्धारित एक अत्यंत वैज्ञानिक एवं शास्त्रसम्मत अनुष्ठान है ।
इस विषय पर 'निर्णयसिन्धु', 'धर्मसिन्धु', 'स्कन्द पुराण', 'पद्म पुराण' तथा 'लिंग पुराण' जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में जो दिशा-निर्देश प्राप्त होते हैं, वे मानव देह और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के मध्य एक विलक्षण संतुलन स्थापित करते हैं। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, इसी पवित्र तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण एवं उनकी अर्धांगिनी देवी सत्यभामा ने आतातायी दैत्य नरकासुर (भौमासुर) का वध कर सोलह सहस्र एक सौ कन्याओं को उसकी अमानवीय कैद व यातना से मुक्त कराया था । इस महाविजय के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं तिल के तेल से तैलाभ्यंग स्नान कर अपनी देह को शुद्ध किया था, जो आज भी इस पर्व की सबसे प्रमुख परंपरा का भाग है । एक अन्य आख्यान के अनुसार, भगवान वामन और दैत्यराज बलि के मध्य हुए संवाद में यह वरदान दिया गया था कि जो प्राणी इस दिन यमराज के निमित्त दीपदान करेगा, उसके पितरों को कभी नरक की यातना नहीं सहनी पड़ेगी ।
प्रस्तुत शोध-प्रबंध का मुख्य उद्देश्य नरक चतुर्दशी के प्रभातकालीन अनुष्ठानों—विशेषतः ब्रह्ममुहूर्त में अभ्यंग स्नान, संकल्प-विधि, यम तर्पण की चरणबद्ध प्रक्रिया, प्रभातकालीन दीपदान तथा उल्का दर्शन—का पूर्णतः प्रमाण-आधारित, तार्किक एवं शास्त्रीय दृष्टिकोण से अत्यंत विस्तारपूर्वक विश्लेषण करना है। यह शोध उन सभी भ्रांतियों का निवारण करेगा जो लोकमानस में व्याप्त हैं, ताकि जिज्ञासु साधक बिना किसी संशय के शास्त्रोक्त विधि से इस महान पर्व का अनुपालन कर सकें。
नरक चतुर्दशी का पारलौकिक, दार्शनिक एवं शास्त्रीय महत्व
शास्त्रों में इस दिन को नरक की घोर यातनाओं से पूर्णतः मुक्ति दिलाने वाला तथा जीवन में सात्विकता एवं नव-ऊर्जा का संचार करने वाला माना गया है। 'धर्मसिन्धु' एवं 'निर्णयसिन्धु' जैसे मूर्धन्य धर्मशास्त्रों के अनुसार, नरक चतुर्दशी के दिन प्रत्येक सनातन धर्मी के लिए पाँच मुख्य कर्म अनिवार्य माने गए हैं: तैलाभ्यंग स्नान (तिल के तेल से मालिश और स्नान), कार्तिक स्नान, यम तर्पण, उल्का दान व प्रदर्शन (दीपमालाओं को आकाश की ओर दिखाना), तथा दीप प्रज्वलन ।
इन पञ्च-कर्मों का उद्देश्य मात्र शारीरिक स्तर की शुद्धि करना नहीं है, अपितु यह दैहिक, मानसिक एवं आत्मिक स्तर पर एकत्रित मलिनता तथा पाप-कर्मों का समूल शमन करना है। अकाल मृत्यु (अपमृत्यु) से रक्षा और मृत्यु के पश्चात नरक के भय से शाश्वत मुक्ति—ये इस दिन किए जाने वाले यमराज के पूजन के मुख्य फल माने गए हैं । दार्शनिक दृष्टिकोण से 'नरक' केवल मृत्यु के पश्चात प्राप्त होने वाला कोई भौगोलिक स्थान नहीं है, अपितु यह अज्ञान, रोग, शोक, दरिद्रता और मानसिक क्लेश की वह अवस्था है जिसे मनुष्य इसी जीवन में भोगता है। नरक चतुर्दशी के ये शास्त्रीय अनुष्ठान व्यक्ति को इसी लौकिक जीवन के नरक से निकालकर 'रूप' अर्थात् शारीरिक एवं आत्मिक सौंदर्य की ओर ले जाते हैं ।
तिथि निर्णय एवं काल-विवेचना
धर्मशास्त्रों में किसी भी व्रत अथवा अनुष्ठान की सफलता के लिए 'काल' (समय) का सूक्ष्म निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। नरक चतुर्दशी के अनुष्ठान के लिए अरुणोदय (सूर्योदय से पूर्व की बेला) और चन्द्रोदय का विशेष विचार किया जाता है। 'धर्मसिन्धु' और 'कालनिर्णय' ग्रंथों के अनुसार, चतुर्दशी का व्रत और तैलाभ्यंग स्नान उसी दिन मान्य होता है जिस दिन चन्द्रोदय के समय अथवा अरुणोदय के समय चतुर्दशी तिथि विद्यमान हो ।
शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है कि यदि चतुर्दशी तिथि दो दिनों तक अरुणोदय काल को स्पर्श कर रही हो, तो पूर्वविद्धा (पहले दिन वाली) तिथि को ही ग्रहण किया जाता है । तैलाभ्यंग स्नान रात्रिकाल के चतुर्थ प्रहर अर्थात् चन्द्रोदय के समय अथवा अरुणोदय के समय ही संपन्न कर लेना चाहिए । जो साधक किसी कारणवश अरुणोदय काल में स्नान नहीं कर पाते, वे सूर्योदय के पश्चात भी स्नान कर सकते हैं, परंतु मुख्य फल अरुणोदय काल के स्नान का ही प्रतिपादित है ।
पात्रता एवं अधिकार मीमांसा
यम तर्पण और श्राद्ध कर्म को लेकर लोकमानस में एक सामान्य धारणा व्याप्त है कि जिसके पिता जीवित हों (जीवत्पितृक), उसे तर्पण करने का अधिकार नहीं है। परंतु, नरक चतुर्दशी का यम तर्पण इस सामान्य नियम का एक अत्यंत विशिष्ट एवं शास्त्रसम्मत अपवाद है。
'निर्णयसिन्धु' तथा 'धर्मसिन्धु' के सूक्ष्म अवलोकन से यह अद्भुत तथ्य उद्घाटित होता है कि नरक चतुर्दशी के दिन पिता के जीवित रहते हुए भी पुत्र को अकाल मृत्यु एवं नरक भय से मुक्ति हेतु यमराज के निमित्त तर्पण अवश्य करना चाहिए । इसका शास्त्रीय तर्क यह है कि यह तर्पण पितरों के लिए किया जाने वाला पारंपरिक श्राद्ध नहीं है, अपितु यह मृत्यु के अधिपति देवता (यम) की प्रसन्नता और परिवार के सभी सदस्यों की आयु-रक्षा के लिए किया जाने वाला एक सार्वभौमिक अनुष्ठान है। यदि किसी कारणवश घर में कोई पुरुष सदस्य उपस्थित न हो, अथवा कोई पुरुष न हो, तो घर की स्त्रियाँ भी पूर्ण अधिकार के साथ इस तर्पण को संपन्न कर सकती हैं । यह विधान सनातन धर्म की उस उदारता को परिलक्षित करता है जहाँ आत्म-रक्षा और पारलौकिक कल्याण पर प्रत्येक मनुष्य का समान अधिकार है。
ब्रह्ममुहूर्त जागरण एवं संकल्प-विधान
नरक चतुर्दशी के महा-अनुष्ठान का वास्तविक आरंभ रात्रिकाल के चतुर्थ प्रहर अर्थात् ब्रह्ममुहूर्त से ही हो जाता है । शास्त्रों का अत्यंत कठोर निर्देश है कि साधक को सूर्योदय से पूर्व शय्या का त्याग कर देना चाहिए। यदि प्रमादवश या आलस्य के कारण कोई साधक इस दिन सूर्योदय के पश्चात निद्रा से जागता है, तो उसके वर्ष भर के संचित पुण्य एवं सत्कर्म उसी क्षण क्षीण हो जाते हैं ।
जागृत होने के पश्चात साधक को शय्या पर ही अपने इष्टदेव, भगवान श्रीकृष्ण तथा यमराज का मानसिक स्मरण करना चाहिए। तदुपरांत दैनिक शौचादि क्रियाओं से निवृत्त होकर, पूर्वाभिमुख (पूर्व दिशा की ओर मुख करके) या उत्तराभिमुख होकर संकल्प ग्रहण करना चाहिए। सनातन धर्म में 'संकल्प' वह मनोवैज्ञानिक एवं तांत्रिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से साधक अपने बिखरे हुए विचारों और ब्रह्मांडीय ऊर्जा को एक विशिष्ट उद्देश्य के प्रति एकाग्र करता है। बिना संकल्प के किया गया कोई भी कर्म फलदायी नहीं होता。
संकल्प की शास्त्रीय विधि
साधक अपने दाहिने हाथ की अंजलि में शुद्ध जल, अक्षत (बिना टूटे हुए चावल), पुष्प, और काले तिल लेकर निम्नलिखित भाव के साथ शास्त्रसम्मत संकल्प करे। सर्वप्रथम देश (स्थान), काल (संवत्सर, मास, पक्ष, तिथि) और अपने गोत्र तथा नाम का उच्चारण करना चाहिए। इसके पश्चात मुख्य संकल्प मन्त्र का उच्चारण किया जाता है:
"ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे चतुर्दश्याम् तिथौ अमुक गोत्रोत्पन्नः अमुक शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं मम अपमृत्यु निवारणार्थं, नरक यातना निवृत्त्यर्थं, यमराज प्रीत्यर्थं तथा च सकल पाप क्षयार्थं प्रातःकाले तैलाभ्यंग स्नानं, यम तर्पणं, दीपदानं च करिष्ये।"
इस संकल्प को ग्रहण करने के पश्चात हाथ में ली गई सामग्री को भूमि पर अथवा किसी ताम्र पात्र में छोड़ देना चाहिए। यह संकल्प साधक की चेतना को यह निर्देश देता है कि वह यह संपूर्ण अनुष्ठान किसी भौतिक कामना की पूर्ति के लिए नहीं, अपितु आत्मिक उत्थान और मृत्यु-भय पर विजय प्राप्त करने के लिए कर रहा है。
अभ्यंग स्नान (तैलाभ्यंग) की तार्किक एवं शास्त्रीय प्रक्रिया
नरक चतुर्दशी का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शारीरिक एवं आत्मिक अनुष्ठान 'अभ्यंग स्नान' है। सामान्य दिनों में जल से किया जाने वाला स्नान केवल बाह्य त्वचा की शुद्धि करता है, परंतु अभ्यंग स्नान में तिल के तेल एवं विशेष औषधियों का लेपन किया जाता है जो रोमछिद्रों के माध्यम से नाड़ियों तक प्रवेश कर स्नायुतंत्र को बल प्रदान करता है। शास्त्रीय मान्यता है कि इस विशेष दिन "तैले लक्ष्मी: जले गंगा दीपावल्या चतुर्दशीम्" अर्थात् कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन तेल में भगवती लक्ष्मी का साक्षात वास होता है और जल में माता गंगा निवास करती हैं । जो व्यक्ति इस दिन सूर्योदय से पूर्व तैल-स्नान करता है, वह यमलोक के दर्शन नहीं करता ।
तैल मर्दन एवं उबटन (उद्वर्तन) लेपन
चन्द्रोदय के समय अथवा सूर्योदय से पूर्व, साधक को अपने संपूर्ण शरीर पर शुद्ध तिल के तेल का भली-भांति मर्दन (मालिश) करना चाहिए । आयुर्वेद और धर्मशास्त्रों में तिल के तेल को अत्यंत सात्विक, उष्ण वीर्य और पाप-नाशक माना गया है। तैल मर्दन के पश्चात शरीर पर औषधीय उबटन का लेपन किया जाता है। यह उबटन चने के बेसन, हल्दी, चंदन पाउडर, और विभिन्न सुगंधित द्रव्यों (हर्ब्स) को मिलाकर तैयार किया जाता है ।
शास्त्रों का निर्देश है कि इस उबटन को शरीर पर पंद्रह से बीस मिनट तक लगा रहने देना चाहिए । इस अवधि में शरीर की ऊष्मा से उबटन के औषधीय गुण त्वचा में अवशोषित होते हैं और देह के भीतर संचित नकारात्मक ऊर्जा, मलिनता तथा विकार बाहर निकलते हैं。
अपामार्ग (चिरचिटा) प्रदक्षिण एवं मन्त्र-रहस्य
स्नान करने से ठीक पूर्व एक अत्यंत विशिष्ट तांत्रिक एवं औषधीय प्रक्रिया संपन्न की जाती है। इसमें अपामार्ग (जिसे लोकभाषा में चिरचिटा, आंधीझाड़ा या लटजीरा भी कहा जाता है) की जड़ अथवा उसके कांटों वाले पत्तों को साधक के सिर के ऊपर से तीन बार वृत्ताकार (प्रदक्षिणा क्रम में) घुमाया जाता है । अपामार्ग एक अत्यंत पवित्र वनस्पति है जिसका प्रयोग आयुर्वेद में विष-नाशक और अथर्ववेद में नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करने वाले अस्त्र के रूप में वर्णित है。
इसे सिर पर घुमाते समय निम्नलिखित शास्त्रोक्त मन्त्र का निरंतर उच्चारण करना अनिवार्य है:
"सितालोष्ठसमायुक्तं सकण्टकदलान्वितं। हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणः पुनः पुनः॥"
दार्शनिक और शाब्दिक अर्थ: 'सितालोष्ठ' का अर्थ है जोती हुई भूमि का ढेला और 'सकण्टकदल' का अर्थ है कांटों और पत्तों से युक्त। मन्त्र का पूर्ण भावार्थ यह है कि—"हे मिट्टी के ढेले और कांटों से युक्त अपामार्ग! तुम बार-बार मेरे सिर के चारों ओर घुमाए जाते हुए, मेरे द्वारा इस जन्म में अथवा पूर्व जन्मों में किए गए समस्त पापों का हरण करो और मेरी कुबुद्धि (नकारात्मक विचारों) का समूल नाश कर दो" । अपामार्ग को घुमाने के पश्चात उसे किसी पवित्र स्थान पर विसर्जित कर देना चाहिए, उसे पैरों के नीचे नहीं आने देना चाहिए。
अहोई अष्टमी के जल का मिश्रण एवं स्नान मन्त्र
अपामार्ग की प्रक्रिया पूर्ण करने के पश्चात स्नान का विधान है। सनातन परंपरा के अनुसार, नरक चतुर्दशी से पूर्व कार्तिक कृष्ण अष्टमी (अहोई अष्टमी) के दिन एक लोटे (ताम्र पात्र) में जल भरकर सुरक्षित रखा जाता है । नरक चतुर्दशी के दिन इस सुरक्षित जल को स्नान के उष्ण (गुनगुने) जल में मिश्रित करके स्नान करने की अत्यंत प्राचीन परंपरा है । मान्यता है कि यह जल मातृ-शक्ति के आशीर्वाद और वात्सल्य से अभिमंत्रित होता है, जो नरक के भय से मुक्ति दिलाता है ।
स्नान करते समय साधक को शांत चित्त से निम्नलिखित मन्त्र का निरंतर मानसिक अथवा वाचिक जाप करना चाहिए:
"सिद्धिदं अभ्यंगं कुर्वे प्रातः नरक प्राप्तये सदा दामोदर प्रीत्यै च स्नानं मे भवतु सिद्धिदम्।"
(भावार्थ: मैं नरक के भय से सदा के लिए मुक्त होने तथा भगवान दामोदर (श्रीकृष्ण) की प्रीति प्राप्त करने हेतु यह सिद्धिदायक प्रातःकालीन अभ्यंग स्नान कर रहा हूँ। यह स्नान मेरे लिए समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाला हो।)
अथवा साधक इस अत्यंत प्रभावशाली मन्त्र का जाप भी कर सकता है:
"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
(भावार्थ: जो क्लेशों का नाश करने वाले हैं, उन परम परमात्मा, वासुदेव-नंदन भगवान श्रीकृष्ण और गोविन्द को मेरा बारंबार नमस्कार है।)
इस प्रकार पूर्ण शास्त्रीय विधि, मंत्रोच्चार एवं औषधियों के साथ स्नान करने से साधक को न केवल विलक्षण शारीरिक कांति एवं रूप प्राप्त होता है (जिसके कारण इसे रूप चतुर्दशी कहा जाता है), अपितु यमलोक के दर्शन से भी सर्वदा के लिए मुक्ति मिल जाती है ।
यम तर्पण: चरणबद्ध प्रक्रिया एवं मन्त्र-रहस्य
अभ्यंग स्नान के पश्चात स्वच्छ एवं नवीन वस्त्र (अधिमानतः श्वेत अथवा पीत वस्त्र) धारण कर साधक को 'यम तर्पण' का विधान पूर्ण करना चाहिए। यह तर्पण नरक चतुर्दशी के संपूर्ण अनुष्ठान का हृदय-स्थल है। जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया गया है, यह तर्पण सभी के लिए अनिवार्य है, चाहे उनके माता-पिता जीवित हों अथवा नहीं ।
तर्पण की सामग्री एवं दिशा-विधान
तर्पण आरंभ करने से पूर्व एक ताम्र (तांबे) के पात्र में शुद्ध गंगाजल अथवा कुएं का जल भर लेना चाहिए। उस जल में श्वेत तिल, कृष्ण (काले) तिल, यव (जौ), और कुशा के कुछ अग्रभाग मिश्रित कर लेने चाहिए । यदि संभव हो तो जल में थोड़ा सा कच्चा दूध भी मिलाया जा सकता है । तर्पण करते समय साधक को अपना मुख पूर्णतः दक्षिण दिशा की ओर रखना चाहिए, क्योंकि वेदों और पुराणों में दक्षिण दिशा को मृत्यु, न्याय और पितरों के अधिपति देवता यमराज की अधिष्ठात्री दिशा माना गया है ।
मुद्रा एवं अंजलि-विधान
यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने वाले द्विजाति पुरुषों को तर्पण के समय अपना यज्ञोपवीत 'अपसव्य' (दाहिने कंधे पर और बाएँ हाथ के नीचे) अथवा 'निवीती' (माला की भाँति गले में) कर लेना चाहिए । हाथों की उंगलियों में स्वर्ण, रजत (चांदी) अथवा कुशा से निर्मित पवित्री (अंगूठी) अवश्य धारण करनी चाहिए ।
जल को दोनों हाथों की अंजलि (हथेलियों को मिलाकर) में लेकर अंगूठे और तर्जनी के मध्य भाग (जिसे शास्त्रों में 'पितृतीर्थ' कहा जाता है) से दक्षिण दिशा की ओर भूमि पर या किसी अन्य स्वच्छ ताम्र पात्र में छोड़ना चाहिए । कुछ विद्वानों के अनुसार यमराज देव रूप भी हैं, अतः 'देवतीर्थ' (उंगलियों के अग्रभाग) से भी जल अर्पित किया जा सकता है ।
यमराज के चौदह नामों का तात्विक मन्त्र-विधान
तर्पण करते समय मृत्यु एवं न्याय के अधिपति यमराज के चौदह विशिष्ट नामों का पूर्ण श्रद्धा के साथ उच्चारण किया जाता है। धर्मशास्त्रों का निर्देश है कि प्रत्येक नाम के साथ तीन-तीन बार जलांजलि अर्पित करनी चाहिए । यमराज के ये चौदह नाम केवल शब्द नहीं हैं, अपितु ये ब्रह्मांडीय न्याय-व्यवस्था, मृत्यु के मनोविज्ञान और काल की अजेय शक्ति के चौदह विभिन्न स्वरूपों के द्योतक हैं। तर्पण के समय प्रयुक्त होने वाले मन्त्रों और उनके दार्शनिक अर्थों की विस्तृत मीमांसा निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत है:
| क्रमांक | यमराज का नाम | तर्पण मन्त्र (शास्त्रसम्मत) | दार्शनिक भाव एवं तात्विक अर्थ |
|---|---|---|---|
| 1 | यम | ॐ यमाय नमः यमं तर्पयामि | 'यम' का अर्थ है नियमन करने वाला। जो ब्रह्मांड के समस्त जीवों के कर्मों का कठोरता से नियमन करते हैं और उन्हें संयम के पाश में बाँधकर रखते हैं, उन यमराज को यह जलांजलि अर्पित है। |
| 2 | धर्मराज | ॐ धर्मराजाय नमः धर्मराजं तर्पयामि | मृत्यु के देवता क्रूर नहीं हैं, वे धर्म के राजा हैं। जो पूर्णतः निष्पक्ष होकर, बिना किसी राग-द्वेष के, केवल धर्म और सत्य के आधार पर जीवों का न्याय करते हैं। |
| 3 | मृत्यु | ॐ मृत्यवे नमः मृत्युं तर्पयामि | भौतिक शरीर का अंत सुनिश्चित है। जो स्वयं मृत्यु के मूर्तिमान स्वरूप हैं और पंचतत्वों से निर्मित देह के अंत के अधिपति हैं। |
| 4 | अन्तक | ॐ अन्तकाय नमः अन्तकं तर्पयामि | जो काल के अनंत चक्र में हर भौतिक वस्तु, देह और स्थिति का एक निश्चित अंत सुनिश्चित करते हैं, जिसके पार कुछ भी लौकिक शेष नहीं रहता। |
| 5 | वैवस्वत | ॐ वैवस्वताय नमः वैवस्वतं तर्पयामि | जो भगवान सूर्य (विवस्वान) के तेजस्वी पुत्र होने के कारण परम प्रकाशवान और न्याय में सूर्य के समान प्रखर हैं। |
| 6 | काल | ॐ कालाय नमः कालं तर्पयामि | जो समय के अजेय और अगोचर स्वरूप हैं, जिन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता और जो अंततः सबको अपना ग्रास बना लेते हैं। |
| 7 | सर्वभूतक्षय | ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः सर्वभूतक्षयं तर्पयामि | जो समस्त पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से निर्मित चराचर प्राणियों का समय आने पर क्षय (नाश) करने वाले हैं। |
| 8 | औदुम्बर | ॐ औदुम्बराय नमः औदुम्बरं तर्पयामि | जो उदुम्बर (गूलर) वृक्ष के समान परम शक्ति से युक्त, अत्यंत रहस्यमयी और जिनकी कार्यप्रणाली सामान्य जीवों की समझ से परे है। |
| 9 | दध्न | ॐ दध्नाय नमः दध्नं तर्पयामि | जिस प्रकार दूध को मथकर दही (दधि) और मक्खन निकाला जाता है, उसी प्रकार जो जीवों के संचित कर्मों को मथकर उनके वास्तविक फल को पृथक कर प्रदान करते हैं। |
| 10 | नील | ॐ नीलाय नमः नीलं तर्पयामि | जिनका स्वरूप अथाह समुद्र अथवा अनंत आकाश की भाँति नीलवर्णी, अथाह, गंभीर और अपरिमित है। |
| 11 | परमेष्ठिन | ॐ परमेष्ठिने नमः परमेष्ठिनं तर्पयामि | जो अपने परम पद और न्याय के सर्वोच्च धर्म-सिंहासन पर पूर्ण दृढ़ता और अडिगता से स्थित हैं। |
| 12 | वृकोदर | ॐ वृकोदराय नमः वृकोदरं तर्पयामि | जिनके उदर (पेट) में संपूर्ण ब्रह्मांड और महाकाल के समय सभी जीव समाहित होने की क्षमता रखते हैं (अथवा जो भेड़िये के समान कभी शांत न होने वाली क्षुधा वाले काल हैं)। |
| 13 | चित्र | ॐ चित्राय नमः चित्रं तर्पयामि | जो प्राणियों के अत्यंत विचित्र, सूक्ष्म और बहुआयामी कर्मों के ज्ञाता हैं। जिनके न्याय का स्वरूप अत्यंत चित्र-विचित्र है। |
| 14 | चित्रगुप्त | ॐ चित्रगुप्ताय नमः चित्रगुप्तं तर्पयामि | जो अदृश्य रहकर जीवों के अत्यंत गुप्त और छिपे हुए मानसिक व शारीरिक कर्मों का अचूक लेखा-जोखा रखते हैं। |
इन चौदह नामों से तिलांजलि (तिल-मिश्रित जल) अर्पण करने के पश्चात साधक को दोनों हाथ जोड़कर दक्षिण दिशा की ओर श्रद्धावनत होकर नमन करना चाहिए । नमन करते हुए मन ही मन अथवा वाचिक रूप से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि—"हे धर्मराज! हे कालस्वरूप! मेरे इस तर्पण से आप प्रसन्न हों। मेरे घर-परिवार में कभी किसी की अकाल मृत्यु न हो, हमारे द्वारा जाने-अनजाने में किए गए समस्त पापों का समूल शमन हो तथा हमारे घर में चिरस्थायी सुख, शांति एवं समृद्धि का वास रहे" ।
तर्पण का यह अत्यंत पवित्र अनुष्ठान पूर्ण होने के पश्चात, पात्र में बचे हुए जल और तिल को किसी पवित्र वृक्ष (जैसे पीपल, बरगद या तुलसी) की जड़ में अथवा किसी स्वच्छ क्यारी में विसर्जित कर देना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि वह जल किसी के पैरों के नीचे न आए, अन्यथा पुण्य का क्षय होता है ।
प्रभातकालीन दीपदान एवं उल्का दर्शन की शास्त्रीय मीमांसा
नरक चतुर्दशी के पर्व में 'दीपदान' मात्र अंधकार दूर करने का भौतिक माध्यम नहीं है, अपितु यह एक अत्यंत रहस्यमयी पारलौकिक मार्गदर्शन की प्रक्रिया है। सामान्यतः दीपावली के पर्व पर दीपदान रात्रिकाल में होता है, परंतु शास्त्रों में चतुर्दशी की संध्या (प्रदोष काल) के साथ-साथ प्रभात काल (अरुणोदय बेला) में भी दीपदान और 'उल्का दर्शन' का अत्यंत विशेष उल्लेख मिलता है ।
दीपदान का उद्देश्य एवं पौराणिक संदर्भ
दीपदान के पीछे एक अत्यंत मार्मिक पौराणिक संदर्भ है। भगवान वामन और दैत्यराज बलि के संवाद के अनुसार, जब भगवान ने बलि से तीन पग भूमि नाप ली थी, तब बलि ने यह वरदान मांगा था कि जो व्यक्ति कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन यमराज और नरक के निमित्त दीपों का दान करेगा, उसके पितर कभी नरक की यातना नहीं सहेंगे और यदि वे नरक में होंगे तो उन्हें मुक्ति मिल जाएगी । दीपदान मुख्य रूप से घर के दक्षिणी भाग में किया जाता है, जो यम की दिशा है ।
चौमुखा दीप (उल्का) निर्माण एवं अर्पण विधि
उल्का दर्शन के लिए एक विशेष प्रकार का दीपक तैयार किया जाता है। गेहूँ अथवा उड़द के आटे में थोड़ी सी हल्दी मिलाकर एक चौमुखा दीपक (जिसमें चार बत्तियाँ रखने का स्थान हो) तैयार करना चाहिए । धर्मशास्त्रों में आटे के दीपक को अत्यंत पवित्र और आसपास व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा (Negative Energy) का तीव्र गति से शमन करने वाला माना गया है । इस दीपक में शुद्ध तिल का तेल अथवा सरसों का तेल डालकर चारों दिशाओं की ओर मुख करके रूई की चार लंबी बत्तियाँ प्रज्वलित करनी चाहिए。
प्रभात काल के अंधकार में अथवा प्रदोष वेला में इस प्रज्वलित दीपक को दोनों हाथों में लेकर अपने सिर से ऊपर, आकाश की ओर (ऊँचा उठाकर) प्रदर्शित किया जाता है। इसी प्रक्रिया को 'उल्का दर्शन' या 'उल्का प्रदर्शन' कहा जाता है ।
इसका पारलौकिक उद्देश्य उन पितरों को मार्ग दिखाना है जो पितृपक्ष (महालया) के पश्चात् भी अपने लोकों को नहीं लौट पाए हैं और पृथ्वी लोक के आस-पास भटक रहे हैं। यह उल्का (मशाल या ऊँचा दीप) उनके लिए एक प्रकाश-स्तंभ (Light-house) का कार्य करता है, जिसे देखकर वे अपने अभीष्ट लोकों (वैकुंठ अथवा पितृलोक) की ओर प्रस्थान कर सकें ।
उल्का दर्शन एवं यम दीपदान के मन्त्र: दीपक को आकाश की ओर उठाते समय साधक को अत्यंत भक्तिभाव से निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए:
"अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु परां गतिम्॥"
"यमलोकं परित्यज्य आगता ये महालये। उज्ज्वलज्योतिषा वर्त्म प्रपश्यन्तो व्रजन्तु ते॥"
मन्त्रों का अर्थ: मेरे कुल में जो जीव अग्नि द्वारा दग्ध किए गए हैं (अर्थात् जिनका विधिवत दाह संस्कार हुआ है) और जो अग्निदग्ध नहीं हो सके (जिनकी अकाल मृत्यु हुई या जिनका विधिवत संस्कार नहीं हो पाया), वे इस भूमि पर दिए गए प्रकाश एवं तर्पण से तृप्त हों और परम गति को प्राप्त करें। जो पितर महालय (श्राद्ध पक्ष) में यमलोक से यहाँ आए हैं, वे इस उज्ज्वल ज्योति से अपना मार्ग स्पष्ट रूप से देखकर बिना किसी बाधा के अपने लोक को वापस लौट जाएँ ।
दीपदान के समय प्रयुक्त होने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण श्लोक:
"दत्तो दीपश्चतुर्दश्यां नरकप्रीतये मया। चतुर्वर्तिसमायुक्तः सर्वपापापनुत्तये॥"
(भावार्थ: मैंने नरक के अधिपति की प्रसन्नता, नरक के भय से शाश्वत मुक्ति और अपने द्वारा संचित सर्वपापों के नाश के लिए यह चार बत्तियों से युक्त प्रकाशवान दीपक चतुर्दशी के पावन दिन अर्पित किया है।)
उल्का प्रदर्शन की इस रहस्यमयी प्रक्रिया के पश्चात इस प्रज्वलित दीपक को घर की देहली (मुख्य द्वार की चौखट) के बाहर, जहाँ कूड़ा या अपशिष्ट रखा जाता है वहाँ, अथवा किसी मंदिर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रख देना चाहिए ।
नैवेद्य, पूजा एवं दान-विधान
नरक चतुर्दशी के इस पवित्र दिन शारीरिक और आध्यात्मिक शुद्धि के पश्चात इष्टदेवों की आराधना, विशिष्ट नैवेद्य अर्पण और दान का भी अत्यंत विस्तृत विधान धर्मशास्त्रों में वर्णित है。
श्री हनुमान जन्मोत्सव एवं विशेष नैवेद्य
अभ्यंग स्नान, तर्पण और दीपदान के पश्चात घर के पूजा गृह में भगवान श्रीकृष्ण, माता महालक्ष्मी, यमराज तथा संकटमोचन श्री हनुमान जी की विधिवत षोडशोपचार पूजा की जानी चाहिए । अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वाल्मीकि रामायण एवं अन्य पुराणों की मान्यता के अनुसार, कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की महानिशा (मध्यरात्रि) में स्वाति नक्षत्र एवं मेष लग्न में माता अंजना के गर्भ से श्री हनुमान जी का भी प्राकट्य (जन्मोत्सव) हुआ था ।
अतः इस दिन श्री हनुमान जी को विशेष रूप से लाल वस्त्र, चमेली का तेल मिश्रित सिंदूर, अक्षत, पुष्प माला, और नैवेद्य के रूप में बूंदी या बेसन के लड्डुओं का भोग अवश्य लगाना चाहिए । हनुमान चालीसा अथवा सुन्दरकाण्ड का पाठ करने से जीवन से कर्ज, रोग और समस्त संकटों का नाश होता है ।
परम्परागत रूप से पूर्वी भारत के कई अंचलों में इस दिन भोजन में ओल (सूरन या जिमीकंद) की सब्जी, चोखा और चटनी बनाने का भी एक विशेष विधान है । आयुर्वेद के अनुसार सूरन वात और कफ का नाशक है और इसे स्वास्थ्य तथा आयु-वर्धक माना गया है। यह लौकिक परंपरा भी चतुर्दशी के आरोग्य-वर्धक स्वरूप को पुष्ट करती है。
तपस्वियों एवं दरिद्रों को दान-विधान
सनातन धर्म में किसी भी पर्व की पूर्णता दान के बिना संभव नहीं है। 'लिङ्ग पुराण' एवं अन्य व्रत-ग्रंथों के अनुसार, प्रेत चतुर्दशी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) के दिन तपस्वियों, शैव संन्यासियों, सुपात्र ब्राह्मणों और दरिद्रों को सम्मानपूर्वक भोजन कराने तथा शीत ऋतु के आगमन को देखते हुए वस्त्र दान करने से असीम और अक्षय पुण्यों की प्राप्ति होती है । दान करने वाले साधक को मृत्यु के पश्चात यमलोक की भयंकर यातनाएँ नहीं सहनी पड़तीं और वह सीधे शिवलोक या वैकुंठ में उच्च स्थान प्राप्त करता है । शास्त्रों का यह भी स्पष्ट नियम है कि इस दिन घर के द्वार पर आए किसी भी भिक्षुक, असहाय या याचक व्यक्ति को खाली हाथ नहीं लौटाना चाहिए, उसे अन्न, धन या वस्त्र का दान अवश्य करना चाहिए ।
व्रत के नियम एवं शास्त्रीय निषेध (वर्जनाएँ)
'निर्णयसिन्धु', 'धर्मसिन्धु' तथा 'कालनिर्णय' जैसे ग्रंथों के रचयिताओं ने नरक चतुर्दशी के अनुष्ठान की सफलता और पवित्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए कुछ अत्यंत कठोर नियम एवं वर्जनाएँ (निषेध) निर्धारित की हैं। इनका पालन न करने पर अनुष्ठान का फल प्राप्त नहीं होता。
अनिवार्य नियम (कर्तव्य)
- ब्रह्ममुहूर्त जागरण की अनिवार्यता: जैसा कि पूर्व में विस्तार से वर्णित है, सूर्योदय से पूर्व जागरण और तैलाभ्यंग स्नान सर्वथा अनिवार्य है। यदि घर में कोई वृद्ध या अत्यंत बीमार व्यक्ति भी है, तो उनके लिए भी यह अपवाद नहीं है; वे पूर्ण स्नान न कर सकें तो कम से कम थोड़े से उष्ण जल से सूर्योदय से पूर्व प्रतीकात्मक स्नान अवश्य करें ।
- तीव्र स्वच्छता अभियान: इस दिन घर के कोने-कोने की गहन सफाई करनी चाहिए। घर के सभी कमरों एवं मंदिर में पवित्र गंगाजल का छिड़काव कर संपूर्ण परिसर को शुद्ध और सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण करना चाहिए ।
- मंत्र साधना एवं सिद्धि: नरक चतुर्दशी (काली चौदस) की रात्रि को तंत्र-मंत्र की साधना और मंत्र सिद्धि के लिए अत्यंत उपयुक्त माना गया है। जो साधक इस रात्रि में अपने गुरु-मंत्र, इष्ट-मंत्र, सरस्वती मंत्र अथवा किसी भी सात्विक मंत्र का पूर्ण एकाग्रता से जाप करते हैं, उनके मंत्र शीघ्र सिद्ध होते हैं ।
शास्त्रोक्त निषेध (वर्जनाएँ)
- सूर्योदय के पश्चात शयन का घोर निषेध: जो व्यक्ति प्रमादवश इस दिन सूर्योदय के बाद तक सोता रहता है, उस पर तामसिक ऊर्जा हावी हो जाती है और उसके वर्ष भर के संचित पुण्य और शुभ कार्यों का प्रभाव क्षीण हो जाता है ।
- क्षुरकर्म (केश एवं नख कर्तन) वर्जित: 'लिंग पुराण' और 'निर्णयसिन्धु' के स्पष्ट उल्लेख के अनुसार, चतुर्दशी तिथि के दिन क्षुरकर्म अर्थात् बाल काटना, दाढ़ी बनाना या नाखून काटना पूर्णतः वर्जित है। इसे अशुद्ध कर्म माना गया है ।
- तामसिक आहार एवं व्यसन का त्याग: इस पवित्र दिन किसी भी प्रकार के तामसिक आहार, मांस, मदिरा, अथवा नशीले पदार्थों का सेवन सर्वथा निषिद्ध है ।
- कलह एवं वाद-विवाद से बचाव: घर में अथवा घर के बाहर किसी से भी विवाद, कलह, क्रोध या अपशब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। जिस घर में कलह होती है, वहाँ से महालक्ष्मी दीपावली से पूर्व ही रुष्ट होकर चली जाती हैं ।
- खंडित वस्तुओं का निष्कासन: घर में किसी भी प्रकार की खंडित (टूटी-फूटी) वस्तु, अनुपयोगी कबाड़ या मलिन सामग्री नहीं रखनी चाहिए। चतुर्दशी के दिन इन्हें घर से बाहर निकाल देना चाहिए, क्योंकि ये दरिद्रता और नकारात्मकता के प्रतीक हैं ।
फल-श्रुति एवं दार्शनिक उपसंहार
नरक चतुर्दशी का यह संपूर्ण अनुष्ठान—ब्रह्ममुहूर्त का तैलाभ्यंग स्नान, पितरों के निमित्त यम तर्पण, आकाश को प्रकाशित करता दीपदान एवं निष्काम भाव से किया गया दान—मात्र एक कर्मकांडियों का विधान नहीं है, अपितु यह मानव जीवन के अत्यंत गहन मनोविज्ञान और ब्रह्मांडीय दर्शन को प्रतिबिंबित करता है。
इस व्रत एवं अनुष्ठान के श्रवण, मनन और निष्पादन से प्राप्त होने वाले फलों (फल-श्रुति) का शास्त्रों में इस प्रकार वर्णन किया गया है:
- अपमृत्यु (अकाल मृत्यु) का समूल नाश: यमराज को दीपदान एवं 14 नामों से तर्पण करने वाले साधक के जीवन से ग्रहों की वक्र दृष्टि और अकाल मृत्यु का योग टल जाता है। उसकी आयु में वृद्धि होती है और वह पूर्ण जीवन भोगता है ।
- नरक-भय से शाश्वत मुक्ति: जो साधक शास्त्रीय विधि से तैलाभ्यंग स्नान और उल्का दर्शन करता है, वह स्वयं और उसके सभी पूर्वज नरक की घोर यातनाओं से मुक्त होकर वैकुंठ के परमानंद को प्राप्त करते हैं ।
- पापों का प्रक्षालन एवं आत्म-शुद्धि: अपामार्ग वनस्पति द्वारा मन्त्र-सहित परिक्रमा और संकल्पित स्नान से साधक द्वारा जाने-अनजाने में हुए समस्त कायिक (शारीरिक), वाचिक (वाणी के) और मानसिक पाप जलकर भस्म हो जाते हैं ।
- रूप, लावण्य एवं ओज की प्राप्ति: शारीरिक और मानसिक मलिनता के नाश से देह और मन दोनों शुद्ध होते हैं। तिल के तेल और औषधीय उबटन से व्यक्ति को नैसर्गिक सौंदर्य, आरोग्य एवं ओज की प्राप्ति होती है। इसी विलक्षण कांति-प्रदायक गुण के कारण इसे 'रूप चतुर्दशी' की संज्ञा दी गई है ।
अतः निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि नरक चतुर्दशी का यह पावन पर्व सनातन धर्मियों को यह शाश्वत शिक्षा देता है कि अमावस्या के परम प्रकाश (दीपावली और महालक्ष्मी) के स्वागत से पूर्व, प्रत्येक साधक को अपने भीतर बैठे अज्ञान, प्रमाद, आलस्य, अहंकार एवं मलिनता रूपी 'नरकासुर' का वध करना अत्यंत आवश्यक है。
प्रभातकालीन तैलाभ्यंग स्नान जहाँ देह और मन की मलिनता का नाश कर सात्विकता को स्थापित करता है, वहीं यम तर्पण और उल्का दीपदान मृत्यु के सत्य को स्वीकार करते हुए पितरों के प्रति हमारी कृतज्ञता को प्रकट करते हैं। जो भी साधक पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता एवं धर्मशास्त्रों द्वारा प्रतिपादित इन सूक्ष्म नियमों के अधीन रहकर इस दिन उपर्युक्त विधियों का पालन करता है, वह इस लोक में असीम ऐश्वर्य, निर्दोष स्वास्थ्य एवं दीर्घ आयु का उपभोग करते हुए अंतकाल में भगवान वासुदेव के परम धाम को प्राप्त होता है।






