विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत को कष्ट देना — अर्थात् मृत व्यक्ति के उचित संस्कार न करना, श्राद्ध न करना, पिंडदान न करना — इन सबका दंड बताया गया है।
पितृदोष और नरक — 'जो परिजन श्राद्ध और पिंडदान नहीं करते, उनके पितर भटकते रहते हैं।' इस पाप से परिजनों को पितृदोष और नरक दोनों मिलते हैं।
यमदूत का उलाहना — 'पितरों का तर्पण नहीं किया।' — यह उलाहना उन्हें मिलता है जिन्होंने मृत परिजन का उचित संस्कार नहीं किया।
प्रेत की पीड़ा का कारण — गरुड़ पुराण में — 'जिनका पिंडदान नहीं होता, वे कल्पान्त तक निर्जन वन में दुःखी भटकते हैं।' उन्हें यह कष्ट देने वाले परिजन दोषी हैं।
इस जन्म में दंड — 'जब तक पितरों की आत्मा संतुष्ट नहीं होती, वंशजों को अनेक कष्ट होते हैं।' संतानहीनता, रोग, व्यापार-हानि — ये इसी जन्म के दंड हैं।
मृत्यु के बाद — प्रेत को कष्ट देने वाले स्वयं भी मृत्यु के बाद असहाय प्रेत बनकर भटकते हैं।





