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पवित्र कर्मों को त्यागने वाले को कौन-सा नरक मिलता है?

पवित्र कर्म त्यागने पर — शाल्मी-वृक्ष (व्रत-तीर्थ त्याग), कुड्म, प्रेत योनि (ईश्वर-विमुखता), घोर नरक (देव-पूजा न करना)। यमदूत का उलाहना — 'तीर्थ-पूजा क्यों नहीं की?

संक्षिप्त उत्तर

पवित्र कर्म त्यागने पर — शाल्मी-वृक्ष (व्रत-तीर्थ त्याग), कुड्म, प्रेत योनि (ईश्वर-विमुखता), घोर नरक (देव-पूजा न करना)। यमदूत का उलाहना — 'तीर्थ-पूजा क्यों नहीं की?'

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण में पवित्र कर्मों — व्रत, तीर्थ, देव-पूजा, श्राद्ध — का त्याग करना नरक का कारण बताया गया है।

शाल्मी-वृक्ष — गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में — 'व्रत तथा तीर्थ का परित्याग करने वाले — ये वैतरणी तटस्थित शाल्मी-वृक्ष में जाते हैं।'

कुड्म और संबद्ध नरक — 'जो ईश्वर के निमित्त दान नहीं करते — कुड्मल जैसे नरक भोगने पड़ते हैं।'

यमदूत का उलाहना — तृतीय अध्याय में — 'कभी कोई तीर्थ-यात्रा नहीं की, देवताओं की पूजा भी नहीं की, गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी हन्तकार नहीं निकाला।' — यह उलाहना पवित्र कर्मों के त्याग का दंड है।

प्रेत योनि — 'ईश्वर में विश्वास नहीं करने वाला प्रेत योनि में जाता है।' पवित्र कर्मों का त्याग ईश्वर-विमुखता का ही रूप है।

घोर नरक — 'जो मन्द पुरुष भगवान शिव, नारायण, सूर्य, गणेश की पूजा नहीं करते, वे नरक में जाते हैं।'

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

पवित्र कर्मों को त्यागने वाले को कौन-सा नरक मिलता है को संदर्भ सहित समझें

पवित्र कर्मों को त्यागने वाले को कौन-सा नरक मिलता है का सबसे सीधा सार यह है: पवित्र कर्म त्यागने पर — शाल्मी-वृक्ष (व्रत-तीर्थ त्याग), कुड्म, प्रेत योनि (ईश्वर-विमुखता), घोर नरक (देव-पूजा न करना)। यमदूत का उलाहना — 'तीर्थ-पूजा क्यों नहीं की?'

जीवन एवं मृत्यु जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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