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शरीर — प्रश्नोत्तरी

शास्त्रों और पुराणों पर आधारित प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर — कुल 16 प्रश्न

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ध्यान अनुभव

ध्यान करते समय शरीर में विद्युत प्रवाह जैसा अनुभव क्यों होता है?

प्राण ऊर्जा (72,000 नाड़ी), कुंडलिनी (अमर उजाला: 'बिजली कौंधना'), नाड़ी शुद्धि (block), चक्र सक्रिय। रीढ़=कुंडलिनी, हथेली=प्राण। सामान्य+शुभ! दर्दनाक=गुरु।

विद्युतप्रवाहशरीर
मंत्र जप अनुभव

मंत्र जप करते समय शरीर में कंपन हो तो डरना चाहिए या नहीं?

डरें नहीं। कारण: मंत्र resonance, कुंडलिनी गति, चक्र जागरण, प्राण प्रवाह। शांत रहें → जप जारी। अत्यधिक = रोकें + गहरी सांस। नियमित = कम होता है। तीव्र = गुरु।

कंपनशरीरजप
मंत्र जप विधि

मंत्र जप में मातृका न्यास कैसे करें?

50 संस्कृत अक्षर (अ→क्ष) शरीर पर। 16 स्वर = मस्तक→मुख, 34 व्यंजन = कंठ→पैर। बोलें + स्पर्श। तांत्रिक = अनिवार्य। सामान्य = करन्यास/अंगन्यास पर्याप्त। गुरु उत्तम।

मातृकान्यासवर्णमाला
मंत्र जप विधि

मंत्र जप से पहले न्यास विधि कैसे करें?

शरीर अंगों पर मंत्राक्षर स्थापना। करन्यास (5 अंगुली+करतल), अंगन्यास (6 अंग), मातृका (वर्णमाला)। शरीर = मंत्रमय। सरल: 'ॐ' 3 बार + ध्यान = पर्याप्त।

न्यासविधिजप
ध्यान अनुभव

ध्यान करते समय अपने शरीर से बाहर निकलने का अनुभव क्या है?

'ऊपर से शरीर देखना' = शरीर transcend, सूक्ष्म शरीर, पतंजलि 3.38। कुंडलिनी→सहस्रार। Webdunia: 'अनुभव — मन खेल भी।' भय नहीं — 'वापस आओगे।' गुरु।

शरीरबाहरनिकलना
ध्यान अनुभव

ध्यान करते समय शरीर में कंपन होने का क्या कारण है?

ऊर्जा block तोड़ रही (नाड़ी शुद्धि), कुंडलिनी (अमर उजाला: 'बिजली कौंधना'), दबी भावनाएं release। सामान्य — घबराएं नहीं। गहरी श्वास, ढीला, बहने दें। अत्यधिक = गुरु।

ध्यानकंपनशरीर
मंत्र जप अनुभव

मंत्र जप करते समय शरीर में गर्मी महसूस होने का कारण क्या है?

कुंडलिनी जागरण, बीज मंत्र अग्नि तत्व, 'तप'=आंतरिक अग्नि। शारीरिक: metabolism, रक्त प्रवाह। शुभ संकेत। अत्यधिक: ठंडा जल, चंदन, 'ॐ शांति'।

गर्मीशरीरजप
शकुन शास्त्र

छिपकली शरीर पर गिर जाए तो शुभ-अशुभ?

दाहिना अंग = अधिकांशतः शुभ, बायाँ = अशुभ। दाहिनी भुजा = धनलाभ। बालों पर = अशुभ। सिर = धनलाभ (स्त्री)। छिपकली = लक्ष्मी प्रतीक। अशुभ हो तो स्नान + गंगाजल + 'ॐ नमः शिवाय'। शकुन शास्त्र मान्यता।

छिपकलीशकुनशरीर
आत्मा और मोक्ष

मरने के बाद आत्मा शरीर से कैसे निकलती है

बृहदारण्यक उपनिषद (4.4.1-2) अनुसार — इंद्रियां शिथिल होती हैं, पांचों प्राण हृदय में एकत्रित होते हैं, उदान वायु आत्मा को सूक्ष्म शरीर सहित शरीर के एक द्वार से बाहर ले जाती है। कर्म और संस्कार भी साथ जाते हैं।

आत्माशरीरमृत्यु
तंत्र साधना

तंत्र में शरीर को देवालय कैसे बनाएं

शरीर = देवालय (कुलार्णव तंत्र: 'देहो देवालयः')। विधि: (1) न्यास — शरीर पर मंत्र आरोपण (कर/अंग/मातृका)। (2) भूतशुद्धि — पंचतत्व शुद्धि (लं/वं/रं/यं/हं)। (3) चक्र जागृति — 7 चक्र = 7 कक्ष, कुण्डलिनी ऊर्ध्वगमन। (4) प्राणायाम + बन्ध। (5) सात्विक आहार-विहार। गुरु दीक्षा अनिवार्य।

तंत्रशरीरदेवालय
कुंडलिनी

कुंडलिनी जागरण होने पर शरीर में क्या बदलाव आते हैं?

तत्काल: रीढ़ विद्युत, ज्योति per चक्र (BhaktiSatsang), कंपन, ताप। दीर्घ: रोग↓, इंद्रियां↑, नींद↓, सात्विक स्वतः। बिना गुरु = कष्ट। अमर उजाला: 'बिजली कौंधना।'

कुंडलिनीशरीरबदलाव
तंत्र ज्ञान

तंत्र में मुद्रा कितने प्रकार की होती हैं?

3 प्रकार: हस्त (ज्ञान/चिन्/योनि), शरीर (हठ — महामुद्रा/खेचरी/बंध = 10), तांत्रिक (पूजा — 24/64)। पंचमकार 'मुद्रा' = अन्न/योगिक। हठ योग प्रदीपिका: 10 = कुंडलिनी।

मुद्राप्रकारतंत्र
तंत्र साधना

तंत्र शास्त्र में भूत शुद्धि का क्या विधान है?

पंचभूत शुद्धि: लं/वं/रं/यं/हं — 5 चक्रों पर बीज जप। अग्नि(रं)→शरीर भस्म→पुनर्निर्माण (कल्पना)। 'सोऽहम्' = आत्मा भावना। तांत्रिक जप/यंत्र पहले = अनिवार्य। सरल: 5×'ॐ'।

भूत शुद्धिविधानपंचभूत
मंत्र जप विधि

मंत्र जप में करन्यास और अंगन्यास कैसे करें?

करन्यास: 6 अंगुली/करतल (अंगूठा→कनिष्ठिका+करतल) + 'नमः/स्वाहा/वषट्/हुं/वौषट्/फट्'। अंगन्यास: 6 शरीर (हृदय/मस्तक/शिखा/कवच/नेत्र/अस्त्र)। प्रत्येक पर बीज + स्पर्श।

करन्यासअंगन्यासविधि
कुंडलिनी

कुंडलिनी जागरण में शरीर गर्म क्यों हो जाता है?

अग्नि सर्पिणी (मूलाधार=अग्नि), 'बिजली कौंधना' (अमर उजाला), नाड़ी friction (शुद्धि), मणिपुर=अग्नि चक्र, metabolism↑। सामान्य। शीतली प्राणायाम, चंदन, grounding।

कुंडलिनीशरीरगर्म
ध्यान अनुभव

गहरे ध्यान में शरीर सुन्न हो जाने का क्या कारण है?

प्रत्याहार (इंद्रियां अंतर्मुखी), शरीर transcend, प्राण shift। या शारीरिक (बैठना→रक्त↓)। सुखद सुन्न=आध्यात्मिक(शुभ)। असहज=शारीरिक(बदलें)। बाद=धीरे awareness।

सुन्नशरीरध्यान

सनातन धर्म प्रश्नोत्तरी — शास्त्रीय ज्ञान

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