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नरक में जीव के शरीर का स्वरूप कैसे बदलता है?

नरक में जीव 'यातना-देह' में रहता है जो पिंडदान से बनती है। यातना से क्षत-विक्षत होती है, रक्त वमन होता है।

संक्षिप्त उत्तर

नरक में जीव 'यातना-देह' में रहता है जो पिंडदान से बनती है। यातना से क्षत-विक्षत होती है, रक्त वमन होता है। नष्ट होने पर यमराज की शक्ति से पुनः निर्मित होती है — यह पाप-शुद्धि की प्रक्रिया है।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण में नरक में जीव के शरीर के बदलने का वर्णन एक अद्भुत और रहस्यमय प्रक्रिया के रूप में है।

यातना-देह का निर्माण — मृत्यु के बाद स्थूल शरीर जल जाता है। नरक में जीव एक विशेष 'यातना-देह' में रहता है जो पिंडदान से बनती है। यह देह सामान्य शरीर जैसी है — इसमें यातना भोगने की पूर्ण क्षमता है।

नरक की यातना से परिवर्तन — इस देह पर निरंतर प्रहार होते हैं — कटना, जलना, काटा जाना। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'रक्त वमन करते हैं।' अर्थात् शरीर क्षत-विक्षत हो जाता है।

पुनर्निर्माण — जब यातना-देह नष्ट हो जाती है, तो यमराज की शक्ति से पुनः निर्मित होती है। यह देह फिर उसी स्थिति में बन जाती है जिससे यातना पुनः दी जा सके।

पाप-शुद्धि — गरुड़ पुराण में नरक को केवल दंड नहीं, आत्मा की शुद्धि का एक चरण भी कहा गया है। शरीर का बार-बार नष्ट होना और पुनर्निर्माण होना उस शुद्धि की प्रक्रिया है।

अंत में — जब पापों का दंड पूरा हो जाता है, तो यह यातना-देह विसर्जित होती है और जीव नई योनि में जन्म लेता है।

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