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प्रेत को शरीर क्यों नहीं मिलता?

गरुड़ पुराण में इस प्रश्न का उत्तर कर्म के नियम और मृत्यु-प्रक्रिया दोनों के संदर्भ में मिलता है।

संक्षिप्त उत्तर

प्रेत को शरीर इसलिए नहीं मिलता क्योंकि — स्थूल शरीर जल चुका है, पापकर्मों के कारण तत्काल पुनर्जन्म नहीं, अकाल मृत्यु में शेष आयु प्रेत-रूप में बिताना पड़ता है और यमराज के निर्णय की प्रतीक्षा होती है।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण में इस प्रश्न का उत्तर कर्म के नियम और मृत्यु-प्रक्रिया दोनों के संदर्भ में मिलता है।

स्थूल शरीर का जलना — मृत्यु के बाद स्थूल शरीर दाह-संस्कार में जल जाता है। नई योनि में जन्म लेने से पहले जीव को उचित कर्म-निर्धारण और यमराज के निर्णय की प्रतीक्षा करनी होती है। इस बीच उसके पास कोई स्थूल शरीर नहीं होता।

पापकर्मों का बोझ — जो जीव पापकर्मों के बोझ से दबा है, उसे सीधे पुनर्जन्म नहीं मिलता। यमराज पाप-पुण्य का हिसाब करके निर्णय देते हैं — तब तक जीव प्रेत-अवस्था में है।

अकाल मृत्यु — जब शेष आयु बाकी हो तो नई योनि नहीं मिलती। वह शेष समय प्रेत रूप में व्यतीत होता है।

पिंडदान का अभाव — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते' — जले हुए शरीर के बाद पिंडदान से यातना-देह निर्मित होती है। बिना पिंडदान के यह देह भी नहीं बनती और जीव असहाय अवस्था में भटकता रहता है।

यमराज के निर्णय की प्रतीक्षा — अगले शरीर का निर्धारण यमराज करते हैं — उनका निर्णय होने तक जीव प्रेत-अवस्था में है।

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