विस्तृत उत्तर
सनातन दर्शन के अनुसार शरीर स्वयं में निर्जीव है — उसमें जो चेतना और गति है, वह जीवात्मा और पाँच प्राणों के कारण है। जब मृत्यु का समय आता है, तो जीवात्मा शरीर से अपना संबंध तोड़ने की प्रक्रिया शुरू करती है। इस प्रक्रिया में प्राण-ऊर्जा विभिन्न अंगों को छोड़ती जाती है।
गरुड़ पुराण में इसका वर्णन इस प्रकार है — पहले वाणी जाती है, फिर हाथ-पैर निष्क्रिय होते हैं, फिर सुनना-देखना बंद होता है और अंत में श्वास थम जाती है। यह सब इसलिए होता है क्योंकि शरीर की चेतना का आधार जीवात्मा है — और वह विदा हो रही है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण इसे अत्यंत स्पष्ट रूप से कहते हैं — जैसे वायु के बिना दीपक बुझ जाता है, वैसे ही जीवात्मा के बिना शरीर जड़ हो जाता है। यह शरीर आत्मा का वस्त्र मात्र है। जब आत्मा इसे त्यागती है, तो शरीर अपने मूल पाँच तत्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — में विलीन होने के लिए तैयार हो जाता है।
इसीलिए मृत शरीर का दाह संस्कार किया जाता है — ताकि पाँच तत्व अपने-अपने स्थान पर शीघ्र लौट सकें और जीवात्मा को मुक्ति मिल सके।





