लघु मृत्युंजय मंत्र (रोग एवं मृत्यु भय निवारण हेतु)
मंत्र
मंत्र: ॐ जूं स माम् पालय पालय स: जूं ॐ।
(यदि किसी अन्य के लिए जप करना हो तो 'माम्' के स्थान पर उस व्यक्ति का नाम लें: ॐ जूं स <व्यक्ति का नाम> पालय पालय स: जूं ॐ।)
देवता
भगवान शिव (मृत्युंजय रूप)।
स्रोत
इस मंत्र का उल्लेख शिव पुराण या स्कन्द पुराण में संभावित है। नित्यकर्म पूजा प्रकाश या मंत्र रत्नाकर जैसे ग्रंथों में भी इसका विधान मिल सकता है। महामृत्युंजय मंत्र का उल्लेख ऋग्वेद से लेकर यजुर्वेद तक मिलता है।
प्रयोजन
दीर्घायु प्राप्ति, असाध्य रोगों से मुक्ति, मृत्यु भय निवारण, शोक, अनिश्चितता और विभिन्न दोषों का निवारण, तथा पापों का नाश। यह ग्रहों की बाधा, पारिवारिक कलह, और आर्थिक हानि जैसी समस्याओं में भी लाभकारी है।
विधि
लघु मृत्युंजय मंत्र का पुरश्चरण सामान्यतः सवा लाख जप का होता है, यद्यपि कुछ स्थानों पर 11 लाख जप का भी विधान मिलता है। जप के लिए रुद्राक्ष की माला का प्रयोग उत्तम माना गया है। साधना का प्रारंभ सोमवार को करना शुभ है। जप प्रातःकाल, विशेषकर सूर्योदय से लेकर दोपहर 12 बजे के पूर्व तक करना चाहिए। साधक घर पर शिवलिंग या महामृत्युंजय यंत्र का पूजन कर, शुद्ध घी का दीपक जलाकर प्रतिदिन कम से कम 11 माला का जप 10 दिनों तक कर सकते हैं, अथवा सवा लाख जप पूर्ण होने तक। अनुष्ठान के अंत में दशांश हवन करना आवश्यक है।
महत्व
प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंत्र (त्र्यम्बकं यजामहे...) की तुलना में लघु मृत्युंजय मंत्र जप संख्या और सुगमता की दृष्टि से भिन्न है। यह विशेष रूप से उन साधकों के लिए उपयोगी है जो लंबे अनुष्ठान करने में असमर्थ हों, तथापि यह अत्यंत प्रभावशाली और त्वरित फलदायक माना जाता है। इसकी संरचना बीज मंत्रों (ॐ जूं सः) पर आधारित है, जो इसे गूढ़ शक्ति प्रदान करते हैं। यह अपेक्षाकृत अल्पज्ञात है क्योंकि अधिकांश साधक महामृत्युंजय मंत्र के पूर्ण रूप से ही परिचित होते हैं।






