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लघु मृत्युंजय मंत्र: रोग और मृत्यु भय से मुक्ति का उपाय !
मृत्युंजय

लघु मृत्युंजय मंत्र: रोग और मृत्यु भय से मुक्ति का उपाय

📿 पौराणिक•2 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 19 मई 2025
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जानिए भगवान शिव के इस अल्पज्ञात लेकिन अत्यंत प्रभावशाली मंत्र की साधना विधि, फल और पुरश्चरण विधान — जो बनाता है साधक को निडर और स्वस्थ

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लघु मृत्युंजय मंत्र

लघु मृत्युंजय मंत्र (रोग एवं मृत्यु भय निवारण हेतु)

मंत्र

मंत्र: ॐ जूं स माम् पालय पालय स: जूं ॐ।

(यदि किसी अन्य के लिए जप करना हो तो 'माम्' के स्थान पर उस व्यक्ति का नाम लें: ॐ जूं स <व्यक्ति का नाम> पालय पालय स: जूं ॐ।)

देवता

भगवान शिव (मृत्युंजय रूप)।

स्रोत

इस मंत्र का उल्लेख शिव पुराण या स्कन्द पुराण में संभावित है। नित्यकर्म पूजा प्रकाश या मंत्र रत्नाकर जैसे ग्रंथों में भी इसका विधान मिल सकता है। महामृत्युंजय मंत्र का उल्लेख ऋग्वेद से लेकर यजुर्वेद तक मिलता है।

प्रयोजन

दीर्घायु प्राप्ति, असाध्य रोगों से मुक्ति, मृत्यु भय निवारण, शोक, अनिश्चितता और विभिन्न दोषों का निवारण, तथा पापों का नाश। यह ग्रहों की बाधा, पारिवारिक कलह, और आर्थिक हानि जैसी समस्याओं में भी लाभकारी है।

विधि

लघु मृत्युंजय मंत्र का पुरश्चरण सामान्यतः सवा लाख जप का होता है, यद्यपि कुछ स्थानों पर 11 लाख जप का भी विधान मिलता है। जप के लिए रुद्राक्ष की माला का प्रयोग उत्तम माना गया है। साधना का प्रारंभ सोमवार को करना शुभ है। जप प्रातःकाल, विशेषकर सूर्योदय से लेकर दोपहर 12 बजे के पूर्व तक करना चाहिए। साधक घर पर शिवलिंग या महामृत्युंजय यंत्र का पूजन कर, शुद्ध घी का दीपक जलाकर प्रतिदिन कम से कम 11 माला का जप 10 दिनों तक कर सकते हैं, अथवा सवा लाख जप पूर्ण होने तक। अनुष्ठान के अंत में दशांश हवन करना आवश्यक है।

महत्व

प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंत्र (त्र्यम्बकं यजामहे...) की तुलना में लघु मृत्युंजय मंत्र जप संख्या और सुगमता की दृष्टि से भिन्न है। यह विशेष रूप से उन साधकों के लिए उपयोगी है जो लंबे अनुष्ठान करने में असमर्थ हों, तथापि यह अत्यंत प्रभावशाली और त्वरित फलदायक माना जाता है। इसकी संरचना बीज मंत्रों (ॐ जूं सः) पर आधारित है, जो इसे गूढ़ शक्ति प्रदान करते हैं। यह अपेक्षाकृत अल्पज्ञात है क्योंकि अधिकांश साधक महामृत्युंजय मंत्र के पूर्ण रूप से ही परिचित होते हैं।

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

पूजा एवं उपासना

मृत्युंजय पूजा का विधान कहाँ है?

मृत्युंजय पूजा का विधान गरुड़ पुराण के आचारखण्ड में वर्णित है। इसका सम्बन्ध महामृत्युंजय मंत्र से है, जिसका मूल ऋग्वेद और यजुर्वेद में है। यह पूजा अकाल मृत्यु-निवारण और दीर्घायु के लिए की जाती है।

शिव मंत्र

मृत्युंजय मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र में क्या अंतर है?

मृत्युंजय = ऋग्वेद 7.59.12 मूल श्लोक ('ॐ त्र्यम्बकं यजामहे...')। महामृत्युंजय = मूल + बीज (हौं जूं सः) + व्याहृति = तांत्रिक विस्तार, अधिक शक्तिशाली। मूल = सभी, बिना दीक्षा। बीज सहित = गुरु श्रेष्ठ। 33 अक्षर = 33 देवता। मार्कंडेय ने मृत्यु जीती।

मंत्र ज्ञान

शिव जी का महामृत्युंजय मंत्र क्या है?

महामृत्युंजय मंत्र है — 'ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥' यह ऋग्वेद (7.59.12) का मंत्र है। अर्थ — तीन नेत्रों वाले शिव हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें।

शिव पूजा

शिव की पूजा से अकाल मृत्यु का भय कैसे दूर होता है?

शिव = मृत्युंजय (मृत्यु पर विजयी)। मार्कण्डेय कथा: शिव ने यमराज से बचाया। महामृत्युंजय मंत्र = मृत संजीवनी (शिव पुराण)। उपाय: नित्य 108 जप, रुद्राभिषेक, सोमवार/प्रदोष व्रत, रुद्राक्ष धारण। दार्शनिक: आत्मज्ञान से मृत्यु भय स्वतः नष्ट — शिव काल से परे, शरणागत भी काल-मुक्त।

लोक

सत्यलोक को मृत्युंजय लोक क्यों कहते हैं?

सत्यलोक में नैमित्तिक प्रलय तक कोई मृत्यु नहीं होती और निवासी 15,480 अरब वर्ष जीवित रहते हैं। इसीलिए इसे मृत्युंजय लोक कहते हैं।

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