विस्तृत उत्तर
मृत्युंजय पूजा का विधान मुख्य रूप से गरुड़ पुराण के पूर्वखण्ड (आचारखण्ड) में वर्णित है। गरुड़ पुराण विकिपीडिया और भारतकोश के विवरण के अनुसार इस खण्ड में सूर्य पूजा, मृत्युंजय पूजा, माला मन्त्र, शिवार्चा और अनेक अन्य उपासना-विधियों का क्रमबद्ध वर्णन मिलता है। इस प्रकार गरुड़ पुराण इस पूजा का एक प्रमुख आधार-ग्रंथ है।
मृत्युंजय पूजा का सम्बन्ध मुख्यतः भगवान शिव के महामृत्युंजय स्वरूप से है। महामृत्युंजय मंत्र — 'ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥' — का मूल ऋग्वेद (7/59/12) तथा यजुर्वेद में मिलता है। इस मंत्र की महिमा का विस्तृत वर्णन शिव पुराण में भी उपलब्ध है।
मृत्युंजय पूजा का उद्देश्य मृत्यु के भय से रक्षा, अकाल मृत्यु के निवारण और दीर्घायु की प्राप्ति है। पुराणों में महर्षि मार्कण्डेय का उदाहरण इसका सबसे प्रसिद्ध प्रमाण है, जिन्होंने इस मंत्र की शक्ति से यमराज को परास्त किया था। लंकापति रावण भी इस मंत्र का महान साधक था।
गरुड़ पुराण में इस पूजा को उस संदर्भ में विशेष महत्त्व दिया गया है जब कोई व्यक्ति मरणासन्न अवस्था में हो या अकाल मृत्यु का भय हो। जब किसी मरणासन्न रोगी के समीप इस मंत्र का कीर्तन किया जाता है, तो उसे यातनाओं से मुक्ति मिलती है।
साधारणतः यह पूजा एकादशसहस्र (ग्यारह हजार) मंत्रोच्चारण के साथ, होम-हवन सहित, किसी योग्य ब्राह्मण पंडित द्वारा संपन्न कराई जाती है। उपासना के विस्तृत पद्धति के लिए पुराणोक्त विधि और परंपरागत आचार्य का मार्गदर्शन लेना श्रेयस्कर है।





