विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के पूर्व-खण्ड और विशेषकर उत्तर-खण्ड के अनुसार मृत्यु के पश्चात जीवात्मा अपने द्वारा भूलोक में किए गए कर्मों के अनुसार यमराज के लोक (नरक या पितृलोक) की यात्रा करती है। इसके विपरीत पुण्य कर्म करने वाली सात्विक आत्माएं स्वर्लोक या उससे भी उच्च लोकों में जाती हैं। परंतु भगवद्गीता और पुराणों का स्पष्ट मत है कि स्वर्ग हो या पाताल जीव को अपने पुण्यों या पापों को भोगने के पश्चात् पुनः इसी भूलोक में आना पड़ता है। भूलोक ब्रह्माण्ड का वह केंद्र बिंदु है जहाँ आत्माएँ अपने अज्ञान और जन्म-मरण के चक्र को तोड़ने का सचेतन प्रयास करती हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार भी जीव चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् जब उसके पाप और पुण्य का संतुलन होता है तब उसे यह दुर्लभ मनुष्य शरीर भारत भूमि पर प्राप्त होता है।
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