तुलसी विवाह: देवउठनी एकादशी के अवसर पर श्री तुलसी एवं शालिग्राम विवाह की शास्त्रसम्मत विधि तथा अनुष्ठानिक मीमांसा
सनातन वाङ्मय, वैदिक परंपराओं तथा धर्मशास्त्रीय विधानों में प्रकृति और पुरुष के एकाकार का जो सबसे पवित्र, तार्किक और प्रतीकात्मक स्वरूप दृष्टव्य होता है, वह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवप्रबोधिनी या देवउठनी एकादशी) के अवसर पर आयोजित होने वाला 'तुलसी विवाह' है। यह अनुष्ठान केवल एक लौकिक कर्मकांडीय प्रक्रिया मात्र नहीं है, अपितु जीवात्मा (तुलसी रूपी अनन्य भक्त) का परमात्मा (शालिग्राम रूपी श्रीहरि विष्णु) के साथ होने वाले शाश्वत एवं आध्यात्मिक मिलन का एक अत्यंत गूढ़ दर्शन है। यह विस्तृत शोध-पत्र 'पद्म पुराण', 'स्कंद पुराण', 'धर्मसिन्धु', तथा 'निर्णयसिन्धु' जैसे प्रामाणिक धर्मशास्त्रीय ग्रंथों के आलोक में तुलसी-विवाह की संपूर्ण अनुष्ठानिक विधि, मुहूर्त निर्धारण, संकल्प, मंत्र, सप्तपदी, मंगलाष्टक, नियम, निषेध और फल-श्रुति का अत्यंत गहन और सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस शोध का उद्देश्य इस परम पावन अनुष्ठान के प्रत्येक शास्त्रीय पहलू को प्रामाणिक संदर्भो के साथ स्पष्ट करना है।
1. शास्त्रीय पृष्ठभूमि एवं पौराणिक माहात्म्य
तुलसी और शालिग्राम के विवाह का मूल आधार पुराणों में वर्णित एक अत्यंत गूढ़ आख्यान है, जो सती वृंदा और असुरराज जलंधर से संबंधित है। 'पद्म पुराण' के उत्तर खण्ड तथा 'स्कंद पुराण' के वैष्णव खण्ड में इस कथा का अत्यंत विशद और मार्मिक वर्णन प्राप्त होता है ।
शास्त्रों के अनुसार, प्राचीन काल में जलंधर नामक एक अत्यंत पराक्रमी असुर था, जिसने अपने बल और शक्ति से त्रिलोकी में हाहाकार मचा रखा था। उसे कोई भी देवता, यहाँ तक कि भगवान शिव भी पराजित नहीं कर पा रहे थे। उसकी इस अजेयता का मुख्य कारण उसकी पत्नी वृंदा का अखंड पातिव्रत्य धर्म और उसकी भगवान विष्णु के प्रति अनन्य भक्ति थी । देवताओं के त्राहिमाम करने पर, सृष्टि के संतुलन, धर्म की रक्षा और शिव द्वारा जलंधर के वध को संभव बनाने हेतु, भगवान श्रीहरि विष्णु ने एक अत्यंत कठिन निर्णय लिया। उन्होंने छलपूर्वक जलंधर का रूप धारण कर वृंदा का सतीत्व भंग कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप जलंधर की अजेयता समाप्त हो गई और शिव द्वारा उसका वध संभव हो सका ।
जब सती वृंदा को भगवान विष्णु के इस छल का भान हुआ, तो उसने अत्यंत क्षुब्ध और संतप्त होकर भगवान विष्णु को श्राप दे दिया कि वे पाषाण (शालिग्राम) में परिवर्तित हो जाएँ और उन्हें अपनी पत्नी के वियोग का दुःख सहना पड़े । भगवान विष्णु ने उसके पातिव्रत्य और अनन्य भक्ति का सम्मान करते हुए उस श्राप को सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने वृंदा को यह वरदान दिया कि वह इस भौतिक शरीर को त्यागने के पश्चात 'तुलसी' के रूप में उत्पन्न होगी और त्रिलोकी में सर्वाधिक पूजनीय होगी। शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु सदैव उसके साथ रहेंगे और बिना तुलसी-दल के भगवान विष्णु की कोई भी पूजा, नैवेद्य या यज्ञ कभी भी स्वीकार्य नहीं होगा । 'स्कंद पुराण' में इस बात की पुष्टि की गई है कि जहाँ तुलसी का वास होता है, वहाँ यम के दूत प्रवेश नहीं कर सकते । इसी वरदान की स्मृति में प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन तुलसी और शालिग्राम का पूर्ण विधि-विधान से विवाह संपन्न कराया जाता है ।
यह अनुष्ठान भौतिक रूप में एक विवाह प्रतीत होता है, परंतु सूक्ष्म रूप में यह श्रीहरि की चैतन्य शक्ति और तुलसी रूपी परा-भक्ति के शाश्वत मिलन का द्योतक है ।
2. शुभ मुहूर्त निर्धारण: 'निर्णयसिन्धु' एवं 'धर्मसिन्धु' के परिप्रेक्ष्य में
सनातन वैदिक परंपरा में किसी भी अनुष्ठान की सफलता उसके 'काल' अर्थात् शुभ मुहूर्त पर निर्भर करती है। 'निर्णयसिन्धु' और 'धर्मसिन्धु' जैसे काल-निर्णय के सर्वोच्च प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार "तिथ्यादिभिः सर्वे धर्माः निर्णीयन्ते" अर्थात् सभी धार्मिक कृत्य तिथि, वार, नक्षत्र और पंचांग के आधार पर ही निर्धारित होते हैं ।
तुलसी विवाह का मुख्य समय कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी को माना जाता है। यह वह पावन दिवस है जब चातुर्मास के पश्चात भगवान विष्णु अपनी चार मास की योगनिद्रा से जाग्रत होते हैं । 'धर्मसिन्धु' और 'निर्णयसिन्धु' के सूक्ष्म विवेचन के अनुसार, यह अनुष्ठान कार्तिक शुक्ल एकादशी (द्वादशी युक्ता) से लेकर कार्तिक पूर्णिमा के मध्य किसी भी शुभ दिन किया जा सकता है । कई वैष्णव संप्रदायों और क्षेत्रीय परंपराओं में इसे द्वादशी तिथि के दिन संपन्न करना अधिक श्रेयस्कर माना जाता है ।
विवाह संस्कार के लिए 'गोधूलि बेला' अथवा संध्याकाल (सूर्यास्त के समय या सायं 6 बजे से 8 बजे के मध्य) को सर्वाधिक श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि विवाह के कृत्यों में 'प्रदोष व्यापिनी' तिथि की प्रबलता शास्त्रसम्मत है । इस समय देवों का जागरण पूर्ण माना जाता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार अपने चरमोत्कर्ष पर होता है।
3. पात्रता, अधिकार एवं आध्यात्मिक संकल्पना
तुलसी विवाह का अनुष्ठान करने का अधिकार प्रत्येक सनातनी को प्राप्त है । गृहस्थ आश्रम के लिए यह एक परम कल्याणकारी और पुण्यदायी कृत्य है। विशेष रूप से वे दंपत्ति जो संतानहीन (नि:संतान) हैं अथवा जिन्हें कन्या-रत्न की प्राप्ति नहीं हुई है, उनके लिए तुलसी विवाह का अनुष्ठान अत्यंत अनुशंसित है । शास्त्र वचन है कि जो व्यक्ति अपनी पुत्री के समान माता तुलसी का पूर्ण वात्सल्य के साथ पालन-पोषण कर श्री शालिग्राम जी के साथ उनका विवाह संपन्न करवाता है, उसे साक्षात् 'कन्यादान' का अक्षय पुण्य प्राप्त होता है ।
सनातन धर्म में 'कन्यादान' को महादान की श्रेणी में रखा गया है। इसके अतिरिक्त जिन कन्याओं या युवकों के विवाह में ग्रहों की प्रतिकूलता के कारण बाधाएँ आ रही हों, उनके लिए भी इस अनुष्ठान में यजमान बनना या इसमें पूर्ण श्रद्धा के साथ सम्मिलित होना शीघ्र विवाह के मार्ग प्रशस्त करता है और दांपत्य जीवन में आ रही कटुता को समाप्त कर माधुर्य घोलता है ।
4. अनुष्ठानिक मंडप सज्जा, वेदी निर्माण एवं पूजन सामग्री
तुलसी विवाह एक पूर्ण वैवाहिक प्रक्रिया है, अतः इसमें उन सभी सामग्रियों और प्रतीकों का उपयोग होता है जो एक सामान्य वैदिक विवाह में प्रयुक्त होते हैं। मंडप का निर्माण और सज्जा अत्यंत पवित्रता, कलात्मकता और सौंदर्य के साथ की जानी चाहिए । मंडप की प्रत्येक वस्तु का अपना एक विशेष तात्विक और आध्यात्मिक अर्थ होता है।
तालिका 1: तुलसी विवाह सामग्री एवं शास्त्रीय सज्जा विधान
| सामग्री/विधान | शास्त्रीय उपयोग एवं प्रतीकात्मक अर्थ |
|---|---|
| ईख (गन्ना) का मंडप | चार या पाँच गन्नों का उपयोग करके तुलसी के गमले (वृंदावन) के चारों ओर विवाह मंडप (वेदी) का निर्माण किया जाता है। गन्ना मधुरता, रसात्मकता और वंश वृद्धि का प्रतीक है । यह चारों वेदों का भी प्रतीक माना जाता है। |
| सुहाग सामग्री (शृंगार) | लाल चुनरी, सिंदूर, चूड़ियाँ, बिंदी, मेंहदी, और मंगलसूत्र। माता तुलसी को एक नववधू के रूप में अलंकृत करने हेतु इन वस्तुओं का उपयोग किया जाता है । |
| शालिग्राम शिला | गंडकी नदी से प्राप्त भगवान विष्णु का साक्षात् विग्रह। यह वर (दूल्हे) का प्रतिनिधित्व करता है। शालिग्राम में प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती । |
| ताम्र/मृत्तिका कलश | कलश स्थापना के लिए तांबे या मिट्टी का कलश, शुद्ध जल, आम्रपल्लव और पूर्णपात्र (नारियल)। यह समस्त तीर्थों, सागरों और वरुण देव का प्रतीक है । |
| ऋतुफल एवं नैवेद्य | सिंघाड़ा, शकरकंदी, आँवला, बेर, और बताशे। ये ऋतुफल भगवान को अत्यंत प्रिय हैं और चातुर्मास के पश्चात प्रकृति का यह प्रथम सात्विक भोग है । |
| पंचामृत एवं हरिद्रा (हल्दी) | गाय का दूध, दही, घी, शहद, और शर्करा (तुलसी दल सहित)। शालिग्राम जी के अभिषेक एवं हरिद्रा (हल्दी) लेपन संस्कार हेतु । |
| अक्षत (चावल) के स्थान पर तिल | विवाह में प्रयुक्त होने वाले अक्षत। ध्यान रहे कि शालिग्राम जी पर अक्षत (चावल) चढ़ाना निषिद्ध है; इसके स्थान पर श्वेत या कृष्ण तिल चढ़ाए जाते हैं । |
| दीप, धूप एवं कर्पूर | सात्विक ऊर्जा के संचार, पंचोपचार पूजन और आरती के लिए शुद्ध घी के दीप और कर्पूर । |
तुलसी के मंडप को रंगोली, दीपों की शृंखला, तथा गेंदे और गुलाब की पुष्प मालाओं से सजाया जाना चाहिए। तुलसी के गमले पर गेरू और चूने से शुभ चिह्न (जैसे स्वस्तिक और ॐ) बनाए जाने चाहिए ।
5. देवोत्थान: भगवान श्रीहरि को जाग्रत करने का विधान
विवाह प्रक्रिया का प्रथम और अत्यंत महत्वपूर्ण चरण भगवान विष्णु को उनकी चार मास की योगनिद्रा से जाग्रत करना है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक भगवान विष्णु पाताल लोक में राजा बलि के यहाँ विश्राम करते हैं । देवउठनी एकादशी के दिन संध्याकाल में शंख, घंटा, मृदंग और नगाड़ों की मंगल ध्वनि के साथ भगवान का आवाहन किया जाता है । 'निर्णयसिन्धु', 'धर्मसिन्धु' तथा 'स्कंद पुराण' में भगवान को जगाने के लिए विशिष्ट संस्कृत मंत्रों का उल्लेख है, जिनका वाचन अत्यंत भक्तिभाव से किया जाना चाहिए:
जाग्रत मंत्र:
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्सुप्तमिदं भवेत्॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वाराह दंष्ट्रोद्धृत वसुन्धरे। हिरण्याक्ष प्राणघातिस्त्रैलोक्ये मङ्गलम् कुरु॥
मंत्र का गूढ़ अर्थ: हे गोविन्द! उठिए, उठिए। हे जगत्पते! अपनी योगनिद्रा का त्याग करें। हे जगन्नाथ! आपके सो जाने पर यह संपूर्ण जगत सुप्त (चेतनाहीन और कर्महीन) हो जाता है। हे वराहावतार धारण कर अपनी दाढ़ों पर इस विशाल पृथ्वी का उद्धार करने वाले भगवान! हे हिरण्याक्ष नामक महादानव का वध करने वाले प्रभु! उठिए और त्रिलोकी का कल्याण तथा मंगल कीजिए ।
इस मंत्र के उच्चारण के साथ ही चातुर्मास का समापन और विवाह आदि मांगलिक कार्यों का आरंभ शास्त्रसम्मत रूप से स्वीकृत हो जाता है । इस समय यजमान सूप या थाली बजाकर भी लोक-परंपरा के अनुसार भगवान को जाग्रत करते हैं ।
6. चरणबद्ध विवाह-विधि एवं वैदिक अनुष्ठान प्रक्रिया
शास्त्रों के अनुसार तुलसी विवाह केवल एक सांकेतिक क्रीड़ा या प्रदर्शन नहीं है, अपितु 'कौतुक' में भी यदि इसे पूर्ण वैदिक मंत्रों और श्रद्धा के साथ किया जाए, तो यह अनंत फलदायी होता है । इसकी शास्त्रीय प्रक्रिया अत्यंत व्यवस्थित है, जिसे निम्नलिखित चरणों में संपन्न किया जाता है:
6.1. पवित्रीकरण एवं स्वस्तिवाचन
यजमान (जो माता-पिता की भूमिका निभा रहे हों) शुद्ध वस्त्र धारण कर, पवित्र आसन पर उत्तराभिमुख या पूर्वाभिमुख होकर बैठें। सर्वप्रथम स्वयं पर तथा समस्त पूजा सामग्री पर कुशा या आम्रपल्लव से गंगाजल छिड़कते हुए पवित्रीकरण मंत्र पढ़ें:
ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा। य: स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥
(अर्थात्: मनुष्य चाहे अपवित्र हो या पवित्र, या किसी भी अवस्था में हो, जो पुंडरीकाक्ष भगवान विष्णु का स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर दोनों ओर से शुद्ध हो जाता है।)
तत्पश्चात त्रियाचमन (ॐ केशवाय नमः, ॐ माधवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः) कर हाथ धो लें (ॐ हृषीकेशाय नमः)। इसके बाद स्वस्तिवाचन (ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतो...) का सस्वर पाठ करें, जिससे दसों दिशाओं में मंगल का संचार हो और विघ्नों का नाश हो ।
6.2. गणेश-अंबिका, नवग्रह एवं कलश पूजन
सनातन धर्म में किसी भी कार्य की निर्विघ्नता हेतु सर्वप्रथम 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र से भगवान श्री गणेश और माता गौरी का पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन किया जाता है । इसके उपरांत वेदी पर अष्टदल कमल बनाकर उस पर कलश की स्थापना की जाती है। कलश में जल, सुपारी, सिक्का, दूर्वा और पल्लव डालकर वरुण देव का आवाहन किया जाता है। साथ ही नवग्रहों और षोडश मातृकाओं का आवाहन कर उनकी पूजा की जाती है ताकि विवाह संस्कार में ग्रहीय अनुकूलता बनी रहे ।
6.3. महा-संकल्प विधि
किसी भी वैदिक कर्मकांड का मूल आधार 'संकल्प' होता है। बिना संकल्प के किए गए कर्म का फल यजमान को प्राप्त नहीं होता। यजमान हाथ में जल, अक्षत (शालिग्राम जी के निमित्त तिल), पुष्प, द्रव्य (सिक्का) और कुशा लेकर देश-काल, गोत्र और नाम का उच्चारण करते हुए महा-संकल्प लें:
“ॐ अद्य... (वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि और वार का उच्चारण करें)... अमुक स्थाने (अपने स्थान का नाम लें), अहं अमुक गोत्रः (अपना गोत्र बोलें), अमुक शर्मा/वर्मा/गुप्तः (अपना नाम बोलें), श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं, मम स-कुटुंबस्य सर्वपाप क्षयार्थं, आयुरारोग्य ऐश्वर्य प्राप्त्यर्थं, श्रीविष्णु प्रसन्नता च कामनया, श्री शालिग्राम-तुलसी विवाहं कर्म अहं करिष्ये।”
यह संकल्प यजमान के मन, वचन और कर्म को एकाग्र कर अनुष्ठान के प्रति उसकी पूर्ण निष्ठा को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ जोड़ देता है।
6.4. शालिग्राम एवं तुलसी षोडशोपचार पूजन
संकल्प के पश्चात शालिग्राम जी को एक सुंदर पात्र या सिंहासन में माता तुलसी जी के समीप स्थापित करें । शालिग्राम भगवान को दूल्हे के रूप में (पीत वस्त्र) तथा तुलसी जी को दुल्हन के रूप में (लाल साड़ी/चुनरी, सुहाग सामग्री) सुसज्जित किया जाता है । शंख में पंचामृत (दूध, दही, घी, मधु, शर्करा) लेकर शालिग्राम जी का वैदिक मंत्रों (जैसे पुरुष सूक्त) के साथ अभिषेक करें । भगवान विष्णु के लिए 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' तथा 'ॐ श्री शालिग्रामाय नमः' मंत्र का और देवी तुलसी के लिए 'ॐ तुलस्यै नमः' मंत्र का निरंतर जप किया जाना चाहिए ।
भगवान और माता तुलसी को आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत (केवल भगवान को), चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल (पान-सुपारी), प्रदक्षिणा और पुष्पांजलि—ये सोलह उपचार पूर्ण भक्तिभाव से अर्पित करें।
6.5. कन्यादान (वन-दान) विधान एवं संस्कृत श्लोक: एक अलौकिक समर्पण
विवाह का सर्वाधिक भावुक और पुण्यदायी क्षण 'कन्यादान' है। यजमान अपनी पुत्री के समान पाली गई तुलसी का एक कोमल पत्ता (पल्लव) या पुष्प-मंजरी दाहिने हाथ के अंगूठे से पकड़कर श्री शालिग्राम (दामोदर) के हस्त (विग्रह के निकट) में अर्पित करते हैं । यह प्रक्रिया अहंकार के विसर्जन और भगवान के प्रति पूर्ण शरणागति का प्रतीक है। इस समय 'धर्मसिन्धु' और पारंपरिक विधानों में वर्णित निम्नलिखित शास्त्रसम्मत श्लोकों का उच्चारण किया जाता है:
अनादि मध्य निधनात्रैलोक्य परिरक्षक। इमां गृहाण तुलसीं विवाह विधिनेश्वर॥
(अर्थ: हे तीनों लोकों के रक्षक, जिनका न कोई आदि है, न मध्य है और न ही कोई अंत है। हे विवाह विधि के परमेश्वर, कृपा कर इस तुलसी को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें।)
पार्वती बीज संभूतां वृन्दाभस्मनि संस्थिताम्। अनादि मध्यनिधनां वल्लभांते ददाम्यहम्॥
(अर्थ: जो साक्षात् पार्वती के बीज से उत्पन्न हुई हैं और जो सती वृन्दा की भस्म में अपनी चेतना के साथ स्थित रही हैं, मैं उस आदि-मध्य-अंत रहित आपकी परम वल्लभा (प्रिया) को आज आपको सौंपता हूँ।)
पयोघटैश्च सेवाभी: कन्या विवर्धिता मया। त्वत्प्रियां तुलसीं तुभ्यं दास्यामि त्वं गृहाण भो:॥
(अर्थ: मैंने इस कन्या (तुलसी) को दूध-जल के घड़ों से सींचकर और निरंतर वात्सल्यमयी सेवा से बड़ा किया है। हे प्रभु! आपकी इस अत्यंत प्रिया तुलसी को मैं आपको अर्पित करता हूँ, कृपया इसे ग्रहण करें और मेरा उद्धार करें।)
इस प्रकार संकल्पित होकर यजमान भगवान दामोदर (शालिग्राम) को तुलसी रूपी कन्या का दान करते हैं ।
6.6. ग्रंथि-बंधन (गठबंधन) एवं पाणिग्रहण
कन्यादान के पश्चात भगवान विष्णु (शालिग्राम) और माता तुलसी के मध्य सूती धागे (मौली या कलावा) अथवा पीले और लाल वस्त्र (पीतांबर और चुनरी) से ग्रंथि-बंधन (गठबंधन) किया जाता है । यह बंधन पुरुष और प्रकृति के मध्य उस अविच्छेद्य संबंध को दर्शाता है जिसे कोई लौकिक शक्ति तोड़ नहीं सकती। इसी समय पाणिग्रहण संस्कार का भाव करते हुए शालिग्राम जी का स्पर्श तुलसी जी से कराया जाता है।
6.7. सप्तपदी एवं फेरे (प्रदक्षिणा)
हिंदू विवाह में 'सप्तपदी' (सात कदम साथ चलना) और अग्नि अथवा वेदी की सात परिक्रमाओं (फेरे) का सर्वोच्च वैधानिक महत्व है। इसके बिना विवाह पूर्ण नहीं माना जाता। चूँकि शालिग्राम चलायमान विग्रह हैं और तुलसी का पौधा एक स्थान (वृंदावन या गमले) पर स्थिर है, अतः यजमान (अथवा पुरोहित) भगवान शालिग्राम के विग्रह (सिंहासन) को दोनों हाथों में सम्मानपूर्वक उठाकर तुलसी जी की सात बार परिक्रमा (प्रदक्षिणा) करते हैं ।
वैदिक विधान में सप्तपदी के सात मंत्र 'भगवान विष्णु' से ही संबद्ध हैं, जो यहाँ अत्यंत प्रासंगिक हो जाते हैं। 'आश्वलायन गृह्यसूत्र' और 'तैत्तिरीय ब्राह्मण' के अनुसार वर (शालिग्राम के प्रतीक रूप में) वधू को जीवन के सात महत्वपूर्ण लक्ष्यों की ओर कदम बढ़ाने का आह्वान करते हैं:
तालिका 2: सप्तपदी के वैदिक मंत्र एवं उनका भावार्थ
| पद (कदम) | वैदिक संस्कृत मंत्र | भावार्थ एवं आध्यात्मिक आशीर्वाद |
|---|---|---|
| प्रथम पद | ॐ एकम् इषे विष्णुः त्वा नयतु। | "अन्न, स्वास्थ्य और शारीरिक शक्ति की प्राप्ति हेतु भगवान विष्णु तुम्हारा मार्गदर्शन करें।" |
| द्वितीय पद | ॐ द्वे ऊर्जे विष्णुः त्वा नयतु। | "बल, मानसिक ऊर्जा और साहस की प्राप्ति हेतु भगवान विष्णु तुम्हारा मार्गदर्शन करें।" |
| तृतीय पद | ॐ त्रीणि व्रताय विष्णुः त्वा नयतु। | "जीवन में व्रतों, निष्ठा और धर्म के पालन हेतु भगवान विष्णु तुम्हारा मार्गदर्शन करें।" |
| चतुर्थ पद | ॐ चत्वारि मयोभवाय विष्णुः त्वा नयतु। | "पारिवारिक सुख, शांति और आनंद की प्राप्ति हेतु भगवान विष्णु तुम्हारा मार्गदर्शन करें।" |
| पंचम पद | ॐ पञ्च पशुभ्यो विष्णुः त्वा नयतु। | "पशुधन, भौतिक संपत्ति और समृद्धि की प्राप्ति हेतु भगवान विष्णु तुम्हारा मार्गदर्शन करें।" |
| षष्ठ पद | ॐ षड् रायस्पोषाय विष्णुः त्वा नयतु। | "सभी ऋतुओं में धन और आध्यात्मिक ऐश्वर्य की वृद्धि हेतु भगवान विष्णु तुम्हारा मार्गदर्शन करें।" |
| सप्तम पद | ॐ सप्त सप्तभ्यो होत्राभ्यो विष्णुः त्वा नयतु। | "यज्ञ (सप्त होत्रों), सार्वभौमिक धर्म और शाश्वत मैत्री हेतु भगवान विष्णु तुम्हारा मार्गदर्शन करें।" |
परिक्रमा पूर्ण होने के पश्चात भगवान शालिग्राम को माता तुलसी के दाईं ओर से हटाकर बाईं ओर स्थापित किया जाता है, जो पत्नी के रूप में वामांगी होने का प्रतीक है। तदुपरांत शालिग्राम जी की ओर से माता तुलसी की माँग में सिंदूर अर्पण किया जाता है ।
7. मंगलाष्टक, स्तोत्र एवं प्रार्थना: ब्रह्मांडीय आशीर्वाद
विवाह पूर्ण होने की घोषणा और सर्व-मंगल की कामना हेतु पंडितों या यजमान द्वारा 'मंगलाष्टक' का सस्वर पाठ किया जाता है । 'अथ मंगलाष्टक मंत्र' के इन आठ श्लोकों में त्रिदेव, नवग्रह, पवित्र नदियाँ, पर्वत और महर्षियों का आवाहन कर वर-वधू (तुलसी-शालिग्राम) के लिए मंगल की याचना की जाती है। इसके कुछ प्रमुख श्लोक इस प्रकार हैं:
ॐ श्री मत्पंकजविष्टरो हरिहरौ, वायुमर्हेन्द्रोऽनलः। चन्द्रो भास्कर वित्तपाल वरुण, प्रताधिपादिग्रहाः। प्रद्यम्नो नलकूबरौ सुरगजः, चिन्तामणिः कौस्तुभः, स्वामी शक्तिधरश्च लांगलधरः, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥1॥
गंगा सिन्धु सरस्वती च यमुना, गोदावरी नर्मदा, कावेरी सरयू महेन्द्रतनया, चर्मण्वती वेदिका । शिप्रा वेत्रवती महासुरनदी, ख्याता च या गण्डकी, पूर्णाः पुण्यजलैः समुद्रसहिताः, कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥6॥
(भावार्थ: कमल पर विराजमान ब्रह्मा, श्रीहरि, भगवान शिव, वायु, इंद्र, अग्नि, सूर्य, चंद्र, कुबेर, वरुण, नवग्रह, तथा गंगा, यमुना, गोदावरी आदि समस्त पवित्र नदियाँ, समुद्र और तीर्थ आप दोनों का सदैव मंगल करें।) मंगलाष्टक के अंतिम श्लोक के उच्चारण के साथ ही दोनों विग्रहों के मध्य रखा हुआ 'अंतरपट' (पर्दा) हटा लिया जाता है ।
7.1. तुलसी अष्टनाम स्तोत्र (पद्म पुराण)
'पद्म पुराण' के अनुसार विवाह के उपरांत 'तुलसी अष्टनाम स्तोत्र' का पाठ विशेष फलदायी माना गया है। यह स्तोत्र भगवती तुलसी के आठ अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली नामों की महिमा गाता है :
वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी। पुष्पसारा नन्दिनी च तुलसी कृष्णजीवनी॥ एतन्नामाष्टकञ्चैव स्तोत्रं नामार्थसंयुतम्। यः पठेत्तां च सम्पूज्य सोऽश्वमेध फलं लभेत्॥
(भावार्थ: वृन्दा, वृन्दावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी और कृष्णजीवनी—जो भी भक्त इन आठ नामों का अर्थ सहित पाठ और पूजन करता है, वह अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त करता है।) । इसके साथ ही 'तुलसी गायत्री मंत्र' (ॐ श्री तुलस्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि तन्नो वृन्दा प्रचोदयात्) का यथाशक्ति जप वातावरण को अत्यंत सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है।
विवाह के पश्चात् यजमान माता तुलसी से प्रार्थना करते हैं:
त्वं देवि मेऽग्रतो भूयास्तुलसि देवि पार्श्वयो:। देवि त्वं पृष्ठतो भूयास्त्वद्दानान्मोक्षमवाप्नुयाम्॥ (हे देवी तुलसी! आप मेरे आगे, पीछे और पार्श्व (बगल) में सदैव निवास करें। आपके दान (कन्यादान) के प्रभाव से मुझे संसार के बंधनों से मोक्ष की प्राप्ति हो।)
8. नैवेद्य, हवन, आरती एवं क्षमा-प्रार्थना
विवाह अनुष्ठान के विधिवत संपन्न होने पर भगवान शालिग्राम और माता तुलसी को नवीन ऋतुफलों—विशेष रूप से गन्ना, सिंघाड़ा, शकरकंदी, आँवला और बेर—तथा मिष्ठान का नैवेद्य (भोग) अर्पित किया जाता है । इस दिन बिना लहसुन- प्याज का सात्विक भोजन, खीर, और पूड़ी का भोग लगाना श्रेष्ठ माना गया है ।
इसके पश्चात अग्नि की स्थापना कर हवन किया जाता है। हवन में 'पुरुष सूक्त' के मंत्रों अथवा द्वादशाक्षर मंत्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) से खीर, मधु, घी तथा तिल मिश्रित सामग्री की 108 आहुतियाँ दी जाती हैं ।
हवन के पश्चात् सपरिवार कर्पूर और शुद्ध घी के दीप से माता तुलसी और शालिग्राम जी की मंगल आरती उतारी जाती है । (आरती: जय जय तुलसी माता, सब जग की सुख दाता...) ।
अंत में पुष्पांजलि अर्पित कर क्षमा-प्रार्थना की जाती है: "हे प्रभु! हे विष्णुप्रिये! आपकी प्रसन्नता के लिए किए गए इस व्रत और विवाह-कौतुक में मंत्र, क्रिया या अज्ञानतावश जो भी त्रुटि रह गई हो, उसे अपने प्रसाद रूप में पूर्ण मानकर क्षमा करें। आप मेरे द्वारा की गई पूजा से संतुष्ट होकर मुझे कृतार्थ करें।"
9. दान-विधान: गोदान एवं स्वर्णदान के तुल्य पुण्य
सनातनी परंपरा में कोई भी अनुष्ठान तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक ब्राह्मणों और अभावग्रस्तों को दक्षिणा और दान न दिया जाए। तुलसी विवाह में दान का विधान अत्यंत विशिष्ट और महत्वपूर्ण है।
विवाह वेदी पर चढ़ाई गई समस्त सुहाग सामग्री (साड़ी, आभूषण, शृंगार सामग्री), कलश, नारियल, फल, और अन्न (गेहूँ, उड़द, मक्का, धान आदि) का दान किया जाना अनिवार्य है । शास्त्र निर्देश देते हैं कि यह समस्त सामग्री किसी सुयोग्य ब्राह्मण दंपति को, अथवा किसी गरीब कन्या के विवाह में कन्यादान के निमित्त भेंट कर देनी चाहिए । जो यजमान पूर्ण श्रद्धा से इस सामग्री का दान करता है, 'व्रतराज' और 'अग्नि पुराण' आदि ग्रंथों के अनुसार, उसे स्वर्णदान, भूमिदान और गोदान के तुल्य फल प्राप्त होता है। यदि शालिग्राम जी किसी मंदिर से लाए गए थे, तो तुलसी का पौधा, वस्त्र और समस्त दान सामग्री आदरपूर्वक उसी मंदिर में भगवान के साथ विदा कर देनी चाहिए । यह सामग्री यजमान को अपने उपयोग के लिए घर में नहीं रखनी चाहिए।
10. शास्त्रसम्मत नियम, निषेध एवं पारण विधान
तुलसी विवाह और देवउठनी एकादशी के व्रत में शास्त्रों ने कुछ अत्यंत कड़े नियम और निषेध प्रतिपादित किए हैं, जिनका पालन वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से अनिवार्य है:
- पल्लव छेदन निषेध: एकादशी, द्वादशी, संक्रांति, रविवार, और सूर्य/चंद्र ग्रहण के दिन तुलसी पत्र तोड़ना सर्वथा निषिद्ध है । अतः पूजा के लिए आवश्यक तुलसी पत्र एक दिन पूर्व (दशमी को) ही तोड़ कर रख लेने चाहिए। तुलसी पत्र 11 दिनों तक बासी नहीं माने जाते और उन्हें गंगाजल से धोकर पुनः उपयोग किया जा सकता है ।
- आहार निषेध: 'पद्म पुराण' के कार्तिक माहात्म्य के अनुसार कार्तिक मास और विशेषकर एकादशी को चावल (अक्षत), मसूर दाल, लहसुन, प्याज, गाजर, मूली, दुबारा पकाया हुआ भोजन और बैंगन का सेवन पूर्णतः वर्जित है । शालिग्राम जी की पूजा में भी चावल का प्रयोग नहीं होता, उसके स्थान पर तिल चढ़ाए जाते हैं ।
- पारण (व्रत खोलना): जो भक्त एकादशी का व्रत रखते हैं, वे तुलसी विवाह के पश्चात रात्रि जागरण करते हैं। व्रत का पारण (समापन) अगले दिन अर्थात् 'द्वादशी' को प्रातःकाल शुभ मुहूर्त में किया जाता है।
- उच्छिष्ट दोष निवारण: 'पद्म पुराण' के स्पष्ट निर्देशानुसार, पारण के भोजन में आँवला और बेर अवश्य ग्रहण करना चाहिए; इससे उच्छिष्ट दोष मिटता है। भोजन के उपरांत स्वतः गिरे हुए तुलसी के पत्ते का सेवन कर व्रत पूर्ण माना जाता है।
- चातुर्मास के नियमों का मोक्ष: देवशयनी एकादशी से जो सब्जियाँ या पदार्थ चातुर्मास में वर्जित थे, वे तुलसी विवाह के पश्चात् ब्राह्मण को दान कर पुनः ग्रहण किए जा सकते हैं ।
11. फल-श्रुति: अक्षय पुण्यों एवं भगवद्-प्राप्ति का मार्ग
'पद्म पुराण' (कार्तिक माहात्म्य) और 'स्कंद पुराण' में तुलसी-शालिग्राम विवाह की फल-श्रुति (महिमा) का अत्यंत अद्भुत, तार्किक और विस्तृत वर्णन किया गया है। यह केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि जीव के कल्याण का परम मार्ग है:
- कन्यादान का सर्वोच्च पुण्य: जो नि:संतान दंपति या श्रद्धालु पूर्ण श्रद्धा और वैदिक विधान से तुलसी का विवाह शालिग्राम जी से करवाते हैं, उन्हें एक कन्या के कन्यादान का सर्वोच्च पुण्य प्राप्त होता है, जो त्रिलोकी में सबसे बड़ा दान माना गया है ।
- पापों का शमन एवं मोक्ष: कार्तिक मास की प्रबोधिनी एकादशी पर तुलसी विवाह करने वाले मनुष्य के पूर्व जन्मों के संचित घोर पाप भस्म हो जाते हैं। जो व्यक्ति तुलसी के कोमल पल्लवों से श्रीहरि की पूजा करता है, उसे मृत्यु उपरांत यमदूतों का सामना नहीं करना पड़ता और वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर भगवान के वैकुंठ लोक को प्राप्त करता है ।
- अश्वमेध यज्ञ का फल: 'पद्म पुराण' स्पष्ट उद्घोष करता है कि देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी-विवाह के अनुष्ठान में यजमान के रूप में भाग लेने, अथवा दर्शन मात्र से 1000 अश्वमेध यज्ञों और 100 राजसूय यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है ।
- सौभाग्य एवं वास्तु दोष निवारण: जहाँ तुलसी और शालिग्राम का विवाह होता है, वहाँ साक्षात् माता लक्ष्मी का स्थायी वास हो जाता है। घर के सभी वास्तु दोष नष्ट होते हैं, परिवार में कलह शांत होती है, दरिद्रता दूर भागती है और दांपत्य जीवन में अपार माधुर्य और सौभाग्य की वृद्धि होती है ।
12. निष्कर्ष
'तुलसी-शालिग्राम विवाह' भारतीय सनातन वाङ्मय का एक अद्वितीय, वैचारिक और आध्यात्मिक उत्सव है, जो परा-भक्ति और परमात्मा के अद्वैत मिलन को गृहस्थ धर्म की परिधि में अत्यंत सुगमता से ले आता है। 'पद्म पुराण' और 'स्कंद पुराण' की मार्मिक कथाओं से उद्भूत यह परंपरा 'धर्मसिन्धु' और 'निर्णयसिन्धु' के सूक्ष्म काल-गणन और विधानों से अनुशासित होकर एक परम पावन वैदिक यज्ञ का स्वरूप ग्रहण कर लेती है।
माता तुलसी, जो साक्षात् 'भक्ति', 'पवित्रता', 'औषधीय गुणों' और 'समर्पण' की प्रतिमूर्ति (वैष्णवी) हैं, जब सर्वव्यापी 'परमात्मा' (विष्णु/शालिग्राम) के साथ परिणय सूत्र में बँधती हैं, तो यह जीवात्मा का परमात्मा के समक्ष पूर्ण आत्मनिवेदन (Surrender) बन जाता है । महा-संकल्प, वैदिक मंत्रों, मंगलाष्टक, और सप्तपदी के प्रामाणिक श्लोकों के साथ जब कोई भक्त इस कन्यादान को संपन्न करता है, तो वह केवल एक कर्मकांड नहीं कर रहा होता, अपितु अपनी चेतना को भगवद्-चेतना के साथ एकाकार कर रहा होता है। अतः पूर्ण तार्किकता, शास्त्रीय विधि, और निर्मल हृदय से संपन्न किया गया यह 'तुलसी विवाह' मनुष्य को इहलोक में सुख-समृद्धि, उत्तम दांपत्य, और परलोक में विष्णु-सायुज्य (मोक्ष) प्रदान करने वाला सर्वोत्कृष्ट अनुष्ठान सिद्ध होता है।






