विस्तृत उत्तर
तुलसी विवाह केवल एक लौकिक कर्मकांडीय प्रक्रिया मात्र नहीं है, अपितु जीवात्मा (तुलसी रूपी अनन्य भक्त) का परमात्मा (शालिग्राम रूपी श्रीहरि विष्णु) के साथ होने वाले शाश्वत एवं आध्यात्मिक मिलन का एक अत्यंत गूढ़ दर्शन है।
यह अनुष्ठान प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) के दिन संपन्न किया जाता है। इसी वरदान की स्मृति में — कि बिना तुलसी-दल के भगवान विष्णु की कोई भी पूजा, नैवेद्य या यज्ञ कभी भी स्वीकार्य नहीं होगा — प्रतिवर्ष तुलसी और शालिग्राम का पूर्ण विधि-विधान से विवाह संपन्न कराया जाता है।
यह अनुष्ठान भौतिक रूप में एक विवाह प्रतीत होता है, परंतु सूक्ष्म रूप में यह श्रीहरि की चैतन्य शक्ति और तुलसी रूपी परा-भक्ति के शाश्वत मिलन का द्योतक है। माता तुलसी, जो साक्षात् 'भक्ति', 'पवित्रता', 'औषधीय गुणों' और 'समर्पण' की प्रतिमूर्ति हैं, जब सर्वव्यापी परमात्मा (विष्णु/शालिग्राम) के साथ परिणय सूत्र में बँधती हैं, तो यह जीवात्मा का परमात्मा के समक्ष पूर्ण आत्मनिवेदन बन जाता है।




