विस्तृत उत्तर
मंदिर (और घर) में तुलसी का पौधा रखने की परम्परा हिन्दू धर्म में अत्यन्त प्राचीन और बहुआयामी है।
धार्मिक कारण
1विष्णुप्रिया
पद्मपुराण: तुलसी भगवान विष्णु को अत्यन्त प्रिय है। विष्णु पूजा तुलसी बिना अपूर्ण। तुलसी = साक्षात् लक्ष्मी का अंश — 'वृन्दा' नाम से देवी रूप।
2पौराणिक कथा
वृन्दा (तुलसी) एक पतिव्रता स्त्री थीं जिनके सतीत्व के कारण उनके पति (जालन्धर) अवध्य थे। भगवान विष्णु ने छल से उनका सतीत्व भंग किया। वृन्दा ने श्राप दिया और तुलसी पौधे में रूपांतरित हो गईं। विष्णु ने वरदान दिया कि 'तुम्हारे बिना मेरी पूजा अधूरी रहेगी।'
3तुलसी विवाह
प्रतिवर्ष कार्तिक माह में 'तुलसी विवाह' — तुलसी का शालग्राम (विष्णु) से विवाह। यह हिन्दू विवाह सीजन का शुभारम्भ।
4पवित्रता और शुद्धि
- ▸तुलसी जहाँ होती है, वहाँ नकारात्मक शक्तियाँ प्रवेश नहीं करतीं
- ▸तुलसी का पौधा = मंदिर/घर का रक्षा कवच
- ▸तुलसी के पत्ते और गंगाजल कभी बासी नहीं माने जाते
वैज्ञानिक/आयुर्वेदिक कारण
5वायु शुद्धि
तुलसी का पौधा वातावरण में ऑक्सीजन छोड़ता है और हानिकारक जीवाणुओं/विषाणुओं को नष्ट करता है। यह प्राकृतिक Air Purifier है।
6औषधीय गुण
आयुर्वेद: तुलसी = 'रसायन' (Rejuvenator)। सर्दी-खांसी, बुखार, पाचन, प्रतिरक्षा (Immunity) — सभी में लाभदायक।
7मच्छर/कीट निवारक
तुलसी की गंध मच्छरों और हानिकारक कीटों को दूर भगाती है।
मंदिर में स्थापना
- ▸मंदिर के प्रवेश या आँगन में
- ▸ऊँचे चौकोर चबूतरे (तुलसी चौरा/वृन्दावन) पर
- ▸प्रातःकाल और सायंकाल दीप जलाना
- ▸नियमित जल सिंचन और पूजा
विशेष नियम
- ▸रविवार और एकादशी को तुलसी पत्ते न तोड़ें (कुछ परम्पराओं में)
- ▸तुलसी शिवलिंग पर न चढ़ाएँ (विष्णु-प्रिया होने से)
- ▸तुलसी तोड़ते समय क्षमा याचना मंत्र





