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मंदिर वास्तु📜 वास्तु शिल्प शास्त्र, आगम1 मिनट पठन

मंदिर में यज्ञशाला कहां बनानी चाहिए?

संक्षिप्त उत्तर

आग्नेय (दक्षिण-पूर्व = अग्नि)। गर्भगृह से अलग। खुला (धुआं)। कुंड केंद्र। पूर्व/उत्तर मुख। जल निकट। खरगोन: 9 मंजिला, 1 लाख आहुति/दिन!

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विस्तृत उत्तर

यज्ञशाला स्थान — वास्तु:

दिशा: आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) = अग्नि दिशा = यज्ञशाला सर्वोत्तम।

नियम

  1. 1गर्भगृह से अलग (अग्नि = गर्भगृह में नहीं)।
  2. 2खुला/अर्ध-खुला स्थान (धुआं निकास)।
  3. 3कुंड = केंद्र। बैठने = चारों ओर।
  4. 4पूर्व/उत्तर मुख = यजमान।
  5. 5जल स्रोत निकट (अभिषेक/शुद्धि)।

प्रकार: नियमित यज्ञशाला (बड़े मंदिर) या अस्थायी (उत्सव — तम्बू/मंडप)।

खरगोन (अमर उजाला): नवग्रह मंदिर = 9 मंजिला यज्ञशाला, प्रतिदिन 1 लाख आहुति!

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शास्त्रीय स्रोत
वास्तु शिल्प शास्त्र, आगम
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