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मंदिर वास्तु📜 वास्तु शिल्प शास्त्र1 मिनट पठन

मंदिर की वास्तु में वास्तु पुरुष मंडल का क्या अर्थ है?

संक्षिप्त उत्तर

दिव्य पुरुष भूमि पर लेटा = 81/64 खाने = मंडल। केंद्र (पेट) = ब्रह्मस्थान = गर्भगृह। ईशान (शिर) = शुभ (जल/पूजा)। नैऋत्य (पैर) = स्थिर। हर मंदिर/घर = मंडल अनुसार।

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विस्तृत उत्तर

वास्तु पुरुष मंडल = मंदिर/भवन का 'आत्मा':

क्या है: वास्तु पुरुष = एक दिव्य पुरुष (असुर/देव) भूमि पर लेटा हुआ। उसके शरीर पर 81 (9×9) या 64 (8×8) खाने = मंडल। प्रत्येक खाना = विशिष्ट देवता।

अर्थ

  1. 1ब्रह्मस्थान (केंद्र): वास्तु पुरुष का पेट = ब्रह्मा = सबसे पवित्र → गर्भगृह यहीं।
  2. 2किनारे: विभिन्न देवता/दिक्पाल — इंद्र(पूर्व), यम(दक्षिण), वरुण(पश्चिम), कुबेर(उत्तर)।
  3. 3शिर (ईशान): पूर्व-उत्तर = शिव = सबसे शुभ → जल/पूजा स्थान।
  4. 4पैर (नैऋत्य): दक्षिण-पश्चिम = भारी/स्थिर → भंडार/दीवार।

प्रयोग: हर मंदिर/घर = वास्तु पुरुष मंडल अनुसार — ब्रह्मस्थान खाली/पवित्र।

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शास्त्रीय स्रोत
वास्तु शिल्प शास्त्र
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