विस्तृत उत्तर
मंदिर में गणपति (गणेश) की प्रतिमा सबसे पहले स्थापित करने और सभी पूजा/अनुष्ठान में सर्वप्रथम गणपति पूजन करने की परम्परा अत्यन्त प्राचीन और शास्त्रसम्मत है।
शास्त्रीय आधार
1'प्रथम पूज्य' (ऋग्वेद से)
ऋग्वेद (गणपति सूक्त): 'गणानां त्वा गणपतिं हवामहे...' — हे गणों के पति, हम आपका सर्वप्रथम आवाहन करते हैं। वेदों से ही गणपति = प्रथम आवाहनीय देवता।
2विघ्नहर्ता (विघ्न निवारक)
गणेश पुराण: गणेश = विघ्नेश्वर (विघ्नों के ईश्वर)। किसी भी कार्य (पूजा/यज्ञ/निर्माण/यात्रा) के प्रारम्भ में गणपति पूजन = विघ्नों का पूर्व-निवारण। मंदिर निर्माण/प्राण प्रतिष्ठा में गणपति सर्वप्रथम = निर्बाध कार्य सम्पन्न।
3पौराणिक कथा (शिवपुराण)
शिव-पार्वती ने सभी देवताओं से कहा कि जो पहले पृथ्वी की प्रदक्षिणा कर आए, उसे 'प्रथम पूज्य' का वरदान मिलेगा। कार्तिकेय मयूर पर उड़ गए। गणेश ने माता-पिता (शिव-पार्वती = सम्पूर्ण ब्रह्मांड) की प्रदक्षिणा कर ली। शिव-पार्वती प्रसन्न — गणेश = सर्वप्रथम पूजनीय।
मंदिर में गणपति प्रतिमा का स्थान
4प्रवेश द्वार पर
अधिकांश मंदिरों में गणपति प्रतिमा प्रवेश द्वार के पास (दायीं ओर या ऊपर) स्थापित होती है। भक्त सर्वप्रथम गणपति दर्शन करे → फिर मुख्य देवता।
5निचे/अलग मंडप में
कुछ बड़े मंदिरों में गणपति का अलग छोटा मंडप (Sub-shrine) — प्रवेश के बाद, मुख्य गर्भगृह से पहले।
6नवग्रह मंडप के पास
दक्षिण भारतीय मंदिरों में गणपति = नवग्रह मंडप के समीप।
गणपति प्रथम — सभी कार्यों में
- ▸मंदिर निर्माण: भूमि पूजन में सर्वप्रथम
- ▸प्राण प्रतिष्ठा: गणपति हवन पहले
- ▸नित्य पूजा: 'श्री गणेशाय नमः' पहले
- ▸विवाह: गणपति पूजन पहले
- ▸यज्ञ/हवन: गणपति आहुति पहले
- ▸गृह प्रवेश: गणपति पूजन पहले
- ▸पत्र/ग्रंथ: 'श्रीगणेशाय नमः' सबसे ऊपर
देवता अनुसार गणपति स्वरूप
- ▸शिव मंदिर: गणेश = शिव-पुत्र रूप
- ▸विष्णु मंदिर: गणेश = विष्णु द्वारा पूजित
- ▸देवी मंदिर: गणेश = देवी-पुत्र (पार्वती-सुत)
सार: गणपति = सर्वप्रथम, सर्वत्र, सर्वदा। किसी भी शुभ कार्य, पूजा, या निर्माण का प्रारम्भ गणपति से — यह सनातन धर्म का अटल नियम।





