गणेश चतुर्थी: घर में श्रीगणपति स्थापना एवं दश-दिवसीय पूजन की शास्त्रसम्मत विधि का गहन शोध
प्रस्तावना एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
सनातन धर्म के विस्तृत एवं अनंत वाङ्मय में भगवान श्रीगणेश को सर्वोपरि, विघ्नविनाशक एवं प्रथम पूज्य देवता के रूप में अधिष्ठित किया गया है। ऋग्वेद के द्वितीय मंडल के तेईसवें सूक्त में 'गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तम' मंत्र के माध्यम से उन्हें विद्वानों का विद्वान और संपूर्ण वाङ्मय का सर्वोच्च अधिष्ठाता (ब्रह्मणस्पति) घोषित किया गया है । पौराणिक परंपराओं—विशेषकर गणेश पुराण, मुद्गल पुराण, शिव पुराण एवं ब्रह्मवैवर्त पुराण—के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को श्रीगणेश का प्राकट्य हुआ था । यह पर्व मात्र एक सामान्य कर्मकांडीय उत्सव नहीं है, अपितु यह परब्रह्म के सगुण साकार रूप की आराधना का एक परम वैज्ञानिक एवं तार्किक विधान है, जिसमें पंचतत्वों से निर्मित मृत्तिका (पार्थिव तत्त्व) में परम चेतना (चिदाकाश) का आवाहन किया जाता है, और दस दिनों की सघन उपासना के उपरांत उसे पुनः अनंत जलतत्त्व (निराकार ब्रह्म) में विलीन कर दिया जाता है ।
प्रस्तुत शोध में घर में श्रीगणेश की सविधि स्थापना, उनका दश-दिवसीय शास्त्रोक्त पूजन, वैदिक प्राण-प्रतिष्ठा, षोडशोपचार विधि, विशिष्ट नैवेद्य (मोदक, दूर्वा), व्रत के नियम, निषेध (चंद्र-दर्शन दोष एवं स्यमंतक मणि कथा), तथा विसर्जन-विधान का प्रामाणिक, साक्ष्य-आधारित एवं अत्यंत विस्तृत विश्लेषण किया गया है।
अनुष्ठान-पूर्व की सज्जता, आसन शुद्धि एवं मूर्ति चयन
श्रीगणेश स्थापना का प्रथम सोपान बाह्य एवं आंतरिक शुद्धता, पवित्रता एवं उपयुक्त उपासना सामग्री का तार्किक चयन है। शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि उपासना के लिए प्रयुक्त होने वाली मूर्ति पूर्णतः प्रकृति-सम्मत होनी चाहिए।
मूर्ति का विधान एवं शास्त्रीय नियम
धर्मशास्त्रों के अनुसार, भगवान गणेश की मूर्ति विशुद्ध मृत्तिका (पवित्र मिट्टी) अथवा गोमय (गाय के गोबर) से निर्मित होनी चाहिए । इसके पीछे एक अत्यंत गूढ़ पौराणिक एवं वैज्ञानिक रहस्य छिपा है। माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन (मृत्तिका तत्त्व) से ही श्रीगणेश का निर्माण किया था । इसके अतिरिक्त, महर्षि वेदव्यास ने जब महाभारत की रचना प्रारंभ की, तो श्रीगणेश ने उसे लिपिबद्ध करने का कार्य स्वीकार किया। दस दिनों तक निरंतर लेखन के कारण भगवान गणेश के शरीर में अत्यधिक ऊष्मा (ताप) उत्पन्न हो गई। उस ऊष्मा को शांत करने के लिए महर्षि वेदव्यास ने उनके शरीर पर गीली मिट्टी का लेप किया और अनंत चतुर्दशी के दिन उन्हें जलाशय में स्नान कराया । इसी शास्त्रीय घटना के आधार पर पार्थिव (मिट्टी की) मूर्ति का निर्माण और दस दिनों के उपरांत जल में विसर्जन की प्रथा प्रारंभ हुई।
वर्तमान काल में प्रयुक्त होने वाले कृत्रिम, संश्लेषित (पॉलिरेसिन, प्लास्टर ऑफ पेरिस आदि) एवं अघुलनशील पदार्थों से निर्मित मूर्तियों का शास्त्रों में पूर्णतः निषेध है, क्योंकि इनसे न तो सात्त्विक तरंगों का आकर्षण होता है और न ही ये जल में विसर्जित होकर प्रकृति में विलीन होती हैं ।
आसन शुद्धि एवं दिशा-निर्धारण
पूजन प्रारंभ करने से पूर्व साधक को अपनी शारीरिक एवं मानसिक शुद्धि करनी चाहिए। कलिकाल के प्रभाव से पूजा के मध्य जंभाई (उबासी) या आलस्य आना सामान्य माना गया है, जिसका निवारण आसन शुद्धि और आचमन से किया जाता है । साधक को उत्तर या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए । एक स्वच्छ एवं अछूता आसन (विशेष रूप से कुशा अथवा ऊन का) केवल उसी साधक के लिए निर्धारित होना चाहिए, और बिना आसन के पूजा सर्वथा वर्जित मानी गई है । मलिन अथवा फटे हुए आसन पर बैठकर की गई पूजा निष्फल हो जाती है ।
संकल्प-विधान: अनुष्ठान का वैचारिक एवं ब्रह्मांडीय आधार
सनातन परंपरा में बिना 'संकल्प' के किया गया कोई भी कर्म पूर्ण फलदायी नहीं होता। संकल्प वह मानसिक एवं वाचिक घोषणा है जो ब्रह्मांडीय ऊर्जा को एक निश्चित दिशा में केंद्रित करती है और साधक की चेतना को परमात्मा से जोड़ती है ।
गणेश चतुर्थी के दिन पूजन से पूर्व, साधक अपने दाहिने हाथ में शुद्ध जल, अक्षत (अखंडित चावल), दूर्वा, पुष्प और द्रव्य (सिक्का) लेकर संकल्प करता है ।
शास्त्रोक्त संकल्प मंत्र एवं उसका अर्थ: साधक देश, काल, और ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति का उच्चारण करने के पश्चात कहता है:
"ममोपात्त समस्त दुरितक्षयद्वारा श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं (अथवा श्री गणेश प्रीत्यर्थं) श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं, अस्माकं सहकुटुम्बानां क्षेम स्थैर्य आयुः आरोग्य ऐश्वर्य अभिवृद्ध्यर्थं... श्री गणेश अम्बिका पूजनं अहं करिष्ये।"
तार्किक दृष्टिकोण से, इस मंत्र के माध्यम से साधक यह उद्घोष करता है कि वह अपने और अपने परिवार के पूर्व जन्मों तथा वर्तमान के सभी पापों (दुरित) के नाश, शिव-पार्वती एवं गणेश की प्रसन्नता, तथा आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, यश एवं मानसिक शांति की प्राप्ति हेतु यह शास्त्रोक्त पूजन संपन्न कर रहा है । यह संकल्प एक मनोवैज्ञानिक अनुबंध है जो उपासक को दस दिनों तक व्रत, संयम एवं नियमों से सात्त्विक रूप से बांधे रखता है。
कलश स्थापना एवं वेदी निर्माण
गणपति स्थापना से पूर्व एक काष्ठ-पीठ (लकड़ी के पाटे) पर लाल अथवा पीला नवीन वस्त्र बिछाया जाता है । इसके एक भाग में कलश की स्थापना की जाती है। वैदिक वाङ्मय में कलश को संपूर्ण ब्रह्मांड का और उसमें स्थित जल को सभी पवित्र नदियों एवं जीवन-ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है。
एक ताम्र अथवा मृत्तिका (मिट्टी) के कलश में शुद्ध जल भरकर, उसमें हल्दी की गांठ, अक्षत, सुपारी, दूर्वा एवं एक सिक्का (द्रव्य) डाला जाता है । कलश के मुख पर आम अथवा अशोक के पंचपल्लव (पांच पत्ते) रखकर, उस पर एक पूर्ण लाल वस्त्र में लपेटा हुआ नारियल (जटा युक्त) स्थापित किया जाता है । इस कलश में वरुण देव तथा समस्त तीर्थों का आवाहन किया जाता है: "अस्मिन् कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुधं सशक्तिकमावाहयामि... ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥" । कलश स्थापना का मुख्य उद्देश्य पूजा स्थल के वातावरण को पवित्र करना और उसमें ईश्वरीय तत्त्वों को स्थिर करना है。
प्राण-प्रतिष्ठा: मृण्मय मूर्ति में परमसत्ता का आवाहन
प्राण-प्रतिष्ठा गणेश पूजन का सबसे गूढ़, रहस्यमयी एवं तांत्रिक-वैदिक सोपान है। मिट्टी या धातु की मूर्ति तब तक मात्र एक भौतिक प्रस्तर या आकार है, जब तक कि उसमें वैदिक मंत्रों के माध्यम से प्राणों का संचार न किया जाए । यह प्रक्रिया उस अवाङ्मानसगोचर (मन और वाणी से परे) परब्रह्म की चेतना को एक सीमित पार्थिव आकार में आमंत्रित करने की अत्यंत वैज्ञानिक विधि है ।
प्राण-प्रतिष्ठा की प्रक्रिया एवं मंत्र
साधक मूर्ति के हृदय पर अपना दाहिना हाथ रखकर प्राण-प्रतिष्ठा मंत्र का सस्वर उच्चारण करता है। इस प्रक्रिया में वैदिक तथा लौकिक दोनों प्रकार के मंत्रों का प्रयोग किया जाता है ।
वैदिक मंत्र: "ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु। विश्वे देवास इह मादयन्तामोम्प्रतिष्ठ॥"
लौकिक मंत्र: "अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च। अस्यै देवत्वमर्चायै मामेति च कश्चन॥" "ॐ भूर्भुवः स्वः श्री महागणपते! इहागच्छ, इह तिष्ठ, सुप्रतिष्ठितो वरदो भव।"
अर्थात, हे परमात्मा! इस पार्थिव मूर्ति में प्राणों का संचार हो। इस मूर्ति में देवत्व की स्थापना हो जिससे हम इसकी अर्चना कर सकें। हे महागणपति! आप यहाँ पधारें, यहाँ स्थिर हों और हमारे लिए वरदान देने वाले बनें ।
नेत्रोन्मीलन (नेत्र खोलना): प्राण-प्रतिष्ठा के उपरांत भगवान के नेत्रों में स्वर्ण शलाका अथवा दूर्वा की सहायता से घृत (घी) और मधु (शहद) लगाया जाता है, जिसे शास्त्र की भाषा में 'नेत्रोन्मीलन' कहते हैं । यह इस बात का आध्यात्मिक प्रतीक है कि भगवान अब जागृत अवस्था में आ गए हैं और वे अपने भक्तों पर कृपादृष्टि डाल रहे हैं । इसके तुरंत पश्चात भगवान को प्रथम नैवेद्य के रूप में मधु (शहद) अर्पण किया जाता है ।
षोडशोपचार पूजन-विधि: सोलह सोपानों का विस्तृत वर्णन
प्राण-प्रतिष्ठा के पश्चात शास्त्रसम्मत 'षोडशोपचार' (सोलह उपचारों द्वारा) विधि से भगवान श्रीगणेश का पूजन किया जाता है । यह विधि एक विशिष्ट राजोपचार है, जिसमें भगवान को संपूर्ण ब्रह्मांड के सर्वोच्च अतिथि के रूप में स्वीकार कर उनकी आवभगत की जाती है । नीचे दी गई तालिका में इन सोलह उपचारों का क्रमबद्ध और मंत्र-सहित विवरण प्रस्तुत किया गया है。
| क्रम | उपचार का नाम | शास्त्रीय मंत्र | तार्किक एवं आध्यात्मिक अर्थ |
|---|---|---|---|
| १ | आवाहन (आह्वान) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः आवाहयामि | इष्टदेव को अपने हृदय रूपी सिंहासन से बाहर निकालकर पार्थिव मूर्ति में विराजित होने का सम्मानपूर्वक आमंत्रण। |
| २ | आसन (बैठने का स्थान) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः आसनं समर्पयामि | भगवान को सम्मानपूर्वक बैठने हेतु स्वर्ण, कुशा या सुगन्धित पुष्पों का आसन प्रदान करना। |
| ३ | पाद्य (चरण प्रक्षालन) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः पाद्यं समर्पयामि | लंबी यात्रा करके आए सर्वोच्च अतिथि के चरण प्रक्षालन (धोने) हेतु शुद्ध जल अर्पण। |
| ४ | अर्घ्य (हस्त प्रक्षालन) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः अर्घ्यं समर्पयामि | हाथों को शुद्ध करने हेतु पुष्प, गंध और दूर्वा मिश्रित पवित्र जल अर्पण। |
| ५ | आचमन (मुख शुद्धि) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः आचमनीयं समर्पयामि | कंठ और वाणी की शुद्धि हेतु तीन बार जल का पान कराना। |
| ६ | स्नान (अभिषेक) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः पंचामृत स्नानं समर्पयामि | दुग्ध, दधि, घृत, मधु, एवं शर्करा (पंचामृत) तथा शुद्ध जल से सर्वांग स्नान कराना । |
| ७ | वस्त्र (परिधान) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः वस्त्र युग्मं समर्पयामि | लज्जा निवारण एवं शोभा हेतु नवीन रक्त वर्ण (लाल) अथवा पीत वस्त्र अर्पण। |
| ८ | यज्ञोपवीत (जनेऊ) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः यज्ञोपवीतं धारयामि | आध्यात्मिक अधिकार एवं वेद-अध्ययन के प्रतीक स्वरूप पवित्र जनेऊ धारण कराना । |
| ९ | गंध/चंदन (सुगंध) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः गंधं धारयामि | मस्तक पर शीतलता एवं एकाग्रता के लिए पीला चंदन, रोली व सिंदूर लेपन । |
| १० | पुष्प (शृंगार) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः पुष्पैः पूजयामि | लाल पुष्प (विशेषकर जासवंद/गुड़हल) से भगवान का शृंगार करना। |
| ११ | अक्षत (अखंडित चावल) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः अक्षतान् समर्पयामि | अखंडित चावल (अक्षत) जो पूर्णता और अविनाशी तत्त्व का द्योतक है। |
| १२ | धूप (सुगंधित धूम्र) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः धूपं आघ्रापयामि | गूगल, कर्पूर व जड़ी-बूटियों का धुआं, जो अज्ञान के अंधकार और नकारात्मकता का नाश करता है। |
| १३ | दीप (प्रकाश) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः दीपं दर्शयामि | ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक, घृत या तैल का दीपक प्रज्वलित कर अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाना। |
| १४ | नैवेद्य (भोग) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः नैवेद्यं निवेदयामि | मिष्ठान, मोदक, ऋतुफल का भोग। यह साधक द्वारा अपनी इंद्रियों के रसों को भगवान को सौंपने का प्रतीक है। |
| १५ | ताम्बूल (पान) | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः ताम्बूलं समर्पयामि | भोजनोपरांत मुख शुद्धि हेतु पान का पत्ता, लौंग, इलायची और सुपारी अर्पण । |
| १६ | दक्षिणा एवं आरती | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः दक्षिणां समर्पयामि | पूजन में रह गई त्रुटियों की पूर्ति हेतु द्रव्य (स्वर्ण/रजत/मुद्रा) दान एवं कर्पूर से महाआरती । |
इस षोडशोपचार पूजन के उपरांत प्रदक्षिणा (परिक्रमा) की जाती है। यदि स्थान का अभाव हो तो साधक अपने ही स्थान पर खड़े होकर तीन बार घूमकर परिक्रमा (आत्म-प्रदक्षिणा) पूर्ण कर सकता है । इसके उपरांत "मंत्र पुष्पांजलि" अर्पित कर क्षमा याचना की जाती है और अज्ञानतावश हुई किसी भी भूल के लिए परब्रह्म से क्षमा मांगी जाती है ।
गणेश जी का 'ध्रुमवर्ण' स्वरूप और प्रथम आरती का रहस्य
गणेश पुराण और मुद्गल पुराण में एक अत्यंत सूक्ष्म रहस्य उद्घाटित किया गया है। जब घर में भगवान गणेश की स्थापना होती है, तब सर्वप्रथम आरती करने से पूर्व यदि गूलर (गूगल) की धूप जलाई जाए और भगवान को उनके 'ध्रुमवर्ण' नाम से पुकारा जाए, तो भगवान गणेश को भक्त की पूजा तत्काल स्वीकार करनी पड़ती है । यह भगवान का अत्यंत प्रिय और सौम्य स्वरूप है。
विशिष्ट अर्पण: २१ दूर्वा, मोदक एवं निषिद्ध पत्र का रहस्य
गणपति पूजन में दूर्वा (घास की एक विशेष प्रजाति) और मोदक का अत्यंत गूढ़ दार्शनिक और पौराणिक महत्त्व है। इसके बिना गणेश पूजन अपूर्ण माना जाता है。
२१ दूर्वा अर्पण का विधान, मंत्र एवं पौराणिक कथा
भगवान गणेश को २१ दूर्वा अर्पित करने का स्पष्ट विधान मुद्गल पुराण एवं गणेश पुराण में प्राप्त होता है । पौराणिक संदर्भ: भविष्य पुराण के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब देव-दानव अमृत कलश के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब अमृत की कुछ बूंदें इस घास पर गिर गईं, जिससे दूर्वा 'अजर-अमर' हो गई । एक अन्य अत्यंत प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब भगवान गणेश ने ऋषि-मुनियों की रक्षा हेतु अनलासुर नामक भयंकर अग्नि-दैत्य को निगल लिया, तो उनके उदर में असहनीय ताप उत्पन्न हुआ। उस ताप को शांत करने के लिए कश्यप आदि ऋषियों ने उन्हें २१ दूर्वा की गांठें खिलाईं, जिससे उनका ताप तत्काल शांत हुआ । इसी कारण गणेश जी को दूर्वा अत्यंत प्रिय है。
दूर्वा अर्पण मंत्र: दूर्वा अर्पित करते समय निम्नलिखित शास्त्रोक्त मंत्र का उच्चारण करना चाहिए:
"दूर्वांकुरान् सुहरितान् अमृतान मंगलप्रदान्। आनीतान् तव पूजार्थं गृहाण गणनायक॥"
(अर्थात: हे गणनायक! हरी-भरी, अमृत के समान, मंगल प्रदान करने वाली यह दूर्वा मैं आपकी पूजा के लिए लाया हूँ, कृपया इसे ग्रहण करें।)
गणेश जी के २१ नामों का उच्चारण: दूर्वा की २१ गाठें चढ़ाते समय श्रीगणेश के २१ विशिष्ट नामों का उच्चारण किया जाता है। गणेश पुराण के अनुसार, जो साधक इन नामों का स्मरण करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं । ये नाम इस प्रकार हैं: १. ॐ गणंजयाय नमः, २. ॐ गणपतये नमः, ३. ॐ हेरम्बाय नमः, ४. ॐ धरणीधराय नमः, ५. ॐ महागणपतये नमः, ६. ॐ लक्षप्रदाय नमः, ७. ॐ क्षिप्र प्रसादाय नमः, ८. ॐ अमोघ सिद्धये नमः, ९. ॐ अमिताय नमः, १०. ॐ मन्त्राय नमः, ११. ॐ चिन्तामणये नमः, १२. ॐ निधये नमः, १३. ॐ सुमंगलाय नमः, १४. ॐ बीजाय नमः, १५. ॐ आशा पूरकाय नमः, १६. ॐ वरदाय नमः, १७. ॐ शिवाय नमः, १८. ॐ काश्यप नन्दनाय नमः, १९. ॐ वाक् सिद्धाय नमः, २०. ॐ ढुण्ढये नमः, २१. ॐ विनायकाय नमः ।
नैवेद्य: मोदक का दार्शनिक महत्व
श्रीगणेश को मोदक सर्वाधिक प्रिय है । 'मोद' का अर्थ है परमानंद; अतः मोदक वह मिष्ठान है जो आत्मा को परमानंद की प्राप्ति कराता है । मोदक का बाहरी आवरण (आटा या चावल का) साधक के कठोर तप और ज्ञान का प्रतीक है, जबकि अंदर का भाग (गुड़ और नारियल का मिश्रण) आत्मिक मधुरता और परम सुख का प्रतीक है। पूजन में २१ मोदक अर्पित करने का शास्त्रोक्त विधान है ।
निषिद्ध पत्र: तुलसी का पूर्ण निषेध
गणेश पूजन में तुलसी पत्र का प्रयोग सर्वथा वर्जित माना गया है । ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, एक बार तुलसी देवी ने तपस्यारत श्रीगणेश के सम्मुख विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे गणेश जी ने अस्वीकार कर दिया। रुष्ट होकर तुलसी ने उन्हें दो विवाह होने का श्राप दिया, और प्रत्युत्तर में गणेश जी ने तुलसी को एक दैत्य (शंखचूड़) की पत्नी होने और वृक्ष रूप में परिणत होने का श्राप दिया। इसी पौराणिक घटना के कारण भगवान गणेश की पूजा में तुलसी सर्वथा निषिद्ध है ।
प्रमुख स्तोत्र, मंत्र एवं उनका तार्किक अर्थ
मंत्र केवल शब्द नहीं, अपितु ध्वनि-विज्ञान पर आधारित विशिष्ट ब्रह्मांडीय तरंगें हैं, जो ईश्वरीय ऊर्जा के साथ सीधा संपर्क स्थापित करती हैं । गणेश चतुर्थी के अनुष्ठान में निम्नलिखित मंत्रों का विशेष महत्त्व है:
- १. वक्रतुण्ड महाकाय मंत्र: "वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥" अर्थ एवं प्रयोग: घुमावदार सूंड वाले, विशाल देह वाले, और करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हे देव! मेरे सभी कार्यों को सदैव बाधारहित (निर्विघ्न) पूर्ण करें । यह मंत्र किसी भी कार्य के आरंभ में दिशा और ऊर्जा के शुद्धिकरण के लिए प्रयुक्त होता है।
- २. गणेश गायत्री मंत्र: "ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥" अर्थ एवं प्रयोग: हम उस एकदंत भगवान को जानने का प्रयास करते हैं, वक्रतुंड का हम ध्यान करते हैं। वह दन्ती (गणेश) हमारी कुंठित बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करें । यह मंत्र साधक की बौद्धिक क्षमता और विवेक को कुशाग्र करने हेतु जपा जाता है।
- ३. गणपति उपनिषद का बीज मंत्र: "ॐ गं गणपतये नमः" - यह अत्यंत शक्तिशाली बीज मंत्र है जो मूलाधार चक्र को जागृत कर सर्व-बाधा विनाशक सिद्ध होता है ।
- ४. संकटनाशन गणेश स्तोत्र: नारद पुराण में वर्णित इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से जीवन की सभी भौतिक एवं आध्यात्मिक बाधाएं दूर होती हैं। महर्षि नारद द्वारा रचित इस स्तोत्र में भगवान के बारह प्रमुख नामों (सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्ननाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र, गजानन) का स्मरण किया जाता है । शास्त्रों के अनुसार, "विद्यार्थी लभते विद्यां, धनार्थी लभते धनम्। पुत्रार्थी लभते पुत्रान्, मोक्षार्थी लभते गतिम्॥" (अर्थात इसके निरंतर पाठ से विद्यार्थी को विद्या, धन की इच्छा वाले को धन, पुत्र की इच्छा वाले को पुत्र और मोक्ष की इच्छा वाले साधक को परम गति प्राप्त होती है) ।
दश-दिवसीय दैनिक पूजन क्रम एवं अनुष्ठानिक चर्या
गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी (१० दिन) तक घर में गणपति की स्थापना एक अत्यंत संयमित, अनुशासित और आध्यात्मिक चर्या की मांग करती है ।
दैनिक अनुष्ठान:
- १. त्रिकाल संंध्या एवं आरती: भगवान की नित्य प्रातः और सायं काल में षोडशोपचार अथवा पंचोपचार विधि से पूजा होनी चाहिए। धूप, दीप और कर्पूर से महाआरती की जाती है ('सुखकर्ता दुखहर्ता' जैसी पारंपरिक आरतियां गाई जाती हैं) ।
- २. अखंड दीप अथवा २१ दीप: यदि संभव हो तो भगवान के समक्ष १० दिनों तक एक अखंड दीपक प्रज्वलित रखना चाहिए, अथवा नित्य संध्याकाल में २१ दीपक जलाने का शास्त्रीय विधान है ।
- ३. त्रिविध गणेश संकल्प (गणेश पुराण): गणेश पुराण में एक अत्यंत सूक्ष्म रहस्य का वर्णन है कि उपासक को मिट्टी के तीन गणेश स्थापित करने चाहिए। ये तीन प्रतिमाएं क्रमशः भूतकाल (पूर्व जन्म के पाप), वर्तमान काल (वर्तमान के ज्ञात-अज्ञात अपराध), और भविष्य काल के दोषों के पूर्ण नाश का प्रतीक हैं ।
- ४. शमी वृक्ष की समिधा का प्रयोग: दश-दिवसीय अनुष्ठान में यदि हवन किया जा रहा हो, तो उसमें खैर (खदिर) अथवा शमी वृक्ष की समिधा (लकड़ी) का प्रयोग विशेष फलदायी माना गया है ।
- ५. भोजन एवं नित्य भोग: नित्य नूतन नैवेद्य (हलवा, मोदक, ऋतुफल) अर्पित किया जाना चाहिए। भगवान को भोग लगाने के पश्चात ही उसे प्रसाद रूप में सपरिवार ग्रहण करना चाहिए ।
व्रत के नियम, निषेध एवं पात्रता
पात्रता: भगवान गणेश की पूजा के लिए आयु, लिंग, जाति अथवा वर्ण का कोई प्रतिबंध नहीं है। स्त्रियां, पुरुष, विद्यार्थी, और गृहस्थ सभी समान रूप से इस व्रत के अधिकारी हैं । सुहागिन स्त्रियों को संपूर्ण शृंगार (मांग में सिंदूर, भाल पर बिंदी, मंगलसूत्र) के साथ ही भगवान के समक्ष बैठना चाहिए ।
शारीरिक एवं मानसिक नियम: व्रत के दौरान काम, क्रोध, लोभ का त्याग कर ब्रह्मचर्य का पूर्णतः पालन अनिवार्य है । साधक को शय्या (पलंग) पर शयन करने तथा पलंग पर बैठकर अन्न या जल ग्रहण करने का पूर्ण त्याग करना चाहिए (शास्त्रों में वर्णन है: सैया तथा करेन...) । भोजन में सात्त्विक आहार (बिना प्याज-लहसुन का) अथवा केवल फलाहार ही ग्रहण किया जाता है ।
चंद्र-दर्शन निषेध (मिथ्या कलंक) एवं स्यमंतक मणि की कथा
गणेश चतुर्थी के व्रत का सबसे प्रमुख और कठोर निषेध यह है कि इस दिन (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) को चंद्र-दर्शन (चंद्रमा को देखना) सर्वथा वर्जित है ।
पौराणिक मान्यता एवं कथा:
पुराणों के अनुसार, एक बार चंद्रमा ने अपने रूप के अहम् में भगवान गणेश के लंबोदर और गजमुख रूप का उपहास किया था। क्रोधित होकर गणेश जी ने चंद्रमा को श्राप दिया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन जो भी चंद्रमा का दर्शन करेगा, उस पर 'मिथ्या कलंक' (चोरी का झूठा आरोप) लगेगा ।
इस भीषण श्राप का प्रभाव स्वयं भगवान श्रीकृष्ण पर भी पड़ा था, जब उन्होंने भूलवश चतुर्थी का चंद्रमा देख लिया था। परिणामस्वरूप, उन पर सत्राजित नामक यादव की बहुमूल्य 'स्यमंतक मणि' चुराने का झूठा आरोप लगा था । कथा के अनुसार, प्रसेन (सत्राजित का भाई) उस मणि को पहनकर वन में गया, जहाँ एक सिंह ने उसे मार दिया। उस सिंह को ऋक्षराज जाम्बवान ने मारकर मणि प्राप्त कर ली । श्रीकृष्ण ने अपना कलंक मिटाने हेतु जाम्बवान से भयंकर युद्ध किया, मणि पुनः प्राप्त की और उसे सत्राजित को लौटाकर स्वयं को कलंक-मुक्त किया । सत्राजित ने लज्जित होकर अपनी कन्या सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया ।
दोष परिहार (निवारण) मंत्र: यदि किसी व्यक्ति से भूलवश चतुर्थी का चंद्रमा दिख जाए, तो उसे मिथ्या कलंक से बचने के लिए ब्रह्मवैवर्त पुराण (अध्याय ७८) में वर्णित स्यमंतक मणि से संबंधित निम्नलिखित मंत्र का सस्वर जप करना चाहिए:
"सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥"
(अर्थात: हे सुंदर कुमार! रोओ मत। प्रसेन को सिंह ने मारा, और उस सिंह को जाम्बवान ने मार गिराया। अब यह स्यमंतक मणि तुम्हारी ही है।) ।
इसके अतिरिक्त, इस दिन एक पात्र में जल लेकर उसमें चंद्रमा की परछाई देखने या श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कंध में वर्णित स्यमंतक मणि की कथा का श्रवण करने से भी दोष का पूर्ण निवारण हो जाता है ।
दान-विधान एवं सामाजिक-आध्यात्मिक दायित्व
सनातन धर्म में किसी भी अनुष्ठान की पूर्णता दान के बिना संभव नहीं है। दश-दिवसीय पूजा के पूर्ण होने पर अथवा अनंत चतुर्दशी के दिन विसर्जन से पूर्व, साधक को अपनी सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र, अन्न (विशेषकर चावल), मिष्ठान और फलों का दान विद्वान ब्राह्मणों, निर्धनों एवं पक्षियों को करना चाहिए । जो कलश का जल पूजा में प्रयुक्त होता है, उस पवित्र जल को पूरे घर में छिड़क कर शेष जल को पौधों में सींच देना चाहिए (तुलसी को छोड़कर) तथा कलश पर रखे अक्षत को अन्य चावलों में मिलाकर दान कर देना चाहिए ।
उत्तरपूजा एवं विसर्जन-विधान: साकार से निराकार की आध्यात्मिक यात्रा
दस दिनों तक असीम श्रद्धा, राजोपचार और वैदिक मंत्रों से श्रीगणेश की सगुण साकार आराधना करने के पश्चात, भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी) को विसर्जन का विधान है । यह विसर्जन प्रक्रिया इस परम् दार्शनिक सत्य का बोध कराती है कि ईश्वर सर्वव्यापी, अनंत और निराकार है। मानव मन की एकाग्रता और उपासना के लिए उन्हें साकार रूप (मिट्टी) में आवहित किया गया था, और अब उन्हें वापस उसी अनंत निराकार (जल) तत्त्व में विलीन किया जा रहा है ।
उत्तरपूजा (विदाई की पूजा) का विधान
विसर्जन के लिए मूर्ति को उसके स्थापित स्थान से उठाने से पूर्व 'उत्तरपूजा' (Uttarpuja) की जाती है । यह भगवान की ससम्मान विदाई का अनुष्ठान है। इसमें साधक पवित्र होकर आचमन करता है, संकल्प लेता है, और भगवान को पुनः पंचोपचार विधि से चंदन, अक्षत, पुष्प, हल्दी-कुंकुम, दूर्वा, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करता है ।
अध्यात्मशास्त्र के अनुसार, उत्तरपूजा के दौरान मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा के समय समाहित हुए दैवीय कण (पवित्रक) बाहर आते हैं । पूजा के उपरांत साधक हाथ में अक्षत लेकर विसर्जन मंत्र का पाठ करता है:
"यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय पार्थिवीम्। इष्टकाम प्रसिद्धार्थम् पुनरागमनाय च॥"
(अर्थात: हे देवगण! आप इस पार्थिव पूजा को ग्रहण कर, हमारी इष्ट कामनाओं को पूर्ण करते हुए, अगले वर्ष पुनः आने के लिए अपने लोक को प्रस्थान करें।) ।
इसके पश्चात मूर्ति को दायें हाथ से थोड़ा हिलाया (खिसकाया) जाता है। मूर्ति के स्थान से खिसकते ही उसमें विद्यमान चैतन्य का विसर्जन हो जाता है, और यह प्रक्रिया सैद्धांतिक रूप से पूर्ण हो जाती है ।
यात्रा-भोजन एवं जल-विसर्जन
मूर्ति को घर से विसर्जन स्थल (नदी, समुद्र, या शुद्ध जलकुंड) तक ले जाते समय, उन्हें यात्रा के भोजन के रूप में दही, मुरमुरा, नारियल और मोदक एक लाल वस्त्र में बांधकर साथ रखा जाता है ।
विसर्जन स्थल पर पहुंचकर भगवान की अंतिम महाआरती की जाती है। तत्पश्चात, पूरे आदर, अश्रुपूरित नेत्रों और श्रद्धा के साथ "गणपति बप्पा मोरया, पुढ़च्या वर्षी लवकर या" (हे गणपति बप्पा! अगले वर्ष शीघ्र आना) के उद्घोष के साथ प्रतिमा को प्रवाहित जल में विसर्जित कर दिया जाता है ।
शास्त्रोक्त नियम: शास्त्रों में मूर्ति-दान को सर्वथा वर्जित और श्रीगणेश का घोर अपमान माना गया है। मूर्ति कोई भौतिक वस्तु नहीं है जिसे उपयोग के पश्चात दान कर दिया जाए । विसर्जन के उपरांत उस जलाशय या पवित्र स्थान की थोड़ी सी मिट्टी और जल घर लाकर, पूरे घर में उसका छिड़काव किया जाता है, जो भगवान के अनंत आशीर्वाद, शुद्धता और शांति का प्रतीक है ।
निष्कर्ष
गणेश चतुर्थी का दश-दिवसीय अनुष्ठान मात्र एक लौकिक पर्व या सामाजिक उत्सव नहीं है, अपितु यह मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने का एक अत्यंत वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक प्रयोग है। विशुद्ध मृत्तिका से मूर्ति का निर्माण यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि हमारा भौतिक शरीर नश्वर है। प्राण-प्रतिष्ठा के वैदिक मंत्र यह प्रमाणित करते हैं कि उस नश्वर आकार में भी अनंत ईश्वरीय चेतना (चिदाकाश) का आवाहन किया जा सकता है। षोडशोपचार पूजन जीव की सोलह कलाओं और इंद्रियों को पूर्णतः ईश्वर के प्रति समर्पित करने का मार्ग है。
दूर्वा और मोदक का अर्पण यह सिखाता है कि जीवन में जो भी अमृत-तुल्य, सात्त्विक और आनंदमयी है, वह सब ईश्वर की ही देन है। चंद्र-दर्शन का निषेध साधक को अपने मन की चंचलता और अहंकार पर नियंत्रण रखना सिखाता है। अंततः, अनंत चतुर्दशी के दिन विसर्जन का विधान मनुष्य के भौतिक अहंकार, आसक्ति और प्रपंच को जल (निराकार परब्रह्म) में विलीन कर यह परम ज्ञान देता है कि जो भी इस संसार में उत्पन्न हुआ है, उसका विलय निश्चित है, किंतु वह विशुद्ध चेतना जो पार्थिव मूर्ति में जागृत हुई थी, वह शाश्वत रूप से भक्त के हृदय में प्रतिष्ठित हो जाती है。
अतः, पूर्ण निष्ठा, शास्त्रोक्त नियमों के कठोर पालन, और वैदिक मंत्रों के तार्किक बोध के साथ किया गया यह दश-दिवसीय गणेश पूजन उपासक के लौकिक तापों का शमन कर उसे परमानंद, परम कल्याण एवं मोक्ष की ओर अग्रसर करता है。






