श्री हरि-प्रबोधिनी (देवउठानी) एकादशी व्रत कथा
पारंपरिक प्रारंभ: नैमिषारण्य में ऋषियों का समागम और युधिष्ठिर-श्रीकृष्ण संवाद
परम पावन नैमिषारण्य के शांत, सुरम्य और तपोनिष्ठ वातावरण में, जहाँ सहस्त्रों ऋषि-मुनि भगवद्-भक्ति और परमार्थ-चिंतन में निरंतर लीन रहते थे, एक बार एक विशाल ज्ञान-सत्र का आयोजन हुआ। इस पावन सभा में अठ्ठासी हजार ऋषि-मुनि उपस्थित थे, जिनके मुखमंडल ब्रह्मतेज से देदीप्यमान हो रहे थे। उस सभा के मध्य में परम ज्ञानी, पुराणों के मर्मज्ञ और महर्षि व्यास के परम शिष्य सूत जी महाराज विराजमान थे। शौनक आदि ऋषियों ने सूत जी महाराज को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और अत्यंत विनीत भाव से करबद्ध होकर प्रार्थना की, "हे सूत जी! आप संपूर्ण पुराणों, वेदों और उपनिषदों के ज्ञाता हैं। कृपा करके हमें भगवान श्रीहरि की उन परम पावन लीलाओं और व्रतों का श्रवण कराइए, जिनके श्रवण मात्र से कलियुग के प्राणियों के समस्त जन्म-जन्मांतर के पाप भस्म हो जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।"
ऋषियों की इस परम कल्याणकारी जिज्ञासा को सुनकर सूत जी महाराज का रोम-रोम पुलकित हो उठा। उन्होंने भगवान नारायण, माता सरस्वती और महर्षि वेदव्यास का स्मरण करते हुए अत्यंत मधुर और गंभीर वाणी में कहा— "हे शौनक आदि ऋषियों! आपने संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए अत्यंत उत्तम प्रश्न किया है। मैं आप सभी को उस परम पावन संवाद का श्रवण कराता हूँ, जो द्वापर युग में पाण्डुकुल-भूषण, धर्मराज युधिष्ठिर और चराचर जगत के स्वामी, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के मध्य संपन्न हुआ था। आप सभी एकाग्रचित्त होकर इस परम कल्याणकारी कथा का श्रवण करें।"
सूत जी महाराज ने कथा का आरंभ करते हुए कहा— "हे ऋषियों! एक समय की बात है, जब धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने अनुजों के साथ भगवान श्रीकृष्ण के समीप उपस्थित होकर अत्यंत श्रद्धा और विनयपूर्वक उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। युधिष्ठिर ने अपने दोनों हाथ जोड़कर, गदगद कंठ से चराचर जगत के स्वामी, कमलनयन भगवान वासुदेव से पूछा— 'हे माधव! हे त्रिलोकीनाथ! हे शरणागतवत्सल! मुझ पर आपका असीम स्नेह और कृपा है। आपने मुझे वर्ष भर की अनेक पावन एकादशियों का विस्तारपूर्वक वर्णन सुनाया है। आश्विन और कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशियों का वर्णन सुनकर मेरा हृदय अत्यंत तृप्त और आनंदित हुआ है। परंतु हे जनार्दन! मेरी ज्ञान-पिपासा अभी शांत नहीं हुई है। अब आप कृपा करके यह बताने का कष्ट करें कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका नाम क्या है? उस उत्तम तिथि के पीठासीन देवता कौन हैं और उस महान दिन कौन-सी कथा श्रवण करने का विधान शास्त्रों में बताया गया है? हे प्रभु! इस व्रत का क्या माहात्म्य है, इसके पालन से किस फल की प्राप्ति होती है, और इस दिन के नियम क्या हैं, यह सब विस्तारपूर्वक कहकर मेरे अंतःकरण को कृतार्थ करें।'"
धर्मराज युधिष्ठिर के इन धर्मयुक्त, विनम्र और लोकमंगल की भावना से ओत-प्रोत वचनों को सुनकर भगवान श्रीकृष्ण के मुखमंडल पर एक अलौकिक मुस्कान छा गई। उन्होंने अत्यंत स्नेहपूर्ण दृष्टि से युधिष्ठिर की ओर देखा और अत्यंत मधुर वाणी में बोले— "हे राजन्! हे कुंतीपुत्र! तुमने संपूर्ण लोकों के कल्याण के लिए, और विशेष रूप से कलियुग के जीवों के उद्धार के लिए अत्यंत श्रेष्ठ प्रश्न किया है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, वह तीनों लोकों में 'प्रबोधिनी एकादशी', 'देवोत्थान एकादशी', 'देवउठानी एकादशी' और 'हरि-प्रबोधिनी एकादशी' के नाम से विख्यात है। हे युधिष्ठिर! यह वह परम पावन और मंगलकारी तिथि है जिस दिन चराचर जगत के पालनहार, भगवान श्रीहरि चार मास की अपनी गहन योगनिद्रा से जागृत होते हैं। इस दिन देवों के देव भगवान विष्णु का शयन समाप्त होता है और संपूर्ण सृष्टि में एक नई चेतना और मांगलिक कार्यों का संचार होता है।"
भगवान श्रीकृष्ण ने आगे कहा— "हे नृपश्रेष्ठ! इस प्रबोधिनी एकादशी का माहात्म्य इतना अधिक और विस्तृत है कि इसके वर्णन मात्र से जन्म-जन्मांतर के संचित भयंकर पाप भस्म हो जाते हैं। पूर्वकाल में जब स्वयं सृष्टि के रचयिता, चतुर्मुख भगवान ब्रह्मा जी ने अपने मानस पुत्र देवर्षि नारद को इस प्रबोधिनी एकादशी का जो अद्भुत और विस्तृत माहात्म्य सुनाया था, वही रहस्यमयी, परम पावन और कल्याणकारी कथा मैं आज तुम्हें सुनाता हूँ। तुम इसे एकाग्रचित्त और शुद्ध अंतःकरण से श्रवण करो।"
ब्रह्मा-नारद संवाद और प्रबोधिनी एकादशी का विस्तृत माहात्म्य
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा— "हे युधिष्ठिर! प्राचीन काल की बात है। एक बार देवर्षि नारद, जो निरंतर 'नारायण-नारायण' का जाप करते हुए तीनों लोकों में अबाध रूप से विचरण करते हैं, परमपिता ब्रह्मा जी के समीप उनके निवास स्थान सत्यलोक पहुँचे। उन्होंने ब्रह्मा जी को साष्टांग प्रणाम किया और हाथ जोड़कर अत्यंत विनीत भाव से पूछा— 'हे पितामह! हे जगत के सर्जक! मैं आपके श्रीमुख से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की उस महान एकादशी का माहात्म्य सुनना चाहता हूँ, जिस दिन भगवान गोविंद अपनी योगनिद्रा को त्याग कर जाग्रत अवस्था में आते हैं। हे देव! उस प्रबोधिनी एकादशी का वास्तविक स्वरूप क्या है? भगवान के शयन और जागरण का यह रहस्य क्या है? इस व्रत के नियम क्या हैं, और इस दिन पूर्ण श्रद्धा से व्रत करने वाले प्राणी को किस पुण्य की प्राप्ति होती है? कृपया मेरे अज्ञान के अंधकार को नष्ट करते हुए इस परम कथा का विस्तार से वर्णन करें।'"
देवर्षि नारद के इस कल्याणकारी और भक्तिपूर्ण प्रश्न को सुनकर चतुर्मुख ब्रह्मा जी अत्यंत प्रसन्न हुए। उनके चारों मुखों से वेदों की ध्वनि गुंजायमान होने लगी और वे भगवान विष्णु के उस परम स्वरूप का स्मरण करते हुए बोले— "हे पुत्र नारद! तुमने संसार के उद्धार के लिए अत्यंत श्रेष्ठ प्रश्न किया है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रबोधिनी एकादशी सभी व्रतों में मुकुटमणि के समान है। यह तिथि भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और यह समस्त पापों का नाश करने वाली, पुण्यों की वृद्धि करने वाली तथा उत्तम बुद्धि वाले मनुष्यों को मोक्ष प्रदान करने वाली है।"
ब्रह्मा जी ने प्रबोधिनी एकादशी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा— "हे देवर्षि! जब तक इस पृथ्वी पर कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पाप-नाशिनी प्रबोधिनी एकादशी का आगमन नहीं होता, तभी तक अन्य सभी तीर्थ, सागर, सरोवर और पवित्र नदियाँ पृथ्वी पर अपने पुण्यों की गर्जना करते हैं। हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! गंगा-भागीरथी भी इस पृथ्वी पर तभी तक अपने माहात्म्य की गर्जना करती हैं, जब तक कि भगवान विष्णु को जगाने वाली यह प्रबोधिनी एकादशी नहीं आ जाती। परंतु प्रबोधिनी एकादशी के आते ही अन्य सभी तीर्थों का पुण्य इसके समक्ष क्षीण और नतमस्तक हो जाता है।"
ब्रह्मा जी ने आगे कहा— "हे नारद! जो मनुष्य इस देवोत्थान एकादशी के दिन पूर्ण श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ उपवास करता है, उसे बिना किसी विशेष प्रयास के ही एक हजार अश्वमेध यज्ञ और सौ राजसूय यज्ञों के समान असीम पुण्य-फल सहज ही प्राप्त हो जाता है। इस दिन व्रत करने से बाल्यकाल, यौवन और वृद्धावस्था में किए गए ज्ञात-अज्ञात, मानसिक, वाचिक और शारीरिक सभी पाप भस्म हो जाते हैं। हे नारद! जैसे रुई के एक विशाल पर्वत को अग्नि की एक छोटी सी चिंगारी पल भर में जलाकर भस्म कर देती है, ठीक उसी प्रकार प्रबोधिनी एकादशी की रात्रि में किया गया जागरण मनुष्य के सहस्त्रों पूर्व जन्मों के संचित पापों को क्षण भर में नष्ट कर देता है।"
"हे पुत्र! यह तिथि मोक्षदायिनी, ज्ञानदायिनी और पुत्र-पौत्रों की वृद्धि करने वाली है। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि का रात्रि-जागरण करता है, उसके दर्शन मात्र से संपूर्ण दिशाएँ पवित्र हो जाती हैं। जो फल अत्यंत दुर्लभ है और जिसे प्राप्त करना तीनों लोकों में कठिन है, वह फल भी प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि की विधिपूर्वक आराधना करने से सुलभ हो जाता है। इस दिन व्रत करने वाला ज्ञानी, योगी, तपस्वी और जितेंद्रिय कहलाता है, और वह अंत में बैकुंठ लोक को प्राप्त करता है।"
चातुर्मास की उत्पत्ति: भगवान विष्णु के शयन और जागरण का पौराणिक वृत्तांत
देवर्षि नारद के हृदय में भगवान की इस अद्भुत महिमा को सुनकर अपार भक्ति उत्पन्न हुई। उन्होंने करबद्ध होकर ब्रह्मा जी से पुनः पूछा— "हे पितामह! चराचर जगत के स्वामी, त्रिलोकीनाथ भगवान विष्णु को विश्राम की क्या आवश्यकता आन पड़ी? वे तो अजन्मा, अविनाशी, कालातीत और निद्रा तथा तंद्रा से सर्वथा परे हैं। फिर उनके आषाढ़ मास में चार मास के शयन और कार्तिक मास की प्रबोधिनी एकादशी को जागने का यह प्रसंग किस प्रकार प्रारंभ हुआ? कृपया इस अद्भुत कथा को भी पूर्ण रूप से मुझे सुनाएँ।"
ब्रह्मा जी ने भगवान नारायण की अनंत लीलाओं का स्मरण करते हुए अत्यंत भावविभोर होकर कहा— "हे नारद! ध्यानपूर्वक सुनो। यह अत्यंत प्राचीन काल की बात है। क्षीरसागर में अनंत नाग (शेषनाग) की शय्या पर विश्राम करते हुए भगवान नारायण के चरण दबाते हुए एक बार भगवती महालक्ष्मी जी ने अत्यंत प्रेम, चिंता और अधिकारपूर्वक श्रीहरि से एक प्रश्न किया।"
"माता लक्ष्मी ने अत्यंत विनीत और मधुर स्वर में कहा— 'हे नाथ! हे त्रिलोकी के स्वामी! हे कमलनयन! मैं आपके दैनिक क्रियाकलापों और जीवनचर्या को देखकर अत्यंत विस्मित और चिंतित हूँ। आप जब जागते हैं, तो दिन-रात निरंतर जागते ही रहते हैं। युगों-युगों तक आप अपने नेत्र बंद नहीं करते और संपूर्ण सृष्टि का संचालन, दैत्यों का संहार और देवों तथा भक्तों की रक्षा करने में इतने लीन हो जाते हैं कि स्वयं को तनिक भी विश्राम नहीं देते। और हे प्रभो! जब आप शयन करने का विचार करते हैं, तो लाखों-करोड़ों वर्षों के लिए ऐसी गहन और दीर्घकालिक निद्रा में चले जाते हैं कि संपूर्ण चराचर जगत का विनाश (प्रलय) ही हो जाता है। आपके इस अनिश्चित और अनियमित शयन और जागरण से समस्त देवताओं, मुनियों, चराचर प्राणियों और विशेषकर मुझे अत्यंत कष्ट और असुविधा का सामना करना पड़ता है।'"
माता लक्ष्मी ने अत्यंत करुणापूर्ण शब्दों में अपना आग्रह प्रस्तुत करते हुए आगे कहा— "'हे कमलनयन! जब आप अनवरत जागते रहते हैं, तो मुझे भी आपकी एकनिष्ठ सेवा में निरंतर तत्पर रहना पड़ता है, जिससे मुझे क्षण भर का भी विश्राम नहीं मिल पाता। मैं आपकी अर्धांगिनी होने के नाते सदैव आपकी सेवा में उपस्थित रहती हूँ। अतः हे स्वामी! मेरी आपसे यह करबद्ध प्रार्थना है कि आप अपने शयन और जागरण का एक निश्चित नियम और समय निर्धारित करें। ऐसा करने से सृष्टि का चक्र भी सुचारू रूप से चलता रहेगा, मुझ सहित संपूर्ण देवगणों को आपकी निर्बाध सेवा का सुअवसर भी प्राप्त होगा और हम सभी को विश्राम का समय भी मिल सकेगा।'"
ब्रह्मा जी ने नारद जी को बताया— "देवी लक्ष्मी के इन प्रेम, चिंता और लोकमंगल से भरे वचनों को सुनकर भगवान नारायण मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने अपनी पत्नी के मुखमंडल की ओर अत्यंत स्नेह से देखा और बोले— 'हे देवी! तुम्हारा कथन पूर्णतः सत्य और तर्कसंगत है। मेरे अनिश्चित शयन और जागरण के कारण चराचर जगत के सभी प्राणियों और विशेष रूप से तुम्हें अत्यंत कष्ट उठाना पड़ता है। तुम मेरी सेवा में दिन-रात एक कर देती हो और तुम्हें तनिक भी विश्राम नहीं मिलता। तुम्हारे इस कल्याणकारी और उचित सुझाव को मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ।'"
भगवान विष्णु ने संपूर्ण चराचर जगत के लिए एक उद्घोषणा करते हुए कहा— "'हे प्रिये! आज से मैं यह अटल नियम बनाता हूँ कि मैं प्रतिवर्ष वर्षा ऋतु के आगमन पर, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवशयनी एकादशी) के शुभ दिन से शयन किया करूँगा। मेरी यह निद्रा 'अल्प निद्रा' और 'योग निद्रा' कहलाएगी। यह शयन केवल चार मास की अवधि का होगा। तदुपरांत, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रबोधिनी एकादशी (देवउठानी एकादशी) के मंगलकारी दिन मैं इस योग निद्रा से जागृत होऊँगा। इन चार महीनों के मेरे इस शयन-काल को 'चातुर्मास' के नाम से जाना जाएगा।'"
भगवान श्रीहरि ने आगे अपना परम वरदान देते हुए कहा— "'हे देवी! मेरी यह अल्प निद्रा मेरे भक्तों के लिए परम मंगलकारी, दुःख-विनाशिनी और असीम पुण्य की वृद्धि करने वाली होगी। जो भी मेरा निष्काम भक्त इन चार मासों (चातुर्मास) में मेरे शयन का ध्यान करेगा, नियमों का पालन करेगा, और कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रबोधिनी एकादशी के दिन मेरे उत्थान (जागरण) का उत्सव अत्यंत आनंद, श्रद्धा, रात्रि-जागरण और उल्लास के साथ मनाएगा, उसके घर में मैं तुम्हारे (महालक्ष्मी) सहित सदा के लिए स्थिर होकर निवास करूँगा। उस भक्त के जीवन में कभी कोई दरिद्रता, शोक, रोग या अज्ञान शेष नहीं रहेगा, और अंत में वह मेरे परम धाम को प्राप्त करेगा।'"
ब्रह्मा जी ने नारद जी से कहा— "हे पुत्र! इसी वरदान और नियम के अनुसार भगवान श्रीहरि आषाढ़ मास की एकादशी को क्षीरसागर में योगनिद्रा में जाते हैं और कार्तिक शुक्ल पक्ष की इसी प्रबोधिनी एकादशी के दिन वे पुनः जागृत होकर सृष्टि के पालन का कार्य पूर्ण रूप से अपने हाथों में लेते हैं। इस दिन चातुर्मास का समापन होता है और सभी शुभ एवं मांगलिक कार्य पुनः आरंभ हो जाते हैं।"
चातुर्मास व्रत का उद्यापन एवं एकादशी के नियमों का पारण
ब्रह्मा जी ने नारद जी को प्रबोधिनी एकादशी के दिन किए जाने वाले व्रतों के पारण और दान का महत्त्व बताते हुए कहा— "हे देवर्षि! जो मनुष्य चातुर्मास के दौरान भगवान की प्रसन्नता के लिए विभिन्न नियमों का पालन करते हैं और किसी विशेष वस्तु का त्याग करते हैं, उन्हें प्रबोधिनी एकादशी के दिन उन वस्तुओं का दान करके पुनः उन्हें ग्रहण करना चाहिए। इस दिन विधिपूर्वक किए गए दान से भगवान श्रीहरि अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अनंत सुख की प्राप्ति होती है।"
ब्रह्मा जी द्वारा बताए गए चातुर्मास के नियमों और प्रबोधिनी एकादशी पर किए जाने वाले दान का विवरण इस प्रकार है:
| चातुर्मास में संकल्पित व्रत / त्यागी गई वस्तु | प्रबोधिनी एकादशी के दिन दान करने योग्य वस्तु / विधान |
|---|---|
| नमक का त्याग (नमक न खाना) | प्रबोधिनी एकादशी के दिन ब्राह्मण को शक्कर (चीनी) का दान करना चाहिए। |
| जूते/चप्पल (उपाहन) का त्याग | किसी सुपात्र या ब्राह्मण को उपाहन (जूते-चप्पल) का दान करना चाहिए। |
| मौन व्रत धारण करना (किसी विशेष समय पर) | स्वर्ण सहित तिल का दान करना चाहिए। |
| नित्य देव मंदिरों में दीप जलाना | स्वर्ण या तांबे के दीप को घी और बत्ती सहित दान करना चाहिए। |
| चातुर्मास में किसी विशिष्ट अन्न या फल का त्याग | उस विशिष्ट वस्तु को ब्राह्मण को दान देकर उस दिन से पुनः ग्रहण करना चाहिए। |
ब्रह्मा जी ने आगे बताया— "हे नारद! जो मानव चातुर्मास व्रत को बिना किसी विघ्न के पूर्ण कर लेते हैं, उन्हें इस संसार में दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता। यदि किसी कारणवश किसी मनुष्य का व्रत खंडित हो जाता है, तो उसे भगवान से क्षमा याचना कर पुनः उस व्रत को प्रारंभ कर लेना चाहिए। एकादशी के दिन जुआ खेलना, दिन में सोना, पान खाना, दातून करना, दूसरों की निंदा करना, चुगली करना, चोरी, हिंसा, क्रोध और असत्य भाषण का सर्वथा त्याग करना चाहिए।"
मुख्य कथा (प्रथम दृष्टांत): धर्मनिष्ठ राजा और निष्कपट सेवक की कथा
नारद जी ने करबद्ध होकर पूछा— "हे पितामह! भगवान श्रीहरि इस प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करने वाले अपने भक्तों पर किस प्रकार प्रत्यक्ष कृपा करते हैं? क्या पूर्वकाल में किसी ने इस व्रत का कठोरता से पालन कर भगवान को प्रत्यक्ष प्राप्त किया है? कृपा कर मुझे कोई ऐसी सत्य कथा सुनाएँ जिससे भक्तों के हृदय में एकादशी व्रत के प्रति निष्ठा और अधिक सुदृढ़ हो।"
तब ब्रह्मा जी ने एक अत्यंत प्राचीन और पावन कथा का आरंभ किया। उन्होंने कहा— "हे नारद! सुनो, मैं तुम्हें एक ऐसे धर्मनिष्ठ राजा और उसके एक अत्यंत सरल हृदय सेवक की कथा सुनाता हूँ, जो सिद्ध करती है कि भगवान विष्णु केवल बाह्य आडंबरों से नहीं, अपितु अंतःकरण की शुद्धता, सच्ची पुकार और निश्छल भक्ति से ही प्रकट होते हैं।"
"प्राचीन काल में एक अत्यंत धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और प्रजापालक राजा हुआ करते थे। वे राजा स्वयं तो परम वैष्णव थे ही, उन्होंने अपने संपूर्ण राज्य में यह कठोर नियम लागू कर रखा था कि उनके राज्य की सीमा के भीतर एकादशी के दिन कोई भी प्राणी किसी भी रूप में अन्न ग्रहण नहीं करेगा। राजा की प्रजा, उनके सभी नौकर-चाकर, दरबार के मंत्री, यहाँ तक कि राज्य के पशुओं को भी एकादशी के दिन केवल फलाहार, जल या घास ही दी जाती थी, किसी प्रकार का अन्न नहीं। उस राजा के राज्य में एकादशी व्रत का पालन एक अनिवार्य और पवित्र महाव्रत बन चुका था। पूरी प्रजा अत्यंत श्रद्धा से इसका पालन करती थी।"
"एक दिन, किसी दूर देश से एक गरीब, असहाय और क्षुधातुर व्यक्ति रोजगार की तलाश में भटकता हुआ उस राजा के भव्य दरबार में आ पहुँचा। वह व्यक्ति दिखने में अत्यंत सीधा, भोला और सरल हृदय का था। उसने राजा के समक्ष उपस्थित होकर हाथ जोड़कर अत्यंत कातर स्वर में प्रार्थना की— 'हे महाराज! मैं बहुत दूर से आया हूँ और अत्यधिक निर्धन हूँ। मुझे आजीविका का कोई साधन नहीं मिल रहा है। यदि आप मुझे अपने यहाँ कोई कार्य दे दें, तो आपकी बड़ी कृपा होगी। मैं पूरी निष्ठा, परिश्रम और ईमानदारी से आपकी सेवा करूँगा।'"
"राजा ने उस व्यक्ति को ऊपर से नीचे तक देखा। उसकी दीन-हीन दशा, मलीन वस्त्र और सरलता देखकर राजा का हृदय पसीज गया। राजा ने उस व्यक्ति से कहा— 'हे भद्र! मैं तुम्हें अपने यहाँ नौकरी पर अवश्य रख लूँगा। तुम्हें यहाँ उत्तम वेतन और प्रतिदिन भरपेट स्वादिष्ट भोजन भी मिलेगा। परंतु हमारे राज्य का एक अत्यंत कठोर धार्मिक नियम है, जिसका पालन तुम्हें अनिवार्य रूप से करना होगा।'"
"उस सीधे-सादे व्यक्ति ने प्रसन्न होते हुए पूछा— 'हे अन्नदाता! वह नियम क्या है? मैं आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूँ, बस मुझे काम दे दीजिए।' राजा ने स्पष्ट और कठोर शब्दों में कहा— 'हमारे राज्य में एकादशी के दिन कोई भी व्यक्ति अन्न का सेवन नहीं करता। अतः जब भी एकादशी का दिन आएगा, तो तुम्हें भी उस दिन अन्न (अनाज) नहीं मिलेगा, तुम्हें केवल फलाहार ही दिया जाएगा। क्या तुम्हें यह शर्त स्वीकार है?'"
"उस सीधे-सादे व्यक्ति ने नौकरी मिलने की प्रसन्नता में बिना अधिक विचार किए तुरंत हाँ कर दी। उसने मन ही मन सोचा कि पंद्रह दिन में एक ही दिन की तो बात है, फलाहार से भी काम चल जाएगा और भूखे पेट नहीं सोना पड़ेगा। उसने राजा की शर्त सहर्ष स्वीकार कर ली और उसी दिन से राजा की सेवा में पूरे परिश्रम के साथ लग गया।"
"कुछ दिनों के पश्चात ही वह परम पावन तिथि आई— भगवान श्रीहरि की देवउठानी (प्रबोधिनी) एकादशी। पूरे राज्य में व्रत का अत्यंत श्रद्धा से पालन हो रहा था। राजमहल के भोजनालय में भी उस दिन किसी प्रकार का अन्न नहीं पकाया गया। जब दोपहर का समय हुआ और उस सेवक को भूख लगी, तो राज्य के कर्मचारियों ने उस नए सेवक के समक्ष फल, कंदमूल और दूध ले जाकर रख दिया। सेवक ने उन फलों को देखकर अत्यंत आश्चर्य से पूछा— 'अरे भाई! यह क्या है? मेरा भोजन कहाँ है? क्या आज रसोई में कुछ नहीं बना?'"
"कर्मचारियों ने उसे स्मरण कराया— 'हे भाई! क्या तुम भूल गए? तुमने स्वयं राजा की शर्त मानी थी। आज एकादशी का पवित्र दिन है, आज पूरे राज्य में किसी को भी अन्न नहीं मिलता। तुम्हें भी आज इसी फलाहार से संतोष करना होगा।'"
"वह सेवक अत्यधिक परिश्रमी था, दिन भर कठोर श्रम करता था और उसे बहुत भूख लगती थी। वह फलों को देखकर घबरा गया और सीधा दौड़ता हुआ राजा के दरबार में पहुँचा। उसने राजा के सामने गिरगिड़ाते हुए कहा— 'हे महाराज! मुझे क्षमा करें, परंतु इन थोड़े से फलों से मेरा पेट नहीं भरेगा। मैं एक मजदूर हूँ, दिन भर कठोर शारीरिक श्रम करता हूँ। यदि मैंने आज अन्न नहीं खाया, तो भूख के मारे मेरे प्राण ही निकल जाएँगे। कृपया मेरी स्थिति पर दया करें और मुझे मेरा अनाज दे दीजिए, मैं स्वयं जाकर अपना भोजन पका लूँगा।'"
"राजा ने क्रोधित होते हुए कहा— 'मूर्ख! क्या तुम्हें स्मरण नहीं कि तुमने नौकरी पर रखते समय मेरी क्या शर्त मानी थी? आज एकादशी है, आज तुम्हें किसी भी मूल्य पर अन्न नहीं मिल सकता।' परंतु वह सेवक अपने हठ पर अड़ा रहा। वह रोता रहा और बार-बार राजा के पैरों में गिरकर यही कहता रहा कि यदि उसे अन्न न मिला तो वह मर जाएगा। राजा ने विचार किया कि यह व्यक्ति अत्यंत अज्ञानी और हठी है, यदि सच में भूख से इसके प्राण निकल गए तो मुझे हत्या का भयंकर पाप लगेगा। अंततः विवश होकर राजा ने अपने भंडारगृह के अधिकारी को उसे एक समय का कच्चा अन्न (आटा, दाल, चावल, घी और सीधा) देने का आदेश दे दिया।"
"कच्चा अन्न प्राप्त कर वह सेवक अत्यंत प्रसन्न हुआ। वह अनाज लेकर नगर के बाहर बहने वाली एक अत्यंत पवित्र नदी के तट पर गया। वहाँ पहुँचकर उसने विधि-विधान से नदी में स्नान किया, अपने शरीर को पवित्र किया और एक स्वच्छ स्थान पर लकड़ियाँ जलाकर अत्यंत श्रद्धा से अपना भोजन पकाने लगा। जब भोजन भली-भांति पककर तैयार हो गया, तो उसने अपने बाल्यकाल के संस्कारों के अनुसार भगवान को भोग लगाने का विचार किया। वह अत्यंत सरल मन का था, उसे कोई जटिल वैदिक मंत्र, स्तोत्र या स्तुति नहीं आती थी। उसने दोनों हाथ जोड़कर, अपनी आँखें बंद कर अत्यंत निश्छल, शुद्ध और सच्ची भावना से भगवान को पुकारना शुरू किया— 'हे भगवान! मेरा भोजन तैयार है। कृपया आप आइए और मेरे साथ यह भोजन ग्रहण कीजिए। मैं आपके बिना यह भोजन अकेले नहीं कर सकता। कृपया जल्दी आइए, मुझे बहुत भूख लगी है।'"
"सेवक बार-बार इसी प्रकार पुकारता रहा। उसकी उस सच्ची, निष्कपट और प्रेम से भरी पुकार में इतनी शक्ति और आकर्षण था कि भक्तवत्सल भगवान श्रीहरि स्वयं को बैकुंठ में रोक न सके। देखते ही देखते, पीतांबर धारण किए हुए, चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और पद्म लिए अपने अत्यंत मनोहारी चतुर्भुज रूप में साक्षात् भगवान विष्णु वहाँ प्रकट हो गए। भगवान के उस अलौकिक रूप को देखकर सेवक तनिक भी नहीं डरा, बल्कि वह तो ऐसे व्यवहार करने लगा जैसे वह अपने किसी अत्यंत प्रिय और पुराने सखा से मिल रहा हो। भगवान श्रीहरि ने मुस्कुराते हुए उस सेवक के पास बैठकर वह साधारण सा पकाया हुआ भोजन बड़े प्रेम और आनंद से ग्रहण किया। भगवान ने आधा भोजन स्वयं खाया और आधा उस सेवक को प्रसाद रूप में दिया। भोजन के पश्चात भगवान उसे आशीर्वाद देकर अंतर्धान हो गए और वह सेवक तृप्त होकर अपने काम पर लौट आया।"
"दिन बीतते गए। पंद्रह दिनों के बाद पुनः दूसरी एकादशी का दिन आया। इस बार उस सेवक ने पहले से ही योजना बना ली थी। वह सीधा राजा के पास गया और हाथ जोड़कर बोला— 'महाराज! इस बार मुझे दोगुना कच्चा अन्न (राशन) चाहिए।' राजा ने आश्चर्य से अपनी आँखें बड़ी करते हुए पूछा— 'दोगुना क्यों? तुम तो अकेले हो, क्या तुम इतना सारा भोजन एक साथ खा जाओगे?'"
"सेवक ने अत्यंत भोलेपन से उत्तर दिया— 'महाराज! मैं अकेला कहाँ खाता हूँ? उस दिन जब मैंने भोजन बनाकर भगवान को बुलाया था, तो भगवान साक्षात् मेरे साथ भोजन करने आ गए थे। हम दोनों ने आधा-आधा भोजन बाँटकर खाया था। परंतु वह भोजन हम दोनों के लिए कम पड़ गया था और मैं आधा भूखा ही रह गया था। इसलिए इस बार आप मुझे दोगुना अन्न दीजिए ताकि मेरा और मेरे भगवान दोनों का पेट भर सके।'"
"सेवक की यह बात सुनकर राजा को अत्यंत आश्चर्य हुआ। राजा ने सोचा— 'यह व्यक्ति निश्चित रूप से झूठ बोल रहा है या इसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। मैं जीवन भर से एकादशी का इतना कठोर व्रत कर रहा हूँ, मैंने आज तक कभी अन्न का दाना ग्रहण नहीं किया, नित्य नियम से पूजा-पाठ करता हूँ, दान-पुण्य करता हूँ, परंतु मुझे तो आज तक भगवान के दर्शन नहीं हुए। और यह साधारण सा, अज्ञानी सेवक, जो एकादशी के दिन अन्न खाने का हठ करता है, यह कह रहा है कि साक्षात् श्रीहरि इसके साथ बैठकर भोजन करते हैं! यह असंभव है। मुझे स्वयं छिपकर इसकी परीक्षा लेनी होगी।'"
"राजा ने उसे दोगुना अन्न दे दिया, परंतु चुपचाप उस सेवक के पीछे-पीछे चल पड़ा। सेवक पुनः उसी नदी के तट पर गया। उसने पूर्ववत स्नान किया, अत्यंत श्रद्धा और उल्लास से भोजन पकाया और फिर नदी की ओर मुख करके अपने भगवान को पुकारने लगा— 'हे प्रभु! भोजन तैयार है, आइए और मेरे साथ भोजन कीजिए।' राजा यह सब दृश्य कुछ दूरी पर एक विशाल वृक्ष के पीछे छिपकर बड़ी उत्सुकता से देख रहा था।"
"सेवक पुकारता रहा, पुकारता रहा, परंतु इस बार बहुत समय बीत जाने पर भी भगवान प्रकट नहीं हुए। सेवक ने कई बार गुहार लगाई— 'हे नाथ! आप क्यों नहीं आ रहे? क्या आज आप मुझसे रूठ गए हैं? क्या मेरे भोजन पकाने में कोई कमी रह गई है? प्रभु आइए, मुझे बहुत भूख लगी है।' राजा पेड़ के पीछे से मन ही मन मुस्कुरा रहा था कि यह मूर्ख आज पकड़ा गया, इसका झूठ सामने आ गया, आज इसे इसका दंड अवश्य मिलेगा।"
"उधर सेवक प्रतीक्षा करते-करते निराश होने लगा। उसने अंतिम बार पुकारते हुए अत्यंत दृढ़ता से कहा— 'हे प्रभु! यदि आप आज मेरा यह भोजन ग्रहण करने नहीं आएँगे, तो मैं भी यह अन्न ग्रहण नहीं करूँगा। मैं आपके बिना जीवित रहकर क्या करूँगा? यदि आप नहीं आए, तो मैं इसी क्षण इस नदी में कूदकर अपने प्राण त्याग दूँगा।' यह कहकर जैसे ही उस सेवक ने दृढ़ निश्चय के साथ नदी के गहरे और तीव्र प्रवाह वाले जल में छलांग लगाने के लिए अपने कदम आगे बढ़ाए..."
"...वैसे ही भगवान श्रीहरि तुरंत वहाँ प्रकट हो गए। भगवान ने दौड़कर अपने उस निष्कपट भक्त को अपनी भुजाओं में भर लिया और उसे नदी में गिरने से रोक लिया।"
"तदुपरांत, भगवान श्रीहरि ने अत्यंत प्रेम से उस सेवक के साथ बैठकर वह भोजन ग्रहण किया। भोजन संपन्न होने के पश्चात्, भगवान ने अपने उस निश्छल भक्त को अपने दिव्य विमान में बैठाया और अपने साथ साक्षात् वैकुण्ठ धाम ले गए। यह अद्भुत, अलौकिक और हृदय विदारक दृश्य राजा उस वृक्ष के पीछे से अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देख रहा था।"
"राजा की आँखों से अश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी। उसका सारा राजसी और व्रती होने का अहंकार चूर-चूर हो गया। राजा सोचने लगा— 'धिक्कार है मेरे इन व्रतों और उपवासों पर! मैं जीवन भर शरीर को कष्ट देता रहा, अन्न का त्याग करता रहा, परंतु मेरा मन कभी शुद्ध नहीं हुआ। मेरे भीतर अहंकार था कि मैं एक महान व्रती हूँ। जब तक मन में ईश्वर के प्रति इस सेवक जैसी सच्ची, निष्कपट और निश्छल भक्ति न हो, तब तक केवल बाह्य नियमों और भूखे रहने से भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकती।'"
ब्रह्मा जी ने नारद जी से कहा— "हे नारद! उस दिन से उस राजा को एक नए ज्ञान और सच्ची आध्यात्मिक दृष्टि की प्राप्ति हुई। उसने बाह्य आडंबरों और अहंकार का सर्वथा त्याग कर सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति और एकादशी का व्रत करना प्रारंभ किया, और अंत काल में वह राजा भी भगवान की कृपा से मोक्ष को प्राप्त होकर स्वर्गलोक को गया। इसलिए हे देवर्षि! प्रबोधिनी एकादशी का व्रत केवल देह को कष्ट देने का नहीं, अपितु मन की शुद्धि और भगवान के प्रति अनन्य प्रेम का परम साधन है।"
मुख्य कथा (द्वितीय दृष्टांत): धर्मात्मा राजा की परम परीक्षा
कथा के इस प्रथम भाग को सुनकर नारद जी का रोम-रोम पुलकित हो उठा। उनके नयनों से प्रेमाश्रु बहने लगे। उन्होंने पुनः प्रार्थना की— "हे कमलोद्भव! हे पितामह! आपके श्रीमुख से इस अद्भूत कथा को सुनकर मेरा मन तृप्त नहीं हुआ है। भगवान नारायण अपने एकादशी व्रत का पालन करने वाले भक्तों की किस प्रकार रक्षा करते हैं और उनकी धर्म-निष्ठा की परीक्षा किस प्रकार लेते हैं, कृपया इस विषय पर मुझे कोई अन्य सत्य कथा भी श्रवण कराएँ।"
ब्रह्मा जी ने मंद मुस्कान के साथ कहा— "हे देवर्षि नारद! भगवान विष्णु की लीलाएँ अनंत और रहस्यमयी हैं। वे अपने सच्चे भक्तों की परीक्षा अत्यंत कठोर रूप में लेते हैं, परंतु जब भक्त उस परीक्षा में खरा उतरता है, तो वे स्वयं उसके रक्षक बन जाते हैं और उसे अपने हृदय से लगा लेते हैं। इसी देवोत्थान एकादशी व्रत के संदर्भ में एक और अत्यंत मार्मिक और रोम-हर्षक कथा पुराणों में वर्णित है। ध्यानपूर्वक श्रवण करो।"
"प्राचीन काल में एक अत्यंत धर्मात्मा, सत्यवादी और प्रजापालक राजा हुए। उनका नाम संपूर्ण जम्बूद्वीप में उनके धर्म और न्याय के लिए विख्यात था। वे राजा भगवान विष्णु के परम भक्त थे और विशेष रूप से एकादशी का व्रत अत्यंत निष्ठा, पवित्रता और कठोरता से करते थे। उनके व्रत का प्रताप ऐसा था कि स्वर्ग के देवता भी उनकी प्रशंसा किया करते थे।"
"एक बार भगवान श्रीहरि ने अपने उस परम भक्त राजा की धर्म-निष्ठा और एकादशी व्रत के प्रति उनकी दृढ़ता की परम परीक्षा लेने का निश्चय किया। भगवान ने अपनी अकल्पनीय योगमाया से एक अत्यंत रूपवती, लावण्यमयी और दिव्य सुंदरी का रूप धारण किया। ऐसी सुंदरता, जो तीनों लोकों में किसी ने न देखी थी। भगवान उस सुंदरी का रूप धारण करके राजा के राज्य के एक सघन और एकांत वन में मार्ग पर बैठकर रुदन करने लगे, जहाँ से राजा प्रायः आखेट (शिकार) के लिए होकर गुजरते थे।"
"एक दिन वह प्रतापी राजा अपने रथ पर सवार होकर उसी वन मार्ग से गुजर रहे थे। अचानक उनकी दृष्टि वन के मध्य बैठी उस दिव्य सुंदरी पर पड़ी, जो अत्यंत करुण स्वर में रुदन कर रही थी। राजा ने अपने रथ को रोका और उस सुंदरी के समीप जाकर अत्यंत शालीनता से पूछा— 'हे देवी! तुम कौन हो? इस भयंकर और एकांत वन में तुम अकेली क्यों बैठी हो? तुम्हारा क्या दुःख है? मैं इस राज्य का राजा हूँ, तुम निःसंकोच मुझे अपनी व्यथा बताओ, मैं अवश्य तुम्हारी सहायता करूँगा।'"
"उस छद्मवेशी सुंदरी ने अपने अश्रु पोंछते हुए अत्यंत मधुर स्वर में उत्तर दिया— 'हे राजन्! मेरा इस संसार में कोई नहीं है। मैं सर्वथा अनाथ और बेसहारा हूँ। मेरे न तो माता-पिता हैं, न कोई भाई-बंधु। मैं इसी वन में भटक रही हूँ और मुझे अपने प्राणों का भय सता रहा है।' उस स्त्री की अलौकिक सुंदरता और उसके बेसहारा होने की बात सुनकर राजा का मन करुणा से भर गया। राजा उस रूप पर मोहित भी हो गए थे। उन्होंने उस सुंदरी के समक्ष प्रस्ताव रखा— 'हे देवी! यदि तुम सर्वथा अकेली हो, तो तुम मेरे साथ मेरे राजमहल चलो। मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ और तुम्हें अपनी पटरानी बनाकर राजमहल में सम्मानपूर्वक रखूँगा।'"
"सुंदरी ने राजा की ओर देखा और एक अत्यंत चतुर मुस्कान के साथ कहा— 'हे राजन्! मैं आपके साथ चलने और आपकी रानी बनने को तैयार हूँ, परंतु मेरी एक शर्त है। विवाह से पूर्व आपको मुझे दृढ़ वचन देना होगा कि राजमहल में और राज्य में मेरा पूरा अधिकार होगा। मैं जो भी आदेश दूँगी, आपको वह मानना होगा। और सबसे बड़ी शर्त यह है कि मैं जो भी भोजन पकाकर आपको दूँगी, आपको वही भोजन ग्रहण करना होगा, आप उसमें कोई प्रश्न नहीं करेंगे।'"
"राजा उस समय उस स्त्री के रूप-जाल और माया में पूरी तरह से बंध चुके थे। उन्होंने बिना आगे-पीछे का कुछ विचार किए, उस सुंदरी की सभी शर्तें सहर्ष स्वीकार कर लीं। राजा उस सुंदरी को सम्मानपूर्वक अपने राजमहल में ले आए और उससे विधिपूर्वक विवाह कर उसे अपनी सबसे प्रिय रानी का स्थान दे दिया।"
"समय बीतता गया। वह रानी राजमहल पर अपना एकाधिकार चलाने लगी। राजा ने अपना वचन निभाते हुए राज्य की सत्ता का पूरा अधिकार उसे सौंप दिया था। कुछ समय पश्चात् भगवान श्रीहरि की परम प्रिय प्रबोधिनी एकादशी का पवित्र दिन आया। राजा के राज्य में यह नियम था कि एकादशी के दिन कोई भी अन्न या तामसिक भोजन नहीं बनता था। राजा स्वयं निराहार रहकर भगवान विष्णु की उपासना करते थे।"
"परंतु उस सुंदरी (रानी) ने राजा की परीक्षा लेने का ठीक यही दिन चुना। एकादशी की प्रात:काल, जब राजा भगवान श्रीहरि की पूजा-अर्चना के उपरांत बैठे थे, तब रानी ने राजमहल की रसोई में मांस और मछली पकाने का आदेश दे दिया। जब वह अभक्ष्य और तामसिक भोजन पककर तैयार हो गया, तो रानी ने उसे एक स्वर्ण थाल में सजाया और राजा के सम्मुख ले जाकर रख दिया। रानी ने राजा से कहा— 'हे राजन्! उठिए और यह भोजन ग्रहण कीजिए।'"
"राजा ने जब एकादशी के परम पवित्र दिन उस थाल में मांस और मछली देखी, तो वे कांप उठे। उनका हृदय धक-धक करने लगा। उन्होंने अपने दोनों कान बंद कर लिए और अत्यंत व्यथित होकर बोले— 'हे प्रिये! यह तुम क्या कह रही हो? आज भगवान श्रीहरि की परम पावन एकादशी का दिन है। आज के दिन तो मैं अन्न और जल तक का स्पर्श नहीं करता, फिर यह अभक्ष्य, महापाप का कारण बनने वाला मांस-मछली मैं कैसे ग्रहण कर सकता हूँ? कृपया इसे यहाँ से ले जाओ और मुझे मेरे व्रत का पालन करने दो।'"
"रानी ने तुरंत क्रोधित होने का नाटक किया और अपनी भौंहें तानकर कहा— 'हे राजन्! क्या आप अपना वचन भूल गए? आपने मुझे वन में यह कठोर वचन दिया था कि मैं जो भी पकाकर आपको दूँगी, आपको वही खाना होगा। एक क्षत्रिय होकर अपने वचन से मुकरना आपके लिए महापाप है। यदि आप आज यह भोजन ग्रहण नहीं करेंगे, तो यह आपके वचन का सीधा उल्लंघन होगा।'"
"राजा एक भयंकर धर्मसंकट में फँस गए। एक ओर उनका सत्य और रानी को दिया गया वचन था, तो दूसरी ओर उनके आराध्य भगवान श्रीहरि की एकादशी का महाव्रत। राजा ने हाथ जोड़कर रानी से अनुनय-विनय की— 'हे प्रिये! तुम मेरा संपूर्ण राज्य ले लो, मेरी सारी संपत्ति ले लो, परंतु आज के दिन मुझे यह तामसिक भोजन ग्रहण करने के लिए विवश मत करो। मैं अपने धर्म और अपने भगवान के विरुद्ध नहीं जा सकता।'"
"रानी ने एक क्रूर मुस्कान के साथ अपनी अंतिम और सबसे भयंकर शर्त राजा के समक्ष रखी। उसने कहा— 'ठीक है राजन्! यदि आप यह भोजन ग्रहण नहीं करना चाहते, तो न करें। परंतु मेरे वचन को पूरा करने का एक ही विकल्प शेष है। आपकी बड़ी रानी से जो आपका सबसे प्रिय और ज्येष्ठ पुत्र (राजकुमार) है, आप अभी इसी क्षण अपने हाथों से उस राजकुमार का सिर काटकर मुझे लाकर दें। यदि आप ऐसा करेंगे, तभी मैं आपको इस भोजन को न करने की अनुमति दूँगी। अन्यथा मैं इसी क्षण राजमहल त्याग कर चली जाऊँगी और आपको वचन-भंग का कलंक लगेगा।'"
"यह भयानक शर्त सुनकर राजा के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन पर मानो वज्रपात हो गया। राजा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े। जब उन्हें होश आया, तो वे फूट-फूटकर रोने लगे। पुत्र-मोह और एकादशी-धर्म के बीच राजा का हृदय विदीर्ण होने लगा। वे रोते हुए अपनी बड़ी रानी (राजकुमार की माता) के कक्ष में गए और उन्हें संपूर्ण वृत्तांत सुनाया।"
"बड़ी रानी, जो स्वयं एक अत्यंत धर्मपरायण, पतिव्रता और विष्णु-भक्त स्त्री थीं, उन्होंने राजा के आँसू पोंछे। बड़ी रानी का हृदय यद्यपि एक माता होने के कारण फट रहा था, फिर भी उन्होंने धर्म को सर्वोच्च रखा। बड़ी रानी ने कहा— 'हे स्वामी! आप तनिक भी विलाप न करें। एक नश्वर शरीर और पुत्र মোহ के लिए आप अपने एकादशी के उस महाव्रत को कैसे नष्ट कर सकते हैं, जो जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश कर भगवान की प्राप्ति कराता है? आप अपने सत्य और धर्म की रक्षा कीजिए। मैं सहर्ष अपने पुत्र का बलिदान देने के लिए प्रस्तुत हूँ।'"
"उसी समय वह युवा राजकुमार भी वहाँ आ पहुँचा। जब उसने अपनी माता और पिता का संवाद सुना, तो वह शूरवीर और धर्मज्ञ पुत्र अत्यंत प्रसन्न होकर बोला— 'हे पिताश्री! यह तो मेरे लिए परम सौभाग्य की बात है कि आज मेरे इस नश्वर शरीर का उपयोग भगवान श्रीहरि के एकादशी व्रत की रक्षा और आपके सत्य की रक्षा के लिए हो रहा है। यह देह तो वैसे भी एक दिन मिट्टी में मिल ही जानी है, परंतु आपका धर्म युगों-युगों तक अमर रहेगा। आप बिना किसी संकोच और दुःख के मेरा सिर काट कर उस रानी को सौंप दें। एकादशी के व्रत का खंडन किसी भी स्थिति में नहीं होना चाहिए।'"
"राजा का हृदय दुःख के सागर में डूबा हुआ था, परंतु अपनी बड़ी रानी और राजकुमार के इन धर्मयुक्त वचनों ने उन्हें असीम शक्ति प्रदान की। एकादशी व्रत की रक्षा के लिए राजा ने एक कठोर निर्णय लिया। वे अपनी म्यान से एक तीक्ष्ण खड्ग (तलवार) निकालकर बाहर आए। राजकुमार अत्यंत शांत भाव से भगवान नारायण का स्मरण करते हुए अपना सिर झुकाकर बैठ गया। राजा ने रोते हुए, कांपते हाथों से जैसे ही उस राजकुमार का सिर धड़ से अलग करने के लिए अपनी तलवार हवा में उठाई और पूरी शक्ति से नीचे की ओर प्रहार किया..."
"...उसी क्षण एक अद्भुत चमत्कार हुआ। राजा की तलवार राजकुमार की गर्दन को छूने से पूर्व ही हवा में रुक गई। उस छद्मवेशी सुंदरी के स्थान पर एक अत्यंत तीव्र और अलौकिक प्रकाश फैल गया। उस दिव्य प्रकाश के मध्य से स्वयं शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए, गले में वैजयंती माला और पीतांबर पहने हुए, साक्षात् चराचर जगत के स्वामी भगवान श्रीहरि प्रकट हो गए।"
"भगवान विष्णु ने अपने दोनों हाथों से उस राजा को गले लगा लिया और मेघ के समान गंभीर और मधुर वाणी में बोले— 'हे राजन्! उठो। मैं तुम्हारी इस असीम निष्ठा, धर्म-परायणता और एकादशी व्रत के प्रति तुम्हारे इस अटूट प्रेम से अत्यंत प्रसन्न हूँ। यह सुंदरी और यह सारी स्थिति मेरी ही रची हुई एक माया थी। मैं तो केवल तुम्हारी परीक्षा ले रहा था कि तुम मोह और धर्म के बीच किसे चुनते हो। तुमने सिद्ध कर दिया कि मेरे एकादशी व्रत से बढ़कर तुम्हारे लिए इस संसार में कुछ भी नहीं है। हे राजन्! तुम मेरी इस कठिन परीक्षा में पूर्ण रूप से सफल हुए हो।'"
"भगवान के दर्शन पाकर राजा, बड़ी रानी और राजकुमार गदगद हो गए। तीनों ने भगवान के चरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। राजा ने भगवान के चरणों को अपने अश्रुओं से धो दिया।"
"भगवान श्रीहरि ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा— 'हे राजन्! जो मनुष्य किसी भी संकट, मोह या लालच में आकर मेरी इस प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का त्याग नहीं करता, वह मुझे अत्यंत प्रिय है। मैं तुम्हें अजर-अमर होने का वरदान देता हूँ।' उसी क्षण भगवान के दिव्य पार्षद वहाँ एक स्वर्ण जटित, प्रकाशमान विमान लेकर प्रस्तुत हुए। भगवान ने उस धर्मनिष्ठ राजा, उनकी पतिव्रता बड़ी रानी और उस पितृभक्त राजकुमार को सदेह उस दिव्य विमान में बैठाया और उन्हें अपने परम धाम, वैकुण्ठ लोक को ले गए, जहाँ वे युगों-युगों तक शाश्वत आनंद को प्राप्त हुए।"
प्रबोधिनी एकादशी पर तुलसी महिमा एवं दीपदान का फल
ब्रह्मा जी ने आगे कहा— "हे नारद! इस प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि का शालिग्राम स्वरूप और माता तुलसी के पूजन का अत्यंत विशेष महत्त्व है। जो मनुष्य प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को तुलसी दल (पत्ते) अर्पित करता है, उसके दर्शन मात्र से जन्म-जन्मांतर के पाप भस्म हो जाते हैं। जो व्यक्ति नवधा भक्ति (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य, और आत्मनिवेदन) के माध्यम से तुलसी माता की पूजा करता है, उसे करोड़ों युगों का पुण्य प्राप्त होता है।"
"हे देवर्षि! जो मनुष्य कार्तिक मास में, विशेषकर प्रबोधिनी एकादशी के दिन तुलसी के पौधे का दान करता है या तुलसी विवाह का पुण्य कार्य संपन्न करता है, उसके घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और उसके पितृ तृप्त होकर स्वर्गलोक को जाते हैं। इस दिन देव मंदिरों में दीपदान करने से भगवान श्रीहरि अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्त के जीवन से अज्ञान का अंधकार सदा के लिए मिट जाता है। जो व्यक्ति इस दिन भगवान को कर्पूर और कुमकुम अर्पित करता है और शंख से जल अर्पण करता है, वह सीधे बैकुंठ को जाता है।"
पारंपरिक फल-वचन (फलश्रुति)
सूत जी महाराज ने शौनक आदि ऋषियों से कहा— "हे ऋषियों! भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को यह कथा सुनाते हुए अंत में इस व्रत की फलश्रुति का वर्णन किया।"
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, "हे युधिष्ठिर! इस प्रकार ब्रह्मा जी ने देवर्षि नारद को प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का यह महात्म्य और ये पावन कथाएँ श्रवण कराईं। हे पाण्डुपुत्र! जो प्रभाव और पुण्य ब्रह्मा जी ने नारद जी को बताया था, वही मैंने तुम्हें बताया है, इसे पूर्ण एकाग्रता से अपने हृदय में धारण करो।"
"हे राजन्! जो मनुष्य पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और नियम के साथ इस हरि-प्रबोधिनी (देवउठानी) एकादशी का व्रत करता है, उसके कई जन्मों के संचित भयंकर पाप, जैसे रुई के बड़े ढेर को अग्नि की एक छोटी सी चिंगारी पल भर में भस्म कर देती है, वैसे ही क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन अन्न का त्याग करता है, उसे चान्द्रायण व्रत के समान फल प्राप्त होता है।"
"हे युधिष्ठिर! संसार में जितने भी तीर्थ हैं— गंगा, गया, काशी, पुष्कर और कुरुक्षेत्र— उन सबका पुण्य तभी तक है, जब तक मनुष्य कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की इस प्रबोधिनी एकादशी का व्रत नहीं करता। जो मनुष्य इस दिन भगवान गोविंद के समीप बैठकर श्रद्धापूर्वक रात्रि-जागरण करता है, उसके स्थूल और सूक्ष्म सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। उसके पितृ नरक की यातनाओं से मुक्त होकर भगवान श्रीहरि के परम धाम को चले जाते हैं।"
"हे नृपश्रेष्ठ! जो प्राणी इस परम कल्याणमयी और मोक्षदायिनी एकादशी की इस संपूर्ण व्रत-कथा को श्रद्धापूर्वक पढ़ता है, अथवा किसी दूसरे के मुख से श्रवण करता है, अथवा किसी को श्रवण कराता है, उसे बिना किसी अन्य प्रयास के ही एक सहस्र (हजार) गौ-दान के बराबर असीम पुण्य की प्राप्ति होती है।"
"हे राजन्! इस कथा के श्रवण मात्र से मनुष्य को वाजपेय और अश्वमेध यज्ञों का फल मिल जाता है। अंत काल में यमदूत ऐसे व्यक्ति के समीप भी नहीं आ पाते और वह साक्षात् भगवान विष्णु के दूतों द्वारा विमान में बिठाकर उसी प्रकार वैकुण्ठ लोक को जाता है, जिस प्रकार वह धर्मनिष्ठ राजा गया था। अतः हे युधिष्ठिर! समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले, सुख-समृद्धि देने वाले और अंत में मोक्ष प्रदान करने वाले इस प्रबोधिनी एकादशी के महाव्रत का मनुष्य को सर्वथा यत्नपूर्वक पालन करना चाहिए।"
॥ इति श्री पद्मपुराणे और स्कन्दपुराणे वर्णित युधिष्ठिर-श्रीकृष्ण एवं ब्रह्मा-नारद संवाद के अंतर्गत श्री हरि-प्रबोधिनी (देवोत्थान) एकादशी व्रत कथा एवं माहात्म्य संपूर्णम् ॥