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तुलसी विवाह कब और कैसे करें?

संक्षिप्त उत्तर

तुलसी विवाह: कार्तिक शुक्ल द्वादशी (देवउठनी एकादशी भी)। विधि: तुलसी-शालिग्राम स्नान-श्रृंगार → मण्डप → कन्यादान → सात फेरे → 'ॐ तुलस्यै नमः' जाप → आरती-भोग → दान। विवाह मुहूर्तों की शुरुआत। कन्यादान तुल्य पुण्य।

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विस्तृत उत्तर

तुलसी विवाह हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण और पवित्र पर्व है जिसमें माता तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप से किया जाता है।

कब करें

  • तिथि: कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को तुलसी विवाह का प्रमुख विधान है। कुछ लोग देवउठनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल एकादशी) को भी तुलसी विवाह करते हैं।
  • अवधि: प्रबोधिनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक तुलसी विवाह किया जा सकता है।
  • महत्व: इसी दिन से हिन्दू धर्म में विवाह के शुभ मुहूर्तों की शुरुआत होती है (चातुर्मास समाप्ति)।

तुलसी विवाह की विधि

  1. 1तैयारी: तुलसी के पौधे को गंगाजल से स्नान कराएँ। हल्दी, केसर, चन्दन से सजाएँ। तुलसी को चुनरी ओढ़ाएँ और 16 श्रृंगार की सामग्री (चूड़ी, बिछुए, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी आदि) अर्पित करें।
  1. 1शालिग्राम सज्जा: शालिग्राम शिला को गंगाजल से स्नान कराकर तुलसी पत्तों और फूलों से सजाएँ। पीले-लाल वस्त्र पहनाएँ।
  1. 1मण्डप: तुलसी के पौधे के चारों ओर गन्ने या फूलों से छोटा मण्डप सजाएँ। रंगोली बनाएँ। आम-केले के पत्ते लगाएँ।
  1. 1कलश स्थापना: चौकी पर तुलसी और शालिग्राम स्थापित करें। बगल में जल भरा कलश रखें।
  1. 1विवाह विधि: सामान्य हिन्दू विवाह की तरह रस्में निभाएँ — कन्यादान (तुलसी माता का), मंत्रोच्चार, सात फेरे (शालिग्राम को गमले के चारों ओर घुमाकर), मौली बंधन।
  1. 1मंत्र: 'ॐ तुलस्यै नमः' और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप।
  1. 1आरती और भोग: विवाह संपन्न होने पर आरती करें। मिठाई, फल, पान का भोग लगाएँ।
  1. 1दान: विवाह के बाद दान अवश्य करें।

विशेष नियम: शालिग्राम पर चावल नहीं चढ़ाए जाते — तिल चढ़ाकर विवाह पूरा करवाना शुभ है। तामसिक भोजन वर्जित।

फल: कन्यादान के तुल्य पुण्य, अखंड सौभाग्य, घर में सुख-समृद्धि, नकारात्मक शक्तियों का नाश।

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शास्त्रीय स्रोत
पद्म पुराण, विष्णु पुराण, स्कन्द पुराण
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