विस्तृत उत्तर
पूजा के अंत में भगवान को श्रद्धापूर्वक फूल अर्पित करते समय 'मंत्र पुष्पांजलि' का पाठ किया जाता है, जिसे 'मंत्र पुष्पम' भी कहते हैं। इसका सबसे प्रमुख वैदिक श्लोक यजुर्वेद से लिया गया है— 'ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥' इसके बाद 'ॐ राजाधिराजाय प्रसह्यसाहिने...' और अंत में 'ॐ नानासुगन्धपुष्पाणि यथा कालोद्भवानि च। पुष्पांजलिर्मया दत्ता गृहाण परमेश्वर॥' बोला जाता है। इसका अर्थ है कि प्राचीन काल में देवताओं ने यज्ञ (परमात्मा) के द्वारा ही यज्ञ की आराधना की और वे महानता को प्राप्त होकर स्वर्गलोक (नाकं) में स्थापित हुए। हे परमेश्वर! विभिन्न प्रकार के सुगंधित और ऋतु के अनुसार उत्पन्न हुए ये पुष्प मैं आपको अर्पित कर रहा हूँ, कृपया इन्हें स्वीकार करें।





