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वीरभद्र सर्वेश्वरी साधना: बाधा नाशक, अद्भुत सिद्धि मंत्र !
वीरभद्र

वीरभद्र सर्वेश्वरी साधना: बाधा नाशक, अद्भुत सिद्धि मंत्र !

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वीरभद्र सर्वेश्वरी साधना मंत्र

वीरभद्र सर्वेश्वरी साधना मंत्र

ॐहंठठठसैंचांठंठठठह्र:ह्रौंह्रौंह्रैंक्षैंक्षोंक्षैंक्षंह्रौंह्रौंक्षैंह्रींस्मांध्मांस्त्रींसर्वेश्वरीहुंफट्स्वाहा!

मंत्र का शास्त्रीय अर्थ एवं गूढ़ माहात्म्य:

यह मंत्र भगवान वीरभद्र के सर्वेश्वरी स्वरूप को समर्पित है, जो उनकी सर्वोच्च और सर्व-नियंत्रक शक्ति का प्रतीक है। मंत्र में प्रयुक्त बीज अक्षर जैसे 'हं', 'ठ', 'सैं', 'चां', 'ह्र:', 'ह्रौं', 'ह्रीं', 'क्षैं', 'स्मां', 'ध्मां', 'स्त्रीं' अत्यंत शक्तिशाली हैं और विभिन्न दिव्य शक्तियों को जाग्रत करने की क्षमता रखते हैं। 'ठ ठ ठ' (स्तम्भन), 'ह्रौं' (शिव), 'ह्रीं' (माया/शक्ति), 'क्षैं' (नृसिंह या कूटस्थ बीज), 'हुं' (क्रोध, कवच), 'फट्' (अस्त्र, छेदन) जैसे बीज मंत्र के उग्र और रक्षात्मक स्वरूप को दर्शाते हैं। "सर्वेश्वरी" शब्द का अर्थ है 'सबकी ईश्वरी' या 'सर्वोच्च शक्तिशालिनी', जो वीरभद्र की उस शक्ति को इंगित करता है जिससे वे समस्त बाधाओं और शत्रुओं पर नियंत्रण पा सकते हैं। यह मंत्र वीरभद्र उपासना तंत्र से लिया गया है और इसे स्वयं सिद्ध, चमत्कारिक तथा तत्काल फल देने वाला माना जाता है। इसका गूढ़ माहात्म्य साधक को अभय प्रदान करने और उसे असाधारण सिद्धियों से युक्त करने में निहित है।

स्रोत्र-ग्रंथ संदर्भ:

वीरभद्र उपासना तंत्र।

विशिष्ट जप विधि, अनुष्ठान एवं संबंधित सावधानियां:

जाप विधि:

तत्काल बाधा निवारण: किसी भी आकस्मिक संकट या भय की स्थिति में इस मंत्र का स्मरण कर ७ बार शुद्ध जाप करना चाहिए।

स्मरण शक्ति वृद्धि: एक हजार बार बिना रुके लगातार जाप करने से स्मरण शक्ति उच्चतम स्तर तक पहुँचती है।

त्रिकाल दृष्टि प्राप्ति: दस हजार बार बिना रुके लगातार जाप करने से त्रिकाल दृष्टि (भूत, वर्तमान, भविष्य का ज्ञान) प्राप्त होती है।

खेचरत्व एवं भूचरत्व प्राप्ति: एक लाख बार बिना रुके, रुद्राक्ष माला से, लाल वस्त्र धारण कर, लाल आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके शुद्ध जाप करने से "खेचरत्व" (आकाश गमन) एवं "भूचरत्व" (पृथ्वी पर इच्छानुसार विचरण) की सिद्धि होती है।

सावधानियां:

यह मंत्र अत्यंत तीव्र तेज वाला है, इसे हंसी-ठिठोली में कदापि नहीं लेना चाहिए। इसका प्रयोग केवल अत्यंत आवश्यकता होने पर ही आत्मरक्षा या जनकल्याण के लिए करना चाहिए। अनुचित प्रयोग या दुर्भावना से किया गया जाप निष्फल या हानिकारक हो सकता है 8। गुरु मार्गदर्शन आवश्यक है।

मंत्रानुष्ठान से प्राप्त होने वाले फल एवं सिद्धियाँ:

भय का तत्काल निवारण, आकस्मिक बाधाओं से मुक्ति, असाधारण स्मरण शक्ति, त्रिकाल दृष्टि, खेचरत्व, भूचरत्व जैसी दुर्लभ सिद्धियाँ, शत्रुओं पर विजय, और समस्त प्रकार के कल्याण की प्राप्ति।