विस्तृत उत्तर
पूजा, अनुष्ठान या पाठ के अंत में अनजाने में हुई भूल-चूक के लिए भगवान से क्षमा मांगने की परंपरा है। इसके लिए सबसे प्रसिद्ध श्लोक है— 'आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां (क्षमस्व) परमेश्वर (परमेश्वरि)॥ मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन (सुरेश्वरि)। यत्पूजितं मया देव! परिपूर्णं तदस्तु मे॥' इसका हिंदी अर्थ है: हे प्रभु! न तो मैं आपको बुलाना (आवाहन) जानता हूँ, न ही आपको विदा करना (विसर्जन) जानता हूँ, और न ही मुझे पूजा की सही विधि पता है; इसलिए हे परमेश्वर, मुझे क्षमा करें। हे देव! मैं मंत्रों से हीन हूँ, क्रियाओं से हीन हूँ और मुझमें पूर्ण भक्ति भी नहीं है। मैंने जो भी यथासंभव आपकी पूजा की है, कृपया मेरी भूलों को क्षमा करते हुए उसे पूर्णता प्रदान करें। यह मंत्र साधक की दीनता और पूर्ण समर्पण को दर्शाता है।





