अघोर स्वरूप/अवतार के मंत्र
परिचय:
अघोर भगवान शिव का एक अत्यंत शक्तिशाली, रहस्यमय और परम तात्विक स्वरूप है। 'अघोर' का अर्थ है 'जो घोर न हो', अर्थात जो सौम्य हो, या वह स्थिति जो सांसारिक द्वंद्वों और भयों से परे हो। अघोर पंथ के साधक शिव के इसी स्वरूप की उपासना करते हैं। यह स्वरूप सृष्टि के परे, द्वैत से मुक्त और परम ज्ञान से युक्त माना जाता है।
अघोर शिव मंत्र
साधना विधि:
इस मंत्र की साधना के लिए गुरु और गणेश का स्मरण, शिवलिंग का पूजन, तथा काली हकीक या रुद्राक्ष माला से 21 बार जाप 11 दिनों तक करने का एक विधान मिलता है। एक अन्य विधि में विशिष्ट दिशा बंधन, महामृत्युंजय मंत्र से तिलक और भगवान अघोरेश्वर की स्तुति के उपरांत जाप का निर्देश है।
अघोरेश्वर अवधूत साधना मंत्र
विनियोग, न्यास, ध्यान, विस्तृत साधना विधि:
इस मंत्र की साधना के लिए विशिष्ट विनियोग (अस्य श्री अघोर मंत्रस्य अग्नि ऋषिः...), अंगन्यास, हृदयादिन्यास, और भगवान अघोरेश्वर के पंचमुख स्वरूप का ध्यान करने का विधान है। यह साधना किसी भी सोमवार या प्रदोष के दिन पीले वस्त्र धारण कर, अघोरेश्वर नारायण यंत्र स्थापित कर, संकल्प लेकर प्रारंभ की जा सकती है। रुद्राक्ष माला से 11 दिन तक नित्य 5 माला जप और अंत में हवन का निर्देश है।
लाभ:
इस सात्विक अघोर साधना से शरीर के दैहिक दोष समाप्त होते हैं, व्यक्तित्व में अद्भुत सम्मोहन और आकर्षण उत्पन्न होता है, शत्रुओं का शमन होता है, किसी भी प्रकार के मारण, मोहन, उच्चाटन आदि तांत्रिक प्रयोगों का प्रभाव नहीं पड़ता, जीवन में धन-धान्य की कमी नहीं रहती, और साधक निरंतर आनंद एवं मस्ती में रहते हुए चिंताओं से मुक्त हो जाता है।
अघोर मंत्र अपनी गूढ़ता, विशिष्ट साधना प्रक्रियाओं और समाज में इनसे जुड़ी विभिन्न (प्रायः भ्रामक) धारणाओं के कारण अत्यधिक अल्पज्ञात हैं। यद्यपि इन्हें साधारणतया श्मशान साधना और उग्र तांत्रिक क्रियाओं से जोड़ा जाता है, तथापि अघोरेश्वर अवधूत साधना जैसे सात्विक पक्ष भी शास्त्रों में वर्णित हैं, जो इनके कल्याणकारी स्वरूप को भी प्रकट करते हैं।
