अघोर शिव मंत्र (सर्वसिद्धि एवं तांत्रिक क्रिया शमन)
देवता:
भगवान शिव (अघोर स्वरूप)।
स्रोत:
इसका स्पष्ट पौराणिक स्रोत उल्लेखित नहीं है, यह अघोर परंपरा का एक प्रमुख मंत्र है।
प्रयोजन:
सर्वसिद्धि, सभी प्रकार की तांत्रिक क्रियाओं एवं नकारात्मक प्रभावों का शमन, ग्रह दोष शांति, असाध्य रोगों से मुक्ति, पूर्वजन्म के अशुभ कर्मों का क्षय, तथा अन्य शिव साधनाओं में शीघ्र सफलता।
विधि:
इस साधना का प्रारंभ शिवकल्प (जैसे महाशिवरात्रि) या श्रावण मास के किसी सोमवार को रात्रि १० बजे के पश्चात् करना चाहिए। साधक काले वस्त्र धारण कर उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा की ओर मुख करके बैठे। प्राण प्रतिष्ठित रुद्राक्ष या काली हकीक की माला का प्रयोग करें। पारद शिवलिंग का पूजन श्रेष्ठ है, अन्यथा नियमित पूजित शिवलिंग पर भी साधना की जा सकती है। साधना से पूर्व गुरुपूजन, गणेश पूजन, तथा रक्षा विधान (सरसों अभिमंत्रित कर दशों दिशाओं में फेंकना और आसन के चारों ओर कील या लोहे की वस्तु से सुरक्षा चक्र बनाना) करें। भस्म और चंदन मिश्रित तिलक महामृत्युंजय मंत्र से लगाएं। पारद शिवलिंग का सामान्य पूजन कर, "जय शम्भो विभो अघोरेश्वर स्वयम्भो जयशंकर। जयेश्वर जयेशान जय जय जय सर्वज्ञ कामदं ॥" इस स्तुति से भगवान अघोरेश्वर शिव का स्तवन करें। फिर मूल मंत्र की २१ माला जप करें। जप के उपरांत पुनः उपरोक्त स्तुति करें और समस्त जप भगवान अघोरेश्वर शिव को समर्पित करें। यह साधना ग्यारह दिनों तक नित्य करनी चाहिए। अंतिम दिन साधना समाप्ति पर पांच बिल्वपत्र, दूध-मिश्रित जल, अक्षत, सुगंध, वस्त्र, पुष्प, लड्डू और दक्षिणा मूल मंत्र से अर्पित करें।
महत्व:
भगवान शिव का अघोर स्वरूप अत्यंत उग्र और शक्तिशाली माना जाता है। यह मंत्र उनकी उन्हीं शक्तियों का आवाहन करता है। इसकी साधना जटिल है और इसमें विभिन्न प्रकार की अनुभूतियां (जैसे शरीर में तीव्र गर्मी, भयानक शब्द सुनाई देना) हो सकती हैं, जो साधना की सफलता का संकेत मानी जाती हैं। यह मंत्र सामान्य शिव पंचाक्षर या महामृत्युंजय मंत्र से भिन्न, एक विशिष्ट तांत्रिक एवं अघोर परंपरा का मंत्र है, जो अल्पज्ञात है।
