विस्तृत उत्तर
तुलसी विवाह हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है, जिसे देवउठनी एकादशी, देवप्रबोधिनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु चार माह की योगनिद्रा से जागते हैं और उनके जागने की पहली क्रिया के रूप में तुलसी के साथ उनका विवाह संपन्न होता है। कुछ विद्वान द्वादशी तिथि को भी तुलसी विवाह का विधान मानते हैं, और देश के विभिन्न क्षेत्रों में परंपरा भिन्न होती है।
तुलसी विवाह की पूजा विधि: प्रात:काल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। आंगन या छत पर चौकी स्थापित करें और उस पर तुलसी का गमला रखें। तुलसी के गमले में गन्ने का मंडप बनाएं। तुलसी माता का षोडशोपचार श्रृंगार करें — चुनरी, फूल, हल्दी-कुमकुम से सजाएं। शालिग्राम शिला को साफ करके गंगाजल से स्नान कराएं और उन्हें तुलसी के बाईं ओर स्थापित करें। इसके बाद विधि-विधान से विवाह संस्कार सम्पन्न करें — माला बदलाई जाती है और शालिग्राम को हाथ में लेकर तुलसी की सात परिक्रमाएं करते हैं। इस विवाह का पुण्य कन्यादान के समान माना जाता है। इस दिन से चातुर्मास में रुके हुए सभी मांगलिक कार्य — विवाह, गृहप्रवेश आदि — फिर से प्रारंभ होते हैं।




