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कामदा एकादशी व्रत कथा: चैत्र शुक्ल पक्ष की संपूर्ण पारंपरिक कथा

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कामदा एकादशी की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रमाण-आधारित व्रत कथा

मंगलाचरण एवं पौराणिक पृष्ठभूमि

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥

सूत जी शौनकादि अठासी हजार ऋषियों को संबोधित करते हुए नैमिषारण्य के परम पावन और तपःपूत क्षेत्र में अठारह पुराणों के दिव्य सार का वर्णन कर रहे हैं। इसी पावन प्रसंग में, भगवान श्रीहरि विष्णु की अहैतुकी कृपा, उनके विभिन्न अवतारों की महिमा के साथ-साथ मोक्षदायिनी एकादशी तिथियों के माहात्म्य का विस्तृत और अत्यंत गूढ़ प्रसंग उपस्थित होता है । एकादशी व्रत, जिसे शास्त्रों में 'हरिदिन', 'माधव-तिथि' अथवा 'वैष्णवों का परम धन' भी कहा गया है, अनंत जन्मों के संचित पापों का समूल नाश करने वाला और जीव को परम गति (मोक्ष) प्रदान करने वाला अमोघ साधन है। नैमिषारण्य के ज्ञान-पिपासु ऋषियों की धर्ममयी जिज्ञासा को शांत करते हुए सूत जी महाराज कहते हैं, "हे मुनिश्वरों! भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम भक्त और धर्म के साक्षात स्वरूप धर्मराज युधिष्ठिर को जिन चौबीस प्रमुख एकादशियों का माहात्म्य सुनाया था, जो समस्त पाप-तापों को भस्म करने की अद्भुत शक्ति रखती हैं, मैं उसी पुरातन, विशुद्ध और पवित्र कथा का सविस्तार वर्णन कर रहा हूँ" । यह विशिष्ट और पाप-नाशिनी कथा मुख्य रूप से श्री वराह पुराण और श्री पद्म पुराण के अंतर्गत आती है, जो चर-अचर जीवों को उनके द्वारा किए गए जाने-अनजाने भयंकर पापों और दारुण शापों से मुक्त करने का प्रशस्त मार्ग प्रदर्शित करती है ।


प्रथम भाग: श्री वराह पुराण पर आधारित मुख्य पारंपरिक कथा का विस्तृत वर्णन

कथा का पारंपरिक प्रारंभ: धर्मराज युधिष्ठिर एवं भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य संवाद

महाभारत के महाविनाशकारी युद्ध के पश्चात, जब धर्मराज युधिष्ठिर हस्तिनापुर के सिंहासन पर विराजमान हुए, तो उनके मन में धर्म, कर्म, पाप, पुण्य, शाप और उनके प्रायश्चित्त को लेकर अनेक प्रकार के गूढ़ प्रश्न उत्पन्न हुए। अपने अंतःकरण की पूर्ण शुद्धि, प्रजा के लौकिक व पारलौकिक कल्याण और लोक-संग्रह की पवित्र भावना से प्रेरित होकर, एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर ने पूर्ण पुरुषोत्तम, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारी भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण के चरण कमलों में साष्टांग वंदना की ।

युधिष्ठिर ने अत्यंत विनम्र भाव से, दोनों हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए पूछा— "हे वासुदेव! हे तीनों लोकों के नाथ! हे मधुसूदन! आपको मेरा बारंबार नमस्कार है। हे भगवन्, कृपा करके मेरे अज्ञान के अंधकार को दूर करें और मुझे यह बताने का कष्ट करें कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका क्या नाम है? उस परम पवित्र दिन किस देवता का विधि-विधान से पूजन किया जाता है और उस व्रत के पालन का क्या विधान तथा माहात्म्य है? हे कमलनयन, हे शरणागत-वत्सल! कृपया इस व्रत की कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन करें, जिससे संसार के सभी प्राणियों का उद्धार हो सके" ।

धर्मराज युधिष्ठिर के इस धर्मयुक्त, विनयपूर्ण और संपूर्ण लोक-कल्याणकारी प्रश्न को सुनकर, भक्तों के सभी प्रकार के कष्ट हरने वाले भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए। उनके मुखमंडल पर एक अलौकिक मुस्कान छा गई। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अमृतमयी वाणी में कहा— "हे राजन्! हे कुंतीपुत्र! हे भरतश्रेष्ठ! तुमने संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिए बहुत ही उत्तम और श्रेष्ठ प्रश्न किया है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम 'कामदा' एकादशी है । तुम अत्यंत एकाग्रचित्त और शुद्ध अंतःकरण से इस पुरातन, गुह्य और परम पवित्र कथा का श्रवण करो। यह कोई साधारण कथा नहीं है, अपितु यह वही अति प्राचीन कथा है, जिसे इक्ष्वाकु वंश के महान प्रतापी राजा दिलीप के विनयपूर्वक पूछने पर उनके कुलगुरु, ब्रह्मर्षि वसिष्ठ ने उन्हें सुनाया था। आज मैं उसी पावन कथा और संवाद को तुम्हारे समक्ष ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ। हे युधिष्ठिर! इस कथा के मात्र श्रवण से ही मनुष्य को वाजपेय यज्ञ के समान महान फल प्राप्त होता है और उसके जन्म-जन्मांतर के संचित पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं" ।

राजा दिलीप और महर्षि वसिष्ठ का पारंपरिक संवाद

भगवान श्रीकृष्ण ने आगे उस प्राचीन काल की घटना का वर्णन करते हुए कहा— हे युधिष्ठिर! प्राचीन काल में, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के महान प्रपितामह, सूर्यवंशी राजा दिलीप ने अपने कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ के पवित्र आश्रम में गमन किया। वहाँ पहुँचकर राजा दिलीप ने मुनि के श्रीचरणों में साष्टांग प्रणाम किया। मुनि की विधिपूर्वक सेवा सुश्रुषा करने के पश्चात, जब महर्षि वसिष्ठ प्रसन्न मुद्रा में अपने आसन पर विराजमान थे, तब राजा दिलीप ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनयपूर्वक अपनी जिज्ञासा प्रकट की— "हे भगवन्! हे ब्रह्मर्षि! हे ज्ञान के अथाह सागर! मैं आपके श्रीमुख से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गोपनीय बात सुनना चाहता हूँ। मेरी जानने की प्रबल इच्छा है कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है और उसका क्या माहात्म्य है? कृपा करके मुझ पर अनुग्रह करें और इसका सविस्तार वर्णन कर मेरे संशयों का निवारण करें" ।

अपने प्रिय शिष्य और धर्मपरायण राजा दिलीप की इस धर्ममयी और कल्याणकारी जिज्ञासा को देखकर महर्षि वसिष्ठ अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उत्तर दिया— "हे राजन्! तुमने बहुत ही उत्तम और लोकमंगल की बात पूछी है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसे शास्त्रों में 'कामदा' एकादशी के नाम से जाना जाता है । यह तिथि परम पुण्यमयी है, समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाली है और प्राणियों के सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाली है। जिस प्रकार एक भयंकर दावानल (जंगल की भयानक आग) सूखे ईंधनों के विशाल से विशाल ढेर को पल भर में जलाकर भस्म कर देती है, ठीक उसी प्रकार यह कामदा एकादशी पापरूपी ईंधन के लिए प्रलयंकारी दावानल के समान है। यह बड़े-बड़े और भयंकर पापों को क्षण भर में भस्म कर देती है और पिशाचत्व, राक्षस योनि या अन्य किसी भी नीच योनि से मुक्ति दिलाने में सर्वथा समर्थ है। हे राजन्, अब तुम एकाग्रचित्त होकर इस एकादशी की असीम महिमा को दर्शाने वाली एक अत्यंत प्राचीन, प्रामाणिक और अद्भुत कथा सुनो, जो पापों को नष्ट करने वाली और संसार में पुत्र-पौत्रादि की वृद्धि करने वाली है" ।

भोगीपुर/नागपुर नगरी का अद्भुत वैभव और महाराज पुण्डरीक का परिचय

महर्षि वसिष्ठ ने कथा का विस्तारपूर्वक आरंभ करते हुए राजा दिलीप से कहा— हे राजन्! अत्यंत प्राचीन काल की बात है, पाताल लोक के समीप एक अत्यंत विशाल, रहस्यमयी और ऐश्वर्यशाली नगरी स्थापित थी, जिसका नाम 'नागपुर' (जिसे कुछ प्राचीन ग्रंथों और कल्पभेदों में 'भोगी' या 'भोगीपुर' नगर भी कहा गया है) था । यह नगरी इतनी अधिक सुंदर, भव्य और समृद्ध थी कि स्वर्ग की अलकापुरी और अमरावती भी इसके अनुपम सौंदर्य के समक्ष फीकी प्रतीत होती थीं। इस नगर के विशाल महल, अट्टालिकाएँ, प्राचीरें और भव्य द्वार शुद्ध स्वर्ण और रजत (चांदी) से निर्मित थे तथा उनमें बहुमूल्य रत्न, मणियां और हीरे जड़े हुए थे । नगर के चारों ओर अत्यंत निर्मल जल से भरे सुंदर सरोवर थे, जिनमें कमल खिले रहते थे। चारों दिशाओं में विशाल उद्यान थे जो कल्पवृक्ष के समान फल-फूल देने वाले वृक्षों से सुशोभित थे。

उस वैभवशाली और मायावी नागपुर नगर में पुण्डरीक नाम का एक अत्यंत पराक्रमी, भयंकर और प्रतापी नाग राजा राज्य करता था । राजा पुण्डरीक का शासन अत्यंत कठोर था और वह अपनी अतुलनीय शक्ति और अथाह ऐश्वर्य के मद में चूर रहता था। राजा पुण्डरीक के उस विशाल राज्य में केवल नाग ही नहीं, अपितु अनेक गंधर्व, किन्नर, विद्याधर और स्वर्ग की अप्सराएँ भी स्थायी रूप से निवास करती थीं। ये सभी देव-योनियाँ निरंतर राजा की सेवा में उपस्थित रहती थीं और अपने-अपने कला-कौशल से उसके दरबार की शोभा बढ़ाती थीं । महाराज पुण्डरीक यद्यपि क्रोधी स्वभाव का था, परंतु वह कला, संगीत और नृत्य का भी बहुत बड़ा पारखी और प्रशसंक था。

गंधर्व ललित और अप्सरा ललिता का विस्तृत परिचय एवं अगाध प्रेम

उसी स्वर्णमयी नागपुर नगरी में एक अत्यंत श्रेष्ठ, रूपवती और सर्वगुण संपन्न अप्सरा निवास करती थी, जिसका नाम ललिता था । वह सामान्य अप्सरा नहीं थी, अपितु 'वीरधन्वा' नामक एक अत्यंत महात्मा और प्रतापी गंधर्व की रूपवती पुत्री थी । उसी नगर में एक अत्यंत सुरीला, आकर्षक और रूपवान गंधर्व भी निवास करता था, जिसका नाम ललित था ।

ललित गायन विद्या में अत्यंत निपुण था, उसके कंठ में साक्षात सरस्वती का वास प्रतीत होता था, जबकि ललिता नृत्य कला में सर्वश्रेष्ठ और अद्वितीय थी । वे दोनों ही पति-पत्नी के पवित्र बंधन में बंधे हुए थे और एक साथ उसी स्वर्णमयी नगरी के एक भव्य भवन में बड़े प्रेम से रहते थे । उन दोनों गंधर्व पति-पत्नी के बीच अत्यंत अपार, प्रगाढ़ और अगाध प्रेम था। वे दोनों एक-दूसरे के रूप, यौवन और कला पर अत्यंत मुग्ध थे और सदैव काम-पाश में बंधे रहते थे। उनका प्रेम इतना तीव्र था कि ललिता के हृदय में हर क्षण केवल अपने पति ललित की ही छवि बसी रहती थी, और ललित के मन-मस्तिष्क में भी रात-दिन केवल अपनी सुंदरी पत्नी ललिता का ही स्मरण रहता था। वे दोनों एक-दूसरे के बिना एक पल भी रहने की कल्पना नहीं कर सकते थे। उनका घर धन-धान्य, दिव्य वस्त्रों, आभूषणों और सभी प्रकार की सांसारिक सुख-सुविधाओं से पूर्णतः परिपूर्ण था ।

राजसभा का आयोजन, दरबार में गान और ललित की भयानक भूल

समय अपनी अबाध गति से व्यतीत हो रहा था। एक दिन की बात है, नागराज पुण्डरीक ने अपने विशाल और भव्य दरबार में एक महान सभा का आयोजन किया। उस राजसभा का दृश्य अत्यंत अलौकिक था। मणिजटित स्वर्ण सिंहासन पर नागराज पुण्डरीक विराजमान थे। उनके मस्तक पर बहुमूल्य मणियों का मुकुट सुशोभित था। उस सभा में अनेक महाभयंकर नाग, श्रेष्ठ गंधर्व, किन्नर, विद्याधर और राज्य के बड़े-बड़े अधिकारी अपने-अपने स्थानों पर उपस्थित थे । राजा पुण्डरीक दरबार में बैठकर संगीत और कला के मनोरंजन का आनंद ले रहा था。

उस दिन दरबार में गान-विद्या के उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए गंधर्व ललित को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था । ललित ने राजसभा के मध्य में खड़े होकर वीणा के तारों को झंकृत किया और अपने अत्यंत मधुर और जादुई कंठ से गान आरंभ किया। पूरी सभा उसके सुमधुर स्वर, आलाप और संगीत की लहरियों से मंत्रमुग्ध हो गई। परंतु, नियति को कुछ और ही मंजूर था। उस दिन राजसभा में किसी कारणवश उसकी प्राणप्रिय पत्नी ललिता उपस्थित नहीं थी ।

ललित भौतिक रूप से दरबार में उपस्थित था और गा भी रहा था, परंतु उसका अस्थिर मन अपनी पत्नी ललिता को खोज रहा था। गाते-गाते अचानक उसे अपनी प्रिय ललिता का प्रबल स्मरण हो आया। कामातुर होने और पत्नी के वियोग के विचारों में गहराई से खो जाने के कारण, ललित की वह एकाग्रता जो संगीत के लिए अनिवार्य होती है, पूरी तरह से भंग हो गई । संगीत शास्त्र में एकाग्रता का टूटना एक महान दोष माना जाता है। ललिता के ख्यालों में खो जाने के कारण ललित के गायन की लय बिगड़ गई, स्वर टूट गए, राग-रागिनियों का क्रम छिन्न-भिन्न हो गया, उसके पैरों की ताल की गति रुक गई और उसकी जीभ लड़खड़ाने लगी, जिससे संगीत के पदों की अत्यंत स्पष्ट गालागाल (त्रुटि और अशुद्धि) हो गई ।

कर्कोटक नाग द्वारा दोषारोपण एवं राजसभा में अपमान

नागराज पुण्डरीक की उस भरी सभा में 'कर्कोटक' नाम का एक अत्यंत कुटिल, क्रोधी और ईर्ष्यालु नाग भी अपने आसन पर उपस्थित था । कर्कोटक नाग ने ललित के स्वर और ताल के इस अचानक हुए पतन को तुरंत पहचान लिया। अपनी मायावी और तीक्ष्ण बुद्धि के कारण कर्कोटक ने ललित के मन की दशा, उसकी अस्थिरता और उसके कामातुर होने के गुप्त रहस्य को भी भली-भांति जान लिया ।

कर्कोटक नाग ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए बिना किसी विलंब के नागराज पुण्डरीक को ललित के पैरों की गति रुकने, गान में त्रुटि होने और उसके द्वारा अपनी पत्नी के ध्यान में मग्न होकर राजसभा के अपमान की पूरी बात विस्तार से बता दी । कर्कोटक ने राजा को भड़काते हुए कहा कि "हे राजन्! यह गंधर्व आपका तनिक भी सम्मान नहीं करता। इसके लिए अपना स्वामी (आप) महत्वपूर्ण नहीं है, अपितु यह अपनी पत्नी को आपसे अधिक महत्व देता है। इसी कारण यह अपनी पत्नी के कामुक विचारों में खोकर आपके इस पवित्र दरबार में गान को अशुद्ध कर रहा है, जो कि आपका और इस संपूर्ण राजसभा का घोर अपमान है" ।

महाराज पुण्डरीक का भयंकर क्रोध और दारुण शाप

कर्कोटक नाग की ये भड़काऊ बातें सुनकर नागराज पुण्डरीक का राजसी अहंकार अत्यंत आहत हो गया। राजा की आँखें क्रोध के मारे लाल अंगारे के समान हो गईं और उसका पूरा शरीर गुस्से से कांपने लगा। राजा का यह रौद्र रूप देखकर संपूर्ण राजसभा में सन्नाटा छा गया。

राजा पुण्डरीक ने अपने सिंहासन से उठकर, भरी सभा में गाते हुए कामातुर ललित को लक्ष्य करके अत्यंत कठोर और भयानक शाप दिया— "हे दुर्बुद्धे! हे नीच गंधर्व! तू मेरे सामने, इस राजसभा में गान करते समय भी अपनी पत्नी के काम-पाश के वशीभूत हो गया और तूने मेरे गान में घोर त्रुटि कर दी। तूने संगीत की विद्या का, इस राजसभा का और अपने स्वामी का घोर अपमान किया है। इसलिये जा, तू अपने इस सुंदर रूप को खोकर तत्काल मनुष्य का मांस भक्षण करने वाला एक महाभयंकर और क्रूर राक्षस हो जा!" ।

ललित का राक्षस योनि में पतन और उसका अत्यंत विकराल स्वरूप

महाराज पुण्डरीक के मुख से शाप के ये भयंकर शब्द निकलते ही राजसभा में एक अत्यंत हृदयविदारक और भयंकर घटना घटी। रूपवान, आकर्षक और सुरीले कंठ वाला गंधर्व ललित, क्षण भर में ही सबके देखते-देखते एक विकराल, वीभत्स और डरावने राक्षस में परिवर्तित हो गया ।

पुराणों में उस राक्षस के स्वरूप का अत्यंत वीभत्स, विस्तृत और डरावना वर्णन किया गया है। शाप के तीव्र प्रभाव से ललित का शरीर तत्काल बत्तीस (32) कोस (अथवा कुछ पाठों के अनुसार आठ योजन/चौंसठ मील) लंबा और विशाल हो गया । उसकी भुजाएँ जो कभी वीणा बजाती थीं, वे चार कोस (अथवा दो योजन) लंबी और कठोर हो गईं। उसका मुख एक विशाल पर्वत की भयंकर गुफा के समान गहरा और अंधकारमय हो गया । उसकी आँखें सूर्य और चंद्रमा के समान प्रखर, लाल और डरावनी हो गईं। उसकी गर्दन एक ऊंचे पहाड़ के समान दिखने लगी और उसके होंठ दो कोस लंबे हो गए, जिनमें से लार टपकने लगी ।

उसका रूप इतना विकराल और भयानक था कि उसे देखने मात्र से प्राणियों के प्राण सूख जाते थे। इस प्रकार भयंकर मांसभक्षी राक्षस बन जाने पर, अपने पूर्व जन्म के शुभ कर्मों और दिव्य चेतना को पूरी तरह से भूलकर, वह राक्षस अनेक प्रकार के दारुण दुःख भोगने लगा। वह घने और अंधकारमय जंगलों में पागलों की भांति भटकते हुए घोर पाप कर्मों (मनुष्य और जीव जंतुओं के निर्दयी भक्षण) में प्रवृत्त हो गया ।

पत्नी ललिता का अथाह विलाप, संघर्ष और वन-गमन

अपने प्रियतम पति ललित की यह दुर्दशा, पतन और विकराल आकृति देखकर ललिता के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका हृदय विदीर्ण हो गया। वह मन ही मन बहुत चिंतित हुई और भारी दुःख के कारण वह असीम कष्ट पाने लगी । जिस पति के बिना वह एक क्षण भी नहीं रह सकती थी, जिस पति के स्पर्श मात्र से वह रोमांचित हो जाती थी, आज वही पति एक डरावना, हिंसक और वीभत्स राक्षस बन चुका था。

ललिता अथाह दुःख से व्यथित होकर करुण क्रंदन करते हुए विलाप करने लगी— "हा दैव! यह मेरे भाग्य में क्या लिखा था? मेरे किस पूर्व जन्म के पाप का यह प्रतिफल है? मैं अब क्या करूँ? मैं कहाँ जाऊँ? मेरे प्राणनाथ, मेरे सर्वस्व स्वामी अपने इस पाप-दोष और राजा के शाप के कारण भयंकर राक्षस हो गए हैं और घोर कष्ट पा रहे हैं। मैं किस जतन से, कौन सा उपाय करके अपने पति को इस नरक तुल्य यातना से मुक्त कराऊँ?" ।

परंतु ललिता ने अपने पति का साथ नहीं छोड़ा। वह एक सच्ची, निष्ठावान और पतिव्रता स्त्री थी। राक्षस बना ललित घोर अंधकारमय वनों में रहते हुए जब अनेक प्रकार के पाप कर्म करता और भूख से व्याकुल होकर पागलों की भांति भटकता, तो उसकी सुंदरी पत्नी ललिता भी रोती और विलाप करती हुई उन कंटीले, दुर्गम और भयानक वनों में उसके पीछे-पीछे छाया की भांति घूमने लगी । कँटीली झाड़ियों से उसके सुंदर वस्त्र फट गए, उसके कोमल पैरों से रक्त बहने लगा, परंतु उसने अपने पति का त्याग नहीं किया। अपने पति की ऐसी दयनीय, हिंसक और क्रूर अवस्था देखकर उसे दिन-रात एक पल के लिए भी चैन नहीं मिलता था और उसकी आँखों से निरंतर अश्रुधारा बहती रहती थी。

विन्ध्याचल पर्वत पर महर्षि शृंगी (ऋष्यशृंग) के आश्रम में गमन

अपने पति के पीछे-पीछे बीहड़ जंगलों में भटकते हुए, रोती और विलाप करती हुई ललिता एक दिन विन्ध्याचल पर्वत के अत्यंत दुर्गम और घने जंगलों में पहुँच गई । वहाँ भटकते हुए अचानक उसे एक अत्यंत शांत, पवित्र और दिव्य आश्रम दिखाई दिया। यह पवित्र आश्रम महान तपस्वी महर्षि शृंगी (जिन्हें शास्त्रों में ऋष्यशृंग मुनि भी कहा गया है) का था ।

आश्रम का वातावरण अत्यंत आलौकिक और शांतिपूर्ण था। वहाँ प्रवेश करते ही मन के सारे ताप मिट जाते थे। वहाँ किसी भी प्राणी के साथ किसी का कोई वैर-विरोध नहीं था। जन्मजात वैरी माने जाने वाले हिंसक पशु भी वहाँ एक साथ शांत भाव से बैठे थे। आश्रम में वेद मंत्रों की ध्वनि गूंज रही थी और यज्ञ की पवित्र अग्नि प्रज्वलित थी। मुनि शृंगी अपने आसन पर अत्यंत शांत मुद्रा में, ध्यान मग्न विराजमान थे ।

ललिता अपनी थकावट, पैरों की पीड़ा और दुःख को भूलकर शीघ्रता के साथ उस पवित्र आश्रम में प्रविष्ट हुई। वह मुनि के समीप गई और उनके सामने पहुँचकर अत्यंत श्रद्धाभाव से साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया। तदुपरांत वह दोनों हाथ जोड़कर विनीत भाव से मुनि के समक्ष खड़ी हो गई ।

मुनि शृंगी और ललिता का करुणापूर्ण संवाद

महर्षि शृंगी अत्यंत दयालु, कृपालु और त्रिकालदर्शी थे। उन्होंने उस दुःखी, अश्रुपूर्ण और मलिन वेशभूषा वाली सुंदरी को देखकर अत्यंत करुणा भरे स्वर में पूछा— "हे शुभे! हे कल्याणी! तुम कौन हो? तुम कहाँ से इस घने और भयंकर वन में यहाँ आयी हो? तुम्हारा मुख इतना मलिन क्यों है? तुम्हारे नेत्रों से अविरल अश्रु क्यों बह रहे हैं? तुम निर्भय होकर अपने इस अपार दुःख का कारण मेरे सामने सच-सच बताओ" ।

महर्षि के इन अमृततुल्य और सांत्वना देने वाले वचनों को सुनकर ललिता ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से रोते हुए उत्तर दिया— "हे महामुने! हे ब्रह्मन्! मैं महात्मा 'वीरधन्वा' नाम वाले एक अत्यंत प्रतापी गन्धर्व की अभागी पुत्री हूँ । मेरा नाम ललिता है। मेरे स्वामी, मेरे प्राणनाथ गंधर्व ललित, नागराज पुण्डरीक के भयंकर शाप और अपने स्वयं के पाप-दोष के कारण एक महाभयंकर और क्रूर राक्षस हो गए हैं । उनकी यह वीभत्स अवस्था और नरक तुल्य यातना देखकर मुझे तनिक भी चैन नहीं है। मेरा हृदय विदीर्ण हो रहा है। मैं उन्हें इस दशा में नहीं देख सकती, इसलिए मैं उनके पीछे-पीछे इन वनों में भटक रही हूँ।

हे ऋषीश्रेष्ठ! हे विप्रवर! कृपा करके मुझे यह बताइये कि इस दारुण समय में मेरा क्या कर्त्तव्य है? मैं कौन सा ऐसा कठोर व्रत, तप, अनुष्ठान या प्रायश्चित्त करूँ जिसके पुण्यों के महान प्रभाव से मेरे पतिदेव इस भयानक राक्षस भाव से और राजा के कठोर शाप से सर्वथा छुटकारा पा जाएँ? हे मुनिश्रेष्ठ, आप दीनों पर दया करने वाले हैं, मुझ दुःखी पर कृपा करें और मेरे पति के उद्धार का मुझे उपदेश कीजिये" ।

मुनि द्वारा पापनाशिनी कामदा एकादशी व्रत का उपदेश

ललिता का यह संपूर्ण वृत्तान्त और उसका हृदयविदारक करुण विलाप सुनकर मुनि शृंगी का हृदय करुणा और दया से भर गया। मुनि ने उसे सांत्वना देते हुए अत्यंत मधुर वाणी में कहा— "हे भद्रे! हे पुत्री! तुम तनिक भी चिंता मत करो। भगवान श्रीहरि की शरण में आने वाले का कभी अमंगल नहीं होता। इस समय चैत्र मास का शुक्ल पक्ष चल रहा है । अब शीघ्र ही जो एकादशी तिथि आने वाली है, उसका नाम 'कामदा' एकादशी है । यह एकादशी सब प्रकार के घोर पापों को हरने वाली, मनुष्यों की सभी लौकिक और पारलौकिक मनोकामनाओं को शीघ्र पूर्ण करने वाली और व्रतों में अत्यंत उत्तम है。

हे सुंदर ललिते! तुम इसी 'कामदा एकादशी' का पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और विधि-पूर्वक व्रत करो। एकादशी के दिन पूर्ण उपवास रखो, अन्न-जल का त्याग करो और रात्रि में जागरण करते हुए भगवान वासुदेव श्रीहरि का निरंतर स्मरण करो। द्वादशी के दिन व्रत का पारण करने से पूर्व, इस व्रत का जो भी अतुलनीय पुण्य तुम्हें प्राप्त हो, उसे संकल्प करके अपने स्वामी (पति) को दे डालो । तुम्हारे इस उत्तम व्रत के महान पुण्य का फल देते ही, भगवान नारायण की कृपा से क्षण भर में तुम्हारे पति के शाप का दोष सर्वथा दूर हो जाएगा और वह सहज ही इस पिशाचत्व और राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा" ।

श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन और भगवान वासुदेव से कातर प्रार्थना

महर्षि शृंगी के इन अमृतमय वचनों को सुनकर ललिता के निराशा से भरे मन में आशा की एक नई और उज्ज्वल किरण जाग उठी। उसने महर्षि के श्रीचरणों में पुनः साष्टांग प्रणाम किया और उनकी आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए आश्रम में ही रुक गई。

जब चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी का परम पावन दिन आया, तो ललिता ने मुनि के द्वारा बताए गए शास्त्रीय विधान के अनुसार पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और अगाध भक्ति भाव से उपवास किया । उसने दिन-रात निराहार रहकर भगवान वासुदेव श्रीहरि के मंगलमय नामों का स्मरण किया और रात्रि जागरण किया。

अगले दिन, अर्थात् द्वादशी तिथि को, जब पारण का शुभ समय आया, तो ललिता ने स्नान आदि से निवृत्त होकर ब्राह्मणों (महर्षि शृंगी) के समक्ष उपस्थित होकर और भगवान वासुदेव की प्रतिमा के समक्ष हाथ जोड़कर अत्यंत कातर और भावपूर्ण प्रार्थना की— "हे प्रभु! हे वासुदेव! हे शरणागत-वत्सल! मैंने अपने पति के उद्धार के निमित्त जो यह 'कामदा एकादशी' का विधिपूर्वक उपवास और व्रत किया है, उसके महान पुण्य के प्रभाव से मेरे पतिदेव का यह भयंकर राक्षस-भाव तत्काल नष्ट हो जाए और वे राजा के शाप से मुक्त हो जाएँ। मेरे इस एकादशी व्रत का संपूर्ण पुण्य मैं उन्हें अर्पित करती हूँ" ।

व्रत-फल से शाप-निवारण और पुनः गंधर्व-रूप की प्राप्ति का अद्भुत चमत्कार

ललिता के मुख से यह पुण्य-दान का संकल्प और प्रार्थना पूरी होते ही उस तपोवन में एक अद्भुत और अकल्पनीय चमत्कार हुआ। कामदा एकादशी के व्रत का वह अमोघ फल जैसे ही ललित को प्राप्त हुआ, उसका वह बत्तीस कोस लंबा, भयंकर, वीभत्स और डरावना राक्षस रूप तत्काल विलुप्त हो गया । उसके सारे संचित पाप और राजा पुण्डरीक के शाप का दोष उसी क्षण भस्म हो गया, जैसे दावानल में सूखी लकड़ियों का ढेर जलकर राख हो जाता है。

क्षण भर में ही ललित ने अपना पुराना और दिव्य गंधर्व स्वरूप पुनः प्राप्त कर लिया । कामदा एकादशी के व्रत के अपार प्रभाव से वह पहले की अपेक्षा भी अधिक सुंदर, तेजवान और आकर्षक हो गया। वह अनेक प्रकार के दिव्य और सुंदर वस्त्रों तथा बहुमूल्य आभूषणों से अलंकृत होकर अपनी प्राणप्रिय पत्नी ललिता के समक्ष आ खड़ा हुआ。

अपने प्राणनाथ को पुनः उसी दिव्य, सुडौल और आकर्षक स्वरूप में पाकर ललिता की आँखों से हर्ष के आंसू अविरल बह निकले। ललित और ललिता का यह पुनर्मिलन अत्यंत भावुक और अलौकिक था। स्वर्ग से देवी-देवताओं ने उन दोनों पति-पत्नी की इस निष्ठा और एकादशी के प्रभाव को देखकर उन पर पुष्पों की वर्षा की । वे दोनों पुनः उसी प्रकार प्रेमपूर्वक विहार करने लगे। अंततः, इस लोक में दीर्घकाल तक सुख भोगने के पश्चात, मृत्यु के उपरांत वे दोनों एक दिव्य 'पुष्पक विमान' पर आरूढ़ होकर आकाश मार्ग से सीधे विष्णुलोक (स्वर्ग) को चले गए ।


द्वितीय भाग: पद्म पुराण एवं अन्य शास्त्रीय स्रोतों पर आधारित कथा का द्वितीय स्वरूप (कथा-भेद)

सनातन धर्म की विशालता और अठारह पुराणों के अथाह विस्तार के कारण, एक ही कथा के कई पारंपरिक पाठांतर और क्षेत्रीय संस्करण (Recensions) पाए जाते हैं। यद्यपि कथा का मूल तत्व, पात्रों के नाम (ललित-ललिता) और एकादशी का उपदेश अपरिवर्तित रहता है, परंतु कुछ पारंपरिक कथा वाचकों द्वारा श्री पद्म पुराण (विशेषकर क्रिया-सागर-सार) और भविष्य पुराण के आधार पर भी इस कथा का वाचन किया जाता है । एकादशी के व्रत के अवसर पर पारंपरिक रूप से किसी भी अंग को छोड़ना अनुचित माना जाता है, अतः कथा के इस दूसरे प्रमुख और प्रचलित संस्करण का भी पूर्ण वर्णन किया जा रहा है ताकि व्रत कथा का श्रवण पूर्ण और शास्त्र-सम्मत हो。

कथा का आरंभिक भेद और रत्नपुर नगरी का वर्णन

पद्म पुराण और कुछ अन्य पौराणिक उल्लेखों के अनुसार, कथा का आरंभ सूत जी और शौनक ऋषियों के संवाद से ही होता है, परंतु नगरी के नाम और कुछ विवरणों में थोड़ा सा भेद पाया जाता है。

इस संस्करण के अनुसार, वसिष्ठ मुनि राजा दिलीप से कहते हैं— "हे राजन्! प्राचीन काल में 'रत्नपुर' नाम की एक अत्यंत समृद्ध, वैभवशाली और दिव्य नगरी थी । यह नगरी पूर्ण रूप से स्वर्ण, रजत और बहुमूल्य रत्नों से सुसज्जित थी, जिसके कारण ही इसका नाम रत्नपुर पड़ा था। इस नगरी में विषैले और तीखे दांतों वाले नाग मदमत्त होकर विचरण करते थे और संपूर्ण नगर पर उनका आधिपत्य था । इस रत्नपुर नगरी के अधिपति महाराज पुण्डरीक थे, जो एक अत्यंत प्रतापी और शक्तिशाली नाग थे" ।

(शास्त्रीय टिप्पणी: वराह पुराण संस्करण में नगरी का नाम मुख्य रूप से नागपुर या भोगीपुर बताया गया है , जबकि पद्म पुराण और उससे जुड़े अन्य पाठों में इसे स्पष्ट रूप से 'रत्नपुर' कहा गया है । पारंपरिक व्रत कथा के पाठ में इन दोनों नामों का उल्लेख पूर्णतः मान्य और प्रामाणिक है।)

घटनाक्रम का विस्तार और दरबार का दृश्य

रत्नपुर नगरी में महाराज पुण्डरीक के दरबार में ललित नामक गंधर्व और ललिता नामक अप्सरा (नर्तकी) रहते थे । ललित राजदरबार का मुख्य गायक था और ललिता मुख्य नर्तकी थी। वे दोनों पति-पत्नी थे और उनके मध्य ऐसा अगाध प्रेम था कि वे एक पल का भी वियोग सहन नहीं कर पाते थे ।

एक दिन महाराज पुण्डरीक के दरबार में एक विशाल संगीत सभा का आयोजन हुआ। ललित को गायन के लिए बुलाया गया। परंतु उस दिन किसी कारण से ललिता वहां उपस्थित नहीं हो सकी । ललित राजसभा में राजा के समक्ष गान प्रस्तुत कर रहा था, किंतु उसकी दृष्टि बार-बार सभा में अपनी पत्नी को खोज रही थी। अपनी पत्नी के प्रबल स्मरण और कामुक विचारों के कारण, वह गाते-गाते अपने गान के कुछ पदों और सुरों को भूल गया और उसका गायन अशुद्ध हो गया ।

कर्कोटक नाग का हस्तक्षेप और राजा का शाप

दरबार में पाताल लोक का एक अत्यंत रहस्यमयी और कपटी नाग उपस्थित था, जिसका नाम कर्कोटक था । कर्कोटक नाग ने ललित के मन की दशा को भाँप लिया। उसने तुरंत राजा पुण्डरीक के कान भरे और कहा कि "हे राजन्! यह गंधर्व आपका सम्मान नहीं करता। इसके लिए अपना स्वामी (आप) महत्वपूर्ण नहीं है, अपितु यह अपनी पत्नी को आपसे अधिक महत्व देता है और उसी के कामुक विचारों में खोकर इसने आपके दरबार में गान को अशुद्ध कर दिया है" ।

यह सुनते ही राजा पुण्डरीक भयंकर क्रोध से प्रज्वलित हो उठा। उसने ललित को शाप दिया— "तूने एक कामी पुरुष की भाँति मेरे दरबार की मर्यादा का उल्लंघन किया है। अतः तू साठ मील (चौंसठ मील/योजन) ऊँचा, पर्वत के समान दिखने वाला और मनुष्यों को खाने वाला एक क्रूर राक्षस बन जा!" ।

शाप के तुरंत बाद ललित एक भीमकाय नरभक्षी राक्षस में बदल गया। उसका शरीर पर्वतों के समान विशाल हो गया और वह जंगलों में दर-दर भटकने लगा。

ललिता का संघर्ष और ऋषि शृंगी का मार्गदर्शन

ललिता अपने पति की इस दुर्दशा को देखकर अत्यंत दुःखी हुई। वह अपने नरभक्षी और पाप कर्मों में लिप्त राक्षस पति के पीछे-पीछे विन्ध्याचल की पहाड़ियों और जंगलों में भटकने लगी ।

भटकते हुए वह विन्ध्याचल पर्वत पर महर्षि शृंगी के आश्रम में पहुँची। उसने ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया और अपने पति को इस दारुण दुःख और राजा के शाप से मुक्त करने का उपाय पूछा ।

ऋषि शृंगी ने अत्यंत करुणा भाव से उसे देखा और कहा— "पुत्री, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में 'कामदा' नामक एकादशी आती है। तुम इस व्रत का पूर्ण विधि-विधान से पालन करो और इस व्रत से जो पुण्य अर्जित हो, उसे अपने पति के पापों के प्रायश्चित्त स्वरूप भगवान को अर्पित कर दो" ।

व्रत का पारण और भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति

ललिता ने महर्षि की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया। उसने चैत्र शुक्ल एकादशी (कामदा एकादशी) का पूर्ण उपवास रखा। अगले दिन, द्वादशी तिथि को, वह पुनः महर्षि शृंगी के पास गई और वहाँ स्थापित भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण) की प्रतिमा के समक्ष नतमस्तक होकर प्रार्थना की ।

उसने अत्यंत गदगद कंठ से भगवान से निवेदन किया— "हे कृष्ण! हे माधव! मैंने जो यह कामदा एकादशी का व्रत किया है, इसके संपूर्ण पुण्यों का फल मेरे पति को प्राप्त हो और राजा पुण्डरीक का शाप समाप्त हो जाए। मेरे पति को उनका गंधर्व स्वरूप पुनः प्राप्त हो" ।

उसकी इस श्रद्धापूर्ण स्तुति और व्रत के पुण्य के प्रभाव से एक चमत्कार हुआ। ललित का वह भयानक राक्षस रूप उसी क्षण लुप्त हो गया और वह पुनः एक सुंदर गंधर्व बन गया। तत्पश्चात, एक दिव्य रथ (विमान) स्वर्ग से उतरा और उन दोनों पति-पत्नी को ससम्मान स्वर्गलोक ले गया ।


तृतीय भाग: कथा के शास्त्रीय भेदों की तुलनात्मक तालिका

कथा श्रवण करने वाले सुधी जनों के ज्ञानार्जन हेतु, अठारह पुराणों में वर्णित कामदा एकादशी कथा के दोनों प्रमुख स्वरूपों का संक्षिप्त विवरण इस तालिका में प्रस्तुत है:

विवरण / प्रसंग वराह पुराण संस्करण (प्राथमिक) पद्म पुराण संस्करण (वैकल्पिक)
नगरी का नाम नागपुर / भोगीपुर रत्नपुर
राजा का नाम नागराज पुण्डरीक नागराज पुण्डरीक
मुख्य पात्र गंधर्व ललित एवं अप्सरा ललिता गंधर्व ललित एवं अप्सरा ललिता
दोषारोपणकर्ता कर्कोटक नाग कर्कोटक नाग
राक्षस स्वरूप (विस्तार) ३२ कोस लंबा, ४ कोस लंबी भुजाएँ ६४ मील/योजन ऊँचा भीमकाय स्वरूप
आश्रम व ऋषि विन्ध्याचल पर्वत, महर्षि शृंगी (ऋष्यशृंग) विन्ध्याचल पर्वत, महर्षि शृंगी
कथा का मूल उपदेशक वसिष्ठ द्वारा राजा दिलीप को श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को (मूल सूत-शौनक संवाद)

(यह तालिका कथा के पूर्ण और प्रामाणिक स्वरूप को स्पष्ट करती है, जिससे कथा श्रवण में कोई भी शास्त्रीय त्रुटि या शंका शेष न रहे।)


चतुर्थ भाग: पारंपरिक उपसंहार एवं विस्तृत फलश्रुति

इस अद्भुत और पापनाशिनी कथा को विस्तारपूर्वक सुनाने के पश्चात महर्षि वसिष्ठ ने राजा दिलीप से कहा— "हे राजन्! इस प्रकार यह कामदा एकादशी समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली और ब्रह्महत्या जैसे घोर पापों तथा पिशाचत्व (राक्षस योनि) आदि दोषों का समूल नाश करने वाली है" । संसार में इससे उत्तम और पवित्र दूसरा कोई व्रत नहीं है ।

कथा के अंतिम चरण में, भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को संबोधित करते हुए इस कथा का उपसंहार किया— "हे नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! मैंने मानव जाति के कल्याण और लोगों के हित के लिए तुम्हारे सामने इस अत्यंत गुप्त और पवित्र व्रत का वर्णन किया है । जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति-पूर्वक इस कामदा एकादशी का व्रत करता है, उसके जीवन से सभी शाप और पाप नष्ट हो जाते हैं । हे राजन्! जो भी व्यक्ति इस अद्भुत कथा को सुनता है, उसे अपनी पूर्ण क्षमता के अनुसार कामदा एकादशी का पवित्र व्रत अवश्य करना चाहिए。

तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, और पाताल) में, चर और अचर सभी जीवों में, इस एकादशी के दिन से अधिक पवित्र और पापनाशक कोई दूसरा दिन नहीं है । यह एकादशी ब्रह्महत्या जैसे महापाप को भी जड़ से मिटा सकती है, यह राक्षसी शापों को निष्प्रभावी कर देती है और प्राणी की चेतना को पूर्ण रूप से शुद्ध कर देती है ।

अतः, हे युधिष्ठिर! जो भी प्राणी परम श्रद्धा से कामदा एकादशी का व्रत करता है, अथवा इस व्रत की कथा का पाठ करता है या एकाग्रचित्त होकर इसे श्रवण करता है, उसे महान 'वाजपेय यज्ञ' के करने का फल प्राप्त होता है । वह इस लोक में समस्त सुखों को भोगकर अंत में निःसंदेह मेरे परम धाम (विष्णुलोक) को प्राप्त करता है।"

॥ इति श्री वराह पुराण एवं पद्म पुराण अंतर्गत युधिष्ठिर-श्रीकृष्ण तथा वसिष्ठ-दिलीप संवाद में कामदा एकादशी व्रत कथा संपूर्ण ॥

बोलिए श्री वासुदेव भगवान की जय! श्री लक्ष्मी नारायण भगवान की जय!

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