अपरा एकादशी व्रत कथा: सम्पूर्ण, पारंपरिक एवं प्रामाणिक पौराणिक पाठ
मंगलाचरण एवं प्रस्तावना
श्रीगणेशाय नमः। श्रीसरस्वत्यै नमः। श्रीवेदव्यासाय नमः。
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
सनातन धर्म की पौराणिक परंपरा और शास्त्रों में एकादशी व्रत को सर्वोपरि, महापापों का समूल नाश करने वाला और मोक्षदायिनी माना गया है । ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को पारंपरिक रूप से 'अपरा एकादशी' (तथा अचला एकादशी) के नाम से जाना जाता है । पारंपरिक एकादशी-व्रत ग्रंथों के अनुसार, इस दिन मुख्य रूप से दो प्रमुख पौराणिक स्रोतों का पाठ किया जाता है। पहला भाग पद्म पुराण के उत्तरखण्ड (अध्याय ५०) से लिया गया है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा धर्मराज युधिष्ठिर को अपरा एकादशी का विस्तृत माहात्म्य और फलश्रुति बताई गई है । दूसरा भाग ब्रह्माण्ड पुराण से उद्धृत है, जिसमें राजा महिध्वज और महर्षि धौम्य की अत्यंत पावन और मोक्षदायिनी कथा का वर्णन है ।
इस पुण्य अवसर पर पढ़ी जाने वाली दोनों पारंपरिक कथाओं (माहात्म्य एवं मुख्य कथा) का पूर्ण, अक्षुण्ण, क्रमबद्ध और प्रामाणिक स्वरूप नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है。
प्रथम खण्ड: कथा का पारंपरिक प्रारंभ (पद्म पुराण आधारित युधिष्ठिर–श्रीकृष्ण संवाद)
कथा का पारंपरिक आरंभ महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण से किए गए प्रश्न से होता है ।
युधिष्ठिर द्वारा प्रश्न
धर्मराज युधिष्ठिर ने दोनों हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रतापूर्वक भगवान श्रीकृष्ण से पूछा:
ज्येष्ठस्य कृष्णपक्षे तु किं नामैकादशी भवेत्।
श्रोतुमिच्छामि माहात्म्यं तद्वदस्व जनार्दन॥
अर्थ: "हे जनार्दन! हे माधव! ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? हे प्रभो! मैं उसका माहात्म्य सुनना चाहता हूँ। कृपा करके मुझे उसका विस्तारपूर्वक वर्णन सुनाइए" ।
श्रीकृष्ण द्वारा अपरा एकादशी का माहात्म्य-वर्णन
युधिष्ठिर के इस धर्म-युक्त प्रश्न को सुनकर भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपरा एकादशी की असीम महिमा का वर्णन प्रारंभ किया:
साधु पृष्टं त्वया राजन्लोकानां हितकाम्यया।
बहुपुण्यप्रदा ह्येषा महापातकनाशिनी॥
अपरा नाम राजेन्द्र अपरा पुत्रदायिनी।
लोके प्रसिद्धितां याति अपरां यस्तु सेवते॥
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण ने कहा— "हे राजन्! तुमने सम्पूर्ण लोकों के प्राणियों के हित की कामना से बहुत ही उत्तम बात पूछी है। हे राजेन्द्र! इस महान पुण्यमयी एकादशी का नाम 'अपरा' है। यह एकादशी अपार पुण्य प्रदान करने वाली और मनुष्य के बड़े-से-बड़े महापातकों (घोर पापों) का नाश करने वाली है। जो भी प्राणी इस अपरा एकादशी का सेवन (श्रद्धापूर्वक व्रत) करता है, वह इस लोक में अपार प्रसिद्धि को प्राप्त करता है" ।
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को उन घोर पापों का स्मरण कराया जो केवल इस एक व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाते हैं:
ब्रह्महत्याभिभूतोऽपि गोत्रहा भ्रूणहा तथा।
परापवादवादी च परस्त्री रसिकोऽपि च॥
अपरा सेवनाद्राजन्विपाप्मा भवति ध्रुवम्।
कूटसाक्ष्यं कूटमानं तुलाकूटं करोति यः॥
कूटवेदं पठेद्यस्तु कूटशास्त्रं तथैव च।
ज्योतिषी गणकः कूटः कूटायुर्वैदिको भिषक्॥
कूटसाक्ष्य समायुक्तो विज्ञेया नरकौकसः।
अपरा सेवनाद्राजन्पापैर्मुक्ता भवंति ते॥
अर्थ: भगवान बोले— "हे राजन्! जो मनुष्य ब्रह्महत्या (ब्राह्मण की हत्या) के पाप से दबा हुआ हो, जिसने अपने ही गोत्र (कुल) वालों की हत्या की हो, जो गर्भस्थ बालक की हत्या (भ्रूणहत्या) का घोर पापी हो, जो सदा दूसरों की निंदा (परापवाद) करता हो, और जो परायी स्त्री में आसक्त (परस्त्रीलम्पट) रहता हो— ऐसे जघन्य पापी पुरुष भी यदि पूर्ण श्रद्धापूर्वक अपरा एकादशी का व्रत कर लें, तो वे निश्चित रूप से पापरहित हो जाते हैं ।
जो व्यक्ति न्यायालय या धर्मसभा में झूठी गवाही देता है, जो व्यापार में माप-तौल में धोखा (तुलाकूट) करता है, जो बिना वास्तविक ज्ञान के वेदों और शास्त्रों का झूठा पाठ करता है, जो अज्ञानी होते हुए भी कूटनीति से स्वयं को ज्योतिषी बताता है और नक्षत्रों की झूठी गणना करता है, अथवा जो कपटपूर्वक वैद्य (चिकित्सक) बनकर लोगों के प्राणों से खेलता है— ये सभी अपने पाप कर्मों के कारण नरक के स्थायी भागी माने गए हैं। परन्तु हे राजन्! अपरा एकादशी के व्रत के अलौकिक प्रभाव से ऐसे पापी भी समस्त पापों से मुक्त होकर सद्गति को प्राप्त हो जाते हैं" ।
क्षत्त्रियः क्षात्रधर्मं यस्त्यक्त्वा युद्धात्पलायते।
स याति नरकं घोरं स्वीयधर्मबहिष्कृतः॥
विद्यावान्यः स्वयं शिष्यो गुरुनिंदां करोति च।
स महापातकैर्युक्तो निरयं याति दारुणम्॥
अर्थ: "हे युधिष्ठिर! जो क्षत्रिय अपने क्षात्र-धर्म का कायरतापूर्वक त्याग करके युद्ध के मैदान से पीठ दिखाकर भाग जाता है, वह अपने धर्म से बहिष्कृत होकर घोर नरक में गिरता है। इसी प्रकार, जो शिष्य अपने गुरु से विद्या प्राप्त करके भी स्वयं उसी विद्यादाता गुरु की निंदा या अपमान करता है, वह महापातक से युक्त होकर दारुण नरक की यातना भोगता है। परन्तु यदि ये दोनों भी अपने पापों का पश्चाताप करते हुए अपरा एकादशी का व्रत करें, तो वे अपने महापापों को त्याग कर स्वर्ग लोक को चले जाते हैं" ।
पारंपरिक शास्त्रों में वर्णित इन पापों और अपरा एकादशी द्वारा उनके निवारण को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है:
| महापाप / अपराध | अपरा एकादशी व्रत का प्रभाव |
|---|---|
| ब्रह्महत्या, भ्रूणहत्या एवं गोत्रहत्या | महापातकों का समूल नाश और पापरहित अवस्था की प्राप्ति |
| परनिंदा एवं परस्त्रीगमन | दोषों से मुक्ति एवं आत्मा की शुद्धि |
| झूठी गवाही एवं माप-तौल में धोखा (तुलाकूट) | नरकगामी होने से बचाव एवं सद्गति |
| झूठा ज्योतिषी या कपटी वैद्य बनना | कपट कर्म के पापों से मुक्ति |
| युद्ध से पलायन करने वाला क्षत्रिय | क्षात्र-धर्म के पतन दोष से मुक्ति एवं स्वर्ग की प्राप्ति |
| विद्यादाता गुरु की निंदा करने वाला शिष्य | दारुण नरक की यातना से रक्षा |
तीर्थों एवं दानों से पुण्य-तुलना
भगवान श्रीकृष्ण ने अपरा एकादशी के अतुलनीय पुण्यों की तुलना संसार के महानतम तीर्थों और दानों से करते हुए उसकी महिमा को इस प्रकार प्रकट किया:
मकरस्थे रवौ माघे प्रयागे यत्फलं नृणाम्।
काश्यां यत्प्राप्यते पुण्यमुपरागे निमज्जनात्।
गयायां पिंडदानेन पितॄणां तृप्तिदो यथा॥
सिंहस्थिते देवगुरौ गौतम्यां स्नातको नरः।
कन्यागते गुरौ राजन्कृष्णवेणी निमज्जनात्॥
यत्फलं समवाप्नोति कुंभकेदार दर्शनात्।
बदर्याश्रमयात्रायां तत्तीर्थसेवनादपि॥
यत्फलं समवाप्नोति कुरुक्षेत्रे रविग्रहे।
गजाश्व हेमदानेन यज्ञं कृत्वा सदक्षिणम्॥
तादृशं फलमाप्नोति अपरा व्रतसेवनात्।
अर्थ: "हे राजन्! सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर माघ मास में प्रयागराज (त्रिवेणी संगम) में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है; सूर्यग्रहण के समय काशी (वाराणसी) में गंगा स्नान करने से जो फल मिलता है; गया तीर्थ में पितरों को पिण्डदान करके उन्हें जो अक्षय तृप्ति दी जाती है; बृहस्पति के सिंह राशि में प्रवेश करने पर गोदावरी नदी में स्नान करने से जो पुण्य मिलता है; तथा बृहस्पति के कन्या राशि में जाने पर कृष्णवेणी नदी में स्नान का जो फल है; कुम्भ के मेले में भगवान केदारनाथ के दर्शन का जो पुण्य है; बदरिकाश्रम (बद्रीनाथ) की यात्रा और उस तीर्थ के सेवन का जो फल है; तथा सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र के पवित्र मैदान में स्नान करके हाथी, घोड़ा और स्वर्ण का दान करते हुए दक्षिणा सहित महायज्ञ करने से जो फल प्राप्त होता है— हे राजन्! वह सारा का सारा असीम पुण्य केवल अपरा एकादशी का व्रत कर लेने से सहज ही प्राप्त हो जाता है। जो फल आधी प्रसूता (गर्भवती) गाय, भूमि या स्वर्ण का दान करने से मिलता है, वही फल इस व्रत का पालन करने से मिल जाता है" ।
| पवित्र तीर्थ एवं महादान | अपरा एकादशी का समतुल्य पुण्य फल |
|---|---|
| मकर संक्रांति पर माघ मास में प्रयाग स्नान | एक अपरा एकादशी के व्रत के पूर्ण पुण्य के समान |
| सूर्यग्रहण पर काशी स्नान एवं कुरुक्षेत्र में यज्ञ | एक अपरा एकादशी के व्रत के पूर्ण पुण्य के समान |
| गया में पितरों को पिण्डदान | एक अपरा एकादशी के व्रत के पूर्ण पुण्य के समान |
| सिंह राशि के बृहस्पति में गोदावरी स्नान | एक अपरा एकादशी के व्रत के पूर्ण पुण्य के समान |
| केदारनाथ दर्शन एवं बदरिकाश्रम यात्रा | एक अपरा एकादशी के व्रत के पूर्ण पुण्य के समान |
| हाथी, घोड़ा, स्वर्ण एवं गर्भवती गौ का दान | एक अपरा एकादशी के व्रत के पूर्ण पुण्य के समान |
महात्म्य के पौराणिक रूपक
भगवान श्रीकृष्ण ने इस व्रत की संहारक शक्ति को समझाने के लिए अत्यंत सुंदर रूपकों का प्रयोग किया:
पापद्रुमकुठारीयं पापेंधन दवानलः।
पापांधकारतरणिः पापसारंग केसरी।
बुद्बुदा इव तोयेषु पुत्तिका इव जंतुषु।
जायंते मरणायैव एकादश्या व्रतं विना॥
अर्थ: "हे युधिष्ठिर! यह अपरा एकादशी का व्रत मनुष्य के पाप कर्मों के वृक्षों से भरे हुए घने वन को काट गिराने वाली तीक्ष्ण कुल्हाड़ी (पापद्रुमकुठारी) के समान है। यह एकादशी पापों के ढेर रूपी सूखी लकड़ी (ईंधन) को भस्म कर देने वाली भयंकर दावानल (जंगल की आग) है। मनुष्य के दुष्कर्मों के घने अंधकार को चीरने के लिए यह प्रज्वलित सूर्य (पापांधकारतरणि) के समान है, और अधर्म रूपी विनीत मृग (हिरण) का पीछा कर उसका संहार करने वाले सिंह (पापसारंग केसरी) के समान है ।
मनुष्य का जीवन जल के बुलबुले के समान (नराः बुद्बुदा समाः) है जो कभी भी फूट सकता है। एकादशी के व्रत के बिना जो लोग अपना जीवन व्यतीत करते हैं, वे जल के बुलबुलों और क्षुद्र चींटियों की भाँति केवल जन्मने और मरने के चक्र में ही फँसे रहते हैं। उनका जन्म केवल मृत्यु के लिए ही होता है" ।
द्वितीय खण्ड: मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण रूप में)
अपरा एकादशी की महिमा केवल माहात्म्य तक सीमित नहीं है। इसकी शक्ति को साक्षात् प्रमाणित करने हेतु ब्रह्माण्ड पुराण में राजा महिध्वज (महीध्वज) और महर्षि धौम्य का जो पावन और मोक्षदायी प्रसंग वर्णित है, वह इस प्रकार है :
महिध्वज राजा का परिचय एवं धर्मप्रिय स्वभाव
प्राचीन काल में नर्मदा नदी के पावन तट पर महीष्मती नामक एक अत्यंत भव्य और समृद्ध नगरी हुआ करती थी। उस नगरी के अधिपति राजा महिध्वज थे । राजा महिध्वज अत्यंत धर्मात्मा, न्यायप्रिय, सत्यवादी और प्रजापालक नरेश थे। उनके राज्य में सर्वत्र धर्म का आचरण होता था, देव-मंदिरों में नित्य भगवान श्रीहरि की स्तुति होती थी और वेद-शास्त्रों की पावन ध्वनियाँ गूंजा करती थीं。
राजा महिध्वज अपनी प्रजा को अपनी सगी संतान के समान स्नेह करते थे और उनके दुःख-दर्द को अपना मानते थे। राजा का स्वयं का स्वभाव किसी राजर्षि या तपस्वी के समान था। वे नित्य भगवान विष्णु की उपासना करते थे, एकादशी का व्रत रखते थे और अपना अधिकांश समय दान-पुण्य एवं परोपकार के कार्यों में व्यतीत करते थे। उनके धर्मप्रिय स्वभाव और न्यायपूर्ण शासन के कारण सम्पूर्ण महीष्मती नगरी में सुख, शांति और समृद्धि का वास था ।
भाई वज्रध्वज का द्वेष
उसी राजमहल में राजा महिध्वज का एक छोटा सौतेला भाई भी निवास करता था, जिसका नाम वज्रध्वज था । वज्रध्वज का चरित्र और स्वभाव अपने बड़े भाई राजा महिध्वज से सर्वथा विपरीत था। वह अत्यंत क्रूर, अन्यायी, अधर्मी, स्वार्थी और पापी वृत्ति का मनुष्य था。
राजा महिध्वज की धर्मपरायणता और प्रजा के बीच उनकी अपार लोकप्रियता को देखकर वज्रध्वज के हृदय में भयंकर ईर्ष्या और द्वेष की ज्वाला निरंतर धधकती रहती थी । वज्रध्वज किसी भी प्रकार से महीष्मती के राजसिंहासन को हड़पने की तीव्र लालसा रखता था। वह दिन-रात केवल इसी षड्यंत्र में लगा रहता था कि किस प्रकार वह अपने बड़े भाई को मार्ग से हटाकर राज्य पर अपना एकछत्र अधिकार स्थापित कर ले। वह राजा के शुभ कर्मों, दान-पुण्य और धर्म-कार्यों से अत्यधिक घृणा करता था और प्रजा के प्रति राजा के प्रेम को उनकी दुर्बलता मानता था ।
छलपूर्वक हत्या और वृक्ष के नीचे दफनाने का प्रसंग
राजसत्ता के लोभ और द्वेष के पूर्णतः वशीभूत होकर वज्रध्वज ने एक भयंकर और कायरतापूर्ण षड्यंत्र रचा। एक दिन रात्रि के घने अंधकार में, जब सम्पूर्ण राजमहल निद्रा में लीन था और धर्मात्मा राजा महिध्वज अपने कक्ष में गहरी निद्रा में सो रहे थे, तब अवसर पाकर पापी वज्रध्वज ने छुपकर उनके कक्ष में प्रवेश किया । निहत्थे और सोते हुए अपने बड़े भाई पर उसने प्राणघातक प्रहार किया और छलपूर्वक उनकी निर्मम हत्या कर दी ।
भ्रातृघात (भाई की हत्या) का यह जघन्य और महापाप करने के पश्चात, अपने इस कलंकित अपराध को दुनिया की दृष्टि से छुपाने के उद्देश्य से वज्रध्वज राजा महिध्वज के रक्त-रंजित मृत शरीर को गुप्त रूप से उठाकर नगर से बहुत दूर एक भयंकर और निर्जन जंगल में ले गया। उस सघन और अंधकारमय वन के मध्य भाग में एक अत्यंत पुराना और विशाल पीपल का वृक्ष था। वज्रध्वज ने उसी पीपल के वृक्ष के नीचे रातों-रात एक गहरा गड्ढा खोदा और अपने ही भाई के शव को वहीं गाड़ (दफना) दिया ।
तत्पश्चात वह पापी लौटकर राजमहल में आ गया और छल-कपट से स्वयं को महीष्मती का राजा घोषित कर बैठा। सिंहासन पर बैठते ही उसने प्रजा पर अपने क्रूर अत्याचार करने प्रारंभ कर दिए ।
ब्रह्मराक्षस रूप में भटकना और अकाल मृत्यु का संताप
राजा महिध्वज यद्यपि स्वभाव से अत्यंत पुण्यात्मा और धर्मपरायण थे, परन्तु उनकी मृत्यु अत्यंत क्रूरतापूर्ण, छलपूर्वक और अकाल (असमय) हुई थी । वैदिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अकाल मृत्यु और अस्वाभाविक अंत होने के कारण तथा अंतिम संस्कार (दाह-संस्कार) न हो पाने के कारण राजा महिध्वज की आत्मा को सद्गति प्राप्त नहीं हुई। उनका परलोक सुधर नहीं पाया और उन्हें प्रेत-योनि (ब्रह्मराक्षस की भयंकर योनि) प्राप्त हो गई ।
प्रेत रूप धारण करने के पश्चात राजा महिध्वज की वह असंतुष्ट, क्षुधित (भूखी) और विक्षुब्ध आत्मा उसी विशाल पीपल के वृक्ष पर निवास करने लगी, जिसके नीचे उनके शरीर को दफनाया गया था । प्रेत-योनि के भयंकर संताप, क्षुधा-पिपासा (भूख-प्यास) और पीड़ा से ग्रस्त होकर वह आत्मा अत्यंत क्रोधित और व्याकुल रहने लगी। उस वन मार्ग से जो भी राहगीर, व्यापारी, मुनि या सामान्य जन गुजरते, वह प्रेत अपने स्वभाववश उन्हें डराने, भटकाने और भयंकर कष्ट पहुँचाने लगा ।
धीरे-धीरे उस ब्रह्मराक्षस का उत्पात इतना अधिक बढ़ गया कि उस जंगल का वह मार्ग अत्यंत डरावना और पूर्णतः असुरक्षित हो गया। भय के कारण लोगों ने उस वन और उस पीपल के वृक्ष के आस-पास से गुजरना ही पूर्णतः बंद कर दिया ।
ऋषि धौम्य से भेंट
कई वर्ष इसी प्रकार प्रेत-योनि के कष्टों में व्यतीत हो गए। कालचक्र अपनी गति से चलता रहा। एक समय की बात है, परम ज्ञानी, त्रिकालदर्शी, सिद्ध तपस्वी और असीम करुणा के सागर महर्षि धौम्य (धौम्य ऋषि) उसी वन मार्ग से यात्रा करते हुए जा रहे थे ।
जब महर्षि धौम्य उस निर्जन वन में स्थित उस विशाल पीपल के वृक्ष के समीप पहुँचे, तो राजा महिध्वज का वह प्रेत अपने उग्र स्वभाववश महर्षि धौम्य पर भी आक्रमण करने और उन्हें भयभीत करने के उद्देश्य से वृक्ष से नीचे उतरा ।
परन्तु महर्षि धौम्य कोई साधारण मनुष्य नहीं थे; वे योगबल और महान तपोबल से संपन्न एक सिद्ध महापुरुष थे। प्रेत को क्रोधित अवस्था में अपनी ओर आता देख ऋषि तनिक भी विचलित या भयभीत नहीं हुए। उन्होंने अपने प्रबल तपोबल का प्रयोग किया और एक ही दृष्टि में उस उग्र प्रेत को वहीं स्तंभित (कीलित) कर दिया । प्रेत महर्षि के तपोबल के समक्ष शक्तिहीन होकर शांत हो गया。
जब प्रेत शांत हुआ, तब महर्षि धौम्य ने अपनी दिव्य योग-दृष्टि (तपोबल) से उस प्रेत के भूतकाल पर दृष्टि डाली। उन्होंने तुरंत जान लिया कि यह भयानक प्रेत कोई और नहीं, बल्कि महीष्मती नगरी के पूर्व धर्मात्मा एवं प्रजापालक राजा महिध्वज की भटकी हुई आत्मा है । महर्षि ने अपने दिव्य ज्ञान से राजा की छलपूर्वक हत्या, उनके पापी भाई वज्रध्वज के षड्यंत्र, पीपल के नीचे शव गाड़ने के कृत्य और इस अकाल मृत्यु के कारण प्राप्त हुए प्रेत-संताप का पूरा रहस्य जान लिया ।
अपरा एकादशी व्रत का उपदेश एवं प्रेत-उद्धार का संकल्प
ऋषि-मुनि स्वभाव से ही अत्यंत करुणावान, दयालु और परोपकारी होते हैं । एक धर्मात्मा राजा की इस दारुण दुर्दशा को देखकर महर्षि धौम्य का हृदय अत्यंत करुणा से भर आया। उन्होंने प्रेत को पीपल के वृक्ष से नीचे उतारा और उसे शांत कर अत्यंत प्रेमपूर्वक 'परलोक विद्या' का उपदेश दिया ।
महर्षि ने प्रेत को उसकी वास्तविकता और पूर्वजन्म के पुण्यों का भान कराया। उन्होंने उसे आश्वासन दिया कि वे अवश्य ही उसे इस कष्टकारी प्रेत-योनि से मुक्त करेंगे। साथ ही, महर्षि ने राजा की आत्मा से यह कठोर वचन भी लिया कि वह भविष्य में किसी भी प्राणी को कोई हानि नहीं पहुँचाएगा ।
उसी समय, देवयोग से ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की 'अपरा एकादशी' का परम पावन पर्व समीप ही था। महर्षि धौम्य ने राजा की आत्मा की मुक्ति के लिए एक महान संकल्प लिया। उन्होंने प्रेत से कहा कि इस अपरा एकादशी का व्रत ही तुम्हारी इस दुर्गति से मुक्ति का एकमात्र मार्ग है。
श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन और पुण्य-दान
एकादशी की पावन तिथि आने पर, महर्षि धौम्य ने स्वयं पूरे विधि-विधान, असीम श्रद्धा और कठोर निष्ठा के साथ अपरा एकादशी का व्रत रखा । उन्होंने इस पावन दिन घोर तपस्या की, भगवान श्रीहरि (त्रिविक्रम/वामन) का निरंतर ध्यान एवं जप किया और पूर्ण उपवास का पालन किया。
द्वादशी तिथि के प्रातःकाल, पारण के शुभ मुहूर्त में, महर्षि धौम्य ने भगवान विष्णु की साक्षी में संकल्प का पवित्र जल अपने हाथ में लिया। उन्होंने राजा महिध्वज का स्मरण करते हुए पूरी करुणा के साथ कहा— "मेरे द्वारा निष्ठापूर्वक किए गए इस अपरा एकादशी व्रत का जो भी असीमित पुण्य मुझे प्राप्त हुआ है, वह सम्पूर्ण पुण्य मैं इस राजा महिध्वज की प्रेतात्मा के उद्धार और मोक्ष हेतु दान करता हूँ" । ऐसा कहते हुए उन्होंने अपने व्रत का अक्षय पुण्य उस प्रेत को अर्पित कर दिया。
ब्रह्मराक्षस-योनि से मुक्ति और दिव्य लोक की प्राप्ति
जैसे ही महर्षि धौम्य ने अपरा एकादशी के उस महान और अक्षय पुण्य का दान किया, वन में एक महान चमत्कार घटित हुआ। अपरा एकादशी के अपार पुण्य-प्रताप के स्पर्श मात्र से राजा महिध्वज की आत्मा तुरंत ही उस भयंकर प्रेत-योनि (ब्रह्मराक्षस-योनि) के बंधनों से सर्वथा मुक्त हो गई ।
प्रेत शरीर का परित्याग कर राजा महिध्वज ने तत्काल एक अत्यंत सुंदर, प्रकाशमान और 'दिव्य देह' धारण कर ली । उनका शरीर देवताओं के समान तेजवान हो उठा। उसी समय आकाश से देवदूतों द्वारा संचालित एक अलौकिक पुष्पक विमान वहाँ उतरा。
राजा महिध्वज ने हाथ जोड़कर अपने उद्धारकर्ता महर्षि धौम्य की परिक्रमा की, गदगद कंठ और अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें बारंबार प्रणाम किया और अपनी कृतज्ञता प्रकट की । महर्षि का सस्नेह आशीर्वाद प्राप्त कर, राजा महिध्वज उस पुष्पक विमान पर आरूढ़ हुए और परम आदर के साथ भगवान श्रीहरि के परम धाम (श्रीविष्णुलोक/स्वर्ग लोक) को प्रस्थान कर गए ।
यह अपरा एकादशी के असीमित पुण्य का ही साक्षात् प्रमाण था कि एक अकाल मृत्यु को प्राप्त और भयंकर ब्रह्मराक्षस योनि में भटक रही आत्मा को भी तत्काल मोक्ष और विष्णु लोक की प्राप्ति हो गई。
तृतीय खण्ड: पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति
राजा महिध्वज की इस मोक्षदायिनी कथा को पूर्ण करने के पश्चात, कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को अपरा एकादशी का अंतिम फल-वचन (फलश्रुति) श्रवण कराया। पारंपरिक एकादशी-व्रत कथा के अंत में यह उपसंहार आवश्यक रूप से पढ़ा जाता है, जिसके बिना कथा का श्रवण पूर्ण नहीं माना जाता。
श्रीकृष्ण उवाच:
अपरां समुपोष्यैव पूजयित्वा त्रिविक्रमम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥
लोकानां च हितार्थाय तवाग्रे कथितं मया।
पठनाच्छ्रवणाद्राजन्गोसहस्रफलं लभेत्॥
अर्थ एवं फल-वचन: भगवान श्रीकृष्ण ने कहा— "हे धर्मराज! इस प्रकार जो भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और भक्तिभाव के साथ इस 'अपरा एकादशी' का उपवास करता है और भगवान विष्णु के वामन (त्रिविक्रम) स्वरूप की भली-भांति पूजा करता है, वह मनुष्य अपने जीवन के सभी ज्ञात-अज्ञात, छोटे-बड़े और महापापों से सर्वथा मुक्त हो जाता है। मृत्यु के पश्चात वह मोक्ष को प्राप्त कर भगवान श्रीहरि के परम धाम 'श्रीविष्णुलोक' में आदरपूर्वक प्रतिष्ठित होता है ।
हे राजन्! समस्त लोकों के जीवों के कल्याण और परम उद्धार के लिए ही मैंने तुम्हारे समक्ष इस उत्तम और पावन कथा का वर्णन किया है। जो कोई भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा से अपरा एकादशी के इस महात्म्य और कथा को पढ़ता है, अथवा जो एकाग्रचित्त होकर इस कथा को सुनता है, उसे सहस्र गोदान (एक हज़ार गायों के दान) करने के बराबर उत्तम पुण्य फल सहज ही प्राप्त हो जाता है" ।
कथा के इस परम पवित्र फल-वचन को सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर अत्यंत प्रसन्न हुए। उनके हृदय में भगवान श्रीहरि के प्रति भक्ति की धारा प्रवाहित हो उठी और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक अपना शीश झुकाकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया。
तदन्तर, कथा के प्रवाह को आगे बढ़ाते हुए युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से निवेदन करते हुए कहा— "हे जनार्दन! मैंने 'अपरा' एकादशी का यह सारा माहात्म्य और पावन कथा पूर्ण रूप से श्रवण कर ली है। अब कृपा करके मुझे ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी (निर्जला एकादशी) का विस्तृत वर्णन सुनाइये" ।
(इस प्रकार पुराणों में वर्णित अपरा एकादशी की यह संपूर्ण, पारंपरिक एवं मोक्षदायिनी कथा संपन्न होती है।)
॥ बोलिए लक्ष्मी नारायण भगवान की जय ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥