मोहिनी एकादशी की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रमाण-आधारित व्रत कथा
१. कथा का पारंपरिक प्रारंभ: धर्मराज युधिष्ठिर और योगेश्वर श्रीकृष्ण का दिव्य संवाद
सनातन धर्म के महानतम पौराणिक ग्रंथों, विशेषतः कूर्म पुराण तथा पद्म पुराण के उत्तर खण्ड में, मोक्षदायिनी एकादशियों के महात्म्य का विस्तृत और अत्यंत गूढ़ वर्णन प्राप्त होता है । भारतीय ज्ञान परंपरा और आध्यात्मिक आख्यानों की यह चिरंतन रीति रही है कि जब भी जगत के कल्याण हेतु किसी परम पवित्र व्रत, उपवास अथवा अनुष्ठान के विधान को पृथ्वी पर प्रकट करना होता है, तो वह प्रायः परब्रह्म परमात्मा और उनके अनन्य कोटि के भक्तों के मध्य हुए एक संवादात्मक आख्यान के माध्यम से ही अवतरित होता है । इसी पावन परंपरा का निर्वहन करते हुए मोहिनी एकादशी की यह परम विशुद्ध और पापनाशक कथा भी कुरुक्षेत्र के महासंग्राम के पश्चात, धर्मराज युधिष्ठिर और त्रिलोकीनाथ भगवान श्रीकृष्ण के मध्य हुए एक भक्तिपूर्ण संवाद से आरंभ होती है ।
जब धर्मराज्य की स्थापना हो गई और चारों ओर शांति का साम्राज्य स्थापित हो गया, तब एक दिन पांडव श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर ने योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों में साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। युधिष्ठिर का हृदय लोक-कल्याण की भावना से ओतप्रोत था। उन्होंने अत्यंत श्रद्धा, विनय और करुणा से युक्त होकर भगवान से यह लोकमंगलकारी प्रश्न किया। युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कहा:
"हे जनार्दन! हे कमलनयन! हे मधुसूदन! आप तीनों लोकों के एकमात्र स्वामी, चराचर जगत के पालनहार और अपने शरणागत भक्तों के समस्त दुखों का समूल नाश करने वाले हैं । हे माधव, मेरी आपसे यह विनीत प्रार्थना है कि कृपया मुझे वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली उस परम पवित्र एकादशी के विषय में विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें। हे अच्युत, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की उस एकादशी का शास्त्रीय नाम क्या है? उस व्रत को करने से किस फल की प्राप्ति होती है? उस पावन तिथि का महात्म्य क्या है और उस दिन किस पारंपरिक कथा का श्रवण करना चाहिए? हे प्रभो, मुझ अज्ञानी पर कृपा करें और इस उत्तम व्रत का संपूर्ण विधान तथा उसकी प्रामाणिक कथा सुनाकर मेरे मन के समस्त संशयों को दूर करें, जिससे मैं और आने वाली पीढ़ियां इस भवसागर से पार जा सकें । "
धर्मराज युधिष्ठिर के इन अत्यंत भक्तिपूर्ण, विनम्र और लोक-कल्याणकारी वचनों को सुनकर, चराचर जगत के स्वामी, देवकीनंदन भगवान श्रीकृष्ण के मुखमंडल पर एक अलौकिक और करुणा से भरी हुई मुस्कान छा गई। उन्होंने अत्यंत मधुर, गंभीर और मेघ के समान नाद करने वाली वाणी में उत्तर दिया:
"हे राजन्! हे धर्मपुत्र युधिष्ठिर! तुमने संपूर्ण मानव जाति के असीम कल्याण और तीनों लोकों के भटके हुए जीवों के उद्धार के लिए अत्यंत ही श्रेष्ठ और स्तुत्य प्रश्न किया है । वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, वह कोई साधारण तिथि नहीं historic रूप से अपितु वह साक्षात् मेरी ही शक्ति का एक स्वरूप है। यह एकादशी महापापों को समूल नष्ट करने वाली, जन्म-जन्मांतर के संचित और सघन कर्म-बंधनों को भस्म करने वाली तथा प्राणियों को सांसारिक मोह-माया के अत्यंत कठोर जाल से मुक्त करने वाली है । इस तिथि का प्रताप इतना अधिक है कि इसके नाम-स्मरण मात्र से ही यमराज के दूत भी भयभीत होकर दूर भाग जाते हैं। तीनों लोकों में इसे 'मोहिनी एकादशी' के नाम से जाना जाता है ।
हे युधिष्ठिर, मैं तुम्हें वह परम पवित्र, अत्यंत प्राचीन और महापापों का नाश करने वाली कथा सुनाता हूँ, जिसे पूर्व काल में स्वयं परम ज्ञानी ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को सुनाया था । तुम इस आख्यान को अत्यंत एकाग्रचित्त और श्रद्धापूर्ण होकर श्रवण करो, क्योंकि केवल इस मोहिनी एकादशी की पावन कथा के श्रवण मात्र से ही मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के महापाप नष्ट हो जाते हैं और वह निष्पाप होकर मेरे परम धाम, वैकुण्ठ लोक का अधिकारी बन जाता है । "
| कथा के प्रमुख वक्ता एवं श्रोता | उनकी भूमिका एवं प्रासंगिकता |
|---|---|
| धर्मराज युधिष्ठिर | कथा के प्रथम श्रोता, लोक-कल्याण हेतु प्रश्नकर्ता । |
| भगवान श्रीकृष्ण | कथा के मुख्य वक्ता, मोहिनी एकादशी महात्म्य के प्रदाता । |
| भगवान श्रीराम | मूल कथा के श्रोता, महर्षि वशिष्ठ से एकादशी का उपाय पूछने वाले । |
| महर्षि वशिष्ठ | मूल कथा के वक्ता, श्रीराम को धृष्टबुद्धि का आख्यान सुनाने वाले । |
२. श्रीराम और महर्षि वशिष्ठ का संवाद: कथा का पौराणिक उद्गम
भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को वह प्राचीन वृत्तांत सुनाना आरंभ किया, जो त्रेता युग में घटित हुआ था। जब भगवान श्रीराम, जो साक्षात् परब्रह्म के अवतार थे, अपनी लौकिक लीला के अंतर्गत माता सीता के अपहरण के पश्चात उनकी खोज में वन-वन भटक रहे थे। उस समय वे सीता-वियोग के कारण लौकिक रूप से अत्यंत शोक संतप्त और व्यथित प्रतीत हो रहे थे । उसी कालखंड में, एक दिन उन्होंने अपने कुलगुरु, परम ज्ञानी ब्रह्मर्षि वशिष्ठ से एक अत्यंत ही मर्मस्पर्शी और लोक-हितकारी प्रश्न किया था ।
पद्म पुराण के उत्तर खण्ड के उनचासवें (४९वें) अध्याय में श्रीराम का वह श्लोक इस प्रकार अंकित है:
मया दुःखानि भुक्तानि सीताविरहजानि तु ।
तथापि कथयिष्यामि लोकानं हितकाम्यया ॥
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अत्यंत विनीत भाव से हाथ जोड़कर महर्षि वशिष्ठ से कहा: "हे गुरुदेव! हे महामुने! मैंने अपनी प्राणवल्लभा सीता के विरह से उत्पन्न होने वाले अत्यंत दारुण, असहनीय और हृदय को विदीर्ण कर देने वाले दुखों को इस मर्त्यलोक में भोगा है । यद्यपि मैं जानता हूँ कि यह संपूर्ण संसार नश्वर है और इसमें संयोग-वियोग प्रकृति का एक अटल नियम है, फिर भी लौकिक लीला के अंतर्गत मेरा मन इस वियोग के असीम दुःख से अत्यंत संतप्त और व्याकुल है ।
इसलिए, हे मुनिश्रेष्ठ! हे ज्ञान के अथाह सागर! कृपा करके मुझे कोई ऐसा श्रेष्ठ, अत्यंत सरल और परम फलदायी व्रत अथवा उपवास बताइए, जिसके प्रभाव से मनुष्य के समस्त दुखों, कष्टों और पूर्व जन्म के महापापों का तत्काल नाश हो सके । मैं यह प्रश्न केवल अपने लिए ही नहीं कर रहा हूँ, अपितु भविष्य में आने वाले उन अनगिनत सांसारिक जीवों के कल्याण के लिए भी कर रहा हूँ, जो कलि काल के अज्ञान और पाप के घोर अंधकार में भटकते रहेंगे और जिन्हें भवसागर से पार जाने का कोई मार्ग नहीं सूझेगा । "
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के इन असीम करुणा से भरे और लोकमंगलकारी वचनों को सुनकर महर्षि वशिष्ठ अत्यंत प्रसन्न हुए। उनका मुखमंडल तेज से दमक उठा। उन्होंने श्रीराम की स्तुति करते हुए अत्यंत गदगद कंठ से कहा:
"हे रघुनंदन! हे दशरथनंदन राम! आपके तो केवल नाम-स्मरण मात्र से ही प्राणी इस अपार भवसागर से तर जाता है और उसके जन्म-जन्मांतर के बड़े से बड़े पाप भी क्षण भर में उसी प्रकार भस्म हो जाते हैं जैसे अग्नि के स्पर्श से सूखी घास जलकर राख हो जाती है । आप स्वयं परमेश्वर हैं, सर्वज्ञाता हैं और जगत के रक्षक हैं, किंतु लोक-कल्याण की महान भावना से और संसार को एक आदर्श मार्ग दिखाने के लिए आपने जो यह प्रश्न किया है, वह अत्यंत ही साधुवाद के योग्य है । आपका यह प्रश्न युगों-युगों तक मानवता का पथ-प्रदर्शन करेगा।
हे राम! आपकी इस लोकमंगलकारी जिज्ञासा को शांत करने और विश्व के भटके हुए जीवों के उद्धार के लिए मैं आपको व्रतराज एकादशी के उस विशिष्ट और परम गोपनीय स्वरूप का वर्णन करता हूँ, जो सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ है। हे श्रीराम, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली इस मंगलकारी एकादशी का नाम 'मोहिनी एकादशी' है ।
पद्म पुराण में महर्षि वशिष्ठ के वचनों को इस श्लोक के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है:
वैशाखस्य सिते पक्षे राम चैकादशी भवेत् ।
मोहजालात्प्रमुच्यंते पातकानां समूहतः ॥
हे राम! यह मोहिनी एकादशी समस्त प्रकार के मोह जालों को काटने वाली एक तीक्ष्ण तलवार के समान है। जो भी भाग्यशाली प्राणी इस व्रत का पूर्ण निष्ठा, नियम और श्रद्धा के साथ पालन करता है, वह मोह, अज्ञान और पातक-समूहों के सघन अंधकार से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे प्रातःकाल सूर्य के उदय होने पर रात्रिकाल का सघन अंधकार स्वतः ही मिट जाता है । इस मोहिनी एकादशी के व्रत से श्रेष्ठ, पवित्र और पापनाशक कोई दूसरा व्रत तीनों लोकों में नहीं है ।
हे राम! अब मैं आपको इस महान एकादशी की वह प्रामाणिक और पौराणिक कथा सुनाता हूँ, जिसके केवल श्रवण और मनन मात्र से बड़े-बड़े पापियों, दुराचारियों और पतितों का भी उद्धार हो गया। आप इसे एकाग्र मन से सुनें।"
३. मुख्य कथा: सुरम्य भद्रावती नगरी और सत्यवादी राजा द्युतिमान का वैभव
महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम को वह अद्भुत कथा सुनाना आरंभ किया। उन्होंने कहा:
हे राम! प्राचीन काल में पुण्य सलिला सरस्वती नदी के सुरम्य और पावन तट पर एक अत्यंत विशाल, समृद्ध और दिव्य नगरी बसी हुई थी, जिसका नाम 'भद्रावती' था । वह भद्रावती नगरी स्वर्ग की अमरावती को भी लज्जित करने वाली थी। वह नगरी धन-धान्य, असीम ऐश्वर्य और वैभव से इस प्रकार परिपूर्ण थी मानो साक्षात् देवी लक्ष्मी ने वहाँ अपना स्थायी निवास बना लिया हो । उस नगरी के प्रासाद और भवन आकाश चूमते थे, जिनके शिखरों पर फहराती हुई स्वर्ण-जटित पताकाएं मानो बादलों से वार्तालाप करती थीं। भद्रावती नगरी के राजमार्ग अत्यंत विस्तृत, स्वच्छ और सुगंधित जल से सिंचित रहते थे। उस नगरी में सर्वत्र धर्म और सत्य का वास था; वहाँ नित्य वेदों की ऋचाओं का सस्वर गान होता था, यज्ञों की पवित्र अग्नि निरंतर प्रज्वलित रहती थी और नागरिक सत्य, अहिंसा और धर्म के मार्ग पर चलते हुए एक सुखी जीवन व्यतीत करते थे ।
सरस्वत्यास्तटे रम्ये पुरी भद्रावती शुभा ।
चंद्रवंशोद्भवो नाम धृतिमान्सत्यसंगरः ॥
उस परम पवित्र भद्रावती नगरी में चंद्रवंश में उत्पन्न हुए 'द्युतिमान' (कुछ पारंपरिक ग्रंथों और पुराणों में इन्हें 'धृतिमान' के नाम से भी संबोधित किया गया है) नामक एक अत्यंत पराक्रमी, तेजस्वी, सत्यवादी और धैर्यवान राजा राज्य करते थे । राजा द्युतिमान का प्रताप दशों दिशाओं में व्याप्त था। उनके राज्य में न कोई दुखी था, न कोई दरिद्र, न कोई अनाथ था और न ही कोई रोगी। उनका शासन पूर्णतः वेद-पुराणों और धर्मशास्त्रों के अनुकूल था । राजा द्युतिमान स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु के एक महान और अनन्य भक्त थे। वे अपनी प्रजा का पालन-पोषण अपनी सगी संतान की भाँति अत्यंत वात्सल्य और प्रेम के साथ करते थे । उनके राज्य में चहुँओर शांति, न्याय और समृद्धि का अखंड साम्राज्य स्थापित था。
४. धर्मात्मा धनपाल वैश्य और उसके पाँच पुत्रों का विवरण
महर्षि वशिष्ठ ने कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा:
हे रघुनंदन! उसी भद्रावती नगरी में, सत्यवादी राजा द्युतिमान के न्यायपूर्ण संरक्षण में, 'धनपाल' नामक एक अत्यंत धनी, कुलीन और धर्मात्मा वैश्य निवास करता था ।
धनपाल इति ख्यातः पुण्यकर्मप्रवर्त्तकः ।
विष्णुभक्तिरतः शांतस्तस्यासन्पंचपुत्रकाः ॥
धनपाल वैश्य भगवान श्रीहरि विष्णु का अत्यंत परम भक्त था । उसके पास व्यापार से अर्जित की हुई अपार संपत्ति थी, किंतु उस अथाह धन-संपत्ति के होने पर भी उसके मन में किंचित मात्र भी अहंकार या लोभ नहीं था। वह अपना सारा धन सदैव लोकोपकार, दीन-दुखियों की सेवा और सत्कार्यों में ही व्यय करता था ।
धनपाल ने अपने जीवन में प्रजा के कल्याण और पुण्य प्राप्ति के लिए अनेक गहरे और मीठे जल वाले कुएँ, विशाल और सुंदर सरोवर, ग्रीष्म ऋतु में यात्रियों के लिए प्याऊ, और भूखों के लिए निःशुल्क भोजनालय (अन्नक्षेत्र) बनवाए थे । उसने राजमार्गों के दोनों ओर छायादार और फलदार वृक्षों के बड़े-बड़े बगीचे लगवाए थे, ताकि थके हुए पथिकों को विश्राम मिल सके । वह ब्राह्मणों का अतीव आदर करता, निर्धनों को खुले हाथों से स्वर्ण और वस्त्रों का दान देता और नगर के हर अभावग्रस्त व्यक्ति की सहायता के लिए रात-दिन तत्पर रहता था। उसकी दानशीलता और धर्मपरायणता की कीर्ति केवल भद्रावती में ही नहीं, अपितु दूर-दूर के जनपदों तक फैली हुई थी ।
इस महान पुण्यात्मा और विष्णु-भक्त धनपाल वैश्य के पाँच पुत्र थे । उन पुत्रों के नाम इस प्रकार थे—सुमना, सद्बुद्धि (कुछ कथा-पाठांतरों में इसे द्युतिमान भी कहा गया है), मेधावी, सुकृति और सबसे छोटा पुत्र 'धृष्टबुद्धि' ।
| धनपाल वैश्य के पुत्र | उनके आचरण और स्वभाव का पारंपरिक वर्णन |
|---|---|
| सुमना | प्रथम पुत्र, अत्यंत शांत, आज्ञाकारी और पिता के व्यापार में सहायक । |
| सद्बुद्धि (द्युतिमान) | द्वितीय पुत्र, धर्मपरायण, ईश्वर-भक्त और सत्यवादी । |
| मेधावी | तृतीय पुत्र, विद्वान, शास्त्रों का ज्ञाता और नीति-कुशल । |
| सुकृति | चतुर्थ पुत्र, पुण्य कर्म करने वाला, दानशील और समाज में प्रतिष्ठित । |
| धृष्टबुद्धि | पंचम (सबसे छोटा) पुत्र, महापापी, दुराचारी, व्यसनी और कुलकलंक । |
धनपाल के प्रथम चार पुत्र अपने पिता की ही भाँति अत्यंत संस्कारी, आज्ञाकारी, धर्मपरायण और व्यापार-कुशल थे । वे नित्य भगवान विष्णु की पूजा करते, वेदों का पाठ करते और पिता के सेवा-कार्यों में बढ़-चढ़कर हाथ बँटाते थे। किंतु विधाता की गति बड़ी ही विचित्र और अगम्य होती है। धर्मात्मा पिता के घर में भी दुरात्मा का जन्म हो सकता है, यह बात धनपाल के परिवार में सत्य सिद्ध हुई। धनपाल का जो पाँचवाँ और सबसे छोटा पुत्र था—'धृष्टबुद्धि', वह अपने नाम के अनुरूप ही अत्यंत दुराचारी, कुमार्गगामी, महापापी और अधर्मी निकला ।
५. धृष्टबुद्धि का भयंकर दुराचार एवं अधर्म
महर्षि वशिष्ठ ने अत्यंत खेद प्रकट करते हुए श्रीराम को बताया:
पंचमो धृष्टबुद्धिश्च महापापरतः सदा ।
हे राम! वह धृष्टबुद्धि बचपन से ही कुसंगति में पड़ गया था। उसका मन न तो विद्याध्ययन में लगता था, न पैतृक व्यापार में और न ही धर्म-कर्म के किसी कार्य में । जैसे-जैसे वह युवावस्था को प्राप्त हुआ, उसके पाप कर्म अपनी चरम सीमा पर पहुँच गए। वह अपना पूरा समय नगर की वेश्याओं की कुसंगति में, जुआ (द्यूत) खेलने में, और मद्य (मदिरा) तथा मांस का भक्षण करने में व्यतीत करने लगा ।
वह अत्यंत निर्लज्ज हो चुका था। वह अपने पिता धनपाल द्वारा अर्जित किए गए अत्यंत पवित्र और पसीने की कमाई वाले धन को वेश्याओं पर और नीच कर्मों में दोनों हाथों से जल की तरह लुटाता था । धृष्टबुद्धि के जीवन में धर्म और समाज की कोई मर्यादा शेष नहीं रह गई थी। वह न तो देवताओं का सम्मान करता था, न पर्वों पर पितरों का तर्पण करता था, और न ही वेदपाठी ब्राह्मणों तथा गुरुजनों का आदर करता था । वह सदा अभक्ष्य (न खाने योग्य) पदार्थों का सेवन करता, राजमार्गों और चौराहों पर निरपराध लोगों से अकारण विवाद करता और अधर्म के हर उस अंधकारमय मार्ग पर चलता था जो सीधे नरक की ओर ले जाता है。
उसके दुष्ट मित्रों की मंडली दिन-रात उसे घेरे रहती थी, जो केवल उसके धन के लोभ में उसकी झूठी प्रशंसा करते थे। उसकी इस दुष्टता, उद्दंडता और अनवरत पाप कर्मों के कारण पूरे नगर में धर्मात्मा धनपाल की वर्षों से अर्जित की गई धवल प्रतिष्ठा धूमिल होने लगी थी । नगर के सभ्य लोग धृष्टबुद्धि की परछाई से भी दूर भागने लगे थे。
६. पिता द्वारा निष्कासन और पतनशील जीवन की पराकाष्ठा
हे राम! अपने सबसे छोटे पुत्र धृष्टबुद्धि के इन भयंकर और घृणित आचरणों से पिता धनपाल अत्यंत दुखी, संतप्त और समाज में लज्जित रहते थे । उन्होंने एक पिता होने के नाते अनेक बार उसे एकांत में बिठाकर समझाने का प्रयास किया। परिवार के अन्य सदस्यों, सगे-संबंधियों, भाइयों और नगर के वृद्ध विद्वानों ने भी धृष्टबुद्धि को धर्म और नीति का मार्ग दिखाने की बहुत चेष्टा की, किंतु उस महापापी पर किसी उपदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ा । उसका मन पाप और व्यभिचार के दलदल में इतना गहरे तक धंस चुका था कि उसे सत्य और असत्य, पुण्य और पाप का भेद ही भूल गया था。
अंततः, जब उसके दुराचार अपनी सभी सीमाएं पार कर गए और उस कुलीन वैश्य कुल की मर्यादा पूरी तरह नष्ट होने के कगार पर पहुँच गई, तब एक दिन अत्यंत व्यथित और विवश होकर पिता धनपाल ने कठोर निर्णय लिया । उन्होंने भरे समाज और कुटुंब के मध्य धृष्टबुद्धि को अपने परिवार से हमेशा के लिए बेदखल कर दिया और उसे अपने घर से निकाल दिया । पिता द्वारा त्यागे जाने के पश्चात, उसके सगे भाइयों, संबंधियों और उन लोगों ने भी उससे मुख मोड़ लिया जो कभी उसके पिता के उपकारों के ऋणी थे ।
घर से निकाले जाने पर भी धृष्टबुद्धि की आँखें नहीं खुलीं। वह अपने शरीर पर बचे हुए बहुमूल्य रेशमी वस्त्रों और कीमती आभूषणों को लेकर उन्हीं वेश्याओं और दुराचारी मित्रों के पास गया, जिन पर वह अपना सारा धन लुटाता था । जब तक उसके पास वे स्वर्ण आभूषण और कुछ धन शेष रहा, तब तक उन वेश्याओं और कपटी मित्रों ने बड़े आदर के साथ उसे अपने पास रखा। किंतु जैसे ही उसका सारा धन समाप्त हो गया और वह पूरी तरह से कंगाल और निर्धन हो गया, उन स्वार्थी वेश्याओं और कपटी मित्रों ने भी उसे दुत्कार कर और अपमानित करके अपने यहाँ से बाहर धकेल दिया ।
अब धृष्टबुद्धि पूर्णतः अनाथ, दरिद्र और निराश्रय होकर भद्रावती नगरी की सड़कों पर एक भिखारी की भाँति भटकने लगा। जो व्यक्ति कल तक मखमल के कोमल बिस्तरों पर सोता था और छप्पन प्रकार के स्वादिष्ट भोग खाता था, वह आज एक-एक दाने के अन्न के लिए तरसने लगा । भूख और प्यास से व्याकुल होकर, उसने जीवित रहने के लिए चोरी, डकैती और लूटपाट का अत्यंत निंदनीय मार्ग अपना लिया । वह नगर के संभ्रांत लोगों के घरों में रात के गहन अंधकार में सेंध लगाने लगा。
किंतु पाप का मार्ग कभी छिपता नहीं है और न ही पाप का फल मिलने में विलंब होता है। एक रात्रि वह चोरी करते हुए राजा द्युतिमान के सतर्क सिपाहियों द्वारा रंगे हाथों पकड़ लिया गया । सिपाहियों ने उसे कारागार की अंधेरी कोठरी में डाल दिया और उसे कड़ी यातनाएँ दीं । जब उसे न्याय के लिए सत्यवादी राजा द्युतिमान के सम्मुख प्रस्तुत किया गया, तो राजा ने यह जानकर कि यह महान धर्मात्मा और राज्य के परम हितैषी धनपाल का पुत्र है, अपने मित्र के सम्मान की रक्षा हेतु पहली बार उसे केवल कड़ी चेतावनी देकर छोड़ दिया ।
किंतु धृष्टबुद्धि की पाप-वृत्ति नहीं बदली। वह कुछ दिन छिपकर रहा और भूख से व्याकुल होकर पुनः चोरी करने लगा और पुनः रंगे हाथों पकड़ा गया। इस बार राजा द्युतिमान ने राजधर्म का पालन करते हुए उसे कठोर दंड दिया और उसे राज्य की सीमा से सदैव के लिए निष्कासित (देशनिकाला) कर दिया ।
७. वनगमन और हिंसक पशुओं के समान जीवन
राजाज्ञा के कारण सिपाहियों ने धृष्टबुद्धि को नगर की सीमा से बहुत दूर ले जाकर एक अत्यंत भयंकर और घने जंगल में धकेल दिया । वह वन ऐसा था जहाँ दिन के उजाले में भी अंधकार छाया रहता था। विशाल और कंटीले वृक्षों से आच्छादित उस वन में हिंसक पशुओं की भयानक गर्जना निरंतर गूंजती रहती थी。
उस भयानक और दुर्गम वन में पहुँचकर धृष्टबुद्धि की दुर्दशा और भी चरम सीमा पर पहुँच गई । राजसी सुखों में पले उस शरीर को अब न तो आश्रय प्राप्त था और न ही भोजन। भूख और प्यास से उसका शरीर सूखकर काँटा होने लगा। भोजन की तलाश में वह वन में विक्षिप्तों की भाँति इधर-उधर भटकने लगा। जब उसे कोई फल या कंदमूल प्राप्त न हुआ, तो कोई अन्य मार्ग न पाकर, उसने एक निर्दयी बहेलिए (शिकारी) का रूप धारण कर लिया ।
वह अपने हाथों में एक बड़ा सा धनुष और तीक्ष्ण बाणों से भरा तरकश लेकर वन के निरीह पशु-पक्षियों का निर्दयतापूर्वक वध करने लगा । उसने जंगली सूअरों, हिरणों, शेरों, भेड़ियों और यहाँ तक कि अत्यंत सुंदर और निर्दोष पक्षियों—जैसे चकोर, मोर, और कबूतरों—का बिना किसी करुणा के वध करना शुरू कर दिया । वह उन मूक प्राणियों के कच्चे मांस का भक्षण करता और अपनी आसुरी क्षुधा को शांत करता。
इस प्रकार, पूर्व जन्म के संचित घोर पापों के साथ-साथ, वह उस वन में प्रतिदिन नए और भयंकर पापों का संचय कर रहा था । वह महापापों के एक ऐसे अथाह और अंधकारमय सागर में पूर्णतः डूब चुका था, जहाँ से बाहर निकलने का उसे कोई भी मार्ग शेष नहीं दिखाई देता था । उसका जीवन एक जीवित प्रेत के समान हो गया था, जो केवल हिंसा, रक्तपात और पाप के लिए ही इस पृथ्वी पर श्वास ले रहा था。
८. महर्षि कौण्डिन्य से भेंट और दैवीय संयोग
इस प्रकार घोर पाप, हिंसा और संताप का जीवन जीते हुए उस पापी के अनेक वर्ष वन में व्यतीत हो गए। किंतु हे राम, परमपिता परमात्मा की कृपा अत्यंत रहस्यमयी और असीम होती है। कभी-कभी पूर्व जन्म का कोई संचित और अज्ञात पुण्य अथवा किसी सिद्ध महात्मा की अहैतुकी कृपा क्षण भर में जीवन की दिशा बदल देती है ।
समय बीतता गया और वर्ष का वह पुनीत समय आ गया जब 'वैशाख' का मास आरंभ होता है । वैशाख मास भगवान श्री विष्णु को अत्यंत प्रिय है; इस मास में किए गए स्नान, दान और तप का फल अनंत गुना हो जाता है। उस भयंकर वन के एक एकांत, शांत और पवित्र भाग में परम तपस्वी और ब्रह्मज्ञानी महर्षि कौण्डिन्य (जिन्हें कुछ ग्रंथों में कौण्डिल्य भी कहा गया है) का पावन आश्रम स्थित था । महर्षि कौण्डिन्य अपने कठोर तप, ज्ञान और ब्रह्मचर्य के कारण साक्षात् सूर्य के समान तेजस्वी प्रतीत होते थे。
एक दिन वैशाख मास की तपती दोपहर में, भूख और प्यास से तड़पता हुआ, मलिन वस्त्र पहने और हाथों में धनुष-बाण लिए हुए वह हिंसक धृष्टबुद्धि भटकते-भटकते महर्षि कौण्डिन्य के उस शांत आश्रम के समीप आ पहुँचा । संयोगवश, यह वही समय था जब महर्षि कौण्डिन्य पवित्र गंगा (अथवा सरस्वती) नदी में अपना वैशाख मास का नित्य स्नान और तर्पण पूर्ण करके आश्रम की ओर वापस लौट रहे थे ।
महर्षि के शरीर पर नदी के जल से भीगे हुए वल्कल (पेड़ों की छाल से बने) वस्त्र थे। वे भगवान नारायण के नामों का उच्चारण करते हुए आ रहे थे। जैसे ही धृष्टबुद्धि उनके समीप से गुजरा, महर्षि कौण्डिन्य के भीगे हुए पवित्र वस्त्रों से जल की कुछ बूंदें हवा के झोंके से छिटक कर पापी धृष्टबुद्धि के मलिन शरीर पर गिर पड़ीं ।
हे श्रीराम! वे जल की बूंदें कोई साधारण जल की बूंदें नहीं थीं; वे एक सिद्ध तपस्वी के पवित्र शरीर और परम पावन नदी के जल का वह अमोघ दिव्य संगम थीं, जिसमें ब्रह्मांड के सभी पापों को धोने और अज्ञान को भस्म करने की अलौकिक क्षमता थी। उन पावन बूंदों का स्पर्श होते ही उस वन में एक महान आध्यात्मिक चमत्कार घटित हुआ । धृष्टबुद्धि के मलिन अंतःकरण पर जन्म-जन्मांतर से छाया हुआ अज्ञान, मोह और महापापों का सघन अंधकार क्षण भर में छँट गया । उसकी वर्षों की मानसिक मलिनता धुल गई और उसके भीतर अचानक एक प्रखर सद्बुद्धि और आत्मबोध का उदय हुआ । उसे अपने जीवन में किए गए एक-एक पाप कर्म का स्मरण हो आया और उसका पाषाण हृदय गहन पश्चाताप की अग्नि में धू-धू कर जलने लगा ।
९. धृष्टबुद्धि का पश्चाताप और मुनि से प्रार्थना
अपने किए पर अत्यंत ग्लानि का अनुभव करते हुए, रुदन करता हुआ वह महापापी धृष्टबुद्धि अपने धनुष-बाण फेंककर दौड़ता हुआ गया और महर्षि कौण्डिन्य के श्रीचरणों में साष्टांग गिर पड़ा । वह दोनों हाथ जोड़कर, आँखों से पश्चाताप के निरंतर अश्रु बहाते हुए अत्यंत दीन, आर्त और कांपते हुए स्वर में महर्षि से प्रार्थना करने लगा:
"हे मुनिश्रेष्ठ! हे सिद्ध ब्राह्मण देवता! हे करुणा के सागर! मुझ पतित पर कृपा करें । मैं इस पृथ्वी का सबसे बड़ा पापी और कुलकलंक हूँ। मैंने अपने जीवन में कोई ऐसा कुकर्म नहीं है जो न किया हो। मैंने वेश्यागमन किया, जुआ खेला, मदिरा और मांस का भक्षण किया, अपने देवतुल्य पिता की पवित्र संपत्ति को नष्ट किया, निर्दोष पशु-पक्षियों की निर्मम हत्या की और नगर में चोरी की । मेरे पाप मेरु पर्वत के समान ऊँचे हो चुके हैं और मैं इस पाप के असहनीय भार से नरक की ओर दबा जा रहा हूँ。
हे ऋषिवर, मैं अत्यंत दरिद्र, दीन और असहाय हूँ। मेरे पास प्रायश्चित के बड़े-बड़े यज्ञ करने के लिए कोई धन या साधन नहीं है । कृपा करके मुझे कोई ऐसा अत्यंत सरल, बिना धन के संपन्न होने वाला और निश्चित फल देने वाला उपाय बताएँ, जिससे मेरे इन भयंकर महापापों का समूल नाश हो सके और मुझे इस घोर नरक-तुल्य जीवन से तत्काल मुक्ति मिल सके । "
१०. मोहिनी एकादशी व्रत का परम उपदेश
धृष्टबुद्धि के इन अत्यंत दीन-हीन वचनों और उसके हृदय से फूट रहे सच्चे पश्चाताप को देखकर करुणासागर महर्षि कौण्डिन्य का हृदय द्रवित हो उठा । संतों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे पापी से घृणा नहीं करते, अपितु उसके पापों का शमन कर उसे परम पद की ओर अग्रसर करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं。
महर्षि कौण्डिन्य ने धृष्टबुद्धि को सांत्वना देते हुए अत्यंत मधुर और अभय प्रदान करने वाले स्वर में कहा:
"हे वत्स्! निराश मत हो। उठो! भगवान श्रीहरि अत्यंत दयालु और शरणागतवत्सल हैं। यदि कोई जीव सच्चे हृदय से उनके समक्ष समर्पण कर दे, तो वे बड़े से बड़े पाप को भी क्षण भर में भस्म कर देते हैं । तुमने जो यह सच्चा पश्चाताप किया है, उसी से तुम्हारे अंतःकरण की शुद्धि का मार्ग आरंभ हो गया है। अब तुम ध्यानपूर्वक सुनो, मैं तुम्हें एक ऐसा अमोघ उपाय बताता हूँ जिसके अनुष्ठान से तुम्हारे पूर्व जन्मों और इस जन्म के सारे पाप समूल नष्ट हो जाएंगे ।
व्रतं चकार विधिवत्कौंडिन्यस्योपदेशतः ।
हे पुत्र! तुम इसी पवित्र 'वैशाख' मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली परम पावनी 'मोहिनी एकादशी' का विधिपूर्वक व्रत करो । यह मोहिनी एकादशी समस्त प्रकार के मोह, माया और पातक-समूहों को नष्ट करने के लिए त्रिलोकी में विख्यात है । इस दिन तुम अन्न और जल का परित्याग कर पूर्ण उपवास करना। अपने मन, वचन और कर्म को पूर्णतः शुद्ध रखना। रात्रि के समय निद्रा का त्याग कर भगवान श्रीहरि विष्णु के पवित्र नामों का कीर्तन और जागरण करना। इस मोहिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से प्राणी के अनेक जन्मों के किए हुए मेरु पर्वत जैसे महापाप भी वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे प्रज्वलित अग्नि के स्पर्श से रुई का विशाल ढेर क्षण भर में भस्म हो जाता है । अतः तुम अगाध श्रद्धा के साथ इस व्रत को धारण करो।"
११. श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन, पाप-निवारण और दिव्य स्वरूप की प्राप्ति
महर्षि कौण्डिन्य के श्रीमुख से मोहिनी एकादशी व्रत का उपदेश और उसका पूर्ण विधान सुनकर धृष्टबुद्धि का संतप्त हृदय असीम आनंद और आशा की किरण से भर गया । उसने महर्षि के चरणों में बारंबार साष्टांग प्रणाम किया और यह दृढ़ संकल्प लिया कि वह इस पवित्र व्रत का पूर्ण निष्ठा, भक्ति और नियमों के साथ पालन करेगा。
जब वैशाख शुक्ल पक्ष की वह परम पावन मोहिनी एकादशी की तिथि आई, तो धृष्टबुद्धि ने महर्षि कौण्डिन्य द्वारा बताई गई विधि के अनुसार अत्यंत कठोर व्रत का पालन किया । उसने उस दिन किसी भी प्रकार का अन्न या जल ग्रहण नहीं किया । अपनी समस्त इंद्रियों को वश में रखकर उसने दिन भर भगवान श्री विष्णु के नामों का स्मरण किया। जब अंधकारमयी रात्रि हुई, तो उसने क्षण भर के लिए भी अपने नेत्र नहीं मूँदे। वह पूरी रात्रि जागकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान से अपने जघन्य पापों की क्षमा मांगता रहा और हरि-कीर्तन करता रहा ।
धृष्टबुद्धि जैसे महापापी द्वारा जब इस प्रकार असीम श्रद्धा, पूर्ण वैराग्य और अटल निष्ठा के साथ मोहिनी एकादशी का व्रत पूर्ण किया गया, तो भगवान श्रीहरि की असीम कृपा उस पर बरस पड़ी ।
पद्म पुराण में धृष्टबुद्धि की इस अलौकिक परिणति का वर्णन इस श्लोक में किया गया है:
कृते व्रते नृपश्रेष्ठ गतपापो बभूव सः ।
दिव्यदेहस्ततो भूत्वा गरुडोपरिसंस्थितः ।
जगाम वैष्णवं लोकं सर्वोपद्रव वर्जितम् ॥
मोहिनी एकादशी व्रत के उस अचूक और अमोघ प्रभाव से, धृष्टबुद्धि के जन्म-जन्मांतर के संचित पाप, जो मेरु पर्वत के समान विशाल और अभेद्य थे, वे क्षण भर में नष्ट हो गए । वह पूर्णतः निष्पाप और पवित्र हो गया। उसके मलिन और दुर्बल मानव शरीर का उसी क्षण अंत हो गया और उसे तत्काल एक अत्यंत कांतिमय, अलौकिक और चतुर्भुज 'दिव्य देह' की प्राप्ति हुई । उसके नूतन दिव्य शरीर पर पीतांबर और बहुमूल्य स्वर्ण आभूषण सुशोभित होने लगे。
उसी समय आकाश से भगवान विष्णु का दिव्य वाहन, पक्षीराज गरुड़ वहाँ अवतरित हुए । धृष्टबुद्धि उस विशाल गरुड़ पर आरूढ़ हुआ और देवदूतों द्वारा की जा रही निरंतर पुष्पवर्षा के मध्य, समस्त प्रकार के उपद्रवों, व्याधियों और जन्म-मृत्यु के दुष्चक्र से सदा के लिए मुक्त होकर, सीधे भगवान श्रीहरि के परम धाम 'वैकुण्ठ लोक' (विष्णु लोक) को प्रस्थान कर गया ।
यह मोहिनी एकादशी व्रत का ही प्रताप था कि एक ऐसा पापी जिसे उसके सगे पिता ने घर से निकाल दिया था, जिसे समाज ने दुत्कार दिया था, और जो निर्दोषों का हत्यारा बन चुका था, वह भी श्रीहरि की शरण और व्रत के प्रभाव से परम गति को प्राप्त हुआ ।
१२. पारंपरिक पाठभेद: राजा इन्द्रद्युम्न का आध्यात्मिक आख्यान
(पारंपरिक एकादशी कथाओं के पठन-पाठन में, कुछ विशिष्ट अंचलों और पारंपरिक ग्रंथों में मोहिनी एकादशी के महात्म्य के संदर्भ में एक अन्य प्रचलित कथा का भी उल्लेख मिलता है, जिसे 'राजा इन्द्रद्युम्न' के वृत्तांत के रूप में बाचा जाता है। कथा की पूर्णता एवं प्रामाणिकता को अक्षुण्ण रखने हेतु इस पारंपरिक पाठभेद का उल्लेख भी यहाँ किया जा रहा है।)
कथा के इस द्वितीय पाठ के अनुसार, प्राचीन काल में इन्द्रद्युम्न नाम के एक अत्यंत प्रतापी, पराक्रमी और ऐश्वर्यवान राजा हुए । राजा इन्द्रद्युम्न का साम्राज्य अत्यंत विशाल था। उन्होंने अनगिनत युद्धों में विजय प्राप्त कर अपार धन-संपत्ति और यश अर्जित किया था। उनके पास वह सब कुछ था जिसकी कामना एक चक्रवर्ती सम्राट कर सकता है—एक विशाल और अजेय सेना, रत्नों से भरा हुआ राजकोष, और अत्यंत अनुकूल प्रजा ।
किंतु इतने अपार ऐश्वर्य, सत्ता और लौकिक विजयों के मध्य रहकर भी, राजा इन्द्रद्युम्न के हृदय में एक अजीब सी शून्यता और अशांति निरंतर निवास करती थी । उनके पास सभी लौकिक सुख तो विद्यमान थे, परंतु आत्मिक शांति और आध्यात्मिक तृप्ति का पूर्णतः अभाव था। उनका मन एक अज्ञात बेचैनी से घिरा रहता था, जिसे कोई भी भौतिक सुख-सुविधा शांत नहीं कर पा रही थी । यह उनके पूर्व जन्म के किसी कर्म का बंधन था जो उन्हें लौकिक मोह में बाँधे हुए था और उनके मोक्ष मार्ग में बाधा उत्पन्न कर रहा था。
अपने इस आंतरिक विक्षोभ और आध्यात्मिक अशांति से मुक्ति पाने के लिए राजा इन्द्रद्युम्न ने अंततः विद्वान संतों और तपोनिष्ठ गुरुजनों की शरण ली । गुरुजनों ने राजा की आध्यात्मिक शून्यता को भाँपकर उन्हें वैशाख शुक्ल पक्ष की परम पावन 'मोहिनी एकादशी' का व्रत करने का निर्देश दिया। उन्होंने राजा को बताया कि अकारण उत्पन्न होने वाले मोह, मानसिक क्लेश और सांसारिक विक्षोभों को नष्ट करने के लिए साक्षात् नारायण द्वारा रचित इस व्रत से श्रेष्ठ और कोई मार्ग नहीं है。
गुरुजनों के निर्देशानुसार, राजा इन्द्रद्युम्न ने राजसी सुखों का त्याग कर पूर्ण श्रद्धा, अगाध भक्ति और कठोर शास्त्रीय नियमों के साथ मोहिनी एकादशी का उपवास किया । इस महाव्रत के प्रभाव से राजा के अंतःकरण पर पड़ा हुआ मोह और अज्ञान का घना पर्दा हट गया । उनके समस्त पूर्व संचित क्लेश धुल गए और उनके हृदय में वह परम शांति और आध्यात्मिक आनंद (Spiritual Fulfillment) प्रकट हो गया, जिसकी खोज में वे भटक रहे थे ।
इस कथा के माध्यम से यह पारंपरिक संदेश दिया जाता है कि मोहिनी एकादशी का व्रत केवल धृष्टबुद्धि जैसे पापियों का ही उद्धार नहीं करता, अपितु भौतिक सुखों में लिप्त उन सफल और संपन्न जीवों को भी परम शांति और भगवत-प्राप्ति का मार्ग दिखाता है, जो सांसारिक मोह के कारण आंतरिक शून्यता का अनुभव कर रहे हैं ।
१३. पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति (व्रत एवं श्रवण का महापुण्य)
महर्षि वशिष्ठ द्वारा सुनाई गई इस अद्भुत, रोमांचकारी और पापनाशक कथा को सुनकर भगवान श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए। उनका हृदय असीम शांति से भर गया。
कथा का यह पूर्ण वृत्तांत धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाने के पश्चात, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने कथा का उपसंहार करते हुए कहा:
"हे राजन्! हे धर्मपुत्र! यह है मोहिनी एकादशी का अमोघ महात्म्य और उसकी परम पावनी कथा ।
इतीदृशं रामचंद्र उत्तमं मोहिनी व्रतम् ।
नातः परतरं किंचित्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥
हे युधिष्ठिर! जड़ और चेतन से युक्त इस संपूर्ण त्रिलोकी (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) में, मोह और पाप के कठोर बंधनों को काटने के लिए मोहिनी एकादशी के व्रत से श्रेष्ठ और उत्तम कोई अन्य व्रत नहीं है । इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य घने से घने मोहजाल और महापापों के समूह से तत्काल छुटकारा पा जाता है ।
| पुण्य कर्म | मोहिनी एकादशी के समकक्ष फल |
|---|---|
| समस्त यज्ञों का अनुष्ठान | मोहिनी एकादशी के पुण्य के १६वें भाग (सोलहवीं कला) के बराबर भी नहीं । |
| समस्त तीर्थों का दर्शन एवं स्नान | एकादशी व्रत की महिमा के सम्मुख अत्यंत न्यून । |
| कथा का केवल पठन अथवा श्रवण | एक हजार गौदान (Sahasra Godan) करने के असीम पुण्य के समान । |
पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण के अंतिम वचनों को इस प्रकार दर्शाया गया है:
यज्ञादितीर्थदानानि कलां नार्हंति षोडशीम् ।
पठनाच्छ्रवणाद्राजंगोसहस्र फलं लभेत् ॥
हे धर्मराज! संसार में किए जाने वाले बड़े-बड़े यज्ञ (जैसे राजसूय और अश्वमेध), समस्त पवित्र तीर्थों के दर्शन और स्नान, और विपुल मात्रा में किया गया अन्न-स्वर्ण आदि का दान—ये सब मिलकर भी मोहिनी एकादशी व्रत की 'सोलहवीं कला' (१/१६वें भाग) के बराबर भी पुण्य प्रदान नहीं कर सकते ।
अतः हे राजन्, जो भी प्राणी पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ इस मोहिनी एकादशी का व्रत करता है, वह इस लोक में समस्त सुखों को भोगकर अंत में भगवान श्री विष्णु के परम धाम को प्राप्त होता है। और हे युधिष्ठिर, जो व्यक्ति अस्वस्थता या अन्य किसी कारणवश पूर्ण व्रत न भी कर सके, किंतु पूर्ण श्रद्धा-भाव से मोहिनी एकादशी के दिन इस पावन कथा को पढ़ता है अथवा एकाग्रचित्त होकर इसका श्रवण करता है (सुनता है), उसे मात्र इस कथा के पढ़ने और सुनने से ही 'एक हजार गौदान' (Sahasra Godan) करने के बराबर महान पुण्य फल की प्राप्ति होती है । "
इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से इस परम कल्याणकारी और अमृतमयी कथा को सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर अत्यंत आनंदित हुए और उन्होंने भगवान नारायण के श्रीचरणों में बारंबार वंदना की。
(कूर्म पुराण एवं पद्म पुराण के उत्तर खण्ड में वर्णित मोहिनी एकादशी माहात्म्य की यह संपूर्ण, अक्षुण्ण और पारंपरिक व्रत कथा यहाँ पूर्ण होती है।)