कामिका एकादशी की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रामाणिक व्रत कथा
सनातन धर्म की सर्वोत्कृष्ट, पापनाशिनी और मोक्षदायिनी परंपराओं में एकादशी व्रत का स्थान सर्वोपरि है। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में उदित होने वाली एकादशी को 'कामिका एकादशी' के पावन नाम से जाना जाता है। पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण के अंतर्गत वर्णित यह परम पवित्र तिथि संपूर्ण महापापों को भस्म करने वाली और भगवान श्रीहरि विष्णु के साक्षात दर्शन व अहैतुकी कृपा प्राप्त कराने वाली मानी गई है । प्रस्तुत आख्यान में, विशुद्ध पौराणिक स्रोतों पर आधारित कामिका एकादशी की संपूर्ण, अक्षुण्ण और पारंपरिक कथा का क्रमबद्ध वर्णन किया गया है। यह आख्यान उसी शास्त्रीय और पौराणिक स्वरूप में प्रस्तुत है, जिस स्वरूप में इसे एकादशी के पावन अवसर पर श्रद्धापूर्वक पढ़ा और सुना जाता है ।
१. कथा का पारंपरिक प्रारंभ: युधिष्ठिर-श्रीकृष्ण संवाद
पौराणिक एकादशी कथाओं का आरंभ सदैव एक अत्यंत पवित्र, रहस्यमयी और ज्ञानवर्धक संवाद से होता है। कामिका एकादशी की कथा का मूल उद्गम भी द्वापर युग के उसी कालखंड से जुड़ा है, जहाँ धर्मराज युधिष्ठिर अपने मन के संशयों और आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के निवारण हेतु त्रिलोकीनाथ भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाते हैं ।
एक समय की बात है, धर्मराज युधिष्ठिर ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक अपने दोनों हाथ जोड़कर, परम कृपालु भगवान श्रीकृष्ण को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। उनके नेत्रों में अपार श्रद्धा और वाणी में भक्ति का अमृत था। उन्होंने कहा:
"हे कमलनयन! हे गोविन्द! हे वासुदेव! आपको मेरा बारंबार प्रणाम है। हे त्रिलोकीनाथ, मैं आपकी शरण में हूँ। हे प्रभु, मैंने आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का अत्यंत अद्भुत और पुण्यदायी माहात्म्य आपके श्रीमुख से भली-भांति श्रवण किया है । देवशयनी एकादशी के व्रत का श्रवण कर मेरा मन अत्यंत तृप्त हुआ है, परंतु मेरी ज्ञान-पिपासा अभी शांत नहीं हुई है। अब कृपा करके मुझे श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी के विषय में विस्तारपूर्वक बताइए। हे माधव, इस पावन एकादशी का क्या नाम है? इसके इष्ट देवता कौन हैं? इस पावन तिथि के व्रत का पालन करने से मनुष्य को किस अतुलनीय पुण्य की प्राप्ति होती है और इस व्रत के पीछे कौन सी प्राचीन कथा निहित है? हे कृपानिधान, मुझ अज्ञानी पर अनुग्रह करें और मेरे इन सभी प्रश्नों का उत्तर देकर मेरे हृदय के अंधकार को दूर करें" ।
धर्मराज युधिष्ठिर के इन भक्तिपूर्ण और लोकमंगल की भावना से युक्त वचनों को सुनकर, शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले परमेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के मुखमंडल पर एक अलौकिक मुस्कान छा गई। भगवान श्रीकृष्ण ने मेघ के समान गंभीर और मधुर वाणी में उत्तर दिया:
"हे धर्मराज! हे निष्पाप युधिष्ठिर! तुम्हारा यह प्रश्न संपूर्ण चराचर जगत के कल्याण के लिए है। एकादशी का व्रत मुझे अत्यंत प्रिय है और जो कोई भी इसके विषय में श्रवण करता है, वह मेरे हृदय के अत्यंत समीप आ जाता है । हे नृपश्रेष्ठ, तुम एकाग्रचित्त होकर ध्यान से सुनो। मैं तुम्हें श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का वह पापनाशक और कल्याणकारी आख्यान सुनाता हूँ, जो संपूर्ण जगत के पापों का समूल नाश करने में सक्षम है। पूर्वकाल में, जब देवर्षि नारद ने जगत के रचयिता और कमलोद्भव पितामह ब्रह्मा जी से इसी एकादशी के विषय में प्रश्न किया था, तब ब्रह्मा जी ने जो ज्ञान नारद जी को प्रदान किया था, वही अत्यंत पवित्र संवाद आज मैं तुम्हें सुनाता हूँ" ।
ब्रह्मा-नारद संवाद और कामिका एकादशी का माहात्म्य-वर्णन
भगवान श्रीकृष्ण ने अपने वचनों को आगे बढ़ाते हुए कहा:
"हे युधिष्ठिर! एक समय की बात है, स्वर्गलोक में देवर्षि नारद ने कमल के आसन पर विराजमान अपने पिता, जगतसृष्टा ब्रह्मा जी के समक्ष जाकर उन्हें साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। देवर्षि नारद, जो सदैव नारायण-नारायण का जाप करते हुए लोकों का भ्रमण करते हैं, उन्होंने अत्यंत विनीत भाव से ब्रह्मा जी से पूछा:
'हे भगवन्! हे कमलासन! मैं आपसे यह जानने की तीव्र इच्छा रखता हूँ कि श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका क्या नाम है? उस पावन दिन किस देवता का पूजन किया जाता है और उस व्रत को धारण करने से जीव को किस श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होती है? हे पितामह, कृपया इस रहस्य का उद्घाटन कर मुझे कृतार्थ करें'" ।
देवर्षि नारद के इस लोक-कल्याणकारी प्रश्न को सुनकर ब्रह्मा जी अत्यंत प्रसन्न हुए। ब्रह्मा जी ने गंभीर स्वर में कहा: "हे नारद! सुनो। तुमने संपूर्ण लोकों के हित की उत्कृष्ट लालसा से यह अत्यंत सुंदर और श्रेष्ठ प्रश्न किया है। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका नाम 'कामिका एकादशी' है। यह एकादशी इतनी परम पवित्र और पुण्यमयी है कि केवल इसका नाम सुनने मात्र से ही मनुष्य को वाजपेय यज्ञ करने के समान महान फल की प्राप्ति हो जाती है" ।
ब्रह्मा जी ने कामिका एकादशी के अलौकिक माहात्म्य का विस्तार करते हुए देवर्षि नारद से कहा: "हे नारद! इस एकादशी के दिन शंख, चक्र, गदाधारी भगवान श्रीहरि विष्णु का पूजन किया जाता है। जो मनुष्य इस दिन श्रीधर, हरि, विष्णु, माधव और मधुसूदन आदि पवित्र नामों का उच्चारण करते हुए भगवान की आराधना करता है, उसके पुण्य का वर्णन स्वयं मैं भी पूर्ण रूप से नहीं कर सकता । हे पुत्र, जो फल मनुष्य को पवित्र पावनी गंगा नदी, काशी, नैमिषारण्य और पुष्कर तीर्थ में वर्षों तक तपस्या और स्नान करने से प्राप्त होता है, वही फल कामिका एकादशी के दिन भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से सहज ही प्राप्त हो जाता है" ।
पारंपरिक ग्रंथों में कामिका एकादशी के माहात्म्य की तुलना विभिन्न पवित्र कर्मों से की गई है, जिसका विवरण निम्नलिखित रूप में प्राप्त होता है:
| पवित्र कार्य एवं तीर्थ | कामिका एकादशी के समतुल्य पुण्य |
|---|---|
| महान यज्ञों का फल | वाजपेय यज्ञ और अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान के समान असीमित पुण्य । |
| महातीर्थों में स्नान | गंगा, काशी, नैमिषारण्य, और पुष्कर जैसे पावन तीर्थों में स्नान के समान । |
| ग्रहण काल का पुण्य | सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के परम पवित्र समय में केदारनाथ और कुरुक्षेत्र में स्नान करने का फल । |
| महादान का फल | स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत और बछड़े सहित गौ-दान (गौमाता का दान) तथा समुद्र और वन सहित संपूर्ण पृथ्वी के दान का फल । |
| विशेष योग में स्नान | सिंह राशि के बृहस्पति में गोदावरी नदी और गंडकी नदी (व्यतीपात योग) में स्नान के फल से भी अधिक । |
ब्रह्मा जी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा: "हे देवर्षि! पापरूपी कीचड़ में फँसे हुए और संसाररूपी अगाध सागर में डूबते हुए दुखी मनुष्यों के लिए इस एकादशी का व्रत और भगवान विष्णु का पूजन एक सुदृढ़ नौका के समान है । इससे बढ़कर पापों के नाश का अन्य कोई भी उपाय तीनों लोकों में नहीं है। स्वयं परमेश्वर भगवान श्रीहरि ने यह उद्घोष किया है कि जो प्राणी कामिका एकादशी का व्रत धारण करता है, वह कभी भी मृत्यु के देवता यमराज के भयंकर दर्शन नहीं करता, उसे नरक की घोर यातनाएँ नहीं सहनी पड़तीं, और वह कुयोनि (नीच योनि) में कभी जन्म नहीं लेता" ।
तुलसी-पूजन और दीप-दान का विशेष माहात्म्य
पारंपरिक कामिका एकादशी महात्म्य में भगवान विष्णु की परम प्रिय तुलसी देवी के पूजन का अत्यंत विशेष और अनिवार्य प्रसंग आता है। ब्रह्मा जी ने नारद जी को इस रहस्य का उपदेश देते हुए कहा:
"हे देवर्षि! जो मनुष्य इस कामिका एकादशी के दिन पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ भगवान विष्णु के श्रीचरणों में तुलसी-दल अर्पण करते हैं, वे इस भौतिक संसार के समस्त भयंकर पापों से उसी प्रकार अछूते रहते हैं, जैसे कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी जल से सर्वथा अछूता रहता है । भगवान श्रीहरि बहुमूल्य रत्नों, चमकते मोतियों, मणियों और स्वर्ण-रजत के भारी आभूषणों से भी इतने प्रसन्न नहीं होते, जितने कि वे एक मात्र तुलसी-दल के अर्पण करने से प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान को तुलसी का एक पत्ता अर्पित करने का फल चार भार चाँदी और एक भार स्वर्ण (सोना) के दान के बराबर माना गया है । हे नारद! मैं स्वयं भगवान की उस अतिप्रिय तुलसी देवी को सदैव नमस्कार करता हूँ। तुलसी के पवित्र पौधे को सींचने मात्र से मनुष्य की समस्त यम-यातनाएँ नष्ट हो जाती हैं। तुलसी के दर्शन मात्र से पूर्व जन्मों के पाप भस्म हो जाते हैं, उसके स्पर्श से मनुष्य का शरीर पवित्र हो जाता है, और जो भक्त तुलसी को आरोपित करता है (लगाता है), वह भगवान श्रीकृष्ण के समीप वैकुंठ लोक में निवास करता है" ।
इसके साथ ही रात्रि-जागरण और दीप-दान की अद्भुत महिमा बताते हुए ब्रह्मा जी कहते हैं:
"हे मुनिश्रेष्ठ! कामिका एकादशी की पावन रात्रि को जो मनुष्य भगवान के मंदिर में जागरण करते हैं और उनके समक्ष घी अथवा तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करते हैं, उनके पुण्यों का लेखा-जोखा लिखने में यमराज के सचिव चित्रगुप्त भी सर्वथा असमर्थ हो जाते हैं । जिसके द्वारा जलाया गया दीपक एकादशी की रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख निरंतर जलता है, उसके पितर स्वर्गलोक में स्थित होकर अमृत-पान से तृप्त होते हैं। देह त्यागने के पश्चात् वह मनुष्य करोड़ों दीपकों से पूजित और देदीप्यमान होकर सीधे सूर्यलोक या भगवान विष्णु के परम धाम को गमन करता है" ।
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा: "हे धर्मराज! इस प्रकार पितामह ब्रह्मा जी ने नारद जी को कामिका एकादशी के अनुपम माहात्म्य का बोध कराया। अब मैं तुम्हें इस एकादशी से जुड़ी वह अत्यंत प्राचीन और पारंपरिक कथा सुनाता हूँ, जो महापापों का नाश करने वाली है।"
२. मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण रूप में)
कामिका एकादशी की मूल पारंपरिक कथा के दो अत्यंत प्रसिद्ध संस्करण विभिन्न पौराणिक व पारंपरिक ग्रंथों (पद्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण और स्कंद पुराण आदि) में प्राप्त होते हैं। दोनों ही संस्करणों का मूल संदेश अनजाने में हुए महापाप से मुक्ति और एकादशी व्रत का अमोघ प्रभाव है। शास्त्र-निर्देशानुसार यहाँ दोनों ही प्रमुख पारंपरिक पाठों को उनके पूर्ण, अक्षुण्ण और विस्तारपूर्वक रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है。
प्रथम संस्करण: क्षत्रिय और ब्राह्मण का पारंपरिक आख्यान
(पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण पर आधारित सर्वाधिक प्रचलित पारंपरिक पाठ)
प्राचीन काल की बात है, किसी राज्य के एक अत्यंत समृद्ध गाँव में एक पराक्रमी और बलवान क्षत्रिय (ठाकुर) निवास करता था । वह क्षत्रिय धन-धान्य, भूमि और अपार बाहुबल से पूर्ण था। यद्यपि वह भगवान का स्मरण करता था और उनके प्रति आस्था रखता था, परंतु अत्यधिक बाहुबल, यौवन और संपत्ति के कारण उसके मन में अहंकार ने अपना गहरा स्थान बना लिया था। वह अत्यंत क्रोधी स्वभाव का था और अपनी शारीरिक शक्ति के मद में दिन-रात चूर रहता था ।
उसी गाँव में एक अत्यंत विद्वान, सदाचारी और तपस्वी ब्राह्मण भी रहते थे। वे ब्राह्मण नित्य-प्रति भगवान की पूजा-अर्चना, संन्ध्या-वंदन और वेद-पाठ में अपना समय व्यतीत करते थे। उनका शरीर अत्यंत दुर्बल था, परंतु वे आध्यात्मिक तेज और सादगी से युक्त थे。
विवाद और अनजाने में महापाप (ब्रह्महत्या का प्रसंग)
एक दिन वह अहंकारी क्षत्रिय किसी महत्वपूर्ण कार्य हेतु गाँव के मार्ग से होकर कहीं जा रहा था। मार्ग में दैवयोग से उसका सामना उस विद्वान ब्राह्मण से हो गया । मार्ग पार करने या किसी अन्य सांसारिक विषय को लेकर क्षत्रिय और ब्राह्मण के मध्य अचानक एक विवाद उत्पन्न हो गया। क्षत्रिय का स्वभाव वैसे ही अत्यंत उग्र और क्रोधी था। देखते ही देखते वह विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि बात अपशब्दों से होते हुए हाथापाई और शारीरिक बल-प्रयोग तक पहुँच गई ।
क्रोध से अंधे हो चुके उस बलवान क्षत्रिय ने अपने शारीरिक बल का तनिक भी विचार न करते हुए उस दुर्बल ब्राह्मण पर एक जोरदार और प्राणघातक प्रहार कर दिया। क्षत्रिय का वह प्रहार इतना भयानक था कि वह कमज़ोर और वृद्ध ब्राह्मण उस आघात को सहन न कर सका। वह उसी क्षण भूमि पर अचेत होकर गिर पड़ा और देखते ही देखते, उसी स्थान पर तड़पते हुए ब्राह्मण ने अपने प्राण त्याग दिए ।
अपराध-बोध, समाज द्वारा बहिष्कार एवं घोर भय
जैसे ही ब्राह्मण के प्राण पखेरू उड़े, क्षत्रिय का सारा क्रोध, मद और अहंकार क्षण भर में वाष्प के समान उड़ गया। ब्राह्मण को अपने ही हाथों मृत देखकर क्षत्रिय स्तब्ध रह गया। उसे अपनी भयंकर भूल और पाप का पूर्ण रूप से आभास हुआ। उसके हृदय में अत्यंत तीव्र अपराध-बोध, ग्लानि और मृत्यु का भय उत्पन्न हो गया। उसने एक निर्दोष और पवित्र ब्राह्मण की हत्या कर दी थी, जो सनातन धर्म और शास्त्रों में सबसे भयंकर 'ब्रह्महत्या' का महापाप माना गया है ।
इस अत्यंत दुःखद और लोमहर्षक घटना का समाचार जंगल की आग की तरह संपूर्ण गाँव और आस-पास के क्षेत्रों में फैल गया। क्षत्रिय को अपने अमानवीय कृत्य पर घोर पश्चाताप हो रहा था। वह विलाप करने लगा। प्रायश्चित की भावना से भरकर, क्षत्रिय ने यह निश्चय किया कि वह स्वयं उस मृत ब्राह्मण के दाह-संस्कार और त्रयोदशी आदि अंतिम क्रिया-कर्मों को अपने धन से संपन्न करेगा ।
परंतु जब उसने यह प्रस्ताव गाँव के अन्य विद्वान ब्राह्मणों और पंडितों के समक्ष रखा, तो उन्होंने अत्यंत कठोरता के साथ उसका पूर्ण बहिष्कार कर दिया। सभी पंडितों ने एक स्वर में क्षत्रिय से कहा:
"हे दुराचारी! तूने अत्यंत घोर पाप किया है। तेरे ऊपर 'ब्रह्महत्या' का भयंकर दोष लग चुका है। तू एक महापापी है और पापी के हाथों से किए गए किसी भी धार्मिक कार्य या अंतिम संस्कार को शास्त्र कभी मान्यता नहीं देते। जब तक तू इस ब्रह्महत्या के महापाप से पूर्ण रूप से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक न तो हम तुझे इस ब्राह्मण की अंतिम क्रिया में सम्मिलित होने देंगे, न ही हम तेरे घर का जल या अन्न ग्रहण करेंगे, और न ही कोई धार्मिक कार्य तेरे निवास पर संपन्न किया जाएगा। आज से तेरा संपूर्ण सामाजिक और धार्मिक रूप से बहिष्कार किया जाता है। तू अछूत और पतित हो गया है" ।
ऋषियों से मार्गदर्शन एवं व्रत का उपदेश
पंडितों और ब्राह्मणों के इन कठोर परंतु सत्य वचनों को सुनकर क्षत्रिय अत्यंत व्याकुल और दुखी हो गया। ब्रह्महत्या के पाप का भारी बोझ उसे प्रतिपल भीतर ही भीतर जला रहा था। वह इस घोर नरकगामी पाप से किसी भी प्रकार से मुक्ति पाना चाहता था ।
वह रोता हुआ, हाथ जोड़कर उन विद्वान ब्राह्मणों और मुनियों के चरणों में गिर पड़ा। उसने अत्यंत आर्त स्वर में रुदन करते हुए प्रार्थना की: "हे ऋषियों! हे विप्रगण! मैं मानता हूँ कि क्रोध के वशीभूत होकर मुझसे यह महापाप हो गया है। मेरा अपराध किसी भी स्थिति में क्षमा के योग्य नहीं है। परंतु हे महात्मनों! शास्त्रों में हर पाप का प्रायश्चित वर्णित है। कृपा करके आप लोग मुझे कोई ऐसा उपाय, कोई ऐसा व्रत या तपस्या बताएँ, जिससे मेरे इस घोर ब्रह्महत्या के दोष का निवारण हो सके और मैं इस असहनीय मानसिक पीड़ा और महापाप से मुक्त हो सकूँ। अन्यथा मैं इसी क्षण अपने प्राण त्याग दूँगा" ।
क्षत्रिय के इस सच्चे पश्चाताप, उसके रुदन और आर्त पुकार को देखकर पंडितों और ऋषियों का हृदय कुछ द्रवित हुआ। उन्होंने अपने शास्त्रों और पुराणों का स्मरण किया। तत्पश्चात उन्होंने क्षत्रिय को प्रायश्चित का मार्ग बताते हुए उपदेश दिया:
"हे क्षत्रिय! यदि तू वास्तव में अपने इस महापाप से मुक्ति चाहता है, तो ध्यानपूर्वक सुन। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में जो पावन एकादशी आती है, जिसे 'कामिका एकादशी' कहा जाता है, तू पूर्ण श्रद्धा, नियम और निष्ठा के साथ उस एकादशी का व्रत कर । एकादशी के दिन निराहार रहकर शंख, चक्र, गदाधारी भगवान श्रीहरि विष्णु (श्रीधर) की विधि-विधान से पूजा कर। रात्रि के समय भगवान के समक्ष दीप-दान और जागरण कर। अगले दिन द्वादशी को ब्राह्मणों को आदरपूर्वक आमंत्रित कर, उन्हें उत्तम भोजन कराकर और उन्हें अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा और दान देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर। ऐसा करने से ही भगवान श्रीहरि की कृपा होगी और तू इस ब्रह्महत्या के महापाप से मुक्त हो सकेगा" ।
श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन, पाप-निवारण एवं शुद्धि
पंडितों और मुनियों से कामिका एकादशी के व्रत का यह दिव्य उपदेश प्राप्त कर, क्षत्रिय को जीवन की एक नई आशा दिखाई दी। जैसे ही श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी की पावन तिथि आई, उस क्षत्रिय ने पूर्ण विधि-विधान, अत्यंत श्रद्धा और अटूट भक्ति के साथ इस व्रत का पालन किया ।
उसने दिन भर निर्जला उपवास किया। भगवान श्रीहरि विष्णु की प्रतिमा को स्नान कराकर पीले वस्त्र, चंदन, पुष्प, और विशेष रूप से भगवान की परम प्रिय 'तुलसी' अर्पित करके उनका विधिवत पूजन किया। संपूर्ण रात्रि उसने भगवान की मूर्ति के समीप बैठकर जागरण किया और घी का अखंड दीपक प्रज्वलित कर भगवान के नामों और मंत्रों का रुदन करते हुए जाप किया ।
रात्रि के समय, जब वह जागरण करते हुए अत्यंत थक गया और भगवान की मूर्ति के समीप ही उसे हल्की सी तंद्रा (नींद) आ गई, तब उसकी अनन्य भक्ति और सच्चे पश्चाताप से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु (श्रीधर रूप में) उसे स्वप्न में दर्शन देने के लिए प्रकट हुए ।
भगवान के दिव्य, चतुर्भुज और तेजोमय स्वरूप को देखकर क्षत्रिय स्वप्न में ही उनके श्रीचरणों में गिर पड़ा और अपने अपराध की क्षमा माँगने लगा। तब अत्यंत करुणा से भरे हुए भगवान श्रीहरि ने उससे मधुर वाणी में कहा:
"हे क्षत्रिय! उठो। तुम्हारे द्वारा किए गए इस उत्तम कामिका एकादशी के व्रत, तुम्हारी निष्कपट श्रद्धा, तुलसी-पूजन और सच्चे पश्चाताप से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। इस पापनाशिनी एकादशी के प्रभाव से मैंने तुम्हें ब्रह्महत्या जैसे भयंकर महापाप से पूर्णतः मुक्त कर दिया है। अब तुम पाप-मुक्त हो चुके हो" ।
प्रातः काल जागने पर क्षत्रिय का हृदय एक अलौकिक शांति और आनंद से भर गया था। उसका सारा भय और पाप का बोझ सदा के लिए समाप्त हो चुका था। द्वादशी के दिन उसने मुनियों के निर्देशानुसार ब्राह्मणों को आदर सहित अपने घर बुलाया, उन्हें उत्तम भोजन कराया, और यथोचित दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। ब्राह्मणों ने भी उसे भगवान द्वारा पाप-मुक्त और शुद्ध मानकर उसके द्वारा दिए गए दान को स्वीकार किया ।
इस प्रकार, कामिका एकादशी का व्रत करने से वह क्षत्रिय सांसारिक जीवन में सभी सुखों को भोगकर, अंत काल में यमराज के भयंकर पाश से बचकर साक्षात भगवान विष्णु के परम धाम (वैकुंठ लोक) को प्राप्त हुआ ।
द्वितीय संस्करण: शिकारी और गोहत्या के महापाप का आख्यान
(स्कंद पुराण एवं अन्य क्षेत्रीय पारंपरिक एकादशी-व्रत ग्रंथों पर आधारित)
कामिका एकादशी महात्म्य की एक अन्य अत्यंत प्रभावशाली और प्राचीन कथा स्कंद पुराण और अन्य पारंपरिक वचनों में प्राप्त होती है। यह कथा 'अनजाने में हुए पाप' और 'हृदय के सच्चे परिवर्तन' पर केंद्रित है। एकादशी के दिन इस कथा का वाचन भी अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना गया है。
प्राचीन काल में एक अत्यंत घने और भयंकर वन में एक भील (शिकारी) निवास करता था। उसका स्वभाव अत्यंत हिंसक, क्रूर और निर्दयी था। वह दिन-रात जंगली पशुओं और पक्षियों का शिकार करके ही अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। उसके जीवन में धर्म, दया, यज्ञ या ईश्वर-भक्ति का कोई स्थान नहीं था। जीवन पर्यंत जीव-हत्या करने के कारण वह सिर से लेकर पैर तक घोर पापों के भारी बोझ से दबा हुआ था ।
अनजाने में गोहत्या का महापाप
एक दिन वह शिकारी अपने तीखे धनुष-बाण लेकर घने जंगल में शिकार की खोज में भटक रहा था। झाड़ियों के पीछे उसे किसी बड़े पशु के हिलने की आहट सुनाई दी। वन के उस अंधकारमय हिस्से में शिकारी को लगा कि वह कोई बड़ा जंगली सुअर या हिरण है। बिना भली-भांति देखे और विचार किए, उसने तुरंत अपने धनुष की प्रत्यंचा खींची और एक विषैला बाण चला दिया。
बाण सीधे उस पशु को जाकर लगा और वह एक चीत्कार के साथ रक्त से लथपथ होकर भूमि पर गिर पड़ा। जब शिकारी प्रसन्नतापूर्वक दौड़कर झाड़ियों के पीछे अपने शिकार को देखने गया, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह कोई जंगली पशु नहीं था, बल्कि एक अत्यंत शांत और पवित्र गौमाता (गाय) थी जो वहां एकांत में घास चर रही थी। अज्ञानता और जल्दबाज़ी के कारण उस शिकारी से 'गोहत्या' का भयंकर महापाप हो गया था。
गौमाता को तड़प-तड़प कर अपने समक्ष प्राण त्यागते देख उस क्रूर शिकारी का हृदय पहली बार काँप उठा। उसका अंतर्मन एक अजीब से अपराध-बोध और अज्ञात भय से भर गया। यद्यपि वह एक हिंसक व्यक्ति था, परंतु उसे यह भान हो गया कि गोहत्या का पाप सनातन धर्म में सबसे बड़ा पाप है और यह उसे सीधे नरक की सबसे गहरी और दर्दनाक यातनाओं में धकेल देगा। वह अपने कृत्य पर फूट-फूट कर रोने लगा ।
ऋषि से मार्गदर्शन और एकादशी व्रत का उपदेश
उस महापाप की ग्लानि से व्याकुल होकर शिकारी ने अपने धनुष-बाण वहीं तोड़कर फेंक दिए। उसने शिकार करना छोड़ दिया और वह पागलों की भांति वनों में भटकने लगा। उसका मन किसी भी क्षण शांत नहीं हो पा रहा था। इसी भटकन के दौरान, उसकी भेंट वन में कुटिया बनाकर तपस्या कर रहे एक अत्यंत ज्ञानी और दयालु तपस्वी ऋषि से हुई。
शिकारी रोते हुए उस मुनि के चरणों में गिर पड़ा और उसने अनजाने में हुई गोहत्या का पूरा वृतांत मुनि को कह सुनाया ।
शिकारी ने हाथ जोड़कर कहा, "हे महर्षि! मैंने अज्ञानतावश एक पवित्र गौमाता की हत्या कर दी है। मेरे जीवन भर के हिंसक कार्यों और इस गोहत्या के पाप से मुझे अत्यंत भय लग रहा है। मुझे हर ओर नरक की अग्नि दिखाई दे रही है। कृपया मुझ पापी पर दया करें और मुझे इस घोर पाप से उद्धार का कोई मार्ग प्रशस्त करें।"
ऋषि ने अपने तपोबल से शिकारी की स्थिति को समझा और उसके हृदय में उत्पन्न हुए सच्चे पश्चाताप को देखकर कहा: "हे व्याध! गोहत्या निसंदेह एक अत्यंत भयंकर और अक्षम्य पाप है, परंतु सच्चे हृदय से किए गए पश्चाताप और भगवान श्रीहरि की शरण में जाने से बड़े से बड़े पाप भी भस्म हो जाते हैं। जल्द ही श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की 'कामिका एकादशी' आने वाली है। यह एकादशी महापापों का नाश करने वाली अमोघ अस्त्र है। तू उस दिन पूर्ण रूप से उपवास रखना। किसी भी जीव को कष्ट मत देना। भगवान विष्णु के पवित्र मंत्रों का जाप करना और रात्रि में साधारण रूप से, परंतु सच्चे हृदय से भगवान की पूजा (तुलसी दल और दीप द्वारा) करना" ।
श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन, पाप-निवारण एवं उत्तम गति की प्राप्ति
मुनि के इस आदेश को उस शिकारी ने अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया। जैसे ही कामिका एकादशी का पावन दिन आया, उस शिकारी ने पूर्ण रूप से अन्न और जल का त्याग कर दिया। उसने वन से जंगली पुष्प और पवित्र तुलसी-दल एकत्रित किए और एक साधारण सी वेदी बनाकर भगवान विष्णु का अत्यंत हृदयस्पर्शी और सच्चा पूजन किया ।
उसने पूरी रात्रि जागरण करते हुए "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का साधारण परंतु अश्रुपूर्ण जाप किया। भगवान श्रीहरि, जो कि भाव के भूखे हैं और मात्र बाहरी दिखावे को नहीं बल्कि हृदय की सच्चाई को देखते हैं, उस शिकारी के इस निष्कपट और शांत समर्पण से अत्यंत प्रसन्न हुए ।
उसी एकादशी की शुभ रात्रि को, भगवान विष्णु ने अपनी दिव्य कृपा दृष्टि उस शिकारी पर डाली। भगवान की अहैतुकी कृपा से उसके जीवन भर की हिंसा, पाप और अनजाने में हुई गोहत्या का भारी कलंक उसी क्षण धुलकर नष्ट हो गया। उसे एक दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई और उसका अंतःकरण पूर्णतः शुद्ध हो गया ।
उसने अपना शेष जीवन एक सच्चे भक्त और साधु के रूप में व्यतीत किया और अंत काल में जब उसकी मृत्यु हुई, तो यमदूतों के स्थान पर भगवान विष्णु के पार्षद दिव्य विमान लेकर उसे वैकुंठ लोक (विष्णु-लोक) ले जाने के लिए आए। इस प्रकार, कामिका एकादशी के व्रत के प्रताप और भगवान विष्णु की विशेष कृपा से एक महापापी शिकारी भी मोक्ष और उत्तम गति का अधिकारी बन गया ।
३. अत्यंत महत्वपूर्ण शास्त्रीय चेतावनी
कथा के इस पड़ाव पर, शास्त्रों (विशेषकर ब्रह्मवैवर्त पुराण) में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा धर्मराज युधिष्ठिर को एक अत्यंत स्पष्ट और कठोर चेतावनी भी दी गई है, जिसे कथा वाचन के समय श्रोताओं के समक्ष अवश्य स्मरण रखा जाना चाहिए:
"हे युधिष्ठिर! यद्यपि यह सत्य है कि कामिका एकादशी ब्रह्महत्या, गोहत्या और भ्रूणहत्या जैसे भयंकर महापापों को समूल नष्ट करने की सामर्थ्य रखती है, परंतु किसी भी मनुष्य को अपने मन में यह कदापि नहीं सोचना चाहिए कि वह जानबूझकर पहले किसी ब्राह्मण, स्त्री, गौ अथवा निर्दोष प्राणी की हत्या कर ले या कोई अन्य घोर पाप कर ले, और बाद में कामिका एकादशी का व्रत करके उस पाप के दंड से सरलता से बच जाएगा ।
पहले से योजना बनाकर, जानबूझकर (स्वार्थ, लालच या द्वेषवश) किया गया पाप अत्यंत घृणित और निंदनीय है। ऐसे जानबूझकर किए गए पापों का क्षमादान इस व्रत से नहीं मिलता। एकादशी का व्रत केवल उन पापों को नष्ट करता है जो अज्ञानतावश, भूलवश या क्रोध के अचानक आवेग में हो गए हों और जिनके लिए मनुष्य के मन में सच्चा और गहरा पश्चाताप हो" ।
४. पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति (Phal-Shruti)
भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को यह पावन और रहस्यमयी आख्यान सुनाते हुए कथा का समापन किया और इसके अंत में उन पारंपरिक फल-वचनों (फलश्रुति) का वर्णन किया, जिनका वाचन किए बिना कोई भी पौराणिक कथा या एकादशी का व्रत पूर्ण नहीं माना जाता ।
भगवान श्रीकृष्ण अपने मधुर स्वर में बोले: "हे राजन! हे कुंतीपुत्र! यह मैंने तुम्हारे समक्ष कामिका एकादशी के उस महान और अतुलनीय माहात्म्य का पूर्ण रूप से वर्णन कर दिया है, जो पूर्वकाल में जगतपिता ब्रह्मा जी ने देवर्षि नारद को सुनाया था। यह 'कामिका' एकादशी मनुष्यों के समस्त महापातकों को हरने वाली, उन्हें पाप-मुक्त करने वाली और परम कल्याण प्रदान करने वाली है । अतः जो मनुष्य संसार के दुखों और जन्म-मरण के चक्र से भयभीत हैं, उन्हें इस व्रत का पालन अवश्यमेव करना चाहिए। यह एकादशी स्वर्गलोक तथा महान पुण्य फल प्रदान करने वाली है।"
पारंपरिक फल-वचन (श्रवण और पठन का फल): "जो कोई भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा और अटूट विश्वास के साथ इस कामिका एकादशी की व्रत कथा को पढ़ता है, अथवा एकाग्रचित्त होकर इस माहात्म्य का श्रवण करता है, वह मनुष्य अपने सभी पूर्व जन्मों और इस जन्म के ज्ञात-अज्ञात पापों से तत्काल मुक्त और शुद्ध हो जाता है । इस पावन कथा के श्रवण मात्र से मनुष्य इस नश्वर लोक में समस्त भौतिक सुखों को भोगता है, उसके सभी क्लेश दूर हो जाते हैं, और मृत्यु के पश्चात् वह भगवान विष्णु के परम धाम, वैकुंठ लोक (विष्णु-लोक) में आदरपूर्वक गमन करता है, जहाँ से उसे इस जन्म-मृत्यु के चक्र में पुनः नहीं लौटना पड़ता" ।
इस प्रकार, यह पापनाशिनी और मोक्षदायिनी कामिका एकादशी व्रत की संपूर्ण, प्रामाणिक और पारंपरिक कथा यहाँ संपन्न होती है।
बोलिए श्री शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी भगवान श्रीहरि विष्णु की जय!
बोलिए धर्मराज युधिष्ठिर की जय!
बोलिए एकादशी महारानी की जय!
बोलिए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!