विस्तृत उत्तर
पद्म पुराण के उत्तर खण्ड तथा स्कंद पुराण के वैष्णव खण्ड में इस कथा का अत्यंत विशद और मार्मिक वर्णन प्राप्त होता है।
प्राचीन काल में जलंधर नामक एक अत्यंत पराक्रमी असुर था, जिसने त्रिलोकी में हाहाकार मचा रखा था। उसकी अजेयता का मुख्य कारण उसकी पत्नी वृंदा का अखंड पातिव्रत्य धर्म और उसकी भगवान विष्णु के प्रति अनन्य भक्ति थी।
सृष्टि के संतुलन और धर्म की रक्षा हेतु भगवान श्रीहरि विष्णु ने छलपूर्वक जलंधर का रूप धारण कर वृंदा का सतीत्व भंग कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप जलंधर की अजेयता समाप्त हो गई और शिव द्वारा उसका वध संभव हो सका।
जब सती वृंदा को भगवान विष्णु के इस छल का भान हुआ, तो उसने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया कि वे पाषाण (शालिग्राम) में परिवर्तित हो जाएँ। भगवान विष्णु ने वृंदा को यह वरदान दिया कि वह 'तुलसी' के रूप में उत्पन्न होगी और त्रिलोकी में सर्वाधिक पूजनीय होगी। बिना तुलसी-दल के भगवान विष्णु की कोई भी पूजा, नैवेद्य या यज्ञ कभी भी स्वीकार्य नहीं होगा। इसी वरदान की स्मृति में प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन तुलसी और शालिग्राम का विवाह संपन्न कराया जाता है।





