विस्तृत उत्तर
स्कंद पुराण के काशी खंड (उत्तरार्ध) के ७१वें अध्याय में महर्षि अगस्त्य और भगवान कार्तिकेय (स्कंद) के संवाद में इसका वर्णन है।
कथा के अनुसार, रुरु दैत्य के वंश में 'दुर्गम' (दुर्गमासुर) नामक एक महापराक्रमी असुर का जन्म हुआ था। उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत कठोर तपस्या की और यह वरदान प्राप्त कर लिया कि कोई भी पुरुष उसका वध न कर सके और चारों वेदों का ज्ञान उसके अधीन हो जाए। वेदों के लुप्त होते ही संसार में धर्म और यज्ञ-कर्म समाप्त हो गए, जिससे देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई। दुर्गमासुर ने अपनी शक्ति से इन्द्र, वायु, चंद्र, यम, अग्नि, वरुण और कुबेर आदि सभी देवताओं के अधिकार छीन लिए।
असुर के अत्याचारों से त्रस्त होकर देवताओं ने आद्याशक्ति का आह्वान किया। देवी पार्वती ने एक महाभयंकर और अजेय रूप धारण किया। देवी ने अपने तीक्ष्ण बाणों से दुर्गमासुर के रथ, अश्व और सारथी को नष्ट कर दिया और अंततः पाँच बाण मारकर उसका वध कर दिया। इस महादैत्य दुर्गम का वध करने के कारण, देवताओं और ऋषियों ने घोषणा की कि आज से तीनों लोकों में माता पार्वती का यह रौद्र रूप 'दुर्गा' के नाम से विख्यात होगा।





