दिव्यास्त्रस्कंद पुराण में कार्तिकेय के अस्त्रों का क्या वर्णन हैस्कंद पुराण में कार्तिकेय का मुख्य अस्त्र वेल (माता-प्रदत्त भाला) है। जन्म से ही उनके हाथ में दिव्य शस्त्र थे। वेल से तारकासुर-वध और सुरपदम का पहाड़-रूप तोड़ा। वे देव-सेनापति हैं।#स्कंद पुराण#कार्तिकेय अस्त्र#वेल
लोकजालंधर की कहानी किस पुराण में आती है?जालंधर की कथा प्रमुख रूप से शिव पुराण में आती है।#जालंधर पुराण#शिव पुराण#स्कंद पुराण
लोकशस्त्र मृत्यु का श्राद्ध कब करें?शस्त्र मृत्यु का श्राद्ध पितृ पक्ष की चतुर्दशी को करें।#शस्त्र मृत्यु#चतुर्दशी श्राद्ध#स्कंद पुराण
श्राद्ध दर्शनपृथ्वी पर अर्पित अन्न पितरों को कैसे मिलता है?मत्स्य/स्कंद पुराण: पितर की योनि के अनुसार अन्न रूपांतरित होता है — देव योनि = अमृत, असुर योनि = भोग, पशु योनि = तृण (घास), सर्प योनि = वायु। मंत्र शक्ति + श्रद्धा से यह सूक्ष्म रूपांतरण होता है।#पारलौकिक विज्ञान#मत्स्य पुराण#स्कंद पुराण
लोकस्कंद पुराण में वैराज देवगणों की क्या विशेषताएँ बताई गई हैं?स्कंद पुराण में वैराज देवगण तृष्णा-मुक्त, निवृत्ति मार्गी, वासुदेव-समर्पित और ब्रह्म-ध्यान में लीन बताए गए हैं।#स्कंद पुराण#वैराज#तृष्णा
दान विधानमकर संक्रांति पर राशि अनुसार क्या दान करें?राशि अनुसार दान: मेष = ऊनी वस्त्र; वृषभ = गाय-चावल; मिथुन = हरे मूंग; कर्क = घी-चांदी; सिंह = स्वर्ण-गेहूं; कन्या = अन्न-बीज; तुला/वृश्चिक = वस्त्र; धनु = चने की दाल; मकर = तिल-कंबल-ईंधन; कुम्भ = जल-घड़े; मीन = पुष्प-मिष्ठान।#राशि अनुसार दान#भविष्य पुराण#स्कंद पुराण
तुलसी विवाह परिचयतुलसी और शालिग्राम का विवाह क्यों होता है — क्या कथा है?पद्म पुराण और स्कंद पुराण: जलंधर असुर की पत्नी वृंदा के पातिव्रत्य के कारण वह अजेय था। विष्णु ने छल से जलंधर का रूप लिया → वृंदा का पातिव्रत्य भंग → जलंधर का वध संभव। वृंदा ने विष्णु को 'शालिग्राम' बनने का श्राप दिया → विष्णु ने वृंदा को 'तुलसी' बनने का वरदान दिया।#तुलसी शालिग्राम कथा#वृंदा जलंधर#पद्म पुराण
नवरात्रि और उपासनास्कंद पुराण के अनुसार विभिन्न आयु की कन्याएं किस देवी का स्वरूप हैं?स्कंद पुराण: 2 वर्ष = कुमारिका (दुख नाश); 3 = त्रिमूर्ति (धर्म-अर्थ-काम); 4 = कल्याणी (सुख-शांति); 5 = रोहिणी (स्वास्थ्य); 6 = कालिका (शत्रु नाश); 7 = चंडिका (ऐश्वर्य); 8 = शाम्भवी (विजय-लोकप्रियता); 9 = दुर्गा (संकट निवारण); 10 = भद्रा/सुभद्रा (मनोकामना पूर्ति)।#कन्या आयु देवी#स्कंद पुराण#2 से 10 वर्ष
दुर्गा शब्द की व्युत्पत्तिस्कंद पुराण के अनुसार 'दुर्गा' नाम कैसे पड़ा?स्कंद पुराण (काशी खंड, 71वाँ अध्याय): दुर्गमासुर ने वेद चुराए → देवताओं की शक्ति क्षीण → आद्याशक्ति का आह्वान → देवी पार्वती ने महाभयंकर रूप धारण कर दुर्गमासुर का वध किया → देवताओं-ऋषियों ने घोषणा: यह रौद्र रूप 'दुर्गा' कहलाएगा।#दुर्गमासुर#स्कंद पुराण#नामकरण
हरतालिका तीज और उपासनाहरतालिका तीज व्रत क्या है?हरतालिका तीज = भाद्रपद शुक्ल तृतीया, निर्जला व्रत। कथा: हिमालय ने विष्णु से विवाह तय किया → पार्वती दुखी → सखी ने हरण कर जंगल ले गई → पार्वती ने बालू का शिवलिंग बनाकर रात भर जागरण किया → शिव प्रकट हुए और पत्नी स्वीकार किया।#हरतालिका तीज#भाद्रपद#निर्जला व्रत
गुरु तत्व और गुरु कृपागुरु गीता में गुरु के बारे में क्या कहा गया है?गुरु गीता (स्कंद पुराण): 'गुरुर्ब्रह्मागुरुर्विष्णुःगुरुर्देवोमहेश्वरः। गुरुःसाक्षात्परब्रह्म...' — गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश और साक्षात परब्रह्म हैं।#गुरु गीता#स्कंद पुराण#गुरुर्ब्रह्मा
नमः शिवाय मंत्र परिचयस्कंद पुराण में नमः शिवाय के बारे में क्या कहा गया है?स्कंद पुराण कहता है: जिसके हृदय में 'नमः शिवाय' मंत्र निवास करता है, उसे अन्य मंत्रों, तीर्थों, तपस्याओं या यज्ञों की कोई आवश्यकता नहीं।#स्कंद पुराण#नमः शिवाय#तीर्थ तपस्या
शास्त्रीय प्रमाण और फलश्रुतिस्कंद पुराण में पारद शिवलिंग के बारे में क्या कहा गया है?स्कंद पुराण कहता है कि हजार करोड़ शिवलिंगों की पूजा का अतुलनीय फल पारद शिवलिंग के दर्शन मात्र से मिल जाता है।#स्कंद पुराण#दर्शन मात्र#हजार करोड़
पारद शिवलिंग परिचय और माहात्म्यपारद शिवलिंग के दर्शन मात्र से क्या होता है?स्कंद पुराण के अनुसार, हजार करोड़ शिवलिंगों के पूजन से जो फल मिलता है, वही अतुलनीय फल पारद शिवलिंग के दर्शन मात्र से मिल जाता है।#दर्शन मात्र फल#स्कंद पुराण#हजार करोड़ शिवलिंग
विशेष अभिषेक द्रव्य और उनके फलतीर्थ जल से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है?स्कंद पुराण के अनुसार, तीर्थ जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति और सभी पापों का क्षय होता है — यह परम आध्यात्मिक लक्ष्य के लिए सर्वश्रेष्ठ द्रव्य है।#तीर्थ जल#मोक्ष प्राप्ति#पाप क्षय
स्तोत्र पाठप्रदोष स्तोत्राष्टकम् क्या है?यह स्कंद पुराण में लिखा एक खास पाठ है, जिसका अर्थ है कि इस जन्म और मरण के भयंकर संसार में केवल शिव जी के चरणों की सेवा ही एकमात्र सत्य है।#स्कंद पुराण#स्तोत्राष्टकम्#शिव महिमा
मंत्र और स्तोत्रसत्यनारायण भगवान का ध्यान मंत्र क्या है?ध्यान मंत्र है: "ध्यायेत् सत्यं गुणातीतं गुणत्रय-समन्वितम्... नीलवर्णं पीतवस्त्रं..." (अर्थात जो सत्य स्वरूप हैं, तीनों गुणों से परे हैं, नीले रंग और पीले वस्त्रों वाले हैं, उनका मैं ध्यान करता हूँ)।#ध्यान मंत्र#स्कंद पुराण#भगवान का स्वरूप
शास्त्रीय प्रमाणसत्यनारायण व्रत का उल्लेख किस पुराण में मिलता है?इस व्रत का मुख्य उल्लेख 'स्कंद पुराण' के 'रेवा खंड' और 'भविष्य पुराण' के 'प्रतिसर्ग पर्व' में मिलता है, जहाँ भगवान विष्णु स्वयं देवर्षि नारद को इस व्रत की महिमा बताते हैं।#स्कंद पुराण#रेवा खंड#भविष्य पुराण
शास्त्रीय प्रमाणक्या शनिवार व्रत का वर्णन पुराणों और शास्त्रों में है?हाँ, इसका वर्णन स्कंद पुराण, पद्म पुराण, भविष्य पुराण, धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में मिलता है।#शास्त्र प्रमाण#स्कंद पुराण#दशरथ स्तोत्र
काशी के शिवलिंगकाशी में कुक्कुटेश्वर शिवलिंग की स्थापना किसने की थी?इसकी स्थापना भगवान शिव के प्रिय 'कुक्कुट' नामक शिव गण ने की थी। इसका वर्णन स्कंद पुराण के काशी खंड (अध्याय 53) में मिलता है, जहाँ कुक्कुट गण काशी की दिव्यता से मोहित होकर यहीं बस गए और शिवलिंग स्थापित किया।#कुक्कुटेश्वर शिवलिंग#शिव गण कुक्कुट#स्कंद पुराण
उपासना का फलस्कंद पुराण के अनुसार पिंगलेश्वर शिवलिंग की पूजा और दान के क्या फायदे (फल) हैं?यहाँ दर्शन से जन्म-जन्मांतर के पाप भस्म होते हैं और पितरों को प्रेत-योनि से मुक्ति मिलती है। यह तारक ज्ञान प्रदान कर जीव को आवागमन के चक्र से मुक्त करता है और शिव-सायुज्य (मोक्ष) देता है।#मोक्ष प्राप्ति#पाप क्षय#पितृ शांति
काशी के शिवलिंगकाशी में पिंगलेश्वर शिवलिंग किसने स्थापित किया था?इसकी स्थापना साक्षात् शिव के अत्यंत तेजस्वी अनुचर 'पिंगल गण' ने की थी। इसका ऐतिहासिक प्रमाण स्कंद पुराण के काशी खंड में मिलता है।#पिंगलेश्वर शिवलिंग#शिव गण पिंगल#स्कंद पुराण
पौराणिक कथाएँभगवान शिव ने अपने गणों को काशी क्यों भेजा था?राजा दिवोदास के निष्कंटक शासन में दोष निकालने और उन्हें काशी से विस्थापित करने के लिए भगवान शिव ने अपने गणों को काशी भेजा था, ताकि शिव पुनः अपनी प्रिय नगरी लौट सकें।#राजा दिवोदास#शिवगणों का काशी आगमन#स्कंद पुराण
काशी के शिवलिंगकाशी में नंदीशेनेश्वर शिवलिंग किसने स्थापित किया था?इस शिवलिंग की स्थापना शिव के पराक्रमी गण 'नंदीषेण' ने की थी, जिसका प्रामाणिक उल्लेख स्कंद पुराण के काशी खंड (अध्याय 53-54) में प्राप्त होता है।#नंदीशेनेश्वर शिवलिंग#शिवगण नंदीषेण#स्कंद पुराण
तुलनात्मक अध्ययनकाशी में स्थित सोमानंदीश्वर लिंग, चंद्रेश्वर लिंग और सोमेश्वर लिंग में क्या मुख्य अंतर है?सोमेश्वर लिंग गुजरात के सोमनाथ का ज्योतिर्लिंग प्रतिरूप है; चंद्रेश्वर लिंग चंद्रदेव द्वारा स्थापित है जो समृद्धि देता है; जबकि सोमानंदीश्वर लिंग शिवगण सोमनंदी द्वारा स्थापित एक 'तपस्या-स्थल' है जो अवसाद और क्रोध दूर करता है।#सोमानंदीश्वर बनाम चंद्रेश्वर#सोमेश्वर लिंग#काशी के शिवलिंग
काशी के शिवलिंगकाशी के नंदीवन में सोमानंदीश्वर शिवलिंग की स्थापना किसने की और इसका प्रामाणिक उल्लेख किस पुराण में है?इसकी स्थापना भगवान शिव के उग्र गण 'सोमनंदी' ने की थी। इसका प्रामाणिक उल्लेख स्कंद पुराण के काशी खंड (अध्याय 53) में प्राप्त होता है, जब शिव ने गणों को राजा दिवोदास की परीक्षा लेने काशी भेजा था।#सोमानंदीश्वर शिवलिंग#शिव गण सोमनंदी#स्कंद पुराण
काशी के शिवलिंगकाशी में महोदरेश्वर शिवलिंग की स्थापना किसने की और इसका प्रामाणिक उल्लेख किस पुराण में है?इसकी स्थापना भगवान शिव के परम गण 'महोदर' ने की थी। इसका प्रामाणिक उल्लेख स्कंद पुराण के काशी खण्ड (अध्याय ५३-५४) में प्राप्त होता है।#महोदरेश्वर शिवलिंग#शिव गण महोदर#स्कंद पुराण
काशी के शिवलिंगकाशी में महाकालेश्वर शिवलिंग कहाँ स्थित है और इसकी स्थापना किसने की?यह काशी के दारा नगर में महामृत्युंजय महादेव मंदिर प्रांगण में स्थित है। इसकी स्थापना शिव के परम गण 'महाकाल' ने की थी, जिसका वर्णन स्कंद पुराण के काशी खंड में है।#महाकालेश्वर शिवलिंग#काशी#दारा नगर
काशी के शिवलिंगकाशी खंड अध्याय 69 में शंकुकर्णेश्वर का क्या स्थान है — 68 मोक्षदायी शिवलिंगकाशी खंड अध्याय 69 में 68 मोक्षदायी शिवलिंगों में शंकुकर्णेश्वर 'महातेज लिंग' के रूप में वर्णित हैं। कुरुक्षेत्र का स्थाणु, नैमिषारण्य का देवदेव लिंग भी इनमें हैं। श्लोक 173 — इनके नाम सुनने मात्र से हजारों जन्मों के पाप नष्ट।#काशी खंड#अध्याय 69#68 शिवलिंग
काशी के शिवलिंगशंकुकर्णेश्वर महादेव कौन हैं और इनकी स्थापना किसने की?शंकुकर्णेश्वर महादेव काशी का गुप्त शिवलिंग है, जिसे शिवगण 'शंकुकर्ण' ने स्थापित किया। काशी खंड अध्याय 69 में इसे काशी के 68 मोक्षदायी शिवलिंगों में गिना गया है।#शंकुकर्णेश्वर महादेव#काशी#शिवगण
काशी के शिवलिंगकाशी में कुल कितने शिवलिंग हैं और कौन-कौन ने स्थापित किए?काशी में ५११+ शिवलिंग — १२ स्वयंभू, ४६ देवताओं द्वारा, ४७ ऋषियों द्वारा, ४० शिवगणों द्वारा, २९४ शिवभक्तों द्वारा स्थापित। काशी तांत्रिक दृष्टि से एक 'महा-यंत्र' है। वर्तमान में ~३२४ शिवलिंग अस्तित्व में।#काशी#शिवलिंग#511
काशी के तीर्थघंटाकर्ण हृद में स्नान और दर्शन की फलश्रुति — स्कंद पुराणतीन फलश्रुतियाँ — (१) जन्म-मृत्यु चक्र से मुक्ति, (२) कहीं भी मरने पर काशी-मरण का पुण्य, (३) सात पीढ़ियों के नरकवासी पितरों का उद्धार। पितर स्वयं कामना करते हैं कि कोई इस तीर्थ से तिलांजलि अर्पित करे।#घंटाकर्ण हृद#फलश्रुति#मोक्ष
पौराणिक कथाएँराजा दिवोदास के कारण शिव ने काशी क्यों छोड़ी थी?दिवोदास के राजकाल में शिव मंदराचल गए। काशी की स्थिति जानने को योगिनियाँ, सूर्य, ब्रह्मा भेजे — सब काशी की माया में मुग्ध होकर लौटे नहीं। फिर घंटाकर्ण-महोदर को भेजा — वे भी मोहित होकर रुक गए और शिवलिंग स्थापित कर दिए।#दिवोदास#काशी#शिव
काशी के तीर्थघंटाकर्ण हृद (कर्णघंटा तालाब) क्या है और इसमें स्नान का क्या फल है?घंटाकर्ण हृद शिवगण घंटाकर्ण द्वारा स्वयं खोदा गया पवित्र कुंड है (K 60/67)। स्कंद पुराण कहता है — इसमें स्नान कर एकाग्र होने पर विश्वनाथ की आरती के घंटों का दिव्य नाद सुनाई देता है।#घंटाकर्ण हृद#कर्णघंटा तालाब#काशी तीर्थ
काशी के शिवलिंगकाशी में शिवगणों द्वारा स्थापित शिवलिंगों की सूचीकाशी खंड के अनुसार — दंडपाणि ने दंडीश्वर, घंटाकर्ण ने घंटाकर्णेश्वर, वीरभद्र ने वीरभद्रेश्वर, कुण्डोदर ने कुण्डोदरेश्वर, महाकाल ने महाकालेश्वर, क्षेमक ने क्षेमेश्वर, पंचशीर्ष ने पंचशिखेश्वर की स्थापना की।#शिवगण#काशी#शिवलिंग
पुराण ज्ञानस्कंद पुराण सबसे बड़ा पुराण क्यों है?स्कन्द पुराण में ८१,१०० श्लोक हैं — किसी अन्य पुराण से अधिक, इसीलिए यह सबसे बड़ा है। इसमें ६ खण्ड हैं। काशी, जगन्नाथ, महाकाल, रामेश्वर जैसे तीर्थों की महिमा, नदियों की उद्गम-कथाएँ, सत्यनारायण व्रत और शिवरात्रि का वर्णन है।#स्कंद पुराण#सबसे बड़ा पुराण#कार्तिकेय
स्तोत्र परिचयलक्ष्मी सहस्त्रनाम क्या है?लक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्र में देवी के 1000 नाम हैं — स्कंद पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में यह मिलता है। प्रमुख नाम हैं — श्री, रमा, पद्मा, इंदिरा, वसुंधरा, महालक्ष्मी, भुवनेश्वरी, मोक्षदायिनी। शुक्रवार को इसका पाठ लक्ष्मी को स्थायी करता है।#सहस्रनाम#लक्ष्मी सहस्रनाम#1000 नाम
कार्तिकेय कथाकार्तिकेय को स्कंद क्यों कहते हैं?कार्तिकेय को 'स्कंद' इसलिए कहते हैं क्योंकि उनका जन्म शिव-तेज के गंगाजल में स्खलित होने से शरवण वन में हुआ। 'स्कंद' का अर्थ है स्खलित होकर प्रकट होने वाला। शत्रु-सेना को छिन्न करने वाले योद्धा के अर्थ में भी यह नाम सार्थक है।#स्कंद#कार्तिकेय#स्कंद अर्थ