विस्तृत उत्तर
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को 'हरतालिका तीज' का निर्जला व्रत किया जाता है। स्कंद पुराण में भगवान शिव स्वयं पार्वती को इस व्रत की कथा और महिमा सुनाते हैं।
पौराणिक कथा: जब पार्वती के पिता हिमालय ने देवर्षि नारद के कहने पर उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया, तो पार्वती अत्यंत दुखी हुईं क्योंकि वे मन ही मन शिव को पति मान चुकी थीं। पार्वती की एक सखी ने उनका अपहरण (हरण) किया और उन्हें एक घने जंगल में गुफा के भीतर ले गई, ताकि उनका विवाह विष्णु से न हो सके।
उस गुफा में भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में पार्वती ने बालू (रेत) का शिवलिंग बनाया और रात भर जागरण कर निर्जल रहकर शिव की स्तुति की। उनकी इस घोर तपस्या से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए और उन्होंने पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार किया।
भगवान शिव का कथन है कि जो स्त्री पूर्ण श्रद्धा से इस व्रत को करेगी, उसे माता पार्वती के समान अचल सुहाग और मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी।


