विस्तृत उत्तर
स्कंद पुराण में भगवान के स्वरूप का मानसिक चित्रण करने के लिए यह ध्यान मंत्र वर्णित है:
ध्यायेत् सत्यं गुणातीतं गुणत्रय-समन्वितम् । लोकनाथं त्रिलोकेशं कौस्तुभाभरणं हरिम् ॥
नीलवर्णं पीतवस्त्रं श्रीवत्स-पद-भूषितम् । गोविन्दं गोकुलानन्दं ब्रह्माद्यैरपि पूजितम् ॥"
विश्लेषण: यह श्लोक भगवान को 'सत्य' (Ultimate Truth) बताता है जो 'गुणातीत' (गुणों से परे) होकर भी सृष्टि के लिए 'गुणत्रय-समन्वित' हैं। उनका 'नीलवर्ण' अनंतता का और 'पीतवस्त्र' ज्ञान का प्रतीक है।





