विस्तृत उत्तर
महोदरेश्वर जो कि एक 'गुप्त' और जाग्रत लिंग है, की पूजा पूर्णतः अंतर्मुखी और आडंबर-रहित होनी चाहिए।
१. ध्यान: सर्वप्रथम सात्त्विक ध्यान मंत्र "ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं..." अथवा अघोर तांत्रिक ध्यान मंत्र "अघोरेभ्यो नमो नित्यं अघोररूपेभ्यश्च..." का पाठ करना चाहिए, जो भय और लोभ को निर्मूल करता है।
२. अभिषेक एवं पूजन: इसके पश्चात आवाहन, पाद्य, अर्घ्य और आचमन कर शिवलिंग पर शुद्ध गाय के दूध, दही, मधु, घृत और शर्करा (पञ्चामृत) से अभिषेक करना चाहिए। अंत में शिव को भस्म (वैराग्य का प्रतीक) और त्रिदल विल्व-पत्र अर्पित करने का विधान है।
३. जप: रुद्राक्ष की माला पर पंचाक्षरी मंत्र "ॐ नमः शिवाय" का १०८ बार मानसिक (उपांशु) जाप अत्यंत फलदायी है।
४. क्षमा-प्रार्थना: अंत में पाप-क्षय हेतु "करचरणकृतं वाक्कायजं..." मंत्र से क्षमा-प्रार्थना करते हुए सम्पूर्ण फल शिव को समर्पित कर देना चाहिए।





